71. पता ही नहीं चला — जीवन का सफ़र

कैसे बीत गया जीवन का सफ़र,
समय का यह कारवाँ कब गुजर गया, पता ही नहीं चला।

क्या पाया जीवन में, क्या खो दिया राहों में,
हिसाब लगाने बैठे तो कुछ समझ ही नहीं आया।

सपनों के पीछे भागते रहे उम्र भर,
कब सपने बदले और हम बदल गये, पता ही नहीं चला।

बीती जवानी हँसते-हँसते,
और बुढ़ापा आकर दरवाज़े पर खड़ा हो गया।

कल तक जो खुद बेटा कहलाते थे,
कब ससुर बन गये, पता ही नहीं चला।

पिता की जिम्मेदारियाँ निभाते-निभाते,
कब नाना-दादा बन गये, पता ही नहीं चला।

कोई कहे बुढ़ऊ, कोई पुकारे पापा,
अपनी असली पहचान क्या है, समझ ही नहीं आया।

पहले माँ-बाप की मरज़ी से चलते रहे,
फिर पत्नी की बातों में ढलते रहे।

उसके बाद बच्चों की दुनिया में उलझ गये,
अपनी इच्छा कब दब गई, पता ही नहीं चला।

पत्नी मुस्कुराकर कहती है,
अब तो समझदार हो जाओ।

पर क्या समझें और क्या समझाएँ,
ये फ़र्क भी कभी साफ़ नहीं हुआ।

दिल आज भी कहता है, जवान हूँ मैं,
उम्र आईने में सच दिखा जाती है।

इस उधेड़बुन में चलते-चलते,
घुटनों की आवाज़ कब बढ़ गई, पता ही नहीं चला।

काले बालों में चाँदी उतर आई,
चेहरे की रेखाएँ गहरी हो गईं।

कदमों की रफ़्तार धीमी पड़ी,
चाल कब बदल गई, पता ही नहीं चला।

समय ने करवट बदली कई बार,
हम भी उसके साथ बदलते रहे।

मित्रों की महफ़िलें छँटती चली गईं,
कौन साथ रहा, कौन छूट गया, पता ही नहीं चला।

कल तक मस्ती के किस्से सुनाते थे,
आज वरिष्ठ नागरिक कहलाने लगे।

नाती-पोते की खिलखिलाहट आई घर में,
सूनी पड़ी दोपहरें भी मुस्कुरा उठीं।

उदासियों की परतें हटती चली गईं,
खुशियों ने कब दस्तक दी, पता ही नहीं चला।

जीवन की भागदौड़ में साँसें थमती रहीं,
पर चाहतें कभी पूरी नहीं हुईं।

अब सोचता हूँ खुलकर जी लूँ हर पल,
कल का भरोसा किसे है यहाँ।

ऐ दोस्त, जी भर के जी ले आज,
कहीं ऐसा न हो कि अंत आ जाए अचानक,

और हम बस इतना ही कहते रह जाएँ,
मौत कब आ गई, पता ही नहीं चला।

70. मुझे जाने दो

पत्नी है तो जीवन में सब कुछ है,
वह घर की रानी, सम्मान की धुरी है।
तुम सिर ऊँचा करके चलते हो जग में,
उसके त्याग से ही यह गरिमा पूरी है।

तुम्हारी सुविधा-असुविधा वह सहती,
अकारण क्रोध भी हँसकर सहती है।
तुम्हारे सुख में खिल उठती है,
दुःख में चुपचाप आँसू बहती है।

रविवार भी उसके लिए काम का दिन,
न उसके लिए कोई त्यौहार रहा।
“चाय लाओ, पानी लाओ” की आवाज़,
उसका जीवन बस सेवा का संसार रहा।

तुम कहते रहे — “तुम्हें समझ कब आएगी?”
पर उसकी समझ से ही घर चलता था।
उसकी बुद्धि, धैर्य और प्रेम से,
तुम्हारा हर दिन सुरक्षित ढलता था।

एक रात अचानक वह चली गई,
घर में रुदन की गूँज उठी।
अंतिम दर्शन के बीच खड़ी,
उसकी आत्मा जैसे धीमे से बोली—

