68. चट मंगनी पट ब्याह वाली प्रेम कहानी

गाँव में मोहन और गीता की प्रेम कहानी बहुत मशहूर थी। दोनों बचपन से साथ पढ़े थे और बड़े होते-होते उनकी दोस्ती धीरे-धीरे प्यार में बदल गई। लेकिन मोहन जी का सपना था कि शादी भी “चट मंगनी पट ब्याह” स्टाइल में हो जाए।

मोहन हमेशा गीता से कहता, “मुझे ज्यादा इंतजार पसंद नहीं है, शादी होनी चाहिए तो बस हो जाए।” गीता हँसकर कहती, “शादी कोई चाय नहीं है जो तुरंत बन जाए।”

एक दिन मोहन ने हिम्मत करके अपने घर बात की। माँ ने पूछा, “लड़की वालों से बात हुई?”

मोहन बोला, “अभी नहीं, लेकिन जल्दी हो जाएगी।”

मोहन सीधे गीता के घर पहुँच गया और उसके पिता से बोला, “मुझे आपकी बेटी पसंद है, मैं शादी करना चाहता हूँ।” गीता के पिता थोड़ा हैरान हुए, लेकिन मोहन की सीधी बात उन्हें पसंद आ गई।

उन्होंने कहा, “इतनी जल्दी शादी?”

मोहन बोला, “जी हाँ, अगर प्यार सच्चा है तो इंतजार क्यों?”

गीता भी आकर बोली, “पापा, मोहन सही कह रहा है।”

बस क्या था… घर में हल्की हलचल शुरू हो गई। शादी की तारीख पूछी गई तो मोहन ने कहा, “अगले हफ्ते कर लेते हैं।” यह सुनकर गीता की माँ चाय का कप हाथ में लिए वहीं खड़ी रह गईं।

अंत में तय हुआ कि शादी जल्दी होगी, लेकिन कुछ रस्में निभानी होंगी।

शादी की तैयारी बहुत तेज हुई। मोहल्ले वाले कहने लगे कि यह सच में चट मंगनी पट ब्याह हो रहा है। किसी ने कहा, “इतनी जल्दी शादी देखकर तो समय भी हैरान होगा।”
शादी वाले दिन मोहन बहुत खुश था, लेकिन गीता थोड़ी घबराई हुई थी। मोहन ने कहा, “डर मत, शादी प्यार की मंजिल है।”

जयमाला के समय मोहन ने धीरे से कहा, “देखो, मैंने इंतजार कम किया लेकिन प्यार ज्यादा किया।”

शादी हो गई और दोनों हँसते हुए घर पहुँचे। मोहन ने कहा, “देखा, चट मंगनी पट ब्याह भी हो गया।”

मोहल्ले वाले कहते हैं कि कभी-कभी प्यार में ज्यादा सोचने से अच्छा है कि समय देखकर फैसला कर लिया जाए। और मोहन-गीता की प्रेम कहानी उसी का मजेदार उदाहरण बन गई।

67. बैंड बजा बारात का

गाँव में रामू काका के बेटे की शादी थी। पूरे मोहल्ले में चर्चा थी कि बारात बड़े धूमधाम से निकलेगी। रामू काका ने खास तौर पर फैसला किया था कि इस बार बारात में बैंड ऐसा बजेगा कि सुनने वाले झूम उठें।

शादी वाले दिन सुबह से ही घर में हलचल थी। दूल्हा तैयार बैठा था, लेकिन उसका चेहरा ऐसा था जैसे किसी ने उससे पूछा हो कि आज परीक्षा भी देनी है और शादी भी करनी है। दोस्त बार-बार कहते, “भाई, मुस्कुरा ले, बारात निकलने वाली है।”

शाम होते ही बैंड वालों की एंट्री हुई। ढोल वाला इतना उत्साहित था कि पहले ही ढोल पीटने लगा। रामू काका बोले, “अभी बारात नहीं निकली।” ढोल वाला बोला, “भाई साहब, प्रैक्टिस कर रहा हूँ।”

फिर बारात निकली तो बैंड बजने लगा – जोर-जोर से, टेढ़ा-मेढ़ा, कभी धीमा, कभी तेज। मोहल्ले के बच्चे पीछे-पीछे नाचने लगे जैसे यह किसी त्योहार की रैली हो।

बारात जैसे ही मुख्य सड़क पर पहुँची, बैंड वाले ने अचानक देशभक्ति गीत शुरू कर दिया। दूल्हे के दोस्त चौंक गए क्योंकि वे फिल्मी गाना सुनकर नाच रहे थे, लेकिन अचानक माहौल बदल गया।

एक चाचा बोले, “बैंड तो अच्छा है, पर दूल्हा ज्यादा गंभीर लग रहा है।”

दूल्हे के दोस्त ने कहा, “भाई, यह शादी का तनाव है।”

रास्ते में एक जगह बैंड रुक गया क्योंकि ढोल वाला बोला, “पहले चाय मिलेगी तब बजाऊँगा।” रामू काका ने तुरंत चाय मंगवाई क्योंकि बारात का रुकना शुभ नहीं माना जाता।
फिर बारात दुल्हन के घर पहुँची। बैंड फिर जोर-जोर से बजा। लोग नाचते रहे, बच्चे तालियाँ बजाते रहे और दूल्हा मन ही मन सोचता रहा कि शादी से ज्यादा शोर तो बारात का है।

जयमाला के समय बैंड वाले ने इतना तेज संगीत बजाया कि दूल्हा घबराकर पीछे हट गया। किसी ने कहा, “लगता है बैंड ही दूल्हे का दिल धड़काने का काम कर रहा है।”

शादी खत्म हुई और लोग बोले, “आज बैंड सच में बारात का बैंड बजा गया।”

और रामू काका मुस्कुराकर बोले, “शादी में बैंड जरूरी है, वरना बारात का मजा पूरा नहीं होता।”

66. मुंह लटकाए दूल्हा

शादी का दिन था और शर्मा जी का बेटा राजू दूल्हे के जोड़े में तैयार बैठा था। लेकिन राजू का चेहरा ऐसा था जैसे किसी ने उसका मनपसंद मोबाइल छीन लिया हो। वह बार-बार आईने में देखकर अपना मुंह टेढ़ा कर रहा था।

माँ ने पूछा, “राजू, खुश नहीं लग रहा? शादी है आज।”
राजू ने लंबी साँस लेकर कहा, “माँ, मुझे डर लग रहा है।”
पड़ोसी चाचा बोले, “अरे बेटा, शादी कोई परीक्षा नहीं है।”
राजू बोला, “परीक्षा से भी ज्यादा मुश्किल है, क्योंकि यहाँ सवाल पूछने वाला टीचर नहीं, पत्नी होगी।”

यह सुनकर कुछ लोग हँस पड़े।

दूल्हे की बारात निकलने वाली थी, लेकिन राजू का मुंह अभी भी लटका हुआ था जैसे किसी ने उसे बिना नमक की सब्जी खिला दी हो। दोस्त ने कहा, “भाई, मुस्कुरा ले, फोटो खराब हो जाएगी।”

राजू बोला, “फोटो तो बाद में आएगी, अभी तो जिंदगी का सवाल है।”

