88. अपनी ढपली अपना राग

शहर के सांस्कृतिक भवन में कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ था। पोस्टर पर लिखा था – “अपनी ढपली अपना राग – विशेष हास्य कवि सम्मेलन।” कार्यक्रम का नाम पढ़कर ही लोग समझ गए थे कि आज कविता से ज्यादा मनोरंजन होने वाला है। मंच पर अलग-अलग कवि अपनी तैयारियाँ कर रहे थे और हर कोई अपनी शैली में कुछ अलग दिखाना चाहता था।

सबसे पहले मंच पर शर्मा जी आए। उन्होंने माइक संभाला और कहा, “आज मैं समाज की सच्चाई सुनाने आया हूँ।” फिर उन्होंने अपनी ही धुन में कविता शुरू की, जिसमें कहीं प्यार था, कहीं राजनीति की चर्चा थी और कहीं खाने-पीने का जिक्र था। उनकी कविता सुनकर दर्शक मुस्कुराने लगे क्योंकि हर लाइन अचानक दिशा बदल लेती थी। कुछ लोग फुसफुसाकर बोले, “यह तो सच में अपनी ढपली अपना राग है।”

इसके बाद गुप्ता जी आए। उन्होंने मंच पर आते ही कहा, “मैं किसी की नकल नहीं करता, मैं अपनी मौलिकता में विश्वास रखता हूँ।” फिर उन्होंने ऐसी कविता सुनाई जिसमें मौसम, चाय, पड़ोसी और जीवन दर्शन सब एक साथ मिल गए। उनकी कविता का असली मजा यह था कि शुरुआत कुछ और होती थी और अंत कुछ और निकलता था।

तीसरे कवि मंच पर आए तो उन्होंने कहा, “मैं सिर्फ अपने मन की सुनाता हूँ।” उन्होंने हास्य और व्यंग्य का ऐसा मिश्रण पेश किया कि दर्शक हँसते-हँसते लोटपोट हो गए। उनकी कविता में कहीं ऑफिस की समस्या थी, कहीं बच्चों की शरारत और कहीं जिंदगी का मजेदार ताना-बाना।

कार्यक्रम के अंत में संचालक ने कहा कि आज के कवि सम्मेलन की सबसे खास बात यही रही कि हर कवि ने अपनी शैली में कविता पढ़ी। किसी ने किसी की नकल नहीं की, बल्कि सभी ने अपने-अपने अंदाज में मनोरंजन किया। दर्शक खुश होकर घर लौटे और कहते रहे कि आज सच में “अपनी ढपली अपना राग” का असली मतलब समझ आया।

मोहल्ले वाले भी इस कवि सम्मेलन की चर्चा करते हुए बोले कि कभी-कभी अलग-अलग राग भी मिलकर जिंदगी को खुशियों का संगीत बना देते हैं।

87. आ बैल मुझे मार

गाँव में रमेश काका अपनी जिद के लिए बहुत मशहूर थे। मोहल्ले वाले मजाक में कहते थे कि अगर रमेश काका किसी बात की जिद पकड़ लें तो वह अक्सर “आ बैल मुझे मार” वाली स्थिति बन जाती है। वे अपनी बात पर अड़ जाने वाले स्वभाव के थे, चाहे बाद में उन्हें परेशानी ही क्यों न हो।
एक दिन गाँव के मेले में झूला लगा था जो बहुत ऊँचा और तेज घूमता था। रमेश काका अपने दोस्तों के साथ मेले में पहुँचे और झूले को देखकर बोले कि वह आज जरूर झूले पर बैठेंगे। दोस्तों ने उन्हें समझाया कि उनकी उम्र को देखते हुए यह झूला सुरक्षित नहीं रहेगा क्योंकि वह बहुत तेजी से घूमता है। लेकिन रमेश काका ने जिद पकड़ ली और कहा कि वह जरूर झूलेंगे।

टिकट लेकर रमेश काका झूले पर बैठ गए। जैसे ही झूला शुरू हुआ, उनका उत्साह थोड़ा कम होने लगा। झूला ऊपर-नीचे और तेज घूमने लगा तो उन्हें अपनी जिद पर पछतावा होने लगा। झूला ऊपर जाता तो वे झूला रोकने की बात करते, लेकिन झूला चलाने वाला मुस्कुराकर कहता कि अभी चक्कर बाकी है। नीचे खड़े उनके दोस्त हँस रहे थे और कह रहे थे कि काका ने खुद ही “आ बैल मुझे मार” वाली जिद पकड़ ली है।

झूला खत्म होने के बाद रमेश काका धीरे-धीरे उतरकर जमीन पर खड़े हुए। उनका सिर थोड़ा घूम रहा था, लेकिन वे मुस्कुराते हुए बोले कि झूला तो बहुत अच्छा था। एक बच्चा पास आकर बोला कि काका को कैसा लगा, तो उन्होंने कहा कि अनुभव अच्छा था, लेकिन अगली बार वे जिद नहीं करेंगे।

शाम को गाँव में सब लोग रमेश काका की कहानी सुना रहे थे और काका भी हँसते हुए कह रहे थे कि कभी-कभी जिद करना मजेदार लग सकता है, लेकिन समझदारी भी जरूरी होती है। घर लौटकर उन्होंने तय किया कि आगे से जब भी कोई उन्हें समझाएगा, तो वे पहले सोचेंगे और फिर कोई फैसला करेंगे। मोहल्ले वाले कहते हैं कि रमेश काका की जिद मशहूर थी, लेकिन उसी जिद ने उन्हें एक मजेदार सीख भी दे दी।

86. जान छुड़ाई ट्यूशन से

रवि को ट्यूशन जाना बिल्कुल पसंद नहीं था। उसे लगता था कि ट्यूशन का मतलब सिर्फ दिमाग पर अतिरिक्त बोझ डालना और खेल-कूद के समय को कम करना है। लेकिन उसके माता-पिता का मानना था कि ट्यूशन से पढ़ाई मजबूत होती है और भविष्य अच्छा बनता है। रोज शाम को जब ट्यूशन जाने का समय होता, रवि का मन उदास हो जाता और वह सोचता कि काश ट्यूशन भी कभी छुट्टी ले ले। ट्यूशन वाले मास्टर जी बहुत सख्त थे। अगर कोई बच्चा होमवर्क नहीं करता तो वे अगले दिन दोगुना काम दे देते थे, जिससे बच्चों की परेशानी और बढ़ जाती थी।

रवि ने ट्यूशन से छुटकारा पाने के लिए एक योजना बनाई। उसने घर आकर अपनी माँ से कहा कि उसे ट्यूशन में कुछ ठीक से समझ नहीं आता और वह घर पर ही पढ़ाई करना चाहता है। माँ ने मुस्कुराकर पूछा कि असली समस्या समझ न आना है या ट्यूशन जाना पसंद नहीं है। रवि ने मासूम चेहरा बनाकर कहा कि दोनों ही बातें सही हैं। बाद में उसने पापा से भी बात की और कहा कि अगर उसे ट्यूशन छोड़ना है तो वह अपनी पढ़ाई खुद संभाल लेगा। पापा ने शर्त रखी कि ट्यूशन तभी छोड़ा जा सकता है जब पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन हो।

