लघु कथा -80

रामपुर कस्बे में दो भाई रहते थे—रमेश और सुरेश। दोनों एक ही माँ-बाप की संतान थे, एक ही घर में पले-बढ़े, पर स्वभाव में ज़मीन-आसमान का अंतर था। रमेश शांत, मददगार और ईमानदार था, जबकि सुरेश चालाक, लालची और स्वार्थी।
पिता अक्सर कहते थे—
“बेटा, आदमी की अच्छाई और बुराई दोनों की कीमत होती है। फर्क बस इतना है कि अच्छाई की कीमत मिलती है और बुराई की कीमत चुकानी पड़ती है।”
रमेश यह बात दिल से मानता था, लेकिन सुरेश हँसकर टाल देता।
गाँव में एक बूढ़ी विधवा, काकी शारदा, अकेली रहती थीं। रमेश रोज़ उनके लिए दवा लाता, कभी लकड़ी काट देता, कभी सब्ज़ी पहुँचा देता। वह यह सब बिना किसी उम्मीद के करता था। शारदा काकी उसे दुआ देतीं—
“बेटा, तू बहुत आगे जाएगा।”
उधर सुरेश को सिर्फ़ अपना फायदा दिखता था। वह लोगों से झूठे वादे करता, उधार लेकर लौटाता नहीं, और मौका मिलते ही धोखा दे देता। उसे लगता था कि चालाकी से ही दुनिया जीती जाती है।
एक दिन कस्बे में एक बड़ी कंपनी का मालिक आया। उसे ऐसे लोगों की ज़रूरत थी जो ईमानदार हों और काम में भरोसेमंद हों। उसने गाँववालों से पूछा—
“यहाँ सबसे सच्चा और नेक इंसान कौन है?”
लगभग सबने एक ही नाम लिया—रमेश।
रमेश को शहर में अच्छी नौकरी मिल गई। वह मेहनत करता गया और धीरे-धीरे तरक्की करता गया। उसने अपने माता-पिता का घर ठीक करवाया, गाँव के बच्चों के लिए किताबें भिजवाईं और शारदा काकी का पूरा इलाज करवाया।
लोग कहने लगे—
“देखो, अच्छाई की कीमत मिलती है।”
उधर सुरेश की हालत बिगड़ने लगी। जिन लोगों को उसने धोखा दिया था, वे एक-एक करके उससे हिसाब माँगने लगे। कुछ ने अदालत में केस कर दिया। कुछ ने गाँव में उसकी इज़्ज़त मिट्टी में मिला दी। अब कोई उस पर भरोसा नहीं करता था। जहाँ जाता, लोग कहते—
“इससे दूर रहो, यह धोखेबाज़ है।”
एक रात सुरेश रोता हुआ रमेश के पास आया। बोला—
“भैया, मेरी ज़िंदगी बर्बाद हो गई। सब मुझसे नफ़रत करते हैं। कोई काम नहीं देता।”
रमेश ने उसका कंधा थामकर कहा—
“सुरेश, तूने बुराई चुनी, इसलिए अब उसकी कीमत चुका रहा है। लेकिन अभी भी देर नहीं हुई। अगर सच में बदलना चाहता है, तो आज से सही रास्ता चुन।”
सुरेश की आँखों में आँसू थे। उसने पहली बार समझा कि चालाकी से थोड़ी देर का फायदा मिल सकता है, लेकिन अंत में वही ज़हर बन जाती है। उसने रमेश के साथ रहकर मेहनत करना शुरू किया। धीरे-धीरे उसने लोगों से माफ़ी माँगी और अपने पुराने कर्ज़ चुकाने लगा।
समय लगा, लेकिन एक दिन लोगों ने फिर उस पर भरोसा करना शुरू किया।
सुरेश ने तब कहा—
“अब समझ आया, आदमी की अच्छाई और बुराई दोनों की कीमत होती है। फर्क बस इतना है कि अच्छाई की कीमत मिलती है, और बुराई की कीमत चुकानी पड़ती है।”

लघु कथा -79

अलोक का बचपन कभी आसान नहीं था। उसका घर हमेशा शोर और उलझनों से भरा रहता। छोटी उम्र में ही उसने देखा कि घर का माहौल तनावपूर्ण और असुरक्षित था। माता-पिता अक्सर अपने झगड़ों और गुस्से में इतने डूबे रहते कि उनका बच्चा अकेला और अनदेखा महसूस करता। अलोक समझ नहीं पाता था कि सही और गलत की सीमाएँ क्या हैं। उसका मन डर, उलझन और अकेलेपन से भरा रहता। रात को वह तन्हाई में उठकर सोचता—“क्या यही दुनिया है? क्या यही ज़िंदगी है?”
स्कूल में अलोक चुपचाप रहता। दोस्त उससे दूरी बनाने लगे, क्योंकि वह अक्सर अचानक गुस्सा कर देता था या कुछ अजीब व्यवहार करता। छोटे-छोटे कामों में वह बार-बार गलती करता और खुद को दोषी समझता। उसे यह समझ में नहीं आता था कि उसके भीतर का अराजकपन उसकी गलती नहीं, बल्कि घर के माहौल का परिणाम है। उसके भीतर डर और असहायपन धीरे-धीरे गुस्से में बदल गया।
किशोरावस्था में अलोक ने महसूस किया कि दुनिया उसके लिए कठोर है। उसे लगता कि कोई उसे समझ ही नहीं सकता। बार-बार वह सोचता—“क्या मैं भी वही बन जाऊँ जो मैंने देखा?” उसकी आँखों में सवाल और निराशा दोनों झलकते। कभी-कभी वह खुद से डरता—“अगर मैं वही करूँ जो मैंने देखा, तो क्या मैं भी सुरक्षित रह पाऊँगा?”
एक दिन स्कूल के शिक्षक ने उसे अकेले बुलाया। शिक्षक ने उसकी आँखों में देखा और धीरे से कहा,
“अलोक, मैं जानता हूँ कि तुम्हारे भीतर कितना दर्द है। बचपन जो भी था, वह तुम्हारी गलती नहीं। अब तुम्हारे हाथ में है अपने भविष्य को बनाने का अवसर।”
अलोक पहली बार किसी से खुलकर रोया। उसने सारी परेशानियाँ बताईं—अकेलापन, डर, भ्रम और गुस्सा। शिक्षक ने उसे समझाया कि हर इंसान में सुधार की क्षमता होती है।
“जो टूट गया, वह भी जोड़ सकता है। जो गिर गया, वह फिर से उठ सकता है। बस कदम बढ़ाना सीखो।”
अलोक ने अपने जीवन को बदलने का निश्चय किया। उसने पढ़ाई पर ध्यान देना शुरू किया। पहले छोटे कामों से शुरुआत की—नोट्स बनाना, मेहनत करना, रोज़ाना समय पर उठना। धीरे-धीरे उसने सफलता की छोटी-छोटी सीढ़ियाँ चढ़ना शुरू किया। हर छोटी जीत ने उसके भीतर विश्वास जगाया। उसने अपने भीतर के डर और गुस्से को प्यार, समझ और संयम में बदलना शुरू किया।
समय बीता। अलोक ने खुद को साबित किया। अच्छे अंक पाए, नौकरी पाई और अपने जीवन में संतुलन स्थापित किया। उसने जाना—बचपन चाहे कितना भी कठिन क्यों न रहा हो, वह इंसान की ताक़त बन सकता है, बुराई नहीं। उसने सीखा कि चोटें हमें कमजोर नहीं बनातीं, बल्कि हमें मजबूत बनाकर आगे बढ़ने की ताक़त देती हैं।
आज अलोक दूसरों को भी यही सिखाता है—
“तुम्हारे बीते हुए कल ने तुम्हें चोट पहुंचाई हो, पर आने वाला कल तुम्हारा है। उसे सही दिशा में बनाना तुम्हारे हाथ में है। टूटना कोई अपराध नहीं, उठना ही असली जीत है।”
वह जान गया कि जीवन में सबसे बड़ी ताक़त यह है कि कोई इंसान अपने भीतर की चोटों को स्वीकार करे, उन्हें सीख में बदले और आगे बढ़े। वह न केवल अपने लिए बल्कि दूसरों के लिए प्रेरणा बन गया।
अलोक की कहानी बताती है कि टूटा हुआ बचपन भी, अगर सही दिशा मिले और समय पर सहारा मिले, तो इंसान को उसके सपनों तक पहुँचा सकता है।
हर चोट, हर डर और हर निराशा सिर्फ़ एक रास्ता है—उठने और मजबूत बनने का।