बारात जैसे ही दुल्हन के घर पहुँची, ढोल बजने लगे। राजू ने घबराकर कहा, “ढोल इतना जोर से क्यों बज रहा है?”
दोस्त ने कहा, “यह तुम्हारे स्वागत में है।”

जयमाला के समय दुल्हन मुस्कुराकर आई तो राजू और ज्यादा घबरा गया। उसके चेहरे पर मुस्कान की जगह चिंता के बादल घूमने लगे।
जैसे ही दुल्हन ने माला पहनाई, राजू ने धीरे से कहा, “मैं अभी भाग सकता हूँ क्या?”
पास खड़े पंडित जी ने सुन लिया और बोले, “शादी का मुहूर्त भागने के लिए नहीं होता।”

फोटो खिंचाने के समय भी राजू का मुंह लटका रहा। फोटोग्राफर बोला, “भाई साहब, थोड़ा खुश हो जाइए।”
राजू ने कहा, “खुशी अंदर है, बाहर आने का रास्ता ढूंढ रही है।”
शादी खत्म होने के बाद दोस्त ने पूछा, “अब कैसा लग रहा है?”
राजू बोला, “पहले डर था, अब थोड़ी राहत है… क्योंकि शादी हो गई।”

रात को घर पहुँचकर राजू ने सोचा कि मुंह लटकाना शायद बेकार था, क्योंकि शादी तो हो ही गई।

मोहल्ले वाले कहते हैं कि उस दिन मुंह लटकाए दूल्हा भी समझ गया कि शादी में मुस्कान जरूरी है, वरना लोग सोचते हैं कि दूल्हा अभी भी भागने की योजना बना रहा है।

65. खटाई में पड़ी छुट्टियाँ

रवि बहुत खुश था क्योंकि गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू होने वाली थीं। उसने पहले ही योजना बना ली थी कि वह सुबह देर तक सोएगा, दिन में दोस्तों के साथ खेल खेलेगा और शाम को टीवी देखकर आराम करेगा। लेकिन किस्मत को शायद उसकी योजना पसंद नहीं आई।

जैसे ही स्कूल की आखिरी घंटी बजी, टीचर ने मुस्कुराकर कहा, “बच्चों, छुट्टियों में रोज दो घंटे पढ़ाई जरूर करना।” यह सुनकर रवि का दिल थोड़ा बैठ गया, लेकिन उसने सोचा, “दो घंटे पढ़ाई भी छुट्टी का ही हिस्सा है।”

घर पहुँचकर रवि ने अपनी छुट्टियों की लिस्ट बनाई – सोना, खेलना, घूमना और मौज करना। लेकिन तभी माँ ने कहा, “छुट्टियों में घर की सफाई भी होगी।” रवि ने सोचा कि शायद यह भी किसी खेल का नाम है।

अगले दिन सुबह माँ ने कहा, “आज से बर्तन धोने का अभ्यास शुरू करो।” रवि ने कहा, “माँ, मैं पढ़ाई की छुट्टी पर हूँ, काम की नहीं।” माँ बोलीं, “छुट्टियाँ हाथ-पैर आराम के लिए हैं, दिमाग के लिए नहीं।”

दोपहर में दोस्त खेलने आए। जैसे ही रवि बाहर जाने लगा, माँ ने कहा, “पहले होमवर्क पूरा करो।” रवि ने दुखी होकर कहा, “छुट्टियाँ तो खटाई में पड़ गईं।”

शाम को टीवी देखने बैठा तो बिजली चली गई। रवि ने ऊपर देखकर कहा, “लगता है छुट्टियाँ भी मुझसे नाराज़ हैं।”
अगले दिन दादी आईं और बोलीं, “छुट्टियों में कुछ नया सीखो।” रवि ने पूछा, “क्या?” दादी बोलीं, “सब्जी काटना, झाड़ू लगाना और जल्दी उठना।”

रवि को लगा कि उसकी छुट्टियाँ किसी सख्त ट्रेनिंग कैंप में बदल गई हैं। उसने दोस्तों को मैसेज भेजा, “मेरी छुट्टियाँ खटाई में पड़ गई हैं।”

आखिरकार रवि ने फैसला किया कि चाहे छुट्टियाँ कितनी भी काम में उलझें, वह थोड़ा समय जरूर मौज-मस्ती के लिए निकालेगा।

रात को छत पर बैठकर उसने सोचा, “छुट्टियाँ सिर्फ आराम के लिए नहीं, बल्कि जिंदगी का स्वाद बढ़ाने के लिए होती हैं।”

और मोहल्ले वाले कहते हैं कि रवि की छुट्टियाँ भले खटाई में पड़ गईं, लेकिन उसकी मुस्कान अभी भी मीठी बनी हुई है।

64. आँखें चार हुईं बस स्टॉप पर

रमेश जी रोज़ सुबह ऑफिस जाने के लिए बस स्टॉप पर खड़े रहते थे। उनकी आदत थी कि बस आने से पहले आसपास के लोगों को गौर से देखने की, क्योंकि उनका मानना था कि दुनिया में हर चेहरा किसी न किसी कहानी का हिस्सा होता है।

उस दिन भी बस स्टॉप पर भीड़ थी। तभी एक महिला वहाँ आकर खड़ी हुईं। हल्का सा हवा का झोंका आया और उनकी चूड़ी की आवाज़ रमेश जी के कानों तक पहुँची। रमेश जी ने अनजाने में उनकी तरफ देखा और उस महिला ने भी उसी समय उनकी तरफ देख लिया।

बस क्या था… दोनों की आँखें चार हो गईं।

रमेश जी घबरा गए और तुरंत इधर-उधर देखने लगे जैसे कुछ हुआ ही नहीं। लेकिन मन ही मन सोचने लगे कि कहीं महिला यह न समझ लें कि वे जानबूझकर घूर रहे थे।

महिला भी थोड़ी असहज हो गईं और अपना दुपट्टा ठीक करने लगीं। पास खड़ा बच्चा यह सब देखकर फुसफुसाया, “अंकल, लगता है लव स्टोरी शुरू हो गई।”

रमेश जी ने बच्चे को घूरकर चुप रहने का इशारा किया।
इतने में बस आ गई, लेकिन भीड़ इतनी थी कि चढ़ना मुश्किल हो गया। रमेश जी और वह महिला दोनों एक ही दरवाजे की तरफ भागे और फिर अचानक एक-दूसरे को देखकर रुक गए।

महिला ने मुस्कुराकर कहा, “आप पहले चढ़ जाइए।”
रमेश जी बोले, “नहीं, आप पहले।”

बस कंडक्टर चिल्लाया, “जल्दी चढ़िए, बस अभी निकल जाएगी।”

अंत में दोनों एक साथ बस में चढ़ गए और खड़े होने की जगह भी एक ही कोने में मिल गई।

रास्ते में बस के झटके लगने पर कभी रमेश जी महिला की तरफ देखते, कभी खिड़की की तरफ। महिला भी कभी अपने बैग को देखतीं, कभी बाहर भागती दुनिया को।

अचानक स्टॉप आ गया और महिला उतरने लगीं। जाते-जाते उन्होंने हल्की सी मुस्कान देकर कहा, “फिर मिलेंगे।”

रमेश जी बस में खड़े रह गए और सोचने लगे कि आज बस स्टॉप पर आँखें चार तो हुईं, लेकिन बात आगे बढ़ाने की हिम्मत बस स्टॉप पर ही रह गई।