कुछ दिनों बाद ट्यूशन में एक टेस्ट हुआ। रवि ने थोड़ी मेहनत की और पेपर अच्छे से दे दिया। उसे उम्मीद से बेहतर अंक मिले। मास्टर जी ने भी कहा कि लगता है रवि पढ़ाई पर ध्यान दे रहा है। रवि अंदर ही अंदर बहुत खुश था क्योंकि उसे लगने लगा था कि शायद अब ट्यूशन से छुटकारा मिल सकता है। घर जाकर उसने पापा को अपना रिजल्ट दिखाया और ट्यूशन बंद करने की बात फिर से कही।

आखिरकार पापा मान गए और रवि की ट्यूशन छूट गई। उस दिन रवि को ऐसा लगा जैसे उसे आजादी मिल गई हो। शाम को वह दोस्तों के साथ खेलने गया और मन ही मन सोचा कि पढ़ाई भी जरूरी है और खेल भी। मोहल्ले वाले कहते हैं कि कभी-कभी बच्चों की खुशी सही फैसले और संतुलित पढ़ाई में ही छिपी होती है।

85. धूल चटाई

गाँव की “वीर इलेवन” क्रिकेट टीम बहुत घमंडी मानी जाती थी। टीम के खिलाड़ी हर मैच से पहले कहते थे, “आज तो विरोधी टीम को धूल चटा देंगे।” लेकिन गाँव वाले मुस्कुराकर कहते थे, “देखते हैं, धूल कौन किसको चटाता है।”

उस दिन गाँव में दूसरी टीम के साथ बड़ा मैच था। वीर इलेवन के कप्तान मुन्ना जी पूरे आत्मविश्वास में मैदान पर उतरे। उन्होंने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का फैसला किया और बोले, “आज स्कोर बोर्ड टूट जाएगा।”

पहले बल्लेबाज बल्ला घुमाते ही गेंद को हवा में उछाल बैठे। गेंद इतनी ऊपर गई कि लोग सोचने लगे कि शायद वह आसमान देखने गई है। जब गेंद नीचे आई तो बल्लेबाज खुद ही आउट हो गया।

दूसरे बल्लेबाज मैदान पर आए और बोले, “आज मैं धूम मचा दूँगा।” लेकिन पहली ही गेंद देखकर उन्होंने इतना जोर से बल्ला घुमाया कि बल्ला हवा में घूमकर पीछे गिर गया और गेंद विकेट पर जा लगी।

फील्डिंग करते समय भी टीम का हाल बुरा था। एक खिलाड़ी कैच पकड़ने के लिए दौड़े, लेकिन गेंद उनके हाथ से ऐसे निकल गई जैसे साबुन लगा हो।

कप्तान मुन्ना जी चिल्लाए, “ध्यान से! विरोधी टीम को धूल चटानी है।”

दूसरी टीम के बल्लेबाज बड़े शांत तरीके से खेल रहे थे। उन्होंने चौके और छक्के ऐसे लगाए जैसे अभ्यास कर रहे हों।

वीर इलेवन की टीम का स्कोर बहुत कम रह गया। आखिरी ओवर में कप्तान मुन्ना जी बोले, “अब हारने का समय नहीं, कुछ कर दिखाओ।”

लेकिन आखिरी गेंद पर खिलाड़ी दौड़े, गिर पड़े और रन भी नहीं बना पाए।

मैच खत्म हुआ और वीर इलेवन टीम बुरी तरह हार गई।

मैदान से बाहर आते हुए कप्तान मुन्ना जी ने कहा, “आज हम धूल चटाने आए थे, लेकिन खुद ही धूल में लोटपोट हो गए।”

गाँव वाले हँसते हुए बोले, “कभी-कभी घमंड नहीं, बल्कि खेल भावना ही असली जीत होती है।”

84. लोटपोट

स्कूल की पाँचवीं कक्षा में उस दिन कुछ ऐसा हुआ कि पूरी क्लास लोटपोट हो गई। मास्टर जी बड़े गंभीर स्वभाव के थे और बच्चों को हमेशा कहते थे, “क्लास में अनुशासन सबसे जरूरी है।”

उस दिन मास्टर जी ने बच्चों से पूछा, “बताओ, सबसे तेज जानवर कौन है?”
पिंटू तुरंत खड़ा हुआ और बोला, “सर, मेरा बड़ा भाई!”
मास्टर जी चौंक गए, “वह कैसे?”
पिंटू बोला, “सर, वह इतनी तेजी से भागता है कि स्कूल का होमवर्क देखकर ही गायब हो जाता है।”
क्लास में हल्की हँसी फैल गई।

मास्टर जी ने फिर पूछा, “अच्छा, बताओ सूरज कहाँ से निकलता है?”
गोलू खड़ा होकर बोला, “सर, हमारे घर के सामने वाली छत से।”
मास्टर जी ने माथा पकड़ लिया।

फिर उन्होंने पूछा, “अगर मैं तुमसे कहूँ कि दो और दो पाँच होते हैं, तो क्या करोगे?”
चिंटू बोला, “सर, मैं बहस नहीं करूँगा क्योंकि मुझे पास होना है।”
यह सुनकर मास्टर जी खुद भी मुस्कुरा दिए।

इतने में पीछे बैठे बंटी ने अचानक कहा, “सर, अगर गणित इतना जरूरी है तो शादी में भी जोड़-घटाव होना चाहिए।”
मास्टर जी बोले, “वह कैसे?”
बंटी बोला, “सर, शादी में लोग जोड़ते ज्यादा हैं और खर्च घटाते कम हैं।”
यह सुनकर पूरी क्लास जोर-जोर से हँसने लगी।

फिर मास्टर जी ने गंभीर होकर कहा, “अब एक मुश्किल सवाल।”
उन्होंने पूछा, “अगर तुम्हें जंगल में शेर मिल जाए तो क्या करोगे?”
पिंटू खड़ा हुआ और बोला, “सर, मैं तुरंत अपना टिफिन शेर को दे दूँगा ताकि वह मेरा पीछा न करे।”
क्लास में इतनी जोर से हँसी हुई कि कुछ बच्चे बेंच पर ही लोटपोट हो गए।
मास्टर जी भी अपनी हँसी रोक नहीं पाए।

उस दिन पढ़ाई के साथ-साथ हँसी का भी पाठ पढ़ाया गया।
छुट्टी के समय मास्टर जी बोले, “याद रखना, हँसी भी पढ़ाई जितनी जरूरी है।”

और बच्चे घर जाते समय कहते जा रहे थे, “आज पूरी क्लास सच में लोटपोट हो गई।”