लघु कथा -78

देवेश्वर जब आठ साल का था, तब उसकी दुनिया बहुत छोटी थी—स्कूल, गली में खेल, माँ की गोद और चाचा का घर। उसके पिता मज़दूरी के लिए बाहर रहते थे, इसलिए माँ अक्सर देवेश्वर को चाचा के घर छोड़ जाती। वही चाचा, जिसे सब भरोसेमंद समझते थे, देवेश्वर की मासूमियत को सबसे ज़्यादा तोड़ने वाला निकला।
देवेश्वर को ठीक-ठीक समझ नहीं आता था कि उसके साथ जो हो रहा है, वह गलत है। उसे बस डर लगता था, शर्म आती थी, और वह किसी को बता नहीं पाता था। चाचा धमकाता—“अगर बताया, तो तेरी माँ को मार दूँगा।”
देवेश्वर चुप हो गया। उसकी हँसी कहीं खो गई। वह खेल में मन नहीं लगाता, रात को डर कर उठ जाता, और खुद को गंदा समझने लगा।
माँ ने बदलाव देखा, पर कारण नहीं समझ पाई। स्कूल में देवेश्वर चिड़चिड़ा हो गया। बच्चे उससे दूर रहने लगे। शिक्षक ने डाँटा, तो उसने पत्थर फेंक दिया। किसी ने पहली बार उसे “बुरा लड़का” कहा—और वह उस नाम में खुद को पहचानने लगा।
समय बीता। चाचा शहर छोड़कर चला गया, पर जो ज़हर वह छोड़ गया, वह देवेश्वर के भीतर ही रह गया। वह बड़ा होने लगा, पर भीतर वही टूटा हुआ बच्चा था—गुस्से से भरा, भरोसे से खाली।
किशोरावस्था में उसने गलत संगत पकड़ ली। चोरी करना उसे आसान लगा—क्योंकि उसे दुनिया से कुछ छीनने में मज़ा आने लगा था।
“जब मेरी ज़िंदगी मुझसे छीनी गई, तो मैं भी छीनूँगा,” वह खुद से कहता।
धीरे-धीरे गुस्सा हिंसा में बदल गया। वह लड़ाइयों में चाकू निकाल लेता। उसे किसी की आँखों में डर देखकर अजीब-सी ताक़त मिलती—शायद वही ताक़त, जो कभी उससे छीनी गई थी।
एक रात उसने ऐसा अपराध कर डाला, जिसे माफ़ नहीं किया जा सकता। एक और ज़िंदगी उसकी वजह से टूट गई। जब पुलिस ने उसे पकड़ा, तो अख़बारों में सिर्फ़ इतना छपा—“निर्दयी अपराधी पकड़ा गया।”
किसी ने नहीं पूछा—वह निर्दयी कैसे बना।
जेल में एक सामाजिक कार्यकर्ता उससे मिलने आई। उसने सीधे सवाल नहीं किए। बस कहा,
“अगर चाहो, तो अपनी कहानी सुना सकते हो।”
पहली बार देवेश्वर ने रोना सीखा। उसने सब बता दिया—बचपन, डर, चुप्पी, गुस्सा।
और आख़िर में बोला,
“मैंने जो किया, वह गलत है। पर मैं भी कभी किसी का शिकार था।”
महिला ने कहा,
“तुम्हारा दर्द असली है, पर उसका इलाज किसी और को दर्द देकर नहीं हो सकता।”
उस रात देवेश्वर देर तक जागता रहा। उसे लगा जैसे वह अपने बचपन के सामने खड़ा है—वही छोटा देवेश्वर, जो मदद के लिए चुपचाप रो रहा था।
उसने उससे कहा,
“काश मैं तुझे बचा पाता… तो शायद मैं यह आदमी न बनता।”
देवेश्वर को सज़ा मिली—कठोर सज़ा। वह जानता था, यह ज़रूरी है।
पर वह यह भी जान गया था—
अगर टूटे बच्चों को समय पर सहारा मिल जाए,
अगर डर को शब्द मिल जाएँ,
तो शायद बहुत-से अपराध जन्म लेने से पहले ही मर जाएँ।
देवेश्वर अपराधी था—इसमें कोई शक नहीं।
पर वह इस बात की सबसे बड़ी मिसाल भी था कि
टूटा हुआ बचपन, अगर न संभाला जाए,
तो वही टूटन किसी और की ज़िंदगी तोड़ देती है।

लघु कथा -77

छोटे से कस्बे में अर्जुन अपने पिता हरदेव के साथ रहता था। माँ बहुत पहले गुजर चुकी थी। हरदेव का स्वभाव कठोर था—कम बोलता, ज़्यादा डाँटता। अर्जुन ज़रा-सी गलती करता, तो बेल्ट चल जाती।
“मर्द बनना है तो दर्द सहना सीख,” हरदेव कहता।
अर्जुन चुपचाप सहता रहा। स्कूल से थका-हारा लौटता, पर घर उसे आराम नहीं, डर देता था। कभी कम नंबर आए, तो मार। कभी देर हो गई, तो मार। उसे याद नहीं कि पिता ने कभी प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा हो।
रात को वह तकिए में मुँह छुपाकर रोता और मन ही मन कहता,
“एक दिन मैं बड़ा बनूँगा, तब तुम्हें दिखाऊँगा।”
समय बीतता गया। अर्जुन जवान हो गया। उसने पढ़ाई पूरी की और शहर जाकर नौकरी पा ली। पहली तनख्वाह हाथ में आई, तो उसे खुशी कम और बदले की आग ज़्यादा लगी। उसने सोचा—
“अब मेरी बारी है।”
वह घर लौटा। हरदेव बूढ़ा हो गया था। कमर झुक गई थी, आँखों में वही कठोरता थी, पर शरीर में पहले-सी ताक़त नहीं रही थी।
अर्जुन ने ठंडे स्वर में कहा, “अब मैं कमाता हूँ। अब आप मेरे भरोसे हो।”
हरदेव चुप रहा।
धीरे-धीरे अर्जुन वही करने लगा, जो उसने बचपन में झेला था।
अगर हरदेव ज़रा-सा काम ठीक से न कर पाते, तो अर्जुन चिल्लाता—
“कुछ आता ही नहीं आपको!”
खाना देर से मिला, तो थाली पटक देता।
दवा भूल जाते, तो ताना मारता—
“जब मुझे मारते थे, तब याद नहीं आता था कि मैं बच्चा हूँ?”
हरदेव सब सहता रहा। कभी-कभी उसकी आँखों में नमी आ जाती, पर वह कुछ नहीं कहता।
एक रात हरदेव को तेज़ बुखार आया। वह काँप रहा था। अर्जुन ने देखा, पर बोला,
“ड्रामा मत करो, सुबह ले चलूँगा डॉक्टर के पास।”
रात में हरदेव बार-बार उठकर पानी माँगता रहा, पर अर्जुन सोता रहा—या यूँ कहें, सोने का नाटक करता रहा।
सुबह हरदेव की हालत बिगड़ गई। पड़ोसी दौड़े आए। डॉक्टर बुलाया गया, पर देर हो चुकी थी। हरदेव की साँस टूट गई।
घर में सन्नाटा छा गया। अर्जुन पहली बार घबरा गया। वह पिता के पास बैठा और बोला,
“अब क्यों चुप हो? अब तो तुम्हें सब समझ आ गया होगा कि दर्द क्या होता है।”
पर जवाब नहीं आया।
पड़ोस की बूढ़ी अम्मा बोली,
“बेटा, तेरे पिता गलत थे, पर तू भी वही बन गया।”
ये शब्द अर्जुन के दिल में तीर की तरह लगे। उसे अचानक बचपन का वह अर्जुन याद आया—डरा हुआ, रोता हुआ, मार खाता हुआ।
उसने सोचा,
“जिस आदमी से मैं नफरत करता था, मैं खुद वही बन गया।”
उस रात वह सो नहीं पाया। उसे लगा जैसे उसका बचपन का रूप उससे पूछ रहा हो—
“तू बदला लेना चाहता था या ज़ख्म बढ़ाना?”
उसे समझ आया कि घृणा आग की तरह होती है—जो उसे पकड़ता है, पहले वही जलता है।
उसने पिता को सज़ा नहीं दी,
उसने बस अपने भीतर उसी ज़ुल्म को ज़िंदा कर लिया।
और अर्जुन ने जाना—
घृणा का चक्र तोड़ना सबसे मुश्किल होता है,
क्योंकि आदमी अक्सर उसी का रूप बन जाता है,
जिससे वह सबसे ज़्यादा नफरत करता है।

लघु कथा – 76

गाँव के एक शांत कोने में रहते थे—हरिराम और शारदा। उम्र ढल चुकी थी, शरीर कमजोर हो गया था, पर मन अब भी मजबूत था। उनका एक ही बेटा था—विनय, जो शहर में नौकरी करता था। शादी के बाद वह अपनी पत्नी रिया के साथ अलग रहने लगा। शुरू-शुरू में सब ठीक था, पर धीरे-धीरे दूरी बढ़ती गई।
रिया को लगता था कि सास-ससुर पुराने ख्यालों के हैं, हर बात में टोकते हैं। विनय भी दुविधा में रहता—माँ-बाप और पत्नी के बीच। कई बार बात बिगड़ जाती। फोन पर कटु शब्द कहे जाते। कभी-कभी विनय गुस्से में कह देता,
“आप लोग हमें समझते ही नहीं, बस अपनी बातें थोपते हो।”
हरिराम चुप रहते। शारदा का दिल दुखता, पर वह भी कुछ नहीं कहती। वह कहती, “बेटा है, आज नहीं समझेगा, कल समझेगा।”
एक दिन रिया ने सीधा कह दिया,
“आप दोनों हमें परेशान करते हो, इसलिए हम कम आते हैं।”
शारदा की आँखों में आँसू आ गए, पर उसने सिर झुका लिया।
हरिराम ने बस इतना कहा, “अगर हमसे कोई भूल होती हो, तो हमें बताना।”
गाँव के लोग कहते, “इतनी बात सुनकर भी चुप कैसे रहते हो?”
हरिराम मुस्कुराते, “निन्दा किए जाने पर जो प्रतिनिन्दा नहीं करता, उसे दुहरी विजय मिलती है।”
समय बीतता गया। एक दिन विनय की नौकरी चली गई। शहर का किराया, खर्च—सब भारी पड़ने लगा। विनय और रिया परेशान हो गए। किसी ने मदद नहीं की। तब उन्हें याद आया—गाँव में माँ-बाप हैं।
वे अचानक गाँव पहुँचे। शारदा ने दरवाज़ा खोला। कुछ नहीं पूछा, बस अंदर ले आई। हरिराम ने विनय का बैग उठाया, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
रात को विनय रो पड़ा। बोला,
“मैंने आपको कितना दुख दिया, फिर भी आपने कुछ नहीं कहा।”
हरिराम ने प्यार से कहा,
“बेटा, जवाब देकर झगड़ा बढ़ता है। चुप रहकर हम दिल जीतना चाहते थे।”
रिया भी रोने लगी। उसने कहा,
“मुझे लगा आप हमें दबाना चाहते हो, पर आपने तो हमें कभी छोड़ा ही नहीं।”
कुछ महीनों तक विनय गाँव में रहा। उसने देखा—माँ-बाप कैसे बिना शिकायत के सबके लिए करते हैं। धीरे-धीरे उसका मन बदलने लगा।
एक दिन उसने सबके सामने कहा,
“आप दोनों ने कभी पलटकर जवाब नहीं दिया, इसलिए आज मुझे अपनी गलती साफ दिख रही है।
आप जीत गए—दो बार।
एक बार चुप रहकर,
और दूसरी बार मेरा दिल जीतकर।”
रिया ने शारदा के पैर छुए। बोली,
“माँ, आपने जो सहा, उसका जवाब मैंने कभी नहीं दिया।”
शारदा ने उसे गले लगा लिया। बोली,
“बेटी, घर जवाब से नहीं, समझ से चलता है।”
और उस दिन हरिराम ने मन ही मन कहा—
“निन्दा किए जाने पर जो प्रतिनिन्दा नहीं करता,
वही सच में दुहरी विजय पाता है।”