मोहल्ले वाले कहते हैं कि प्यार कभी-कभी बस स्टॉप पर ही शुरू होकर वहीं इंतजार करता रह जाता है।

63. सिर पर आसमान उठा बच्चों ने

गाँव के स्कूल में बच्चों की शरारतें मशहूर थीं। मास्टर जी कहते थे कि अगर बच्चों को पाँच मिनट अकेला छोड़ दिया जाए तो वे किसी नई शरारत की खोज कर लेते हैं। उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ।

मास्टर जी क्लास से बाहर क्या गए, बच्चों ने मौज-मस्ती शुरू कर दी। पिंटू ने कहा, “आज कुछ बड़ा करते हैं, छोटा खेल रोज खेलते हैं।” गोलू बोला, “हाँ, आज ऐसा काम करेंगे कि मास्टर जी भी हैरान रह जाएँ।”

फिर बच्चों ने मिलकर सोचा कि क्लास की छत को ही “आसमान” बना दिया जाए। उन्होंने टेबल और बेंच खिसकाकर छत की तरफ हाथ उठाकर कहा, “लो, हमने आसमान सिर पर उठा लिया।”

पिंटू बोला, “अब हम आसमान को पकड़कर रखेंगे ताकि बारिश छुट्टी लेकर आए।”

इतने में मास्टर जी वापस आ गए। क्लास का हाल देखकर उनकी आँखें बड़ी हो गईं। बच्चे बेंचों पर खड़े होकर छत को देखने का नाटक कर रहे थे जैसे सच में आसमान सिर पर उठा रखा हो।

मास्टर जी ने पूछा, “यह क्या चल रहा है?”

गोलू बोला, “सर, हम विज्ञान सीख रहे हैं। हमने पता लगाया है कि आसमान बहुत ऊपर है इसलिए उसे सिर पर उठाना मुश्किल है।”

मास्टर जी मुस्कुराए और बोले, “अगर आसमान सिर पर उठाओगे तो पढ़ाई कहाँ रखोगे?”
बच्चे चुप हो गए।

मास्टर जी ने समझाया, “आसमान सिर पर उठाने का मतलब है बड़े सपने देखना, न कि छत को हिलाने की कोशिश करना।”

पिंटू ने मासूमियत से पूछा, “सर, सपने भी क्लास में बैठते हैं क्या?”

मास्टर जी बोले, “हाँ, अगर मेहनत करोगे तो सपने खुद तुम्हारे पास आएँगे।”

उस दिन बच्चों ने समझ लिया कि शरारत करना अच्छा है, लेकिन पढ़ाई से दोस्ती करना उससे भी अच्छा है।

छुट्टी के समय बच्चे हँसते हुए बाहर निकले और पिंटू बोला, “आज हमने सच में आसमान सिर पर उठा लिया… बस मास्टर जी ने पकड़ लिया।”

और मोहल्ले वाले कहते हैं कि उस दिन बच्चों ने शरारत के साथ ज्ञान का आसमान भी थोड़ा ऊपर कर लिया।

62. आटे दाल का भाव

रमेश जी बड़े शौकीन आदमी थे। शादी-ब्याह में जाना उन्हें बहुत पसंद था क्योंकि वहाँ खाने-पीने का अच्छा इंतजाम होता था। लेकिन इस बार शादी में जो हुआ, उसने उनकी जिंदगी का नजरिया ही बदल दिया।

शहर के बड़े होटल में शादी थी। रमेश जी चमकदार कुर्ता पहनकर पहुँचे और सीधे खाने के पंडाल की तरफ चले गए। जैसे ही लाइन में खड़े हुए, सामने बड़े-बड़े बर्तनों में खाना देखकर उनके चेहरे पर खुशी चमक उठी।

सबसे पहले उन्होंने रोटी ली। जैसे ही रोटी हाथ में आई, उन्होंने सोचा, “आज तो मजा आ जाएगा।” लेकिन पास खड़े बुजुर्ग ने कहा, “भाई साहब, शादी का खाना खाकर ही असली आटे का भाव समझ आता है।”
रमेश जी ने मुस्कुराकर पूछा, “कैसे?”
बुजुर्ग बोले, “घर में रोटी बर्बाद होती है, लेकिन यहाँ एक रोटी के लिए पाँच मिनट लाइन में खड़े होना पड़ता है।”

फिर रमेश जी दाल लेने गए। दाल की कढ़ाही देखकर उन्हें लगा जैसे सोने का खजाना मिल गया हो। उन्होंने प्लेट में दाल डाली और चखकर कहा, “वाह, शादी की दाल तो घर की दाल से ज्यादा स्वादिष्ट होती है।”

तभी पीछे से किसी ने कहा, “लेकिन यहाँ दाल का स्वाद ही नहीं, बल्कि आटे दाल का भाव भी पता चलता है।”
रमेश जी ने पूछा, “वह कैसे?”
आदमी बोला, “घर में पत्नी कहती हैं कि दाल में पानी ज्यादा डाल दिया, और यहाँ दाल खत्म होने से पहले लाइन खत्म होने की चिंता रहती है।”

अगले काउंटर पर सब्जी थी। रमेश जी ने थोड़ा सा आलू लिया और सोचा कि अगर घर में भी इतना ही लें तो महीने का बजट बच सकता है।

खाना खाते-खाते रमेश जी को एहसास हुआ कि शादी में पेट नहीं, बल्कि जीवन का हिसाब-किताब भी चलता है। मिठाई खाते समय उन्होंने कहा, “सच में, आज आटे दाल का असली भाव समझ में आ गया।”

घर लौटकर पत्नी ने पूछा, “खाना कैसा था?”

रमेश जी बोले, “बहुत अच्छा… बस एक बात समझ आई कि शादी में पेट भरता है, लेकिन जिंदगी का हिसाब भी लग जाता है।”

61. दिल पर पत्थर रखकर डाइट

रमाकांत जी को खाने-पीने का बहुत शौक था। मोहल्ले में लोग मजाक में कहते थे कि अगर खाने की प्रतियोगिता हो तो रमाकांत जी बिना तैयारी के भी जीत सकते हैं। लेकिन डॉक्टर की सलाह ने उनकी जिंदगी उलट-पुलट कर दी।
एक दिन चेकअप के बाद डॉक्टर ने गंभीर चेहरे से कहा, “रमाकांत जी, अगर सेहत ठीक रखनी है तो डाइट करनी पड़ेगी।” यह सुनकर रमाकांत जी को ऐसा लगा जैसे किसी ने उनका मनपसंद खाना छीन लिया हो।

घर आकर उन्होंने पत्नी से कहा, “आज से मैं दिल पर पत्थर रखकर डाइट शुरू करूँगा।” पत्नी मुस्कुराकर बोलीं, “बहुत अच्छा, पहले पत्थर की जगह आलू टिक्की रख लेते तो ज्यादा खुशी होती।”

अगले दिन सुबह रमाकांत जी ने फैसला किया कि नाश्ते में सिर्फ एक सेब खाएंगे। टेबल पर सेब देखकर उनका दिल रोने लगा, लेकिन उन्होंने हिम्मत जुटाकर सेब उठा लिया। जैसे ही पहला कौर लिया, उन्हें लगा जैसे जिंदगी का मजा कम हो रहा है।

दोपहर में पत्नी ने पूछा, “खाने में क्या लोगे?”
रमाकांत जी बोले, “सिर्फ सलाद।”
पत्नी ने उन्हें इतना बड़ा सलाद का कटोरा दिया कि वह देखकर ही डर गए।

शाम को रमाकांत जी टीवी देखते हुए सोच रहे थे कि डाइट करना आसान नहीं है। तभी पड़ोस से पकौड़ों की खुशबू आने लगी। रमाकांत जी ने दिल पर पत्थर रखा और खिड़की बंद कर ली, लेकिन पत्थर थोड़ा हिलता हुआ महसूस हुआ।
रात को पत्नी ने पूछा, “खाना खाओगे?”