मैं अब जा रही हूँ, लौट न पाऊँगी,
साथ निभाने का वचन याद है मुझे।
पर किसे पता था इस जीवन में,
अकेले ही जाना पड़ेगा तुझे।

मुझे जाने दो, अब रोक न पाओगे,
दर्द बहुत है, पर ठहर न पाऊँगी।
मन मेरा भी भर आया है,
पर अब लौटकर न आ पाऊँगी।

मेरे जाने पर इतना मत रोना,
बेटियों को संभालो, धीरज रखना।
पोते की “नानी” पुकार अधूरी रही,
उस पीड़ा को हृदय में ही रखना।

तुम अपने को मजबूत बनाना,
ढीले मत पड़ना हालातों से।
जन्म लिया है जिसने जग में,
वह जाता है अपने ही हाथों से।

धीरे-धीरे मुझे कम याद करना,
जीवन की राह पर लौट जाना।
काम-काज में मन लगाना,
मेरे बिना जीना सीख जाना।

बीपी-शुगर का ध्यान तुम्हें रखना,
मीठा कम और दवा समय से लेना।
चाय देर से मिले तो क्रोध न करना,
बेटी पर व्यर्थ न गुस्सा होना।

दामाद-बेटी कुछ भी कहें तो,
मुस्कुराकर सब सह लेना।
नम्रता से हर बात निभाना,
मन में कोई राग न रखना।

सुबह स्वयं उठने की आदत डालो,
किसी की प्रतीक्षा मत करना।
अगर मुझसे कोई भूल हुई हो,
तो अंतर्मन से मुझे क्षमा करना।

भगवान की पूजा मत भूलना,
धैर्य और प्रेम को साथ रखना।
हम फिर शायद न मिल पाएँ,
पर मेरे हिस्से का भी जीवन जीना।

मेरी कमी खले तो चुप रहना,
पर कभी स्वयं को टूटने मत देना।
अब विदा की घड़ी आ पहुँची है—
बस… मुझे जाने दो… मुझे जाने दो।

मेरी छोटी बहन पिंकी को समर्पित

69. जीते जी सम्मान

आज ऊपर बैठी आत्मा ने ठहाका लगाया है,
     देखो, आज मेरे बच्चों ने पंडित को बुलाया है।

कितने जतन से पकवान सजाए गए हैं,
     बड़े आदर से सबको परोसे और खिलाए गए हैं।

जिन स्वादों को तरसती रही मैं जीवन भर,
     आज वही व्यंजन प्रेम से बनाए गए हैं।

कौवे और कुत्तों तक को दावत दी गई,
     सबको स्नेह से कौर खिलाए गए हैं।

पर याद है क्या, जब मैं घर में थी,
     मेरे लिए ही दरवाज़े बंद पाए गए हैं।

जगह नहीं थी मेरे अपने आशियाने में,
     वृद्धाश्रम के रास्ते दिखाए गए हैं।

आज मेरी तस्वीर भगवान संग सजी है,
     दीपक और फूलों से चौखट सजाए गए हैं।

पाँच सौ का नोट, मिठाई और नए वस्त्र,
     सब मेरे नाम से चढ़ाए गए हैं।

कैसा यह दिखावा, कैसी यह श्रद्धा,
     अपने ही मन को बहलाए गए हैं।

डरते हैं कहीं आत्मा न रूठ जाए,
     इस भय से कर्म निभाए गए हैं।

अरे, क्या इतना भी नहीं समझ पाए,
     माँ-बाप कभी संतानों से खफा नहीं होते हैं।

जीते जी दे दो थोड़ा समय और सम्मान,
     उन्हें बस प्रेम चाहिए, धन और पकवान नहीं होते