लघु कथा -75

पुराने शहर की तंग गलियों में अलीमुद्दीन का छोटा-सा घर था। दीवारें पुरानी थीं, छत से कभी-कभी पानी टपक जाता, पर उस घर में सुकून था। अलीमुद्दीन दर्ज़ी था—दिन भर कपड़े सिलता, शाम को मस्जिद में नमाज़ पढ़ता और रात को बच्चों के साथ बैठकर बातें करता।
उसकी पत्नी ज़रीना बहुत सादा दिल की थी। वह कहती, “थोड़ा कम हो तो भी चले, पर दिल हल्का रहे।”
बड़ा बेटा इमरान पढ़ाई में तेज़ था। उसके सपने बड़े थे—वह अमीर बनना चाहता था, बड़ी गाड़ी, बड़ा घर, बड़ा नाम।
एक दिन इमरान को एक आदमी मिला, जो जल्दी पैसा कमाने की बातें करता था। बोला, “मेरे साथ काम करोगे, तो महीने में इतना कमाओगे जितना तुम्हारे अब्बा साल में नहीं कमाते।”
इमरान की आँखों में चमक आ गई। उसने घर आकर बताया।
अलीमुद्दीन ने शांत होकर कहा, “बेटा, जल्दी का पैसा अक्सर देर का दुख देता है।”
इमरान बोला, “अब्बा, आप हमेशा कम में खुश रहते हो, इसलिए कभी आगे नहीं बढ़ पाए।”
ये शब्द अलीमुद्दीन के दिल में चुभ गए, पर उसने कुछ नहीं कहा।
इमरान उस आदमी के साथ काम करने लगा। शुरू में खूब पैसा आया। वह नए कपड़े लाया, दोस्तों को खिलाया। उसे लगने लगा कि अब्बा गलत थे।
पर कुछ महीनों बाद वह आदमी पकड़ा गया। गैर-कानूनी धंधे में उसका नाम भी आ गया। पुलिस आई, पूछताछ हुई। इमरान की आँखों से नींद उड़ गई। घर में डर छा गया।
ज़रीना रोती रही, “हमने क्या गुनाह किया?”
अलीमुद्दीन ने बेटे का हाथ पकड़कर कहा, “बेटा, लालच आदमी को अंधा कर देता है।”
इमरान टूट गया। उसने कहा, “अब्बा, मुझे माफ़ कर दो। मैंने लालसा में आकर सब गँवा दिया—इज़्ज़त, चैन, आपका भरोसा।”
अलीमुद्दीन ने उसे सीने से लगा लिया। उसकी आँखों से आँसू बह निकले, पर आवाज़ में सुकून था, “गिरकर उठना ही असली जीत है।”
कुछ दिनों बाद मामला साफ़ हो गया। इमरान को चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। वह फिर पढ़ाई में लग गया, और साथ में अब्बा की दुकान में मदद करने लगा।
एक शाम मस्जिद से लौटते हुए इमरान ने कहा,
“अब्बा, आपने कभी अमीर बनने का सपना नहीं देखा?”
अलीमुद्दीन मुस्कुराया, “देखा था, बेटा। पर फिर समझ आया—इन्सान यदि लालसा और महत्त्वाकांक्षा को त्याग दे, तो वह बादशाह से कहीं ऊँचा दर्जा हासिल कर सकता है।”
इमरान ने पूछा, “कैसे?”
अलीमुद्दीन बोला, “जिसके पास कम होकर भी संतोष हो, वही असली बादशाह है।
लालच ही आदमी की ऊँचाई में बाधक बनता है।”
उस रात इमरान देर तक जागता रहा। उसने देखा—उसके अब्बा के पास बड़ी दौलत नहीं, पर इज़्ज़त थी। डर नहीं, चैन था। झूठ नहीं, सच्चाई थी।
धीरे-धीरे इमरान बदल गया। अब वह बड़े सपनों से नहीं, अच्छे इंसान बनने से खुश होता था। जब भी लालच मन में उठता, वह अब्बा की आँखों में देखता—और शांत हो जाता।
और उस छोटे-से घर में, बिना ताज के, बिना तख़्त के—
एक सच्चा बादशाह रहता था: संतोष।

लघु कथा – 74

रामदयाल का परिवार पहाड़ों के छोटे-से गाँव से निकलकर बड़े महानगर पहुँचा था। गाँव में कच्चे रास्ते, खुले आँगन, नीम का पेड़ और सुबह की ठंडी हवा थी। शहर में ऊँची इमारतें, तेज़ गाड़ियाँ, शोर और भीड़। एक ही जगह—पर सबकी नज़र अलग-अलग।
रामदयाल को शहर डरावना लगता। उसे लगता, यहाँ हर आदमी दौड़ रहा है, जैसे किसी ने पीछा कर रखा हो। वह जब सड़क पार करता, तो घबराता—“यहाँ आदमी नहीं, मशीनें चलती हैं।” उसे अपना गाँव याद आता, जहाँ समय धीरे चलता था।
उसकी पत्नी कमला को शहर अवसरों का घर लगता। वह कहती, “यहाँ बच्चों के लिए पढ़ाई है, आगे बढ़ने का रास्ता है।” उसे शोर में भी उम्मीद की आवाज़ सुनाई देती थी।
बेटा राहुल कॉलेज जाने लगा। उसके लिए शहर सपनों की जगह थी—मॉल, मेट्रो, दोस्त, नए कपड़े। उसे लगता, “गाँव में रह जाता तो कुछ नहीं बन पाता।”
छोटी बेटी गुनगुन को शहर एक खेल का मैदान लगता—लिफ्ट में चढ़ना, पार्क में झूले, रोशनी से भरी सड़कें।
पहले ही महीने रामदयाल को काम मिला—एक निर्माण स्थल पर चौकीदारी। वह रात भर जागता, और सोचता—“मेरे लिए शहर मतलब थकान।”
कमला पास की सोसाइटी में काम करने लगी। वह लौटकर बताती—“आज पहली बार मैंने वॉशिंग मशीन देखी।” उसकी आँखों में चमक होती।
राहुल पार्ट-टाइम नौकरी करने लगा। वह पैसे देखकर खुश होता—“अब मैं खुद कमा रहा हूँ।”
गुनगुन स्कूल में नए दोस्त बनाती और रोज़ नई कहानी लाती।
एक रविवार सब साथ छत पर बैठे। नीचे शहर चमक रहा था।
रामदयाल बोला, “मुझे तो यह जंगल लगता है—कंक्रीट का जंगल।”
कमला बोली, “मुझे यह रास्ता लगता है—आगे बढ़ने का।”
राहुल बोला, “मुझे यह मौका लगता है—कुछ बड़ा करने का।”
गुनगुन बोली, “मुझे यह मेले जैसा लगता है।”
रामदयाल ने पूछा, “एक ही शहर, पर हम चारों को चार तरह क्यों दिखता है?”
कमला ने हँसकर कहा, “क्योंकि अपने दृष्टिकोण के अनुरूप सारा वातावरण दीख पड़ता है।”
एक दिन गाँव से खबर आई—पुराना घर टूटने लगा है। रामदयाल उदास हो गया। वह बोला, “लगता है, मेरा संसार वहीं रह गया।”
राहुल ने कहा, “पापा, संसार जगह नहीं होता, नज़र होता है।”
कमला ने जोड़ा, “हर व्यक्ति का अपना संसार अलग से रचा हुआ है।”
कुछ दिन बाद वे गाँव गए। रामदयाल खुश हो गया—पेड़, हवा, शांति।
राहुल को वही गाँव छोटा और धीमा लगा।
कमला को दोनों में अच्छा दिखा—गाँव की शांति और शहर का अवसर।
गुनगुन ने कहा, “यहाँ भी खेल है, वहाँ भी।”
लौटते समय रामदयाल ने सोचा—“मैं अपने डर का शहर बनाकर घूमता रहा।” उसने ठान लिया—अब वह शहर को दुश्मन नहीं, साथी मानेगा।
धीरे-धीरे उसे भी शहर में कुछ अच्छा दिखने लगा—सुबह की चाय की दुकान, परिचित चेहरे, काम की इज़्ज़त। उसे समझ आ गया—
अपने दृष्टिकोण के अनुरूप सारा वातावरण दीख पड़ता है।
हर व्यक्ति का अपना संसार अलग से रचा हुआ है,
और वह उसी में विचरण करता रहता है।