रमाकांत जी बोले, “नहीं, मैं डाइट पर हूँ।”

पत्नी ने कहा, “ठीक है, फिर सिर्फ एक रोटी और थोड़ी सब्जी ले लो।”

रमाकांत जी बोले, “डाइट का मतलब भूख से लड़ना नहीं, भूख को समझाना है।”

आधी रात को रमाकांत जी फ्रिज के सामने खड़े थे और सोच रहे थे कि सेहत जरूरी है या स्वाद। अंत में उन्होंने फैसला किया कि डाइट जारी रहेगी… लेकिन धीरे-धीरे।

अगले दिन उन्होंने सेब के साथ आधा समोसा भी खा लिया और दिल पर पत्थर रखने की कोशिश करते हुए बोले, “आज पत्थर थोड़ा हल्का हो गया है।”

60. घुटने टेक दिए क्रिकेट टीम ने

गाँव की क्रिकेट टीम का नाम था “तूफान इलेवन”, लेकिन खेल देखकर लगता था कि तूफान तो दूर, हल्की हवा भी उनके पास से गुजर जाए तो गेंद उड़ जाए। टीम के कप्तान मोहन जी बड़े जोश से कहते थे कि इस बार ट्रॉफी जरूर आएगी, चाहे कुछ भी हो जाए।

मैच शुरू हुआ तो सामने शहर की मजबूत टीम थी। पहली ही गेंद पर मोहन जी के ओपनर बल्लेबाज बल्ला ऐसे घुमाने लगे जैसे मक्खी उड़ाने की कोशिश कर रहे हों। गेंद बल्ले को छूकर सीधे विकेट के पीछे चली गई। अंपायर ने उंगली उठाई तो बल्लेबाज ने कहा, “यह आउट नहीं, अभ्यास शॉट था।”

दूसरे बल्लेबाज मैदान पर आए और पहली गेंद देखकर इतने घबरा गए कि उन्होंने बिना शॉट खेले ही दौड़ना शुरू कर दिया। विकेट के बीच में पहुँचकर याद आया कि अभी गेंद खेली ही नहीं गई है। वह शर्म से वापस लौट आए।
फील्डिंग करते समय भी टीम का हाल बुरा था। एक खिलाड़ी कैच पकड़ने के लिए कूदे, लेकिन गेंद उनके हाथ से ऐसे बच निकली जैसे साबुन लगी मछली हो। कप्तान मोहन जी चिल्लाए, “ध्यान से! गेंद दुश्मन नहीं, मेहमान है।”
दूसरी टीम के बल्लेबाज ने छक्का मारा तो गेंद सीधे पास के खेत में जा गिरी। गेंद ढूँढने के लिए टीम के चार खिलाड़ी गए और लौटकर बोले, “गेंद तो नहीं मिली, लेकिन खेत के मालिक ने चाय जरूर पिला दी।”

मैच आगे बढ़ा तो “तूफान इलेवन” की हालत पतली होने लगी। रन बनाना तो दूर, खिलाड़ी खड़े रहने में भी मुश्किल महसूस करने लगे। स्कोर बोर्ड देखकर कप्तान मोहन जी ने लंबी सांस ली और बोले, “लगता है आज घुटने टेकने का समय आ गया है।”

आखिरी ओवर में पूरी टीम ने मिलकर बस एक ही रन बनाया और मैच हार गई। मैदान से बाहर आते हुए मोहन जी बोले, “हारना भी एक कला है।”

मोहल्ले वाले कहते हैं कि उस दिन क्रिकेट टीम ने सच में घुटने टेक दिए थे, लेकिन खेल भावना को सलाम करना नहीं भूले।

59. नाक पर मक्खी न बैठने देने वाली मैडम

स्कूल में मैडम सीमा जी का नाम सुनते ही बच्चे सावधान हो जाते थे। कहा जाता था कि मैडम सीमा जी इतनी सतर्क रहती थीं कि अपनी नाक पर मक्खी भी नहीं बैठने देती थीं। बच्चे तो मजाक में कहते थे कि अगर हवा भी बिना अनुमति आई तो मैडम उससे भी पूछ लेंगी कि कहाँ जा रही हो।

कक्षा में मैडम का अनुशासन सबसे अलग था। जैसे ही घंटी बजती, वे तुरंत क्लास में प्रवेश करतीं और बच्चों को ऐसे देखतीं जैसे सबने मिलकर शरारत की योजना बना रखी हो।

एक दिन क्लास में पिंटू ने धीरे से अपने दोस्त से कहा, “आज गणित का टेस्ट है, मेरी तो जान निकल रही है।” यह बात मैडम के कान तक पहुँच गई। मैडम तुरंत बोलीं, “पिंटू, अगर जान निकल रही है तो पहले टेस्ट दो, बाद में देखेंगे।”
कक्षा में सन्नाटा छा गया।
पिंटू ने डरते-डरते पूछा, “मैडम, क्या हम पानी पीने जा सकते हैं?”
मैडम बोलीं, “पानी पीने के लिए दो मिनट की अनुमति लेनी होगी और वापस आकर बताना होगा कि पानी ठंडा था या गर्म।”
बच्चे हैरान रह गए।

एक दिन क्लास में अचानक एक छोटी मक्खी उड़कर मैडम की तरफ आ गई। बच्चे चुपचाप देखने लगे कि क्या होगा। जैसे ही मक्खी नाक के पास पहुँची, मैडम ने तेज नजरों से उसे देखा और हाथ से ऐसे झटका दिया जैसे कोई बड़ा संकट टाल दिया हो।

पिंटू फुसफुसाया, “देखो, मैडम ने मक्खी को भी डांट दिया।”
दोपहर में मैडम ने पूछा, “किसी को कोई सवाल है?”
गोलू ने साहस करके कहा, “मैडम, अगर मक्खी दोबारा आ गई तो?”
मैडम बोलीं, “तो उसे समझा देना कि यह स्कूल है, कोई पिकनिक स्पॉट नहीं।”

धीरे-धीरे बच्चे मैडम की सख्ती के आदी हो गए। पढ़ाई भी सुधरने लगी क्योंकि क्लास में शरारत करने का समय ही नहीं मिलता था।

साल के अंत में रिजल्ट अच्छा आया तो बच्चे समझ गए कि नाक पर मक्खी न बैठने देने वाली मैडम असल में अनुशासन की उड़ती हुई पाठशाला थीं।

और बच्चे मुस्कुराकर कहते थे, “मैडम सख्त जरूर हैं, लेकिन उनकी सख्ती ने हमें उड़ना सिखा दिया।”