83. सीधी उंगली से घी न निकला

मदनलाल जी बहुत ही सीधे और ईमानदार आदमी थे, लेकिन मोहल्ले वाले मजाक में कहते थे कि उनकी सबसे बड़ी समस्या यह थी कि “सीधी उंगली से घी निकालने” की कोशिश करते रहते थे।

एक दिन मदनलाल जी ने सोचा कि आज घर में बनी खीर में थोड़ा घी डालना चाहिए। उन्होंने पत्नी से कहा, “जरा घी दे दो।” पत्नी ने घी का डिब्बा दे दिया और कहा, “ध्यान से निकालना।”

मदनलाल जी ने डिब्बे में उंगली डाली और सीधे तरीके से घी निकालने की कोशिश करने लगे। लेकिन घी मानो डिब्बे के अंदर चिपककर बैठ गया था।
उन्होंने फिर कोशिश की, लेकिन घी बाहर आने का नाम ही नहीं ले रहा था।
पास खड़ी उनकी बेटी बोली, “पापा, शायद घी आपकी उंगली से डर गया है।”
मदनलाल जी बोले, “मैं बहुत सीधा आदमी हूँ, इसलिए घी भी सीधा ही निकलेगा।”
उन्होंने फिर जोर लगाया, लेकिन घी वहीं का वहीं रहा।
पत्नी हँसकर बोलीं, “अगर सीधी उंगली से घी नहीं निकल रहा तो थोड़ी टेढ़ी कर लो।”

मदनलाल जी बोले, “मैं सिद्धांतों का आदमी हूँ, टेढ़ापन पसंद नहीं करता।”
कुछ देर तक वे कोशिश करते रहे, लेकिन सफलता नहीं मिली। आखिरकार उन्होंने चम्मच उठाया और घी निकाल लिया।

बेटी हँसकर बोली, “पापा, आज साबित हो गया कि कभी-कभी काम करने का तरीका बदलना पड़ता है।”

शाम को मदनलाल जी मोहल्ले में बैठे थे। पड़ोसी ने पूछा, “क्या हुआ, घी निकला?”
मदनलाल जी मुस्कुराकर बोले, “नहीं, आज सीधी उंगली से घी नहीं निकला, लेकिन चम्मच से निकल गया।”

पड़ोसी बोला, “यही जिंदगी का नियम है—कभी सीधे रास्ते काम नहीं बनते।”

मदनलाल जी सोचने लगे कि ईमानदारी अच्छी बात है, लेकिन थोड़ी समझदारी भी जरूरी है।

घर लौटकर उन्होंने फैसला किया कि अगली बार घी निकालना हो तो पहले चम्मच ढूँढेंगे।

मोहल्ले वाले कहते हैं कि मदनलाल जी आज भी कोशिश करते हैं कि जिंदगी के काम सीधी उंगली से ही पूरे हों, लेकिन कभी-कभी चम्मच की जरूरत भी पड़ जाती है।

82. गले पड़ा मुफ्तखोर

शर्मा जी बहुत ही शांत स्वभाव के आदमी थे, लेकिन उनकी सबसे बड़ी समस्या थी एक ऐसा मेहमान जो बिना बुलाए आ जाता था और जाने का नाम नहीं लेता था। मोहल्ले वाले मजाक में उसे “गले पड़ा मुफ्तखोर मेहमान” कहते थे।

उस मेहमान का नाम था बबलू काका। बबलू काका की खासियत थी कि अगर वह किसी के घर आ जाएँ तो चाय-पानी के साथ-साथ खाने-पीने का पूरा हिसाब भी खुद ही बनवा लेते थे।

एक दिन बबलू काका अचानक शर्मा जी के घर आ पहुँचे और बोले, “भाई साहब, रास्ते से गुजर रहा था तो सोचा चाय पीते जाऊँ।”
शर्मा जी मुस्कुराए और बोले, “आइए, बैठिए।”
चाय आई तो बबलू काका बोले, “चाय अच्छी है, लेकिन थोड़ा बिस्किट होता तो मजा आ जाता।”
पत्नी ने मुस्कुराकर बिस्किट भी दे दिया।
थोड़ी देर बाद बबलू काका बोले, “आज मौसम बहुत अच्छा है, लगता है यहीं खाना भी खा लूँ।”
शर्मा जी ने मन ही मन सोचा कि यह तो सच में गले पड़ने लगे हैं, लेकिन उन्होंने शिष्टाचार नहीं छोड़ा।

दोपहर हो गई तो बबलू काका बोले, “भाई साहब, अगर बुरा न मानें तो आज खाना भी साथ खा लें।”
शर्मा जी की पत्नी ने हँसते हुए खाना परोस दिया। बबलू काका बड़े आराम से खाना खाने लगे और बीच-बीच में कहते, “घर का खाना सबसे अच्छा होता है।”
खाना खत्म होने के बाद भी बबलू काका उठने का नाम नहीं ले रहे थे। उन्होंने कहा, “थोड़ा आराम कर लूँ, बाहर धूप ज्यादा है।”

शाम तक शर्मा जी समझ गए कि बबलू काका सच में गले पड़ गए हैं, लेकिन गुस्सा करने के बजाय उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “काका, अगली बार आना तो अपनी चाय और बिस्किट साथ लेकर आना।”

बबलू काका भी हँसकर बोले, “भाई साहब, दोस्ती में हिसाब नहीं चलता।”

उस दिन शर्मा जी खुश थे क्योंकि बबलू काका मुफ्तखोरी के बावजूद सबको हँसाकर चले गए थे।

मोहल्ले वाले कहते हैं कि कभी-कभी मुफ्तखोर मेहमान भी जिंदगी में खुशी का स्वाद छोड़ जाते हैं।

81. नौ दिन चले अढ़ाई कोस

रामू काका को घूमने का बहुत शौक था, लेकिन उनकी सबसे बड़ी समस्या थी—चलने की गति। गाँव वाले मजाक में कहते थे कि रामू काका अगर यात्रा पर निकलें तो मंजिल खुद उनके पास आ जाए, लेकिन रामू काका पहुँचने में समय जरूर लगाएंगे।

एक दिन रामू काका ने फैसला किया कि वह पास के शहर तक पैदल यात्रा करेंगे। गाँव वालों ने पूछा, “काका, शहर कितनी दूर है?”
रामू काका बोले, “बस अढ़ाई कोस।”

सुबह रामू काका बड़े उत्साह से निकल पड़े। उनके हाथ में लाठी थी और चेहरे पर यात्री वाला गंभीर भाव। पहला दिन बीता, लेकिन रामू काका सिर्फ आधा कोस ही चल पाए।
रात को एक पेड़ के नीचे आराम करते हुए उन्होंने सोचा, “जल्दी चलना सेहत के लिए अच्छा नहीं होता।”

दूसरे दिन फिर यात्रा शुरू हुई। रास्ते में एक आदमी मिला और बोला, “काका, शहर तो अभी बहुत दूर है।”
रामू काका बोले, “कोई बात नहीं, यात्रा भी जीवन का आनंद है।”