लघु कथा – 73

राधा, नेहा और मीरा—तीनों एक ही कॉलेज में पढ़ती थीं। बचपन से साथ थीं, पर स्वभाव बिल्कुल अलग। राधा हमेशा बीते कल में जीती थी। उसे लगता था कि उसने बारहवीं में कम नंबर लाकर अपनी ज़िंदगी खराब कर ली। नेहा हर समय भविष्य के सपने बुनती रहती—कौन-सी नौकरी मिलेगी, कितना पैसा होगा, कैसी ज़िंदगी होगी। मीरा बस आज में जीती थी—न लापरवाही से, बल्कि समझदारी से।
एक दिन कॉलेज में नोटिस लगा—एक महीने बाद प्रतियोगी परीक्षा है, जिसमें पास होने पर स्कॉलरशिप मिलेगी।
राधा बोली, “अब क्या फायदा, मेरी नींव ही कमजोर है।”
नेहा बोली, “अभी नहीं पढ़ूँगी, बाद में देखेंगे। अभी तो सोचने दो कि पास होकर क्या करूँगी।”
मीरा ने कहा, “आज से पढ़ेंगे, आज का काम आज।”
रोज़ मीरा लाइब्रेरी जाती, नोट्स बनाती, सवाल हल करती। राधा कभी-कभी आती, पर अक्सर पुरानी असफलताओं को याद करके मन छोड़ देती। नेहा बस भविष्य के सपनों में खोई रहती।
एक दिन राधा उदास होकर बोली, “काश मैं पहले मेहनत करती।”
मीरा ने कहा, “बीते कल को सुधार नहीं सकते।”
नेहा बोली, “पर आने वाला कल सब ठीक कर देगा।”
मीरा मुस्कुराई, “आने वाला कल कभी भी नहीं आ सकता। वह हमेशा ‘कल’ ही रहता है।”
परीक्षा नज़दीक आई। राधा घबराने लगी। नेहा अब भी टालती रही। मीरा रोज़ की तरह पढ़ती रही—थोड़ा-थोड़ा, पर लगातार।
परीक्षा के बाद रिज़ल्ट आया। मीरा पास हो गई—अच्छे अंकों से। राधा थोड़े से नंबरों से रह गई। नेहा फेल हो गई।
राधा रोने लगी, “मैं तो बस अपने पुराने नुकसान में ही उलझी रही।”
नेहा बोली, “मैं तो बस भविष्य के सपनों में जीती रही।”
मीरा ने उनका हाथ पकड़ा और कहा,
“मात्र आज ही हमारा है। उसका सर्वोत्तम सदुपयोग करो, क्योंकि वही हमारी एकमात्र निश्चित सम्पत्ति है।”
राधा ने ठान लिया—अब पछतावे में नहीं जिएगी। नेहा ने ठान लिया—अब सिर्फ़ सपने नहीं देखेगी, काम भी करेगी। तीनों ने अगली परीक्षा के लिए साथ पढ़ना शुरू किया—हर दिन थोड़ा, पर पक्का।
राधा अब जब भी निराश होती, खुद से कहती—“बीते कल को नहीं बदल सकती, पर आज को बेहतर बना सकती हूँ।”
नेहा जब आलस करती, तो खुद से कहती—“कल का भरोसा मत कर, आज कर।”
और मीरा—वह तो पहले से जानती थी कि ज़िंदगी का असली खज़ाना “आज” है।
अगली बार तीनों पास हुईं। इस बार खुशी सिर्फ़ नंबरों की नहीं थी, बल्कि इस बात की थी कि उन्होंने ज़िंदगी का सही नियम समझ लिया था—
बीता कल हाथ से गया, आने वाला कल भरोसेमंद नहीं,
मात्र आज ही हमारा है—और वही हमारी सबसे कीमती सम्पत्ति है।लघु कथा

लघु कथा – 72

शरद एक सीधा-सादा लड़का था। माँ-बाप ने उसे सिखाया था—सच बोलो, मेहनत करो, और किसी का दिल मत दुखाओ। पर जब वह कॉलेज पहुँचा, तो उसकी दुनिया बदलने लगी। वहाँ दोस्त ऐसे मिले जो हर नियम को मज़ाक समझते थे—कभी क्लास से भागना, कभी नकल करना, कभी दूसरों का मज़ाक उड़ाना।
शरद का मन कई बार कहता, “यह ठीक नहीं है।” पर दोस्त हँसते—
“ज़्यादा सोचता है तू, ज़िंदगी मज़े के लिए है।”
शरद उनकी बातों में आ गया। पहली बार उसने नकल की, तो दिल जोर से धड़का। उसे लगा जैसे भीतर कोई कह रहा हो—“रुक जा।” पर उसने उस आवाज़ को दबा दिया। अगली बार डर कम हुआ। फिर आदत बन गई।
धीरे-धीरे वह क्लास छोड़ने लगा, झूठ बोलने लगा, और घर में भी बहाने बनाने लगा। माँ जब पूछती, “सब ठीक तो है?” तो वह मुस्कुरा कर कह देता, “हाँ, माँ।” पर उसकी अन्तरात्मा हर रात उसे जगाती—
“तू वो नहीं बन रहा, जो बन सकता था।”
एक दिन उसके दोस्तों ने कहा, “चल, इस बार परीक्षा में बड़ा खेल करते हैं। पेपर पहले मिल जाएगा।”
शरद का दिल काँप गया। भीतर से आवाज़ आई—“अब भी रुक जा।”
पर उसने दोस्तों की तरफ़ देखा—सब हँस रहे थे। उसने खुद से कहा, “एक बार और सही।”
परीक्षा वाले दिन पकड़े गए। कॉलेज में हंगामा मच गया। सबके सामने नाम लिया गया। शरद का सिर झुक गया। उसे लगा जैसे उसकी सारी मेहनत, उसके माँ-बाप का भरोसा—सब टूट गया।
घर पहुँचा तो माँ दरवाज़े पर खड़ी थी। खबर पहले ही पहुँच चुकी थी। माँ ने कुछ नहीं कहा, बस उसकी आँखों में देखा। शरद फूट-फूट कर रो पड़ा।
“माँ, मैं गलत राह पर चला गया।”
उस रात वह सो नहीं पाया। उसकी अन्तरात्मा फिर बोली—
“मैं तो पहले दिन से कह रही थी। तूने सुना क्यों नहीं?”
कॉलेज से उसे एक साल के लिए निकाल दिया गया। दोस्त गायब हो गए। जो कल तक साथ थे, आज फोन भी नहीं उठाते थे। शरद समझ गया—वे दोस्त नहीं थे, बस रास्ते के साथी थे।
उस साल उसने खुद से वादा किया—अब किसी की नहीं, सिर्फ़ अपनी अन्तरात्मा की सुनेगा। उसने फिर से पढ़ाई शुरू की, मेहनत की, गलतियों को सुधारा। जब मन भटकता, वह आँख बंद कर पूछता—“यह सही है या गलत?” और जो जवाब भीतर से आता, उसी पर चलता।
एक साल बाद वह फिर कॉलेज लौटा—शर्म के साथ, पर नई ताक़त के साथ। इस बार वह अकेला था, पर साफ़ दिल से। वह पास हुआ, अच्छे नंबरों से। माँ ने उसका माथा चूमा और कहा, “अब तू मेरा वही बेटा है।”
शरद मुस्कुराया। उसे देर से सही, पर समझ आ गया था—
आपकी अन्तरात्मा एक अच्छी मित्र है, उसकी ओर अधिक ध्यान दें।

लघु कथा – 71

शर्मा और वर्मा—दो परिवार, एक ही गली में आमने-सामने रहते थे। सालों से उनके बीच ऐसा भरोसा था कि लोग कहते, “ये दो घर नहीं, एक ही आँगन के दो कोने हैं।” बच्चों की पढ़ाई से लेकर शादी-ब्याह तक, दोनों परिवार एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े रहते।
शर्मा जी स्वभाव से बहुत समझदार थे, पर एक आदत थी—हर बात में राय देना। उन्हें लगता था कि उनका अनुभव ही सबसे बड़ा खज़ाना है, और उसे सबको मिलना चाहिए। वर्मा जी शांत स्वभाव के थे, कम बोलते थे, पर गहराई से सोचते थे।
एक दिन वर्मा परिवार ने तय किया कि उनका बड़ा बेटा शहर जाकर नौकरी करेगा। शर्मा जी को यह ठीक नहीं लगा। उन्होंने बिना पूछे ही समझाना शुरू कर दिया—
“अरे, शहर में लड़का बिगड़ जाएगा। यहीं दुकान खुलवा दो, यही सही है।”
वर्मा जी चुप रहे, पर भीतर उन्हें अच्छा नहीं लगा। उन्होंने कुछ नहीं कहा, क्योंकि दोस्ती तोड़ना नहीं चाहते थे।
धीरे-धीरे शर्मा जी हर बात में टोकने लगे—बच्चों की पढ़ाई, बहू का पहनावा, घर का खर्च। वर्मा परिवार सुनता रहा, पर मन में कसक बढ़ती गई। उन्हें लगने लगा कि दोस्ती में भी इज़्ज़त कम हो रही है।
एक दिन वर्मा जी की पत्नी बीमार पड़ गईं। शर्मा जी दौड़कर आए और बोले,
“तुम लोग गलत इलाज करा रहे हो, मेरे जानने वाले डॉक्टर के पास ले चलो।”
वर्मा जी ने पहली बार धीरे से कहा, “धन्यवाद, पर हमने पहले ही डॉक्टर चुन लिया है।”
शर्मा जी को यह बात चुभ गई। उन्हें लगा कि उनकी बात को ठुकराया जा रहा है। उन्होंने मन ही मन सोचा—“मैं तो अमृत दे रहा हूँ, ये लोग समझते ही नहीं।”
कुछ दिनों बाद वर्मा जी खुद शर्मा जी के पास आए। बोले,
“भाई साहब, एक बात दिल से कहूँ?”
शर्मा जी बोले, “कहो।”
वर्मा जी ने शांति से कहा,
“ज़बरदस्ती हर किसी का मुँह खोलकर अमृत भी डालना चाहोगे, तो लोग उसे विष समझकर थूक ही नहीं देंगे, बल्कि आपको पागल भी समझेंगे। अपनी राय तभी दो, जब कोई उसको माँगे।”
शर्मा जी चुप हो गए। उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि उनका ज्ञान, उनकी चिंता—सब सही हो सकते हैं, पर तरीका गलत था। उन्होंने सिर झुकाकर कहा,
“शायद मैं दोस्ती निभाते-निभाते सीमा भूल गया।”
उस दिन के बाद शर्मा जी बदल गए। अब वे तब तक कुछ नहीं कहते, जब तक वर्मा परिवार खुद न पूछे। और जब पूछते, तो वे पूरे मन से सुनते, बिना ज़ोर डाले सलाह देते।
कुछ महीनों बाद वर्मा जी का बेटा शहर से लौटा—अच्छी नौकरी लेकर। उसने आकर शर्मा जी के पैर छुए और बोला,
“चाचा, कई बार आपकी बातें याद आईं। अच्छा लगा कि आपने मुझे अपनी तरह बनने को मजबूर नहीं किया।”
शर्मा जी की आँखें भर आईं। उन्होंने महसूस किया कि भरोसा ज़बरदस्ती से नहीं, सम्मान से बनता है।
अब दोनों परिवारों के बीच रिश्ता पहले से भी गहरा हो गया। लोग कहते,
“शर्मा और वर्मा अब सच में समझ गए हैं—
सलाह अमृत है, पर तभी, जब उसे माँगा जाए।”