58. हाथ पर हाथ धरे बैठे पति

मोहल्ले में श्याम जी की पहचान एक ऐसे पति के रूप में थी जो घर के कामों से दूरी बनाकर रखते थे। पत्नी का कहना था कि श्याम जी की सबसे बड़ी उपलब्धि यही थी कि वे हाथ पर हाथ धरे बैठना बहुत अच्छे से जानते थे।

सुबह होते ही पत्नी रमा जी घर के कामों में लग जातीं और श्याम जी सोफे पर अखबार लेकर ऐसे बैठ जाते जैसे देश की बड़ी समस्याओं पर चिंतन कर रहे हों। कभी अखबार उलटते, कभी टीवी का चैनल बदलते, लेकिन काम की बात पर हमेशा कहते, “अभी थोड़ा आराम कर रहा हूँ।”

एक दिन रमा जी ने कहा, “आज सब्जी बाजार से ले आओ।” श्याम जी बोले, “ठीक है, लेकिन पहले सोच लूँ कि कौन सी सब्जी लेना ज्यादा बुद्धिमानी होगी।” और वे सोफे पर बैठकर सोचने लगे।

एक घंटे बाद रमा जी बोलीं, “सब्जी कहाँ है?”
श्याम जी बोले, “अभी विचार चल रहा है।”
शाम को रमा जी ने गुस्से में कहा, “तुम सिर्फ हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हो।”

श्याम जी मुस्कुराकर बोले, “यह भी एक योगासन है, इसे ‘आलसी ध्यान मुद्रा’ कहते हैं।”
रमा जी ने सिर पकड़ लिया।
अगले दिन बिजली खराब हो गई। रमा जी ने कहा, “मिस्त्री को बुलाओ।”
श्याम जी बोले, “मैं तकनीकी ज्ञान पर शोध कर रहा हूँ, शायद खुद ही ठीक हो जाए।”

लेकिन मिस्त्री आने पर पता चला कि तार जल गया था।
मोहल्ले वाले अक्सर कहते, “श्याम जी बहुत शांत स्वभाव के हैं।” लेकिन रमा जी जानती थीं कि श्याम जी की शांति के पीछे काम से बचने की अद्भुत कला छिपी है।

एक दिन अचानक श्याम जी उठे और बोले, “आज से मैं घर के कामों में मदद करूँगा।” रमा जी हैरान रह गईं।
श्याम जी ने झाड़ू उठाई, लेकिन पाँच मिनट बाद ही बोले, “झाड़ू का हैंडल छोटा है, मेरी कमर दुखने लगी।”

फिर भी रमा जी मुस्कुरा दीं क्योंकि उन्हें पता था कि श्याम जी पूरी तरह बदलें या नहीं, लेकिन हाथ पर हाथ धरे बैठने की उनकी कला अमर रहेगी।

57. पानी-पानी हुआ हीरो

फिल्मी दुनिया के हीरो राजू बड़े ही मशहूर थे। मोहल्ले की लड़कियाँ उनकी एक मुस्कान पर फिदा थीं और बच्चे उन्हें देखकर हीरो-हीरो चिल्लाने लगते थे। राजू जी खुद को बहुत स्टाइलिश समझते थे, लेकिन असली समस्या तब शुरू हुई जब उन्हें पानी से डर लगने लगा।

एक दिन शूटिंग का सीन था जिसमें हीरो को झरने के नीचे खड़े होकर डायलॉग बोलना था। डायरेक्टर ने कहा, “राजू जी, यह सीन बहुत इमोशनल है, आपको बहादुरी दिखानी है।”

राजू जी ने सिर हिलाया लेकिन अंदर से घबरा गए। जैसे ही झरने का पानी चालू हुआ, राजू जी का चेहरा देखने लायक हो गया। पानी पड़ते ही उन्होंने आँखें बंद कर लीं और चुपचाप खड़े रहे।

डायरेक्टर चिल्लाया, “डायलॉग बोलिए!”
राजू जी बोले, “अभी नहीं… पानी कान में चला गया है।”
कई बार कोशिश के बाद भी राजू जी ठीक से डायलॉग नहीं बोल पाए। अचानक उनका पैर फिसला और वे झरने के नीचे ऐसे गिरे जैसे साबुन से नहाने का इरादा हो।

सेट पर मौजूद लोग हँसने लगे। राजू जी उठे और बोले, “मैं हीरो हूँ, कोई पानी का खिलौना नहीं।”
शूटिंग रोकनी पड़ी। मेकअप आर्टिस्ट भागकर आई और बोली, “सर, आपका हेयरस्टाइल पानी में खराब हो गया है।” राजू जी ने गुस्से में कहा, “हीरो का स्टाइल दिल से होता है, बालों से नहीं।”

अगले दिन राजू जी ने बड़ा फैसला लिया। उन्होंने सोचा कि पानी से डरना छोड़ना पड़ेगा। वे घर की छत पर गए और बाल्टी में थोड़ा पानी भरकर खुद पर डाल लिया।

पहली बार में ही जोर से चिल्लाए, “बचाओ!” लेकिन फिर हिम्मत जुटाकर बोले, “मैं हीरो हूँ, पानी मुझसे नहीं जीतेगा।”

धीरे-धीरे राजू जी पानी से दोस्ती करने लगे। शूटिंग भी पूरी हो गई और फिल्म रिलीज होते ही हिट हो गई।

मोहल्ले वाले कहते हैं कि उस दिन राजू जी सच में पानी-पानी हो गए थे, लेकिन फिर भी हीरो बने रहे। और राजू जी आज भी कहते हैं, “हीरो बनने के लिए तलवार नहीं, हिम्मत चाहिए… और कभी-कभी तौलिया भी।”

56. गागर में सागर भरने वाली दादी

मोहल्ले में हर कोई दादी की बातों का कायल था। लोग कहते थे कि दादी सिर्फ बातें नहीं करतीं, बल्कि गागर में सागर भर देती हैं। मतलब, छोटी सी बात को ऐसे समझाती थीं जैसे पूरा जीवन दर्शन सुना रही हों। दादी की उम्र तो ज्यादा थी, लेकिन दिमाग आज भी तेज था।

एक दिन पड़ोस का बच्चा रोते हुए दादी के पास आया और बोला, “दादी, मेरा दोस्त मुझसे बात नहीं कर रहा।” दादी ने मुस्कुराकर कहा, “बेटा, रिश्ते पानी की तरह होते हैं, अगर ज्यादा हिलाओगे तो छलक जाएंगे, और अगर बंद रखोगे तो सड़ जाएंगे।”

बच्चा थोड़ा चकराया लेकिन चुप हो गया।

दूसरे दिन मोहल्ले की बहू शिकायत लेकर आई, “दादी, सासू माँ हमेशा टोकती रहती हैं।” दादी ने कहा, “बेटी, घर की चक्की में आटा भी पीसता है और चुप भी रहता है। अगर चक्की बोलेगी तो रोटी नहीं बनेगी।” बहू ने सिर हिलाया, पर समझ कुछ खास नहीं आया।

शाम को दादी के पोते ने पूछा, “दादी, पढ़ाई में मन कैसे लगे?” दादी ने कहा, “बेटा, किताबें ऐसी दोस्त हैं जो ज्यादा बोलती नहीं, लेकिन समझ बहुत देती हैं। अगर उनसे दोस्ती कर लोगे तो परीक्षा भी शर्म से पास हो जाएगी।”