तीसरे दिन रामू काका एक चाय की दुकान पर रुक गए। उन्होंने सोचा, “थोड़ा आराम कर लूँ, यात्रा तो चलती रहेगी।”

चौथे दिन गाँव का एक बच्चा मिला और बोला, “काका, आप अभी तक शहर नहीं पहुँचे?”
रामू काका मुस्कुराकर बोले, “जल्दी क्या है, नौ दिन चले अढ़ाई कोस वाली यात्रा कर रहा हूँ।”

पाँचवे दिन रामू काका को लगा कि रास्ता थोड़ा लंबा हो गया है। उन्होंने अपनी गति और कम कर दी।

आठवें दिन तक रामू काका आधे रास्ते पर भी नहीं पहुँचे थे। उन्होंने सोचा, “जल्दी चलने से थकान होती है।”

नौवें दिन आखिरकार रामू काका शहर की सीमा तक पहुँच गए। उन्होंने ऊपर देखकर कहा, “देखा, यात्रा पूरी हो गई।”

गाँव वाले कहते हैं कि रामू काका की यात्रा धीमी जरूर थी, लेकिन उन्होंने साबित कर दिया कि अगर धैर्य हो तो नौ दिन में अढ़ाई कोस भी तय हो सकता है—बस रास्ते में ज्यादा चाय की दुकानें नहीं होनी चाहिए।

80. नाच न जाने, आँगन टेढ़ा

गाँव में किशनलाल जी अपनी समझदारी पर बहुत गर्व करते थे। वे हर बात में बहस करने की कोशिश करते, चाहे उन्हें विषय की समझ हो या न हो। मोहल्ले वाले मजाक में कहते थे कि किशनलाल जी का सिद्धांत था—“गलती मेरी नहीं, हालात की है।”

एक दिन गाँव में शादी का समारोह था। वहाँ नाच-गाने का कार्यक्रम रखा गया था। किशनलाल जी भी बड़े जोश में पहुँच गए और बोले, “आज मैं भी नाचूँगा।”

सभी लोग हैरान रह गए क्योंकि किसी ने किशनलाल जी को पहले नाचते नहीं देखा था।

ढोल बजने लगा और किशनलाल जी मंच के बीचोंबीच खड़े हो गए। उन्होंने पैर हिलाने की कोशिश की, लेकिन उनका पहला कदम ही उल्टा पड़ गया। दूसरे कदम में उनका संतुलन बिगड़ गया और वे थोड़ा टेढ़े होकर खड़े हो गए।
पास खड़ा बच्चा बोला, “अंकल, लगता है नाच अभी सीखना बाकी है।”

किशनलाल जी घबराकर बोले, “नाच तो मैं जानता हूँ, बस आज आँगन थोड़ा टेढ़ा लग रहा है।”
लोग हँसने लगे।

फिर किशनलाल जी ने हाथ हिलाकर डांस करने की कोशिश की, लेकिन पैर और हाथ का तालमेल ऐसा बिगड़ा कि वे लगभग गिरने वाले थे। किसी तरह खुद को संभाला और बोले, “यह आँगन सच में टेढ़ा है।”

शादी में मौजूद एक बुजुर्ग ने कहा, “बेटा, नाचने के लिए आँगन नहीं, ताल चाहिए।”
किशनलाल जी ने तुरंत जवाब दिया, “ताल भी थोड़ा टेढ़ा है।”

कार्यक्रम खत्म होने के बाद किशनलाल जी बाहर आकर खड़े हो गए और बोले, “मैं नाचना जानता हूँ, लेकिन आज हालात साथ नहीं दे रहे थे।”

मोहल्ले वाले जानते थे कि किशनलाल जी कभी अपनी गलती नहीं मानते, इसलिए उन्होंने भी मुस्कुराकर कह दिया, “हाँ, आज आँगन ही टेढ़ा था।”

घर लौटकर किशनलाल जी ने सोचा कि नाचना सीखना चाहिए, लेकिन साथ में यह भी तय किया कि अगली बार अगर डांस करना हुआ तो पहले आँगन की जाँच करेंगे।

और मोहल्ले वाले कहते हैं कि कभी-कभी नाच न आने पर भी आँगन को दोष देना ही सबसे आसान बहाना होता है।

79. दाल में काला

मोहल्ले में राकेश चाचा बहुत मशहूर थे क्योंकि वे हर बात में शक करने की आदत रखते थे। अगर किसी चीज में जरा भी गड़बड़ लगे तो कहते, “दाल में कुछ काला जरूर है।”
एक दिन राकेश चाचा ने पत्नी से कहा, “आज खाने में दाल बनेगी?”

पत्नी बोलीं, “हाँ, लेकिन दाल में काला नहीं होगा।”
राकेश चाचा मुस्कुराए और बोले, “यही तो शक की बात है।”
दोपहर में दाल टेबल पर आई। राकेश चाचा ने चम्मच से दाल को ध्यान से देखा, जैसे कोई जासूस सबूत ढूँढ रहा हो। फिर धीरे से बोले, “लगता है दाल में काला है।”

पत्नी ने पूछा, “कहाँ?”
चाचा बोले, “पता नहीं, लेकिन शक जरूर है।”
उन्होंने दाल का एक चम्मच चखा और कहा, “दाल अच्छी है, लेकिन मुझे लगता है कुछ रहस्य छिपा है।”
पत्नी हँसकर बोलीं, “रहस्य यह है कि मैंने आज दाल में ज्यादा मसाले नहीं डाले।”

शाम को चाचा मोहल्ले में बैठे थे। पड़ोसी ने पूछा, “चाचा, क्या चल रहा है?”
चाचा बोले, “दाल में काला का रहस्य खोज रहा हूँ।”
पड़ोसी ने मजाक में कहा, “चाचा, कभी अपनी शक करने की आदत में भी काला ढूँढिए।”
चाचा गंभीर होकर बोले, “शक करना भी एक कला है।”

रात को खाना खाते समय चाचा फिर दाल देखकर बोले, “मुझे लगता है आज दाल में कोई राज छिपा है।”

पत्नी ने प्लेट लेकर कहा, “अगर राज जानना है तो दाल खत्म करो।”

चाचा ने दाल खत्म की और बोले, “अब समझ आया—दाल में काला नहीं, बल्कि मेरे दिमाग में ज्यादा सवाल हैं।”

मोहल्ले वाले कहते हैं कि राकेश चाचा हर चीज में रहस्य खोजते हैं, चाहे दाल हो या जिंदगी।

और चाचा खुद कहते हैं, “दाल में काला हो या न हो, लेकिन शक करने वाले का दिमाग हमेशा चालू रहता है।”