68. चाय का जादू

नींबू वाली चाय पेट घटाए,
     अदरक वाली हर दर्द मिटाए।

मसाले वाली ताकत बढ़ाए,
     मलाई वाली रुतबा दिखाए।

सुबह की चाय ताजगी लाए,
     शाम की चाय थकान भगाए।

दुकान की चाय स्वाद बढ़ाए,
     पड़ोसी की चाय अपनापन लाए।

मित्रों संग चाय रंग जमाए,
     बैठक में हंसी ठहाके आए।

पुलिसिया चाय डर हटाए,
     अफसर की चाय फाइल बढ़ाए।

नेताओं की चाय काम बनाए,
     विद्वानों की चाय ज्ञान सजाए।

कवियों की चाय भाव जगाए,
     रिश्तों में फिर मिठास घुलाए।

एक चाय आलस दूर भगाए,
     एक चाय भूखे को तृप्त बनाए।

एक चाय भाईचारा लाए,
     एक चाय सम्मान दिलाए।

चाय पिएं और चाय पिलाएं,
     जीवन को आनंदमय बनाएं।

67. जिंदगी को जी लो अभी

जिस पल मृत्यु आती है,
नाम नहीं, बस “बॉडी” रह जाती है।

“बॉडी लाओ, बॉडी उठाओ”
यही पुकार सुनाई जाती है।

जिन्हें रिझाने में उम्र गँवाई,
वे भी नाम नहीं दोहराते हैं।

इसलिए हर चुनौती को अपनाओ,
जीवन को खुलकर जी जाओ।

पसंद की चीजों पर खर्च करो,
हंसो कि पेट में दर्द हो जाए।

चाहे जैसे भी नाचो तुम,
खुशी में मन खुलकर मुस्काए।

तस्वीरों में पागल बन जाओ,
बचपन फिर से लौटाओ।

मृत्यु सबसे बड़ा नुकसान नहीं,
आस का बुझ जाना ही हार है।

जिंदा रहकर जो जी न सके,
वही जीवन की असली हार है।

पनीर न सही तो दाल सही,
हर हाल में मुस्कान रहे।

गाड़ी नहीं तो पैदल सही,
मन में संतोष महान रहे।

कोई साथ न दे तो क्या,
अकेलेपन में भी जान रहे।

जिसे देख न पाओ तुम,
उसकी आवाज ही पहचान रहे।

संकल्प यही, हर मन मुस्काए,
सर्वे भवन्तु सुखिनः गूंज जाए।

66. बदलता हुआ दौर

अच्छी थी अपनी पगडंडी,
     सड़कों पर अब जाम बहुत है।

फुर्र हुई सारी फुर्सत,
     हर चेहरे पर काम बहुत है।

नहीं रही अब बूढ़ों की कीमत,
     हर बच्चा खुद में ज्ञानी बहुत है।

उजड़ गए आँगन-बाग़ हमारे,
     दो गमलों में शान बहुत है।

मट्ठा-दही से दूरी ऐसी,
     कहते हैं इसमें जुकाम बहुत है।

चाय की चुस्की लेते ही,
     बोलें इसमें आराम बहुत है।

बंद हुई अब चिट्ठी-पत्री,
     व्हाट्सएप पर पैगाम बहुत है।

ए.सी. के हम इतने आदी,
     बाहर का मौसम धाम बहुत है।

झुके हुए हैं नन्हें कंधे,
     बस्तों में सामान बहुत है।

रिश्तों में अब गर्मी कम है,
     अकड़-ऐंठ का मान बहुत है।

सुविधाओं का ढेर लगा है,
     फिर भी मन हैरान बहुत है।

65. जीवन के पन्नों पर लिखी मासूमियत

जीवन के कुछ गूढ़ रहस्य,
     आज भी अनसुलझे रह जाते हैं।
हम और तुम चलते रहे,
     पर कई मोड़ समझ न पाते हैं।

दुनिया का हिस्सा बनते-बनते,
     कितने सपने पीछे छूट गए।
कुछ ने मंज़िल थाम ली हाथों में,
     कुछ राहों में ही टूट गए।

सच यही है, हकीकतों ने
     हमको गोद में लेकर पाला है।
धूप में जलकर, बारिश में भीगकर,
     संघर्षों ने ही संभाला है।

स्लेट की बत्ती जीभ से छूकर,
     कैल्शियम पूरा करते थे।
मासूमियत के उस विज्ञान पर,
     हम सचमुच विश्वास करते थे।

पढ़ाई का सारा तनाव,
     पेन्सिल चबाकर मिटाया है।
रबर से पहले दांतों ने ही
     गलती को दूर भगाया है।

किताबों में मोरपंख रखकर,
     होशियार बन जाने का सपना था।
जिल्द चढ़ी नई किताबों में,
     हर दिन जैसे कोई अपना था।