पोता हँसने लगा और बोला, “दादी, आप तो हर बात को कहानी बना देती हो।” दादी बोलीं, “अरे बेटा, जिंदगी खुद एक कहानी है, बस सुनाने वाला चाहिए।”

एक दिन मोहल्ले में बिजली चली गई। लोग परेशान होकर दादी के घर आ गए। किसी ने कहा, “दादी, कुछ उपाय बताइए।” दादी ने कहा, “अंधेरा सिर्फ बाहर है, दिल में अगर उजाला है तो मोमबत्ती भी सूरज लगती है।”

यह सुनकर लोगों ने मोमबत्ती जलाई और दादी की बातें याद करके चुपचाप बैठ गए।

मोहल्ले वाले कहते थे कि दादी उम्र से नहीं, समझदारी से बूढ़ी हुई हैं। उनकी हर बात में ऐसा स्वाद होता था जैसे छोटी सी गागर में पूरा सागर समा गया हो।

और दादी मुस्कुराकर बस इतना कहती थीं, “बेटा, ज्ञान बाँटने से बढ़ता है, और मुस्कुराने से जिंदगी हल्की हो जाती है।”

55. बगलें झांकते रह गए नेता जी

नेता जी का नाम पूरे इलाके में बड़े सम्मान से लिया जाता था, कम से कम मंच पर तो लोग तालियाँ बजाकर ऐसा ही दिखाते थे। नेता जी का सबसे बड़ा हुनर था – हर सवाल का गोलमोल जवाब देना। मोहल्ले वाले कहते थे कि अगर नेता जी सीधे जवाब देने लगें तो मौसम भी हैरान हो जाएगा।

एक दिन मोहल्ले में पानी की समस्या को लेकर सभा रखी गई। लोग परेशान थे, इसलिए सबने नेता जी को बुला लिया। नेता जी मंच पर खड़े हुए, गले में फूलों की माला और चेहरे पर गंभीर भाव।

उन्होंने भाषण शुरू किया, “मेरे प्यारे भाइयों और बहनों, पानी जीवन है और जीवन पानी है।” यह सुनकर पीछे खड़े कुछ बच्चे आपस में हँसने लगे।

फिर एक बुजुर्ग ने पूछा, “नेता जी, हमारे मोहल्ले में पानी कब आएगा?” सवाल सुनकर नेता जी मुस्कुराए और बोले, “देखिए, पानी आना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। जैसे सूरज उगता है, वैसे ही पानी भी आएगा।”

बुजुर्ग बोले, “लेकिन सूरज तो रोज उगता है, पानी तो हफ्ते में एक बार भी नहीं आता।”
यह सुनकर नेता जी थोड़े असहज हो गए और बगलें झाँकने लगे। उन्होंने कहा, “सरकार इस विषय पर गंभीरता से विचार कर रही है।”
तभी एक महिला बोलीं, “गंभीरता से विचार पिछले चुनाव से चल रहा है, पर नल में पानी अभी तक नहीं आया।”

भीड़ में हल्की हँसी फैल गई। नेता जी समझ गए कि आज मामला थोड़ा टेढ़ा है।
उन्होंने बात बदलते हुए कहा, “हम सड़क, पानी और बिजली तीनों पर काम करेंगे।”
एक नौजवान ने पूछा, “तीनों कब तक?” नेता जी बोले, “समय आने पर।”
नौजवान बोला, “समय तो पिछले पाँच साल से आ रहा है।”

अब नेता जी सच में घबरा गए और इधर-उधर देखने लगे, जैसे मंच के नीचे कोई रास्ता ढूँढ रहे हों।

अचानक उनके सहयोगी ने कान में कहा, “भाषण खत्म कर दीजिए।” नेता जी बोले, “आप लोगों का प्यार देखकर मैं अभिभूत हूँ।” और जल्दी से मंच से उतर गए।

उस दिन नेता जी ने घर जाकर सोचा कि कभी-कभी सवालों के सामने भाषण भी बगलें झांकने लगता है।

मोहल्ले वाले कहते हैं कि नेता जी फिर आएंगे, लेकिन अब सवाल पूछने वालों की संख्या देखकर ही।

54. टेढ़ी खीर निकली पड़ोसन

मोहल्ले में रमेश जी की नई पड़ोसन आई थी। नाम था सुमित्रा देवी, लेकिन मोहल्ले वाले उन्हें प्यार से “टेढ़ी खीर” कहने लगे थे क्योंकि उनका हर जवाब थोड़ा उल्टा और रहस्यमय होता था। रमेश जी स्वभाव से जिज्ञासु थे, इसलिए उन्होंने सोचा कि पड़ोसन से दोस्ती करनी चाहिए।

एक दिन सुबह-सुबह रमेश जी हाथ में दूध का गिलास लेकर सुमित्रा जी के घर पहुँचे। मुस्कुराते हुए बोले, “बहन जी, नया पड़ोसी हूँ, सोचा परिचय कर लूँ।” सुमित्रा जी ने उन्हें ऊपर से नीचे तक देखा और कहा, “परिचय तो हो जाएगा, पहले बताइए दूध उधार लेने आए हैं या दोस्ती करने?”

रमेश जी घबरा गए और बोले, “न… नहीं, सिर्फ हालचाल पूछने आया था।” सुमित्रा जी बोलीं, “अच्छा, हालचाल पूछना भी एक कला है।”

दूसरे दिन रमेश जी ने सोचा कि कुछ मिठाई ले जाकर दोस्ती मजबूत कर ली जाए। वे खीर का कटोरा लेकर पहुँचे। दरवाजा खुलते ही बोले, “मैं पड़ोसी धर्म निभा रहा हूँ।” सुमित्रा जी ने खीर देखकर कहा, “खीर अच्छी है, लेकिन मीठा कम है या आप खुद कम मीठे हैं?”

यह सुनकर रमेश जी की हँसी गायब हो गई। फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी।

तीसरे दिन रमेश जी ने पूछा, “आपको मोहल्ला कैसा लगा?” सुमित्रा जी बोलीं, “मोहल्ला अच्छा है, बस कुछ लोग ज्यादा जिज्ञासु हैं।” रमेश जी समझ गए कि इशारा उन्हीं की तरफ है।

एक शाम रमेश जी ने सोचा कि अब साफ बात कर ली जाए। बोले, “मैं आपसे दोस्ती करना चाहता हूँ।” सुमित्रा जी मुस्कुराईं और बोलीं, “दोस्ती करनी है तो पहले मेरी शर्तें सुनिए। ज्यादा सवाल नहीं पूछेंगे, बिना पूछे खीर नहीं भेजेंगे और मेरी चाय में नमक नहीं मिलाएंगे।”

रमेश जी चौंक गए, “चाय में नमक कौन डालता है?” सुमित्रा जी बोलीं, “आप जैसे जिज्ञासु लोग कभी भी डाल सकते हैं।”

धीरे-धीरे रमेश जी समझ गए कि सुमित्रा जी टेढ़ी जरूर हैं, लेकिन दिल की बुरी नहीं। कुछ दिनों बाद दोनों की दोस्ती हो गई, लेकिन रमेश जी ने एक नियम बना लिया—पड़ोसन से बात करनी है तो पहले दिमाग घर पर छोड़कर जाना है।