लघु कथा – 70

सावंत और नीलांबरी एक साधारण-से कस्बे में रहते थे। उनका घर बड़ा नहीं था, पर उसमें हमेशा एक अजीब-सी शांति रहती थी। मोहल्ले के लोग अक्सर कहते, “इनके घर को देखो, जैसे मंदिर का माहौल हो—सब एक-दूसरे के लिए कितनी श्रद्धा, कितना प्रेम रखते हैं।”
सावंत एक छोटी दुकान चलाता था और नीलांबरी घर संभालती थी। उनके साथ बूढ़े माता-पिता और दो बच्चे रहते थे। इतने लोगों का एक ही छत के नीचे रहना आसान नहीं था। कभी बच्चों की शरारत, कभी सास-बहू की नोकझोंक, कभी पैसे की तंगी—सब कुछ था। पर इन सबके बीच जो चीज़ नहीं थी, वह था ज़हर—कटुता का ज़हर।
नीलांबरी हर सुबह सबसे पहले सबको नमस्ते करती। सास के पैर छूती, ससुर को पानी देती, बच्चों को प्यार से जगाती। सावंत दुकान जाने से पहले सबका हाल पूछता। वह कहता, “घर अगर ठीक है, तो बाहर की हर लड़ाई आसान लगती है।”
एक दिन सावंत की दुकान में घाटा हो गया। वह चुपचाप घर लौटा। नीलांबरी ने उसके चेहरे से ही सब समझ लिया। उसने बिना सवाल किए खाना परोसा और बोली, “आज थोड़ा कम खा लो, पर चिंता मत करो—हम मिलकर संभाल लेंगे।”
सावंत की आँखें भर आईं। उसने सोचा—यही तो मंदिर है, जहाँ कोई मूर्ति नहीं, पर विश्वास है।
कुछ दिन बाद बच्चों में झगड़ा हो गया। बड़ा बेटा बोला, “माँ, यह मेरा खिलौना तोड़ दिया!”
छोटी बेटी रोने लगी। नीलांबरी ने दोनों को पास बिठाया और बोली, “मंदिर में कोई लड़ता है क्या?”
बच्चे चुप हो गए।
सावंत ने कहा, “हमारा घर मंदिर है—यहाँ हम एक-दूसरे को नहीं तोड़ते, जोड़ते हैं।”
एक बार सास नाराज़ हो गईं। उन्हें लगा कि नीलांबरी उनकी बात नहीं मान रही। पूरे दिन घर में खामोशी रही। शाम को नीलांबरी उनके पास गई, हाथ जोड़कर बोली, “अगर मुझसे भूल हुई हो, तो माफ़ कर दीजिए। आपका दिल दुखा, तो घर का मंदिर हिल गया।”
सास की आँखें भर आईं। उन्होंने नीलांबरी को गले लगा लिया।
मोहल्ले में लोग इनके घर का उदाहरण देने लगे। जब कहीं झगड़ा होता, तो कहते, “सावंत-नीलांबरी से सीखो। उनके घर में देखो—कैसी शांति है।”
एक दिन एक पड़ोसी बोला, “तुम लोग इतने शांत कैसे रहते हो?”
सावंत मुस्कुराया, “मंदिर में शांति अपने आप नहीं रहती, उसे रोज़ सँभालना पड़ता है।”
नीलांबरी बोली, “अपने घर के मंदिर में सबको खुश रखना आसान नहीं, पर यही सबसे बड़ा धर्म है।”
रात को सब साथ बैठकर खाना खाते। हँसी-ठिठोली होती, कभी छोटी-सी नोकझोंक भी, पर कोई दिल में बात नहीं रखता। सब जानते थे—मूर्ति के बीच रहना आसान है, पर इंसानों के बीच मंदिर बनाना कठिन।
और सावंत-नीलांबरी ने यह कठिन काम प्रेम, श्रद्धा और समझदारी से कर दिखाया—इसलिए उनका घर सच में मंदिर बन गया।

लघु कथा – 69

सरकारी स्कूल के सबसे पुराने अध्यापक थे—ओमप्रकाश। सफ़ेद बाल, मोटा चश्मा और आवाज़ में अब भी वही सख़्ती और अपनापन। बच्चे उन्हें “मास्टर जी” कहते थे, पर उनके लिए वे सिर्फ़ पढ़ाने वाले नहीं, रास्ता दिखाने वाले थे।
एक दिन ओमप्रकाश कक्षा में एक मोटी-सी पुरानी किताब लेकर आए। किताब के पहले पन्ने फटे थे, बीच-बीच में स्याही फैल गई थी, और आख़िरी पन्ने बहुत साफ़-सुथरे और सुंदर थे। उन्होंने किताब मेज़ पर रखी और बोले,
“बच्चो, इस किताब को देखो। आख़िरी पन्ने बहुत अच्छे हैं, है न?”
बच्चों ने हाँ में सिर हिलाया।
ओमप्रकाश बोले,
“हो सकता है तुम अपनी ज़िन्दगी की किताब के आख़िरी पन्ने बहुत अच्छे बनाओ। मगर पढ़ने वाले यही सोचेंगे कि इस व्यक्ति ने कितनी अन्तः-शक्ति, कितना वक़्त व्यर्थ गंवाया है। यह किताब कितनी आकर्षक हो जाती, यदि इसने अपने जीवन में बहुत पहले यह रुख़ अपनाया होता!”
कक्षा में सन्नाटा छा गया।
तभी रामू बोला, “मास्टर जी, कोई अगर आख़िर में सुधर जाए, तो क्या वह अच्छा नहीं है?”
ओमप्रकाश मुस्कुराए, “अच्छा तो है, बेटा। पर सोचो, अगर वह पहले ही सुधर जाता, तो वह कितना ज़्यादा अच्छा कर सकता था—अपने लिए भी, दूसरों के लिए भी।”
उन्होंने अपनी कहानी सुनानी शुरू की।
“मैं भी तुम्हारी तरह एक समय बहुत आलसी था। पढ़ाई टालता रहता था। सोचता था—कल कर लूँगा, परसों कर लूँगा। जब होश आया, तो बहुत-सा समय हाथ से निकल चुका था। तब मैंने खुद से कहा—अब जो बचा है, उसे बेकार नहीं जाने दूँगा। मैंने मेहनत की और अध्यापक बना। पर आज भी सोचता हूँ—अगर यह मेहनत मैंने पहले शुरू की होती, तो शायद मैं और ऊँचा पहुँच सकता था।”
बच्चों ने पहली बार अपने मास्टर जी की आँखों में हल्की-सी नमी देखी।
अगले दिन उन्होंने बच्चों को एक काम दिया—“अपने जीवन की किताब का पहला पन्ना लिखो—तुम क्या बनना चाहते हो, और उसके लिए आज से क्या करोगे।”
राधा ने लिखा—डॉक्टर बनूँगी, रोज़ दो घंटे पढ़ूँगी।
अमन ने लिखा—इंजीनियर बनूँगा, गणित पर ज़्यादा ध्यान दूँगा।
छोटे मोनू ने लिखा—अच्छा इंसान बनूँगा, झूठ नहीं बोलूँगा।
ओमप्रकाश हर कापी पढ़ते गए और मन ही मन खुश होते गए। उन्हें लगा, शायद उनके शब्दों ने किसी का समय बचा लिया है।
कुछ साल बाद, वही बच्चे बड़े होकर लौटे। कोई डॉक्टर बना, कोई अफ़सर, कोई शिक्षक। वे ओमप्रकाश से मिलने आए और बोले,
“मास्टर जी, उस दिन आपने किताब की जो बात कही थी, उसने हमें आज से ही बदल दिया।”
ओमप्रकाश ने मुस्कुरा कर कहा,
“बेटा, ज़िन्दगी की किताब सुंदर तब होती है, जब हर पन्ना ईमानदारी, मेहनत और सही वक़्त पर लिए गए फैसलों से भरा हो—सिर्फ़ आख़िरी पन्ने नहीं।”
और बच्चों ने समझ लिया—अच्छा बनना देर से भी ठीक है,
पर जल्दी बनना कहीं ज़्यादा फलदायक होता है।