78. ऊँट के मुँह में जीरा

मोहल्ले के ठाकुर साहब बड़े शौकीन आदमी थे। जब भी कोई दावत रखते, कहते, “मेहमानों का स्वागत ऐसा होना चाहिए कि वे याद रखें।” लेकिन इस बार जो हुआ, उसे देखकर लोग कहने लगे कि यह तो “ऊँट के मुँह में जीरा” वाली दावत थी।

ठाकुर साहब ने अपने दोस्त की खुशी में छोटी सी दावत रखी थी। उन्होंने घर के आँगन में दो टेबल लगवाईं और खाने का इंतजाम किया। मेहमान भी धीरे-धीरे आने लगे।

सबसे पहले पूड़ी और सब्जी परोसी गई। प्लेट में पूड़ी देखकर एक मेहमान बोला, “भाई साहब, पूड़ी तो बड़ी अच्छी है, लेकिन मात्रा थोड़ी कम लग रही है।”

ठाकुर साहब मुस्कुराकर बोले, “गुणवत्ता पर ध्यान दीजिए, मात्रा पर नहीं।”

फिर हलवाई ने दाल परोसी। दाल का कटोरा इतना छोटा था कि उसे देखकर बच्चों ने कहा, “यह तो खिलौने वाला बर्तन है।”

दावत में मिठाई आई तो मामला और मजेदार हो गया। हर मेहमान के हिस्से में मिठाई का बस एक छोटा सा टुकड़ा आया।

एक बुजुर्ग बोले, “ठाकुर साहब, यह दावत है या स्वाद की झलक?”

ठाकुर साहब बोले, “आजकल स्वास्थ्य भी जरूरी है, ज्यादा खाने से डॉक्टर खुश होते हैं।”

कुछ मेहमान आपस में फुसफुसाने लगे कि दावत में खाने से ज्यादा बातों का स्वाद है।

बच्चों ने पूछा, “चाचा, आइसक्रीम कहाँ है?”

हलवाई ने कहा, “आइसक्रीम बाद में, अगर बची तो।”

दावत खत्म होने पर मेहमानों को लगा कि पेट नहीं, बल्कि भूख का ज्ञान लेकर जा रहे हैं।

एक दोस्त ने ठाकुर साहब से कहा, “भाई, यह दावत ऊँट के मुँह में जीरा जैसी थी।”

ठाकुर साहब हँसकर बोले, “जीरा भी जरूरी है, क्योंकि स्वाद जीरे से ही आता है।”

मोहल्ले वाले कहते हैं कि उस दिन दावत कम, लेकिन चर्चा ज्यादा हुई।

और ठाकुर साहब आज भी कहते हैं, “दावत बड़ी नहीं, बल्कि प्यार से दी गई छोटी दावत भी याद रहती है।”

77. आसमान से गिरा, खजूर में अटका

बाबूजी का नाम मोहल्ले में बड़े सम्मान से लिया जाता था, लेकिन उनकी जिंदगी अक्सर ऐसे चक्कर में फँस जाती थी जैसे “आसमान से गिरा और खजूर में अटका” वाली कहावत हो।

एक दिन बाबूजी ने सोचा कि अब थोड़ा घूमना चाहिए। उन्होंने लंबी यात्रा की योजना बनाई और ट्रेन में टिकट लेकर बैठ गए। यात्रा अच्छी चल रही थी, तभी अचानक पता चला कि जिस शहर में जाना था, उससे एक स्टेशन पहले ही उतरना पड़ गया।

बाबूजी ने सोचा, “चलो, टैक्सी ले लेते हैं।” लेकिन टैक्सी वाले ने इतना ज्यादा किराया बताया कि बाबूजी को लगा जैसे खजूर के पेड़ पर चढ़ने का शुल्क माँगा जा रहा हो।

अंत में उन्होंने बस पकड़ ली। बस में सीट नहीं मिली तो बाबूजी खड़े-खड़े यात्रा करने लगे। तभी बस अचानक ब्रेक लगाकर रुकी और बाबूजी आगे की तरफ ऐसे झुके जैसे आसमान से गिर रहे हों। किसी तरह संतुलन बनाकर खड़े रहे और मन ही मन बोले, “आज बच गए।”

शहर पहुँचकर बाबूजी होटल ढूँढने लगे। एक सस्ता होटल देखकर अंदर गए। लेकिन वहाँ कमरे की हालत देखकर उन्हें लगा कि यह खजूर का पेड़ ही है, जिस पर वे अटक सकते हैं।

रात को सोते समय मच्छरों ने बाबूजी पर ऐसा हमला किया कि वे सोचने लगे कि यात्रा करना सही फैसला था या नहीं।
सुबह उठकर बाबूजी बाहर घूमने गए। रास्ते में एक दोस्त मिला और बोला, “बाबूजी, आप तो आसमान से गिरकर खजूर में अटके लग रहे हैं।”

बाबूजी मुस्कुराकर बोले, “जिंदगी भी कुछ ऐसी ही है—कभी ऊपर से गिराती है और कभी कहीं अटका देती है।”
घर लौटकर बाबूजी ने फैसला किया कि अगली बार यात्रा सोच-समझकर करेंगे, ताकि आसमान से गिरने और खजूर में अटकने दोनों से बच सकें।

मोहल्ले वाले कहते हैं कि बाबूजी की कहानी जीवन का मजेदार सबक है—जल्दी में लिया फैसला कभी-कभी खजूर के पेड़ तक पहुँचा देता है।

76. नाक में दम

मोहल्ले में मेरे पड़ोसी श्रीवास्तव जी बहुत ही अनोखे किस्म के इंसान थे। उनकी सबसे बड़ी खासियत थी कि वे किसी न किसी तरह मेरी नाक में दम करने का तरीका खोज ही लेते थे। मोहल्ले वाले मजाक में कहते थे कि अगर परेशान करने की प्रतियोगिता होती तो श्रीवास्तव जी गोल्ड मेडल जीत लेते।

सुबह-सुबह उनका पहला काम होता था मेरे घर के बाहर खड़े होकर मौसम पर चर्चा करना। वे कहते, “आज गर्मी ज्यादा है।” मैं सोचता, यह बात मैं खिड़की से देखकर भी समझ सकता हूँ।

एक दिन मैं आराम से चाय पी रहा था तभी उन्होंने दरवाजा खटखटाया। मैंने दरवाजा खोला तो बोले, “भाई साहब, आपके घर की घड़ी पाँच मिनट आगे चल रही है।” मैंने कहा, “तो क्या करूँ?” वे बोले, “समय ठीक कर लीजिए, वरना आप जल्दी ऑफिस पहुँच जाएंगे।”

मैंने सिर पकड़ लिया।

उनकी एक और आदत थी—बिना वजह सलाह देना। अगर मैं झाड़ू लगाता तो कहते, “झाड़ू ऐसे नहीं लगाते।” अगर टीवी देखता तो कहते, “इतना टीवी आँखों के लिए अच्छा नहीं।”