नए बस्ते की खुशबू में,
     पूरा उत्सव बस जाता था।
छोटी-छोटी खुशियों में ही
     सारा संसार समाता था।

माता-पिता न आते स्कूल,
     न पूछते किस कक्षा में हैं।
फिर भी संस्कारों की दौलत से
     हम सबसे सच्चे बच्चे थे।

साइकिल के डंडे पर एक,
     कैरियर पर दूजा साथी था।
तीन सपनों की एक सवारी,
     हर रास्ता अपना साथी था।

डांट पड़ी तो रो लिए,
     मुर्गा बनना आम बात थी।
न ईगो था, न शिकवा कोई,
     बस हँस देना ही सौगात थी।

कभी न कह पाए खुलकर हम,
     माता-पिता से प्रेम अपार।
“आई लव यू” शब्द न सीखे,
     पर दिल में था सारा संसार।

दादाजी की मीठी आवाज़,
     “मेरा नाम करेगा रोशन” गाती।
फिर हमने भी सपने गाए,
     “पापा कहते हैं…” धुन सुनाती।

अब बच्चे गुनगुनाते हैं,
     नए ज़माने की परिभाषा।
बापू सेहत के लिए हानिकारक,
     यही है आज की भाषा।

सचमुच सोचो तो लगता है,
     कहाँ से कहाँ हम आ गए।
भटूरे में पहले ईनो डाला,
     फिर ईनो पीकर पछता गए।

एक बार मुड़कर देखो ज़रा,
     बचपन अब भी पुकार रहा।
सादगी के उन पन्नों से,
     जीवन हमको निहार रहा।

64. मेरी धड़कनों की संगीत

दिल की बातें कह दूँ आज,
सपनों में बसती तेरी आवाज़।
तेरे बिना सूनी ये राहें,
तेरे संग खिलती हर एक साँस।

मेरी हर ग़ज़ल तुझसे सजी,
मेरी हर धुन तुझमें बसी।
आई लव यू दिल से कहूँ,
तू ही मेरी हर खुशी।

चमके जैसे तारा रातों में,
तू बसती मेरी बातों में।
तेरी हँसी की रोशनी से,
उजियारा है सौगातों में।

आई लव यू मेरा वादा,
तू ही मेरा एक इरादा।
तेरे बिना अधूरी दास्तां,

तू ही जीवन का इबादत-नामा।
ख्वाबों का तू सुंदर जहां,
तुझसे ही मेरे अरमां।

संगीत, तू मेरी जान,
तुझसे महके मेरा जहान।
आई लव यू सिर्फ तुझसे,
जुड़ी मेरी हर एक धड़कन।

63. हर हार में तुम

हार जाते हैं हम तुम्हें पाने में,
     दिल के सपनों को सजाने में।

हर धड़कन पर नाम तुम्हारा,
     फिर खुद को समझाने में।

हार जाते हैं तुमको भूलने में,
     यादों के दीपक बुझाने में।

तेरी हँसी का साया चलता,
     अश्कों को भी छुपाने में।

तेरी बातें गूंजें हवाओं में,
     नगमे बनें इन फ़िज़ाओं में।

दिल की धड़कन कहती चुपके,
     तुम बसते हो इन दुआओं में।

हर बार सोचा आगे बढ़ेंगे,
     रास्ते नए खुद ही गढ़ेंगे।

पर कदम ठिठक जाते फिर से,
     तेरे ख्यालों में ही अड़ेंगे।

जज़्बातों से बंधे हुए हैं,
     तेरे सपनों में ढले हुए हैं।

शायद प्यार का यही फलसफा,
     हर हार में जीत छुपे हुए है।

62. तुम बिन अधूरी ज़िंदगी

गुज़ार ही लोगे तुम अपनी ज़िंदगी,
मुझसे तो ये हुनर भी नहीं होता।
तुम बिन जीने का जो सलीका है,
वो मुझको कभी नहीं आता।

हर साँस में बस नाम तुम्हारा,
दिल ने सदा तुम्हें ही पुकारा।
तुम बिन कोई लम्हा ऐसा नहीं,
जो तन्हा दिल ने खुद से सँवारा।