लघु कथा – 68

गाँव के आख़िरी छोर पर एक पुराना-सा घर था, जिसमें रहती थी बूढ़ी सुषीला। सफ़ेद बाल, झुकी कमर और चेहरे पर ऐसी शांति, जैसे किसी लंबे सफ़र के बाद मिली हो। लोग उसे देखकर कहते, “बेचारी, कितनी अकेली है।” पर सुषीला खुद को कभी अकेली नहीं मानती थी। वह कहती, “अकेलापन तब होता है, जब आदमी किसी के काम न आए।”
उसका पति बरसों पहले गुजर गया था। बच्चे शहर जाकर बस गए थे। शुरू-शुरू में सुषीला को भी लगा था कि शायद अब जीवन में सुख नहीं बचेगा। पर एक दिन उसने खुद से पूछा—“क्या सच में जीवन की मंज़िल सुख है?” उसी दिन उसने तय किया कि वह सिर्फ़ अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए जिएगी।
हर सुबह वह सबसे पहले मंदिर जाती, फिर गाँव की गलियों में निकल पड़ती। किसी के घर में बच्चा बीमार होता, तो सुषीला अपने पुराने नुस्खे लेकर पहुँच जाती। किसी की बहू उदास होती, तो उसे पास बैठाकर कहती, “बेटी, दुःख भी बादल की तरह होता है, रुकता नहीं।” किसी के घर में झगड़ा होता, तो वह दोनों को बैठाकर सच्चाई और भलाई की बात समझाती।
लोग धीरे-धीरे समझने लगे कि सुषीला सिर्फ़ बूढ़ी औरत नहीं है, वह चलती-फिरती सीख है।
एक दिन गाँव में एक नौजवान आया—नाम था रोहन। वह बहुत परेशान था। उसने कहा, “दादी, मैं सुख ढूँढ रहा हूँ, पर मिल नहीं रहा।”
सुषीला मुस्कुराई, “बेटा, इन्सान की मंज़िल सुख नहीं है।”
रोहन चौंका, “तो फिर क्या है?”
सुषीला बोली, “इन्सान की मंज़िल है एक फलदायक जीवन, एक परोपकारी जीवन, एक सफल जीवन, जिसमें सच्चाई-भलाई की स्पष्ट छाप हो।”
उसने रोहन को अपने साथ चलने को कहा। पहले वे एक बूढ़े किसान के पास गए, जिसकी फसल खराब हो गई थी। सुषीला ने अपने जमा किए पैसे उसे दे दिए। रोहन ने पूछा, “आपको दुख नहीं होता?”
सुषीला बोली, “दुख तब होता है, जब किसी का दुख देखकर भी हम कुछ न करें।”
फिर वे स्कूल गए, जहाँ कुछ बच्चे फीस न होने से पढ़ नहीं पा रहे थे। सुषीला ने उनके लिए कपड़े सिले, किताबें जुटाईं। रोहन देखता रहा—उसके चेहरे पर पहली बार किसी और की खुशी देखकर मुस्कान आई।
शाम को रोहन बोला, “दादी, आज मुझे अजीब-सी खुशी मिली, बिना कुछ पाए।”
सुषीला हँसी, “यही असली पाना है।”
कुछ महीनों बाद रोहन गाँव में ही रुक गया। उसने बच्चों को पढ़ाना शुरू किया, किसानों की मदद करने लगा। लोग कहते, “यह तो सुषीला का बनाया हुआ इंसान है।”
एक दिन सुषीला बीमार पड़ गई। गाँव के लोग उसके पास आए, किसी ने दवा लाई, किसी ने खाना। सुषीला की आँखों में आँसू थे—दुख के नहीं, संतोष के।
उसने धीरे से कहा,
“देखो, मैं सुख के पीछे नहीं भागी,
मैं फलदायक बनी, परोपकारी बनी,
सच्चाई-भलाई के साथ चली—
और जीवन अपने आप सफल हो गया।”
और उसी शांति के साथ, सुषीला ने दुनिया को अलविदा कहा—एक ऐसी मंज़िल पाकर, जहाँ सुख नहीं, अर्थ था।

लघु कथा – 67

पहाड़ी इलाके के बीच बसे गाँव का मुखिया था—चीफ रघुनाथ। लोग उसे “चीफ-चीफ” कहते थे, क्योंकि वह हर बात में खुद को सबसे ऊपर मानता था। उसके पास खेत थे, जंगल का हिस्सा था, सोने-चाँदी के गहने थे, और लोगों पर अधिकार भी। पर उसके मन में कभी शांति नहीं थी। जितना पाता, उससे ज़्यादा पाने की भूख उसे जलाती रहती।
रघुनाथ मानता था कि अगर वह मंदिर में ज़्यादा चढ़ावा चढ़ाएगा, तो देवता उसे और धन देंगे। वह हर महीने बड़ी पूजा करवाता, ब्राह्मणों को दान देता, पर भीतर से उतना ही बेचैन रहता। रात को सोते समय भी उसके दिमाग में यही चलता—किसका खेत हड़पा जाए, किससे कर बढ़वाया जाए।
एक दिन गाँव में एक साधारण-सा फकीर आया। फटे कपड़े, हाथ में लकड़ी की लाठी, आँखों में अजीब-सी गहराई। लोग उसे रोटी देने लगे। जब वह चीफ के दरवाज़े पहुँचा, तो रघुनाथ ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और बोला,
“कुछ काम जानते हो या सिर्फ़ माँगना आता है?”
फकीर मुस्कुराया, “नेचर में हमेशा ‘दो और लो’ का सिद्धांत है। जो देता है, वही पाता है।”
रघुनाथ हँस पड़ा, “मैं तो रोज़ देता हूँ—दान, पूजा, चढ़ावा। फिर भी शांति क्यों नहीं मिलती?”
फकीर बोला, “क्योंकि तुम देते नहीं, दिखाते हो। और लेते बहुत हो—बिना सोचे, बिना रुके।”
रघुनाथ को गुस्सा आया और उसने फकीर को भगा दिया।
कुछ ही दिनों बाद गाँव में सूखा पड़ गया। नदी सूखने लगी, फसलें जलने लगीं। लोग परेशान हो गए। चीफ के पास अनाज भरा था, पर उसने भंडार खोलने से मना कर दिया। बोला, “जब कीमत बढ़ेगी, तब बेचूँगा।”
लोग भूखे रहने लगे। बच्चे रोने लगे। उसी रात रघुनाथ को सपना आया—वह सोने के ढेर पर बैठा है, पर चारों तरफ़ आग लगी है। सोना पिघल रहा है, हाथ जल रहे हैं, और कोई मदद को नहीं आ रहा।
सुबह उठा तो दिल घबराया हुआ था। तभी वही फकीर फिर दिखा। रघुनाथ ने पूछा,
“क्या यह किसी देवता का संकेत था?”
फकीर बोला,
“कोई देवता तुम्हारी नीचता दूर किए बगैर तुम्हें मन की स्थायी शांति नहीं दे सकता।
लालच और पैसे की भूख तुमसे मांगे बगैर, तुममें संतोष धन नहीं दे सकता।”
रघुनाथ चुप हो गया। पहली बार उसे अपने भीतर की गंदगी दिखी। वह सीधे भंडारगृह गया और अनाज खोल दिया। बोला, “सबको बराबर मिलेगा।”
लोग रो पड़े। किसी ने उसके पैर छुए, किसी ने आशीर्वाद दिया। उसी दिन उसके दिल का बोझ हल्का हो गया। उसे लगा जैसे साँस लेना आसान हो गया हो।
फकीर ने कहा,
“देखा? नेचर का नियम है—दो और लो।
तुमने दिया, तो शांति मिली।
पहले तुम लेते थे, इसलिए भीतर खाली रहते थे।”
उस दिन के बाद रघुनाथ बदला हुआ इंसान बन गया। वह अब चीफ-चीफ नहीं रहा—बस लोगों का सेवक बन गया। और पहली बार, उसके पास बहुत कुछ होते हुए भी, उसका मन सच में संतोष से भर गया।

लघु कथा – 66

गाँव के किनारे एक छोटी-सी झोपड़ी में मोहन रहता था। देखने में वह साधारण था, पर उसके भीतर एक असाधारण भ्रम पलता था—उसे लगता था कि वह सबसे बड़ा है, सबसे समझदार है, और सबसे योग्य है। सच यह था कि उसके पास न धन था, न विद्या, न अनुभव; पर अहंकार ऐसा था जैसे उसके सिर पर अदृश्य ताज सजा हो।
मोहन छोटी-छोटी बातों पर लोगों को नीचा दिखाने में आनंद लेता। किसी ने नया कपड़ा पहन लिया, तो कहता, “कपड़े से क्या होता है, आदमी तो दिमाग से बड़ा होता है—और वह तो मेरे पास ही है।” कोई मेहनत करके आगे बढ़ता, तो वह कहता, “किस्मत होगी उसकी, काबिलियत थोड़े ही।” लोग मुस्कुरा कर टाल देते, पर भीतर ही भीतर उसे टेढ़ी नज़र से देखने लगे।
एक दिन गाँव में एक बूढ़ा साधु आया। चेहरे पर शांति थी और आँखों में गहराई। लोग उसके पास सलाह लेने आने लगे। मोहन को यह अच्छा न लगा। उसे लगा, “यह बूढ़ा कौन होता है सबको रास्ता दिखाने वाला?” वह साधु के पास गया और बोला, “बाबा, लोग आपको बहुत बड़ा मानते हैं, पर सच बताइए—आपको आता ही क्या है?”
साधु मुस्कुराया और बोला, “बेटा, मैं तो खुद को बहुत छोटा मानता हूँ। सीखने के लिए ही तो जी रहा हूँ।”
मोहन हँस पड़ा, “छोटा मानते हो, इसलिए छोटे ही रह गए। मैं खुद को बड़ा मानता हूँ, इसलिए बड़ा बनूँगा।”
साधु ने कहा, “ठीक है, कल सुबह तालाब पर आना, एक बात दिखाऊँगा।”
अगली सुबह मोहन पहुँचा। साधु उसे तालाब के किनारे ले गया और बोला, “इस पानी में अपना चेहरा देखो।”
मोहन ने देखा—पानी शांत था, चेहरा साफ दिख रहा था।
साधु ने एक पत्थर फेंका। लहरें उठीं, चेहरा टूट गया, बिगड़ गया।
साधु बोला, “जब मन शांत और विनम्र होता है, तब सच्ची पहचान दिखती है। जब अहंकार की लहरें उठती हैं, तो आदमी खुद को भी सही नहीं देख पाता।”
मोहन को बात चुभी, पर वह चुप रहा।
कुछ दिन बाद गाँव में अकाल पड़ा। अनाज कम था। लोग मिलकर काम करने लगे—कुएँ की मरम्मत, खेतों की सफाई, अनाज का बँटवारा। मोहन ने सोचा, “मैं क्यों काम करूँ? मैं तो इनसे बड़ा हूँ।” वह अलग बैठा रहा।
जब अनाज बँटा, तो उसे सबसे कम मिला। वह गुस्से में बोला, “यह अन्याय है!”
लोगों ने कहा, “तुमने साथ नहीं दिया, इसलिए तुम्हें बराबरी कैसे मिले?”
उस रात मोहन भूखा सोया। उसे साधु की बात याद आई—“जो खुद को बड़ा समझता है, वह अकेला रह जाता है।” पहली बार उसके भीतर कुछ टूटा।
अगले दिन वह लोगों के पास गया और बोला, “मुझसे गलती हो गई। मैं खुद को बड़ा समझता रहा, पर तुम सबके बिना मैं कुछ नहीं।” लोगों ने उसे काम में लगा लिया।
धीरे-धीरे मोहन बदलने लगा। वह सुनना सीख गया, झुकना सीख गया। अब लोग उसकी इज़्ज़त करने लगे—इसलिए नहीं कि वह खुद को बड़ा समझता था, बल्कि इसलिए कि वह खुद को छोटा मानने लगा था।
और मोहन ने समझ लिया—
मनुष्य जितना छोटा होता है, उसका अहंकार उतना ही बड़ा होता है;
और जो सच में बड़ा होता है, उसके भीतर अहंकार के लिए जगह ही नहीं होती।