एक दिन मैंने फैसला किया कि आज उनसे बचकर रहूँगा। मैं चुपचाप घर के अंदर बैठ गया। लेकिन तभी दरवाजे के बाहर से आवाज आई, “भाई साहब, आज बाहर मत निकलना, धूप तेज है।”

मैं समझ गया कि मेरी नाक में दम करने वाली सेवा आज भी जारी है।

शाम को मैं पार्क में गया तो श्रीवास्तव जी भी वहाँ पहुँच गए। बोले, “आज मैंने 5000 कदम चलने का लक्ष्य रखा है।” फिर बोले, “आप भी चलिए, साथ चलने से सेहत अच्छी रहती है।”

मैंने मन ही मन सोचा कि पड़ोसी से बचने का कोई उपाय नहीं है।

हालाँकि सच यह भी था कि श्रीवास्तव जी दिल के बुरे नहीं थे, बस उनकी मदद करने की आदत थोड़ी ज्यादा थी।
मोहल्ले वाले कहते हैं कि ऐसा पड़ोसी किस्मत वालों को ही मिलता है—जो परेशान भी करे और परवाह भी करे।

और मैं आज भी सोचता हूँ कि मेरी नाक में दम करने वाला पड़ोसी शायद मेरी जिंदगी का अनोखा दोस्त है।

75. नौ दो ग्यारह

गाँव में श्यामू काका बड़े मशहूर थे, लेकिन किसी अच्छे काम के लिए नहीं, बल्कि अचानक गायब होने की अपनी अद्भुत कला के लिए। मोहल्ले वाले मजाक में कहते थे कि श्यामू काका ने “नौ दो ग्यारह होने की पीएचडी” कर रखी है।

जब भी किसी काम का नाम आता, श्यामू काका सबसे पहले कहते, “मैं अभी आता हूँ।” और फिर ऐसा आते कि किसी को पता ही नहीं चलता कि वे गए कहाँ।

एक दिन गाँव में सफाई अभियान चल रहा था। सरपंच जी ने कहा, “आज सब लोग झाड़ू लगाएंगे।” जैसे ही श्यामू काका ने झाड़ू उठाई, उन्होंने धीरे से कहा, “मुझे याद आया, घर में जरूरी काम है।” और देखते ही देखते हवा हो गए।

पड़ोसी ने पूछा, “काका कहाँ गए?”

सरपंच बोले, “नौ दो ग्यारह हो गए।”

अगले दिन गाँव में बैठक थी। श्यामू काका पहले ही कुर्सी पर बैठे थे। लेकिन जैसे ही सरपंच ने कहा, “आज चंदा देना होगा”, काका बोले, “मुझे जरूरी फोन करना है।” और कुर्सी खाली छोड़कर गायब।

लोग समझ गए कि काका का फोन हमेशा उस समय जरूरी होता है जब पैसे देने की बात आती है।

एक बार गाँव में मेले का आयोजन हुआ। सब लोग झूला झूल रहे थे। श्यामू काका भी झूले पर बैठे थे। अचानक झूला रुका और टिकट वाला पैसे माँगने लगा।

श्यामू काका बोले, “भाई, अभी लौटकर आता हूँ।”

और झूले से उतरकर ऐसे गायब हुए जैसे हवा में घुल गए हों।

मेला खत्म होने के बाद लोगों ने पूछा, “काका कहाँ थे?”

किसी ने कहा, “काका तो नौ दो ग्यारह होने की ट्रेनिंग ले रहे होंगे।”

लेकिन सच यह था कि श्यामू काका बुरे नहीं थे, बस उन्हें जिम्मेदारी से थोड़ा डर लगता था।

मोहल्ले वाले कहते हैं कि नौ दो ग्यारह होने की कला हर किसी के पास नहीं होती। इसके लिए तेज कदम, हल्की मुस्कान और सही समय पर गायब होने की समझ जरूरी होती है।

और श्यामू काका गर्व से कहते थे, “जहाँ काम भारी हो, वहाँ नौ दो ग्यारह होना ही सबसे बड़ी समझदारी है।”

74. घर का भेदी और लंका की छुट्टी

मोहल्ले में मिश्रा जी का परिवार बहुत मशहूर था। उनकी सबसे बड़ी समस्या थी कि घर की बातें बाहर कैसे निकल जाती थीं, क्योंकि घर में एक ऐसे सदस्य थे जिन्हें मोहल्ले वाले मजाक में “घर का भेदी” कहते थे।

यह भेदी कोई और नहीं, बल्कि मिश्रा जी का छोटा बेटा पप्पू था। पप्पू का स्वभाव था कि जो बात उसे बताई जाए, वह अगले पाँच मिनट में पूरे मोहल्ले को बता देता था।

एक दिन मिश्रा जी ने घर में योजना बनाई कि इस बार गर्मियों की छुट्टियों में सब लोग घूमने जाएंगे। उन्होंने कहा, “इस बात को किसी को मत बताना।”

पप्पू ने सिर हिलाया और कहा, “बिल्कुल नहीं बताऊँगा।”

लेकिन जैसे ही पप्पू बाहर गया, पड़ोसी के बच्चों से बोला, “हम लोग इस बार ‘लंका’ घूमने जा रहे हैं।”

यह सुनकर मोहल्ले में चर्चा शुरू हो गई। किसी ने कहा, “मिश्रा जी इतने अमीर कब हो गए कि विदेश घूमने जा रहे हैं?”

अगले दिन मिश्रा जी को पता चला कि उनकी छुट्टी की योजना मोहल्ले में फैल चुकी है। उन्होंने पप्पू को बुलाकर पूछा, “तूने बताया?”

पप्पू ने मासूम चेहरा बनाकर कहा, “मैंने सिर्फ लंका का नाम बताया, बाकी उन्होंने खुद अनुमान लगा लिया।”
मिश्रा जी ने सिर पकड़ लिया और बोले, “तू सच में घर का भेदी है।”

छुट्टी वाले दिन जब मिश्रा परिवार स्टेशन पहुँचा तो पप्पू ने पूछा, “पापा, लंका किस दिशा में है?”

मिश्रा जी बोले, “हम लंका नहीं, लखनऊ जा रहे हैं।”

पप्पू चौंक गया और बोला, “तो मोहल्ले वालों को क्या बताऊँ?”

