बढ़ती उम्र की पगडंडी पर जब धूप कुछ नरम पड़ जाए,
और मन थोड़ा थककर जीवन की धुन गुनगुनाने लग जाए।
तब समझ लेना कुछ बातें दिल पर बोझ बन जाती हैं,
कुछ बातों को मुस्कान के साथ छोड़ देना ही भली बात होती है।
यदि कोई आपकी बात को बार-बार भी न समझ पाए,
तो उसे समझाने में अपना मन क्यों दुखी कर जाए।
दुनिया की सोच का ताला आपकी चाबी से खुले,
यह जरूरी नहीं, इसलिए खुद को तनाव से दूर रखें।
दिल की गर्माहट को थोड़ा-सा कम करते जाना,
दूसरों को समझाने का प्रयास भी धीरे से छोड़ देना।
बच्चे जब बड़े होकर अपने निर्णय खुद लेने लगें,
तो उनकी छाया बनकर पीछे-पीछे चलना छोड़ दें।
वे अपनी दुनिया के राजा हैं, उन्हें जीने देना,
अपने अनुभवों के समंदर में स्वयं को रहने देना।
उनकी हर बात को दिल में उलझाकर मत रखना,
धीरे-धीरे चिंता के भार को मन से हटाना।
दुनिया में हर कोई आपकी धुन पर नहीं चल पाएगा,
हर इंसान अपने ही सुर और ताल में जीवन गाएगा।
यदि कुछ लोग आपके विचारों से सहमत न हों,
तो इसे अपने दिल पर भारी मत होने देना।
विचारों का अंतर जीवन का सुंदर संगीत होता है,
इसलिए रंज और शिकायत को धीरे से छोड़ देना।
अगर उम्र के किसी पड़ाव पर लोग आपको न पूछें,
या पीछे से कुछ गलत शब्द भी कहने लगें।
उनकी आवाज़ को अपनी आत्मा तक आने मत देना,
कौन क्या कह रहा है—इस सोच को भी छोड़ देना।
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