लघु कथा – 65

अनिल और कमला, दिल्ली के एक पुराने मोहल्ले में रहते थे। उनके बाल अब सफ़ेद हो चुके थे, पीठ में थोड़ी सी झुकान आ गई थी, और हाथ थकान से झूलते थे। लेकिन उनका दिल जवान था, और सोच हमेशा दूसरों के लिए तत्पर रहती थी।
एक दिन सुबह-सुबह अनिल अपने छोटे से आंगन में बैठकर चाय पी रहे थे। उनके सामने छोटा सा चिड़ियाघर सा लगने वाला बगीचा था, जहाँ कुछ पड़ोसी अपने पौधों की देखभाल कर रहे थे। तभी कमला ने देखा कि पास के घर की वृद्ध महिला, रुक्मिणी अम्मा, झाड़ियों के पास बैठकर रो रही हैं।
“अनिल, देखो! रुक्मिणी अम्मा कुछ परेशान लग रही हैं,” कमला ने कहा।
अनिल ने अपनी चाय का घूँट लिया और बोला, “चलो, हम उनके पास चलते हैं। इंसान के रूप में जन्म मिले हैं, तो दुःख-सुख साझा करना हमारी जिम्मेदारी है।”
वे दोनों धीरे-धीरे रुक्मिणी अम्मा के घर पहुंचे। कमला ने उनके हाथ पकड़कर कहा, “अम्मा, क्या हुआ? आप रो क्यों रही हैं?”
रुक्मिणी अम्मा ने कहा, “मेरे बेटे ने घर छोड़ दिया है, और कोई भी मुझे समझने नहीं आता। मैं बहुत अकेली महसूस कर रही हूँ।”
अनिल ने मुस्कुराते हुए कहा, “अम्मा, दुःख बंटाने से हल्का हो जाता है। हम आपके साथ हैं। आइए, बैठिए और थोड़ी चाय पीजिए।”
कमला ने उनके लिए गर्म रोटियाँ और हल्का खाना तैयार किया। अनिल ने ध्यान से सुना कि रुक्मिणी अम्मा की समस्या सिर्फ़ अकेलापन और निराशा थी। उन्होंने अपने अनुभव और कहानियों के माध्यम से उन्हें समझाया कि हर समस्या का समाधान होता है, और हर दुःख कुछ सिखाता है।
अम्मा के चेहरे पर धीरे-धीरे मुस्कान लौट आई। उन्होंने कहा, “आप दोनों का दिल सचमुच बहुत बड़ा है। आपके आने से मुझे फिर से जीवन की उम्मीद मिली।”
अनिल ने धीरे-धीरे कहा, “इन्सान के रूप में जन्म मिले हैं, लेकिन असाधारण बनने का तरीका यह है कि दूसरों के दुःख-सुख को अपने हृदय से महसूस करो, और मदद करो। हम हर किसी का दुःख दूर नहीं कर सकते, लेकिन प्रतिक्रिया और प्रयास हमारे हाथ में हैं।”
कमला ने भी सहमति में सिर हिलाया। “हर छोटी मदद, हर छोटा शब्द, कभी-कभी किसी की पूरी दुनिया बदल देता है।”
उस दिन से अनिल और कमला हर दिन पड़ोसियों से मिलने जाते। वे किसी की समस्या हल कर दें या न करें, लेकिन उनका प्रयास और उनकी दया सभी को महसूस होती। बच्चों से लेकर बुज़ुर्ग तक, सब उनकी छोटी-छोटी मदद को याद रखते थे।
उनका जीवन साधारण था, लेकिन उनके दिल की भव्यता और मानवीय संवेदनशीलता उन्हें असाधारण बनाती थी। मोहल्ले के लोग अक्सर कहते, “अनिल और कमला जैसी आत्मा हमें इंसान होने का मतलब याद दिलाती है।”
और सच में, इन्सान के रूप में जन्म लेना एक अवसर है, लेकिन औरों के दुःख-सुख को महसूस करना, मदद करना, और मंगलकामनाएँ देना—यही असली उपहार है।

लघु कथा – 64

गाँव के सबसे पीछे, घास-फूस की छोटी-सी झोपड़ी में रामलाल नाम का बूढ़ा आदमी रहता था। उसके चेहरे पर गहरी झुर्रियाँ थीं और आँखों में समय की थकान झलकती थी, लेकिन उसकी मुस्कान में अजीब सी गर्माहट थी, जो गाँव के लोगों के दिल तक पहुँचती। उम्र ज्यादा हो चुकी थी, पर जीवन की कठिनाइयों ने उसे कठोर नहीं, बल्कि दयालु बना दिया था।
रामलाल के पास न दौलत थी, न कोई बड़ी संपत्ति। उसकी झोपड़ी में केवल एक टूटे पलंग, कुछ कपड़े और अनाज के थैले थे। पर उसका दिल इतना बड़ा था कि वह हमेशा दूसरों के दुःख-सुख को महसूस करता। गाँव के लोग अक्सर हैरान होकर पूछते, “इतना गरीब आदमी, और इतना खुश कैसे रह सकता है?” रामलाल हँसकर कहता, “खुशी दौलत में नहीं, दूसरों की मदद में है।”
एक दिन तेज बारिश हुई। नदियाँ उफान पर थीं और गाँव में पानी घुस गया। लोग डर के मारे अपने घरों को छोड़कर भागने लगे, पर रामलाल ने अपनी झोपड़ी छोड़कर मदद करना शुरू कर दी। उसने बच्चों के लिए सूखे कपड़े इकट्ठा किए, बूढ़ों को अपने पास बुलाया और अपने पास जितना था, बाँट दिया।
पास के खेत में उसने देखा कि बूढ़ी महिला फँसी हुई है। रामलाल की थकी हुई पीठ और भीगते कपड़े, उसके साहस को नहीं रोक सके। उसने महिला को अपने हाथों में उठाया और सुरक्षित किनारे तक पहुँचाया। महिला की आँखों में आंसू थे, पर रामलाल की मुस्कान ने उसके डर को मिटा दिया।
गाँव के बच्चे अक्सर उसके पास आते। कोई दुखी होता, कोई भूखा। रामलाल हाथ में थोड़ा-सा अन्न लेकर उन्हें बाँट देता और कहता, “इन्सान के रूप में जन्म लेना बड़ी जिम्मेदारी है। जितना हो सके, दूसरों के दुःख को महसूस करो और मदद करो। यही असली संपत्ति है।”
कुछ समय बाद, गाँव के मुखिया ने रामलाल की मदद के लिए गाँव वालों से कुछ पैसे और कपड़े इकट्ठा किए। रामलाल मुस्कराया और बोला, “इनाम की मुझे ज़रूरत नहीं। खुशी इस बात में है कि किसी का दुःख कम कर पाया।”
समय बीतता गया। रामलाल बूढ़ा हो गया, पर उसकी कहानियाँ गाँव में पीढ़ियों तक सुनाई जाती रहीं। बच्चे उसे देखकर सीखते थे कि इन्सान के रूप में जन्म लेना सिर्फ जीने के लिए नहीं, बल्कि दूसरों के दुःख-सुख को महसूस करने और सहारा देने के लिए भी है।
रामलाल ने जीवन में कभी शिकायत नहीं की—न गरीबी से, न अकेलेपन से। उसने समझ लिया था कि हर क्रिया हमारे हाथ में नहीं होती, लेकिन हर प्रतिक्रिया और हर जवाब हमारे हाथ में है। यदि इंसान अपने हृदय से दूसरों के दुःख को महसूस करे और सही समय पर मदद करे, तो यही असली मानवता है।
गाँव वाले अक्सर कहते, “रामलाल ने हमें सिखाया कि असली ताकत दौलत में नहीं, बल्कि दिल की अच्छाई में है।”
और रामलाल, अपनी छोटी-सी झोपड़ी में, हर रात यही सोचकर सोता कि कल फिर किसी की मदद कर सकता है, क्योंकि इंसान के रूप में जन्म लेना सिर्फ जीने का मौका नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन में प्रकाश डालने का उपहार भी है।

लघु कथा – 63

हरि धीरे-धीरे आँगन की झुर्रियों भरी कुर्सी पर बैठे। उनकी आँखें दूर क्षितिज की ओर थीं, लेकिन मन भीतर से अशांत था।
सुनहरी उनके पास आई, हाथ थामते हुए बोली, “हरि, क्या सोच रहे हो? ऐसा लग रहा है जैसे तुम दूर कहीं खो गए हो।”
हरि ने धीमी आवाज़ में कहा, “सुनहरी… मुझे लगता है हमारी आत्मा अब सर्दी-गर्मी की तरह अस्थिर हो गई है। कभी हमारी कामवासना हमें जलाती है, कभी जलन और कुढ़न। लगता है जैसे सहारा के रेगिस्तान में इंसान अकेला हो और सूरज लगातार उसे झुलसा रहा हो।”
सुनहरी ने गहरी साँस ली और कहा, “हाँ, हरि। मुझे भी यही महसूस होता है। हमारी छोटी-छोटी ईर्ष्याएँ, हमारे भीतर के अहंकार… यह केवल हमें ही नहीं, बल्कि हमारे बच्चों और आस-पड़ोस वालों को भी प्रभावित करता है। कभी-कभी तो लगता है कि हम खुद ही अपने जीवन को पीड़ा दे रहे हैं।”
हरि ने हल्का मुस्कुराते हुए कहा, “याद है, जब हम जवान थे, तब हमारी भावनाएँ इतनी सरल और साफ़ थीं। हर खुशी में हम नाचते-गाते, हर दुख में एक-दूसरे का हाथ थाम लेते। अब… अब छोटी-छोटी बातें भी हमारी आत्मा को झुलसा देती हैं।”
सुनहरी ने प्यार से कहा, “तो क्यों न हम अपने भीतर की यह तपिश कम करें? जैसे रेगिस्तान में थोड़ी-सी छाया और पानी इंसान को बचा सकते हैं, वैसे ही प्रेम और धैर्य हमारी आत्मा को शांति दे सकते हैं।”
हरि ने आंखों में चमक के साथ कहा, “सही कहा, सुनहरी। हमें अपनी जलन, क्रोध और अहंकार को पहचानना होगा। जब हम ऐसा करेंगे, हमारी आत्मा ठंडी होगी, और हमारे आसपास की आत्माएं भी शांति महसूस करेंगी।”
अगले हफ्तों में, हरि और सुनहरी ने अपने जीवन में बदलाव लाना शुरू किया। छोटे-छोटे अच्छे काम करने लगे, बच्चों के प्रति समझ और प्रेम बढ़ाया, और गाँव के विवादों में धैर्य और समझदारी अपनाई।
एक दिन हरि ने अपनी पत्नी से कहा, “सुनहरी… मुझे लगता है हमारी आत्माएँ अब शांति महसूस कर रही हैं। पहले जैसी तपिश नहीं रही।”
सुनहरी ने मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ, हरि। अब हमारी ईर्ष्या और क्रोध हमें जला नहीं रहे। हमारी आत्माएँ अब उस रेगिस्तान की तरह नहीं हैं जो हर पल सूरज की तपिश सहती हो, बल्कि एक ओएसासिस की तरह हैं, जहाँ प्यार और शांति का पानी बह रहा है।”
हरि ने हाथ पकड़कर कहा, “देखो, हमने अपने भीतर की गर्मी को ठंडा कर दिया। अब हम शांति के साथ मुस्कुरा सकते हैं।”
सुनहरी ने हल्की हँसी के साथ उत्तर दिया, “अब हमें समझ आ गया है—उच्च और नीच भावों को समझना और उन्हें नियंत्रित करना ही असली जीवन की राह है।”
और इस तरह, हरि और सुनहरी ने अपने जीवन को प्रेम, धैर्य और आत्मिक संतुलन से भर दिया। सहारा के रेगिस्तान की तपिश से दूर, अपने ओएसासिस में, जहाँ हर दिन की धूप भी अब केवल हल्की गर्मी और उजाला देती थी, न कि जलन।