मिश्रा जी मुस्कुराकर बोले, “अब किसी को कुछ मत बताना, वरना इस बार सच में घर की छुट्टी हो जाएगी।”

यात्रा के बाद मिश्रा जी ने फैसला किया कि घर की योजनाएँ अब सिर्फ कानों-कान ही रहेंगी।

मोहल्ले वाले कहते हैं कि घर का भेदी बड़ा खतरनाक होता है, क्योंकि वह जानबूझकर नहीं, बल्कि प्यार से राज खोल देता है। और पप्पू आज भी सोचता है कि लंका और लखनऊ में बस एक अक्षर का फर्क क्यों है।

73. खिसियानी बिल्ली का बदला

मोहल्ले में काली नाम की बिल्ली बहुत मशहूर थी। उसकी सबसे बड़ी पहचान थी कि वह हमेशा खिसियाई हुई सी रहती थी। मोहल्ले के बच्चे उसे देखकर हँसते और कहते, “देखो, खिसियानी बिल्ली फिर से आ गई।”

काली बिल्ली को यह बिल्कुल पसंद नहीं था। वह सोचती थी कि आखिर लोग उसे देखकर मजाक क्यों करते हैं। एक दिन उसने मन ही मन तय किया कि अब वह अपना बदला लेकर रहेगी।

पहले उसने सोचा कि बच्चों को डराएगी। शाम के समय जब बच्चे पार्क में खेल रहे थे, काली बिल्ली चुपके से झाड़ी के पीछे छिप गई और अचानक “म्याऊँ” की तेज आवाज निकाली। बच्चे डरकर भागे, लेकिन अगले ही पल उन्हें समझ आ गया कि यह काली बिल्ली की शरारत है। बच्चे बोले, “खिसियानी बिल्ली डराने आई थी।”

यह सुनकर काली बिल्ली और ज्यादा खिसिया गई।

अगले दिन उसने फैसला किया कि वह मोहल्ले की मुर्गियों को परेशान करेगी। वह धीरे-धीरे मुर्गीखाने के पास गई, लेकिन जैसे ही मुर्गियों ने उसे देखा, उन्होंने शोर मचाना शुरू कर दिया। काली बिल्ली को कुछ समझ नहीं आया और वह बिना कुछ किए ही भाग गई।

अब काली बिल्ली ने नया प्लान बनाया। उसने सोचा कि वह मोहल्ले के कुत्ते को सबक सिखाएगी क्योंकि वही सबसे ज्यादा भौंकता था। वह कुत्ते के पास जाकर ऐसे बैठ गई जैसे बहुत बड़ी नेता हो। कुत्ता पहले तो हैरान हुआ, फिर बोला, “आज तुम्हें क्या हो गया?”

काली बिल्ली बोली, “मैं बदला लेने आई हूँ।”
कुत्ता हँसने लगा और बोला, “बदला लेना है तो पहले मुस्कुराना सीखो।”

यह सुनकर काली बिल्ली का गुस्सा धीरे-धीरे कम होने लगा। उसे समझ आया कि मजाक का जवाब गुस्से से नहीं, समझदारी से देना चाहिए।

अगले दिन काली बिल्ली फिर पार्क में गई, लेकिन इस बार बच्चों के सामने खिसियाने की बजाय चुपचाप बैठ गई।
मोहल्ले वाले कहते हैं कि उस दिन खिसियानी बिल्ली ने बदला नहीं लिया, बल्कि दोस्ती का नया रास्ता चुन लिया।

और बच्चे भी समझ गए कि हर खिसियाई हुई बिल्ली बदला लेने नहीं आती।

72. एक अनार और सौ बीमार

रामलाल जी के घर में हमेशा रिश्तेदारों का आना-जाना लगा रहता था। लेकिन इस बार मामला थोड़ा अलग था। रामलाल जी की भतीजी की शादी तय हो गई थी और मोहल्ले में चर्चा थी कि शादी में मिठाई का खास इंतजाम होगा।

रामलाल जी ने बाजार से एक बड़ा सा अनार खरीदा और सोचने लगे कि इसे घर के बच्चों के लिए काट देंगे। जैसे ही वे अनार लेकर घर पहुँचे, पड़ोस की चाची ने देख लिया और तुरंत खबर फैल गई—“रामलाल जी एक अनार लेकर आए हैं।”

बस फिर क्या था… रिश्तेदारों का आना शुरू हो गया।

पहले ताऊ जी आए और बोले, “भाई, डॉक्टर ने कहा है कि मुझे फल खाने चाहिए।”
रामलाल जी ने मुस्कुराकर कहा, “जरूर, अनार स्वास्थ्य के लिए अच्छा है।”

फिर मामी जी आईं और बोलीं, “मेरे घुटनों में दर्द है, कहते हैं अनार खाने से कमजोरी दूर होती है।”

धीरे-धीरे रिश्तेदारों की लाइन लग गई। किसी को खून की कमी थी, किसी को याददाश्त की, किसी को त्वचा की चमक चाहिए थी, और सबको अचानक अनार की जरूरत महसूस होने लगी।

रामलाल जी परेशान होकर सोचने लगे कि एक अनार और सौ बीमार रिश्तेदार कैसे संभालेंगे।

आखिर उन्होंने अनार काटने का फैसला किया। लेकिन जैसे ही चाकू उठाया, पीछे से आवाज आई, “पहले मुझे दो!”
रामलाल जी चौंके, “क्यों?”

रिश्तेदार बोले, “मैं सबसे ज्यादा बीमार हूँ।”

अनार के टुकड़े इतने छोटे-छोटे बाँटे गए कि हर रिश्तेदार के हिस्से में बस एक-एक दाना आया।

बच्चे यह देखकर हँसने लगे और बोले, “यह तो वैज्ञानिक वितरण है।”

शाम को जब सभी रिश्तेदार चले गए तो रामलाल जी ने राहत की साँस ली और पत्नी से कहा, “अब समझ आया—एक अनार और सौ बीमार रिश्तेदार वाली कहावत यूँ ही नहीं बनी।”

मोहल्ले वाले कहते हैं कि उस दिन अनार तो खत्म हो गया, लेकिन रिश्तेदारों की सेहत की चर्चा अभी भी चल रही है।

71. आँखों का तारा

शर्मा परिवार में छोटा बेटा चिंटू सबका लाडला था। दादी उसे “आँखों का तारा” कहती थीं, तो पापा प्यार से “मेरी शान” बुलाते थे। लेकिन स्कूल के मास्टर जी उसे एक अलग ही नाम से जानते थे—“शैतानी सितारा”।

घर में चिंटू मासूम बनकर घूमता। मम्मी कहतीं, “मेरा बेटा तो कभी गलत काम कर ही नहीं सकता।” और उसी समय चिंटू चुपके से फ्रिज से चॉकलेट निकालकर गायब हो जाता।

एक दिन स्कूल से शिकायत आई कि चिंटू ने क्लास में कुर्सी के नीचे गुब्बारा रख दिया था। जैसे ही मास्टर जी बैठे, “फटाक!” की आवाज हुई। पूरी क्लास हँस पड़ी। मास्टर जी ने गंभीर होकर पूछा, “यह किसने किया?” चिंटू मासूम चेहरा बनाकर बोला, “सर, शायद कुर्सी खुद खुश हो गई थी।”

घर पर पापा ने डांटते हुए कहा, “तुम हमारी आँखों का तारा हो, ये शरारतें क्यों?” चिंटू बोला, “तारा हूँ तो थोड़ा चमकूंगा भी।”

दादी ने हँसते हुए उसका पक्ष लिया, “बच्चे शरारत नहीं करेंगे तो बूढ़े करेंगे क्या?” पापा चुप हो गए।