मोहल्ले वाले कहते हैं कि रमेश जी की जिंदगी में टेढ़ी खीर जरूर आई, लेकिन उसी ने जिंदगी का स्वाद भी मीठा कर दिया।

53. जान पर बन आई

रवि को गणित की परीक्षा से हमेशा डर लगता था। जैसे ही परीक्षा का नाम सुनता, उसका पेट दर्द करने लगता और दिमाग में सवालों के पहाड़ उग आते। इस बार तो हालत और खराब थी क्योंकि उसने पूरे साल पढ़ाई को सिर्फ “कल से शुरू” करने की योजना पर रखा था।

परीक्षा वाले दिन रवि ने सुबह उठकर भगवान से प्रार्थना की, “हे भगवान, आज किसी तरह पास करा देना, मैं वादा करता हूँ अगले साल से सच में पढ़ूँगा।” माँ ने कहा, “झूठे वादे मत कर, पहले खाना खा ले।”

स्कूल पहुँचकर रवि की हालत ऐसी थी जैसे जान पर बन आई हो। परीक्षा हॉल में बैठते ही उसने इधर-उधर देखा। उसके दोस्त पहले से ही अपनी कॉपियाँ उलट-पुलट कर रहे थे जैसे कोई जादू की किताब ढूँढ रहे हों।

जैसे ही प्रश्नपत्र मिला, रवि की आँखें चौड़ी हो गईं। पहला सवाल था – “त्रिभुज के कोणों का योग सिद्ध करें।” रवि ने सोचा, “योग तो समझ में आता है, सिद्ध करना क्या होता है?” उसने बड़ी मेहनत से लिखा – “त्रिभुज के तीन कोण होते हैं और वे मिलकर दोस्ती का संदेश देते हैं।”

दूसरे सवाल में लिखा था – “वृत्त की परिधि का सूत्र लिखिए।” रवि ने सोचा और लिखा – “वृत्त गोल होता है और परिधि उसके आसपास घूमती है।”

तीसरे सवाल पर तो रवि की हालत खराब हो गई। उसने सोचा कि अगर कुछ नहीं आता तो ज्ञान की देवी को याद करना चाहिए। उसने कॉपी में लिखा – “मैं विनम्रतापूर्वक स्वीकार करता हूँ कि मुझे यह प्रश्न समझ नहीं आया।”

पीछे बैठे दोस्त ने धीरे से कहा, “अरे! कुछ तो लिख दे, वरना फेल हो जाएगा।” रवि ने घबराकर लिखा – “गणित बहुत कठिन विषय है, लेकिन जीवन में धैर्य रखना जरूरी है।”

परीक्षा खत्म होने पर रवि बाहर निकला तो लगा जैसे पहाड़ जीत लिया हो। उसने दोस्तों से कहा, “आज तो जान बच गई।”

घर पहुँचकर रवि ने कॉपी के बारे में सोचा और मन ही मन बोला, “अगली बार सच में पढ़ाई करूँगा… शायद।” लेकिन अगले ही पल टीवी चालू कर दिया क्योंकि ज्ञान की देवी भी थोड़ी आराम चाहती थीं।

52. फटी की फटी रह गईं

सुरेश जी बहुत ही साधारण और सीधे-सादे आदमी थे, लेकिन उनके साथ अजीब घटनाएँ अक्सर हो जाती थीं। मोहल्ले में सब लोग कहते थे कि अगर किसी को मनोरंजन चाहिए तो सुरेश जी के साथ बस पाँच मिनट बैठ जाएँ।

एक दिन सुरेश जी ने सोचा कि क्यों न घर की सफाई खुद ही कर ली जाए। पत्नी मायके गई हुई थीं और घर में शांति का माहौल था। उन्होंने झाड़ू उठाई और काम शुरू कर दिया। सोफे के नीचे झाड़ू लगाते ही अचानक एक पुराना डिब्बा बाहर निकला।

सुरेश जी ने सोचा कि शायद इसमें कोई पुरानी चीज होगी। उन्होंने धीरे से डिब्बा खोला तो अंदर से निकली… ढेर सारी मिठाइयाँ। यह देखकर उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्होंने चारों तरफ देखा और सोचा कि कहीं यह सपना तो नहीं।

मिठाइयाँ देखकर सुरेश जी का मन ललचा गया। उन्होंने सोचा कि पत्नी के आने से पहले थोड़ी चखाई कर लेते हैं। एक मिठाई उठाई और खा ली। स्वाद इतना अच्छा लगा कि एक के बाद एक कई मिठाइयाँ गायब हो गईं।

अचानक दरवाजे की घंटी बजी। घबराकर सुरेश जी ने डिब्बा वापस सोफे के नीचे धकेल दिया और चेहरे पर मासूमियत ओढ़ ली। दरवाजा खुला तो सामने उनकी पत्नी खड़ी थीं, जो अचानक ही वापस आ गई थीं।

पत्नी ने घर में कदम रखते ही सूँघते हुए कहा, “यह मिठाई की खुशबू कहाँ से आ रही है?” सुरेश जी ने हकलाते हुए कहा, “क…कौन सी मिठाई?” पत्नी ने सोफे की तरफ इशारा किया और झुककर डिब्बा निकाल लिया।

डिब्बा खोलते ही पत्नी चिल्लाईं, “अरे! यह तो मेरी छुपाकर रखी हुई मिठाइयाँ थीं, जो मैं बाद में खाने वाली थी!” यह सुनकर सुरेश जी की हालत खराब हो गई। उन्होंने तुरंत हाथ जोड़कर कहा, “मुझे लगा कोई खजाना मिला है।”

पत्नी हँसने लगीं और बोलीं, “खजाना मिला था तो मुझे भी बता देते।” सुरेश जी बोले, “मुझे लगा खजाना मिल गया, लेकिन मेरी किस्मत तो हमेशा मिठाई से पहले ही खत्म हो जाती है।”

शाम को सुरेश जी ने वादा किया कि अब बिना पूछे किसी डिब्बे को नहीं खोलेंगे। लेकिन मन ही मन सोचते रहे कि अगली बार अगर खजाना मिला तो पहले पत्नी को नहीं, पड़ोस के बच्चे को बुलाकर जांच करवाएंगे।

उस दिन सुरेश जी की आँखें सचमुच फटी की फटी रह गईं, और मिठाई का रहस्य भी खुल गया।

51. कान पकड़कर माफी

रमेश जी बड़े ही सुलझे हुए इंसान माने जाते थे, लेकिन उनकी पत्नी रमा जी का कहना था कि उनकी सबसे बड़ी समस्या उनकी “भूलने की बीमारी” थी। शादी की सालगिरह नजदीक थी और रमेश जी ने बड़े उत्साह से पत्नी को सरप्राइज देने की योजना बनाई। उन्होंने सोचा कि इस बार कुछ ऐसा करेंगे कि पत्नी खुश होकर गले ही पड़ जाए।

सालगिरह वाले दिन सुबह से ही रमेश जी अजीब सी हरकतें करने लगे। कभी अलमारी खोलकर बंद करते, कभी मोबाइल में नोट्स देखते और कभी खुद से ही बड़बड़ाते। रमा जी ने पूछा, “क्या कर रहे हो?” तो बोले, “प्रेम की तैयारी!” यह सुनकर रमा जी को शक तो हुआ, लेकिन उन्होंने कुछ कहा नहीं।