लघु कथा – 62

बेटा,
आज मैं तुम्हें एक बात बताना चाहता हूँ, जो मेरे जीवन की कई कठिन परिस्थितियों में मुझे हमेशा मार्गदर्शन देती रही। कहते हैं, “अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता।” हाँ, यह सच है। अकेले इंसान से हर बड़ा काम नहीं हो सकता। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अकेला व्यक्ति कोई फर्क नहीं ला सकता। कभी-कभी, सही समय और सही दिशा में की गई छोटी कोशिशें भी बड़ी हलचल पैदा कर सकती हैं।
याद है, जब मैं तुम्हारी उम्र का था, तब मैं भी अक्सर यही सोचता था कि मेरे छोटे-छोटे प्रयासों का कोई महत्व नहीं। मैं अकेला पढ़ता, अकेला मेहनत करता, और अकेले ही अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता। कई बार ऐसा लगता कि ये प्रयास व्यर्थ हैं, कि मैं कुछ भी बड़ा नहीं कर पाऊँगा। लेकिन धीरे-धीरे मैंने यह समझा कि छोटी-छोटी कोशिशें ही हमें बड़ी मंज़िलों तक पहुँचाती हैं।
एक समय की बात है। हमारे गाँव में एक पुराना तालाब था, जो लंबे समय से सूख रहा था। लोग कहते थे कि इसे भरना असंभव है। मैंने सोचा, “मैं अकेला कुछ करूँगा तो क्या होगा?” लेकिन फिर भी मैंने रोज़ छोटी-छोटी कोशिशें शुरू कीं। मैंने एक-एक बाल्टी पानी डालना शुरू किया, मिट्टी हटा कर रास्ता साफ किया, और दूसरों को भी प्रेरित करने की कोशिश की। पहले तो कोई भी मेरी बात नहीं सुनता था, लेकिन मेरी निरंतरता और मेहनत धीरे-धीरे लोगों का ध्यान खींचने लगी। कुछ महीनों में, कई लोग मेरी मदद करने लगे, और अंततः तालाब में पानी आ गया।
बेटा, यही जीवन की सच्चाई है। बड़े परिवर्तन अक्सर छोटी शुरुआत से ही होते हैं। यदि तुम सही दिशा में लगातार प्रयास करते रहो, तो एक दिन तुम्हारे छोटे कदम भी बड़ी हलचल पैदा कर देंगे। जीवन में तुम्हारे सामने मुश्किलें आएँगी। लोग कहेंगे कि तुम अकेले कुछ नहीं कर सकते। लेकिन याद रखना – वही अकेला चना, जिसे लोग नजरअंदाज करते हैं, कभी-कभी सबसे बड़ी हलचल पैदा करता है।
इसलिए, बेटा, अपने प्रयासों को कभी कम मत आंकना। छोटे कदम भी सही दिशा में सही समय पर बहुत कुछ बदल सकते हैं। तुम्हारी निरंतरता, तुम्हारा धैर्य, और तुम्हारा आत्मविश्वास तुम्हारे सपनों को सच कर सकते हैं। याद रखना कि अकेला चना भले ही भाड़ न फोड़ सके, लेकिन हलचल तो पैदा कर ही सकता है। और वही हलचल जीवन में बड़े बदलाव की शुरुआत बन सकती है।
तो हमेशा अपने प्रयासों में विश्वास रखो। कभी भी हार मत मानो। एक छोटे-से कदम की ताकत को कभी कम मत समझो। सही दिशा में बढ़ते रहो, और एक दिन देखोगे कि वही छोटी शुरुआत तुम्हारे जीवन में बड़ी सफलता लेकर आई है।
तुम्हारा पिता

लघु कथा – 61

विकास अपने छोटे-से गाँव में एक साधारण आदमी था। उसने अपने जीवन में हमेशा ईमानदारी और मेहनत को अपनाया था, लेकिन पैसा कभी उसके साथ नहीं खड़ा रहा। उसकी छोटी-सी दुकान थी, जहाँ दिनभर मेहनत करने के बावजूद जीवन की साधारण जरूरतें मुश्किल से पूरी होती थीं।
एक दिन, गाँव के सबसे अमीर और ताकतवर व्यक्ति, ठाकुरसाहब, विकास की दुकान पर आए। उनके आने का मतलब ही गाँव वालों के लिए किसी बड़े मौके की तरह था। ठाकुरसाहब ने मुस्कुराते हुए कहा, “विकास, तुम्हारी ईमानदारी की मुझे खबर मिली है। मुझे तुम्हारी मदद चाहिए, और इसके लिए तुम्हें बहुत इनाम मिलेगा।”
विकास की आँखें चमक उठीं। यह मौका उसके जीवन को बदल सकता था। उसने उत्सुकता से पूछा, “ठीक है, ठाकुरसाहब। मुझे क्या करना होगा?”
ठाकुरसाहब ने धीरे से कहा, “तुम्हें गाँव के कुछ खेतों में कागज़ात जमा करने होंगे, जिनसे मैं बड़े लाभ में आ जाऊँगा। इसे कोई पकड़ नहीं पाएगा, बस मेरे निर्देशों का पालन करना होगा।”
विकास का मन झकझोर गया। एक ओर पैसे का लालच और आसान रास्ता था, जो उसके और उसके परिवार के जीवन को बदल सकता था। दूसरी ओर, उसकी अंतरात्मा बार-बार कह रही थी, “यह गलत है। यह तुम्हारे लिए सही नहीं है।”
विकास ने आँखें बंद कीं और अपने जीवन की याद की—कैसे उसने छोटे-छोटे संघर्षों के बावजूद ईमानदारी और मेहनत से अपने परिवार को संभाला। उसे याद आया उसके पिता ने हमेशा कहा था, “बेटा, सही रास्ता हमेशा कठिन होता है, लेकिन वही रास्ता तुम्हें सम्मान और शांति देता है।”
विकास ने गहरी साँस ली और ढीठ होकर कहा, “मुझे खेद है, ठाकुरसाहब। मैं आपकी मदद नहीं कर सकता। मैं जानता हूँ कि यह आपके लिए लाभदायक होगा, लेकिन मेरे लिए यह सही नहीं है।”
ठाकुरसाहब थोड़ी देर चुप रहे। उनके चेहरे पर गुस्सा था, लेकिन विकास ने अपने मन को शांत रखा। उसने महसूस किया कि असली कठिनाई उस समय थी जब उसने ईमानदारी और साहस के बीच चुनाव किया।
कुछ दिनों बाद, गाँव में विकास की ईमानदारी की खबर फैल गई। लोग उसकी दुकान पर आने लगे। धीरे-धीरे व्यवसाय बढ़ा, और वह अपने परिवार के लिए बेहतर जीवन दे सका। विकास ने महसूस किया कि सही निर्णय से ही स्थायी सफलता और सम्मान मिलते हैं।
एक शाम, विकास अपने बच्चों के साथ बगीचे में बैठा था। बच्चों ने पूछा, “पिताजी, आपने ठाकुरसाहब की मदद क्यों नहीं की, जबकि वह आपको इतना पैसा देने वाले थे?”
विकास मुस्कुराया और धीरे से बोला, “बच्चों, जीवन में दोराहे आते हैं। आसान रास्ता हमेशा आकर्षक लगता है, लेकिन उसे पकड़ने से अंततः मुश्किलें बढ़ती हैं। वही रास्ता चुनो जो सही लगे, चाहे कठिन क्यों न हो। यही जीवन में स्थायी खुशी और सम्मान लाता है।”
बच्चों ने उत्सुकता से पूछा, “लेकिन पिताजी, क्या कभी ऐसा लगा कि हमें पछतावा होगा?”
विकास ने अपने अनुभव से कहा, “सही रास्ता कभी पछतावा नहीं देता। मुश्किलें आती हैं, पर उनमें सीख होती है। याद रखो, एक दिन तुम देखोगे कि वही कठिन राह तुम्हें मजबूती, संतोष और सच्चा सम्मान देती है।”
उस दिन विकास ने अपने बच्चों को न सिर्फ जीवन का एक अनमोल सबक दिया, बल्कि खुद भी यह महसूस किया कि सही निर्णय हमेशा कठिन हो सकता है, लेकिन वही हमें सच्ची सफलता और शांति की ओर ले जाता है।