अगले हफ्ते मोहल्ले में पतंगबाजी का कार्यक्रम था। चिंटू ने सबको भरोसा दिलाया कि वह कोई शरारत नहीं करेगा।

लेकिन जैसे ही प्रतियोगिता शुरू हुई, उसने अपनी पतंग में छोटी सी घंटी बांध दी। हवा चलती तो “टुन-टुन” की आवाज आती और बाकी बच्चों का ध्यान भटक जाता।

जब उसकी पतंग जीत गई तो सब बोले, “यह तो चीटिंग है!” चिंटू बोला, “नहीं, यह रचनात्मक सोच है।”

धीरे-धीरे सब समझ गए कि चिंटू सच में आँखों का तारा है, लेकिन उसकी चमक थोड़ी शैतानी वाली है।

एक दिन पापा ने उसे समझाया, “शैतानी करना बुरा नहीं, लेकिन किसी को चोट न पहुँचे, यह जरूरी है।” चिंटू ने सिर हिलाया और बोला, “अब से मेरी शरारतें भी लिमिटेड एडिशन होंगी।”

मोहल्ले वाले आज भी कहते हैं कि चिंटू जैसा बच्चा हर घर में होना चाहिए—जो आँखों का तारा भी हो और हल्की-फुल्की शैतानी से जिंदगी में हँसी भी भर दे।

70. हाथ से निकली लॉटरी

मोहन जी बहुत दिनों से लॉटरी टिकट खरीद रहे थे। उनका सपना था कि एक दिन अचानक किस्मत चमके और वह करोड़पति बन जाएँ। मोहल्ले वाले मजाक में कहते थे कि मोहन जी पहले लॉटरी खरीदते हैं, फिर सपने देखते हैं।

एक दिन मोहन जी ने खास उत्साह में आकर एक लॉटरी टिकट खरीदा। उन्होंने टिकट को जेब में ऐसे रखा जैसे कोई अनमोल खजाना हो। घर पहुँचकर उन्होंने टिकट को अलमारी में छिपा दिया और पत्नी से कहा, “यह मेरी जिंदगी की सबसे कीमती चीज है।”

पत्नी ने पूछा, “क्या है इसमें?”

मोहन जी बोले, “किस्मत बंद है, खुलने का इंतजार है।”

रात को मोहन जी बार-बार उठकर अलमारी देखते रहे कि टिकट सुरक्षित है या नहीं। उन्हें डर था कि कहीं सपनों की गाड़ी स्टेशन छोड़कर न चली जाए।

अगले दिन सुबह उन्हें याद आया कि लॉटरी का रिजल्ट आज आना है। उन्होंने टीवी चालू किया और नंबर मिलाने लगे। जैसे-जैसे नंबर मिलते गए, मोहन जी का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

अचानक आखिरी नंबर भी मैच हो गया। मोहन जी खुशी से उछल पड़े, “मैं करोड़पति बन गया!”

उन्होंने पत्नी को आवाज लगाई, “जल्दी आओ, हमारी किस्मत बदल गई!”

पत्नी दौड़कर आईं और पूछा, “क्या हुआ?”
मोहन जी बोले, “लॉटरी लग गई!”

दोनों खुशी से नाचने लगे। मोहन जी ने तुरंत टिकट निकालने के लिए अलमारी खोली, लेकिन वहाँ टिकट नहीं था।

मोहन जी की आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्होंने पूरे घर में खोज शुरू कर दी। सोफे के नीचे, बिस्तर के अंदर, यहाँ तक कि फ्रिज के पीछे भी देखा।

तभी पत्नी ने धीरे से कहा, “कल सफाई करते समय मैंने एक पुराना कागज समझकर उसे फेंक दिया था।”

मोहन जी के पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्हें समझ आ गया कि किस्मत हाथ से निकल गई थी।

शाम को मोहन जी चुपचाप बैठे सोच रहे थे कि कभी-कभी सपने सच होने से पहले ही उड़ जाते हैं।

मोहल्ले वाले कहते हैं कि मोहन जी की लॉटरी हाथ से निकल गई, लेकिन उन्होंने जिंदगी का एक सबक जरूर सीख लिया—किस्मत के साथ-साथ अलमारी भी संभालकर रखनी चाहिए।

69. घर बैठे गंगा नहाए चाचा

मोहल्ले में चाचा रमेश बहुत ही चालाक किस्म के आदमी माने जाते थे। लोग मजाक में कहते थे कि चाचा अगर घर बैठे भी कोई फायदा उठा सकते हैं तो मौका नहीं छोड़ते। चाचा खुद को “सुविधा विशेषज्ञ” कहते थे।

एक दिन मोहल्ले में चर्चा थी कि शहर से गंगा स्नान के लिए बस जा रही है। सब लोग उत्साह में तैयारी कर रहे थे। पड़ोसी ने चाचा से कहा, “चाचा, आप भी चलो गंगा नहाने, बड़ा पुण्य मिलेगा।”

चाचा ने मुस्कुराकर कहा, “पुण्य करना अच्छी बात है, लेकिन ठंडे पानी में खड़े होकर पुण्य कमाना मेरी सेहत के खिलाफ है।”

यह सुनकर पड़ोसी हँस दिया।

अगले दिन चाचा के घर एक साधु बाबा आए और बोले, “अगर गंगा स्नान नहीं कर सकते तो मन से गंगा का ध्यान कर लो।” यह बात चाचा के दिमाग में बैठ गई।

चाचा ने एक नया तरीका निकाल लिया। उन्होंने घर के आँगन में बाल्टी भर पानी रखा, पास में एक छोटा सा स्पीकर लगाया और उसमें गंगा आरती का ऑडियो चला दिया।

फिर चाचा आँख बंद करके बाल्टी के पास बैठ गए और बोले, “आज मैं घर बैठे गंगा नहाऊँगा।”

पत्नी ने दूर से देखकर कहा, “चाचा जी, यह क्या नया प्रयोग है?”

चाचा बोले, “आधुनिक युग में सुविधा भी धर्म का हिस्सा है।”
फिर चाचा ने बाल्टी के पानी में दो बूंद गुलाब जल डाला और बोले, “अब यह पवित्र जल हो गया।”

पड़ोस का बच्चा यह देखकर बोला, “चाचा, अगर इतना आसान होता तो सब घर में ही गंगा नहा लेते।”

चाचा मुस्कुराए और बोले, “ज्ञान और श्रद्धा दिल से होती है, जगह से नहीं।”

शाम को चाचा बड़े खुश थे क्योंकि उन्हें लगा कि उन्होंने समय भी बचाया और धर्म भी निभा लिया।

मोहल्ले वाले कहते हैं कि चाचा सच में “घर बैठे गंगा नहाने” की कला के विशेषज्ञ हैं। और चाचा भी गर्व से कहते हैं, “जहाँ इच्छा हो, वहीं गंगा बहती है।”