शाम होते ही रमेश जी फूलों का बड़ा सा गुलदस्ता लेकर घर पहुँचे। मुस्कुराते हुए बोले, “प्रिये, आज तुम्हारे लिए खास उपहार है।” रमा जी खुश होकर बोलीं, “वाह, आज तो चमत्कार हो गया!” लेकिन जैसे ही उन्होंने डिब्बा खोला, अंदर से निकला… किचन का नया कड़छुल सेट।

रमा जी का चेहरा देखने लायक था। उन्होंने कहा, “यह क्या है?” रमेश जी बोले, “पिछली बार तुमने कहा था कि कड़छुल टूट गया है, इसलिए सोच समझकर उपहार लाया हूँ।” पत्नी ने गुस्से से देखा तो रमेश जी समझ गए कि मामला बिगड़ रहा है।

तभी उन्हें याद आया कि असली उपहार तो अभी बाकी है। उन्होंने जेब से छोटा सा डिब्बा निकाला। अंदर चॉकलेट और एक हाथ से लिखा कार्ड था – “मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी तुम हो।” रमा जी का गुस्सा थोड़ा कम हुआ, लेकिन फिर भी बोलीं, “पहले किचन का सामान देकर दिल दुखाया और अब मीठी बात!”

रमेश जी घबराकर पत्नी के सामने कान पकड़कर बैठ गए और बोले, “माफी चाहता हूँ, अगली सालगिरह पर कड़छुल नहीं, सिर्फ प्यार दूँगा।” यह सुनकर रमा जी हँस पड़ीं और बोलीं, “उठो, नाटक मत करो, खाना ठंडा हो रहा है।”

रात को रमेश जी बड़बड़ाते रहे, “प्यार जताना भी मुश्किल है और कड़छुल देना भी!” लेकिन मन ही मन खुश थे कि आज कान पकड़कर माफी माँगने का फार्मूला फिर काम आ गया।

50. ख्याली पुलाव पकाता कवि

गाँव में मोहनलाल नाम का एक कवि रहता था। वह असली कविता कम लिखता था और ख्याली पुलाव ज्यादा पकाता था। लोग उसे कहते थे, “मोहन कवि नहीं, सपनों का शहजादा है।”

मोहनलाल रोज सुबह चाय की दुकान पर बैठकर भविष्य की योजनाएँ बनाने लगता था। कभी कहता, “मैं दुनिया का सबसे बड़ा कवि बनूँगा।” कभी बोलता, “मेरी कविताएँ अखबार के पहले पन्ने पर छपेंगी।”

दुकानदार हँसकर कहता, “पहले चाय का हिसाब तो चुका दो।”

मोहनलाल को लिखने से ज्यादा सोचने का शौक था। वह कागज पर एक लाइन लिखता, फिर घंटों आसमान की तरफ देखकर दूसरी लाइन का इंतजार करता। उसकी डायरी में आधी कविता, दो सपने और तीन बड़े प्लान हमेशा रहते थे।

एक दिन उसने घोषणा कर दी, “मैं जल्द ही कविता संग्रह छपवाऊँगा।”

गाँव वाले बोले, “अच्छा, नाम क्या रखोगे?”

मोहनलाल ने तुरंत कहा, “ख्याली पुलाव और काव्य स्वाद।”
उसने अपने दिमाग में किताब का कवर भी डिजाइन कर लिया था। कवर पर खुद की फोटो, पीछे पहाड़, और ऊपर उड़ते हुए कबूतर।

लेकिन समस्या यह थी कि कविता लिखने के बजाय वह कविता के प्रचार की योजना ज्यादा बनाता था। वह सोचता, “अगर किताब नहीं बिकी तो मैं दूसरी किताब लिखूँगा, जिसमें पहली किताब की सफलता की कहानी होगी।”

एक दिन गाँव के स्कूल में कवि सम्मेलन हुआ। मोहनलाल को भी बुलाया गया। उसने माइक पकड़ा और कहा, “आज मैं ऐसी कविता सुनाऊँगा जो दिल को छू ले।”

भीड़ शांत हो गई। मोहनलाल ने दो मिनट तक आसमान देखा, फिर बोला, “मेरी कविता अभी मन के खेत में पक रही है, जैसे ख्याली पुलाव धीरे-धीरे बनता है।”
लोग हँसने लगे।

घर लौटकर उसकी पत्नी बोली, “तुम कविता कब लिखोगे?”

मोहनलाल मुस्कुराकर बोला, “अभी सपना पका रहा हूँ, कविता खुद बन जाएगी।”

और वह फिर ख्याली पुलाव की खुशबू में अपनी कविताओं का स्वाद खोजने लगा।

49. हवा निकल गई रिजल्ट देखकर

आज रिजल्ट आने वाला दिन था। राजू सुबह से ही अजीब सी बेचैनी में घूम रहा था। कभी मोबाइल देखता, कभी पानी पीता, कभी अपनी कॉपी खोलकर पढ़ने का नाटक करता। उसे पूरा भरोसा था कि इस बार वह पास तो जरूर हो जाएगा, लेकिन मन के किसी कोने में डर भी बैठा था।

दोपहर होते ही स्कूल की वेबसाइट खुल गई। राजू ने काँपते हाथों से रोल नंबर डाला। स्क्रीन पर रिजल्ट का बटन चमक रहा था। उसने आँखें बंद करके दो बार भगवान का नाम लिया और फिर क्लिक कर दिया।

जैसे ही रिजल्ट खुला, राजू के चेहरे से सारी रंगत उड़ गई। दिल की धड़कन तेज हो गई और उसे लगा जैसे पैरों के नीचे जमीन ही नहीं है। स्क्रीन पर लिखा था—“असफल।”
राजू को ऐसा लगा जैसे किसी ने अचानक गुब्बारे की हवा निकाल दी हो। उसका दोस्त सोनू पास बैठा था। उसने धीरे से पूछा, “क्या हुआ भाई?”

राजू ने सिर्फ इतना कहा, “हवा निकल गई।”
सोनू ने स्क्रीन देखकर कहा, “अरे, एक विषय में फेल है, पूरी जिंदगी खत्म नहीं हुई।”
लेकिन राजू को उस समय कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। उसे लग रहा था जैसे सपनों की उड़ान अचानक रुक गई हो।
घर जाकर राजू चुपचाप बैठ गया। माँ ने पूछा, “रिजल्ट कैसा आया?”

राजू ने धीमे से कहा, “इस बार किस्मत ने साथ नहीं दिया।”
माँ ने प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा और बोली, “रिजल्ट सिर्फ एक पड़ाव है, जिंदगी नहीं।”
उस रात राजू देर तक सोचता रहा। उसे समझ आया कि असफलता भी एक शिक्षक होती है।

अगले दिन उसने फैसला किया कि वह फिर से मेहनत करेगा। दोस्तों ने मजाक में कहा, “अब तो तू टॉपर बनकर ही दम लेगा।”

राजू मुस्कुराया और बोला, “हवा निकली जरूर थी, लेकिन हिम्मत नहीं।”

और वह नए जोश के साथ अपनी किताबें खोलकर भविष्य की तैयारी करने लगा।