तुम दूर गए पर ख्वाब वही हैं,
यादों के सिलसिले सभी हैं।
दिल से रिश्ता अब भी गहरा,
धड़कनों में बस तुम ही तुम हो ठहरा।

तुमने हँसकर जीना सीख लिया,
दर्द को भी जैसे पीना सीख लिया।
मुझको तो आँसू छुपाना भी,
अब तक ठीक से नहीं आता।

कहते हैं वक्त मरहम रखता,
हर जख्म को धीरे भरता।
पर इस दिल की सच्ची पीड़ा,
कोई समझ नहीं पाता।

भूलने की कोशिश करता हूँ,
खुद से ही रोज़ लड़ता हूँ।
तेरी झलक से जो उजाला था,
वो अब अँधेरों में जलता नहीं जाता।

61. अनमोल रिश्तों का खजाना

कुछ रिश्ते अनमोल रत्न से,
कुछ जीवन के मधुर धन से।
ये भावों के सच्चे मोती,
मन की थाली में जैसे ज्योति।

     हर धड़कन में एहसास बसे,
     सपनों के मीठे सुवास बसे।
     जो दिल के बेहद पास रहें,
     वो जीवन भर खास रहें।

कुछ रिश्ते नाम बिना खिलते,
सूखे वन में जैसे फूल मिलते।
कभी दोस्ती की छाँव बनें,
कभी प्रेम की नाव बनें।

     इनसे जीवन अर्थ पाता,
     सूना मन भी हर्षित गाता।
     संग इनके दुःख हल्का होता,
     बंजर में जैसे सावन होता।

रंग खुशी के ये भरते हैं,
सूने पल भी ये सजते हैं।
कुछ रिश्ते वरदान लगें,
जन्नत के समान लगें।

     सच्चे भावों की गोद में पलते,
     विश्वास के दीप सदा जलते।
     इनसे ही जीवन गूंजता है,
    अनमोल रिश्ता ही पूजता है।

60. जागृति का आह्वान

हम भी चलें अब रौशनी की ओर,
अंधेरों से कर लें नया सा शोर।

सपनों के दीप जलें गगन में,
आशा के रंग भरें जीवन में।

हर ख्वाब को सच करना है,
अपने भीतर दीप धरना है।

कोई तो है जो जाग रहा,
सोई चेतना को जगा रहा।

राहें भले अंधेरी हों,
मन में डर की फेरी हों।

साहस का दीप जलाना है,
हर भय को दूर भगाना है।

कोई तो हाथ बढ़ाएगा,
गिरकर भी हमें उठाएगा।

हर मुश्किल में राह दिखाए,
मंज़िल का संकेत बताए।

वक्त की धारा तीव्र सही,
पर हौसला हमारा कम नहीं।

जज़्बा है सबसे निराला,
जीवन का बने उजाला।

उम्मीद की राह पर बढ़ जाएं,
स्वप्नों को सच कर दिखलाएं।

कोई तो है जो जाग गया,
अब हम भी जागें — यही प्रण लिया।

59. आईनों का शहर

अब किसी आईने पे भरोसा नहीं,
हर अक्स में सच्चाई का किस्सा नहीं।
जो नहीं होता, वही दिखा देते हैं लोग,
ख्वाबों को भी सच बता देते हैं लोग।

     चुप रहो तो तन्हाई का इल्ज़ाम मिले,
     बोल दो तो चर्चाओं के नाम मिले।
     सच कहो तो दुश्मन ठहरा देते हैं,
     झूठ को सौ बार सजा देते हैं।

रिश्तों को भी बाजार बना देते हैं,
अपनापन यूँ ही गँवा देते हैं।
उम्मीदों का बोझ लाद देते हैं,
साथ चलकर भी फासले बढ़ा देते हैं।

     आईनों को सच बोलने की सज़ा मिली,
     धूल की चादर उन पर चढ़ा दी गई।
     चेहरों पर नक़ाब सजा देते हैं,
     हर अक्स को नया रंग दे देते हैं।

हमने चाहा था सुकून की छाँव,
मिला बस सवालों का गाँव।
दिल की बात समझे बिना,
दूरी की दीवार उठा देते हैं लोग।

     जो हक़ीक़त थी, अफसाना बना दी,
     सच की हर लौ बुझा दी।
     खामोशी को भी शोर बना देते हैं,
     आँसुओं को मौसम बता देते हैं।

डूबते को किनारा दिखाते हैं,
फिर वही किनारा हटा जाते हैं।
दोस्ती का चोला पहनाते हैं,
दिल का सौदा कर जाते हैं।

     रौशनी माँगो तो घर जला दें,
     चिरागों को भी आंधी बना दें।
     छोटे लम्हों को बड़ा बना दें,
     हर बात का तमाशा रचा दें।

इक चेहरे पर कई चेहरे लगा लेते हैं,
सच की राहों को धुंधला कर देते हैं।
अपनों के बीच भी तन्हा कर दें,
ज़ख्मों को फिर से हरा कर दें।

     मोहब्बत की बातें महफिलों में हों,
     दिलों में फिर भी दीवारें हों।
     हर अपने को अजनबी बना दें,
     प्यार को भी सौदा बना दें।

अब किसी आईने पे भरोसा नहीं,
इस शहर में कोई वैसा नहीं।
हर अक्स बदलता रहता है यहाँ,
सच भी बिकता रहता है यहाँ।

58. शून्यता के संबंध


संबंध की डोरी नाज़ुक सही,
     पर विश्वास में अडिग रहती है।
शब्दों से परे एक दुनिया,
     जहाँ मौन भी बातें कहती है।
रिक्तता में जो साथ निभाए,
     वही सच्चा अपना कहलाए।
शून्य क्षणों की गहराई में,
     जो हाथ थामे, वही सहारा बन जाए।
न दिखावे की चकाचौंध हो,
     न स्वार्थ का कोई व्यापार।
सादगी में भी जो महके,
     वही स्नेह का सच्चा संसार।
जो बिना कहे सब समझे,
     आँखों से पढ़ ले दिल की बात।
जिसके होने से सज जाए,
.     जीवन की हर एक सौगात।
सुख में तो मिलते हैं सब,
     दुख में जो खड़ा वही अपना।
आँधियों में जो दीप बने,
     वही रिश्ता सबसे सपना।
अपेक्षा का न हो कोई बोझ,
     न मोल-भाव की दीवार।
समर्पण की हो बस धड़कन,
     लगाव का पावन विस्तार।
जो टूटे मन को जोड़ सके,
     थके कदमों को दे उड़ान।
अंधेरों में जो राह दिखाए,
     वही संबंध सच्चा वरदान।
शून्यता में जो फूल खिलाए,
     उम्मीदों की कोमल डोर।
विश्वास का दीप जला दे,
     जब जीवन लगे चौराहे पर ठौर।
हर मोड़ पर साथ चले जो,
     चाहे राहें हों दुश्वार।
डगमग कदमों को थाम ले,
     बन जाए साहस का आधार।
न शर्तों में बँधा हो रिश्ता,
     न स्वार्थों की हो जंजीर।
मन से मन का हो संवाद,
     स्नेह रहे बस गंभीर।
जब सब कुछ पीछे छूट जाए,
     और समय भी मुड़ जाए।
जो रिक्तता में भी साथ दे,
     वही संबंध अमर कहलाए।
जीवन का असली सार वही,
     जो हर दौर में साथ निभाए।
शून्य क्षणों की नीरवता में,
    अर्थ नया हर बार रच जाए।

57. पापों के साए

जब भी ठोकर खाकर गिरता हूँ,
     अपने ही पापों से डरता हूँ।
बीते लम्हे साए बन जाते,
     रातों में चुपचाप बुलाते।

खामोशी चीख-सी लगती है,
     हर सांस में टीस-सी जगती है।
भूत पापों के घेरे रहते,
     मन के आँगन डेरा रखते।

ख्वाबों में डर आकार लेते,
     जख्म पुराने फिर से चेतें।
दस्तक देती यादों की आहट,
     दिल में उठती टीस की सरगम।

क्यों गलती की ऐसी सजा है,
     रूह तक काँपे हर सदा है।
अंधियारे में साए चलते,
     मन के दीपक धीरे जलते।

रात गहराए, भय बढ़ जाता,
     सन्नाटा भी शोर मचाता।
काश मुझे क्षमा कर दे खुदा,
     धो दे मन का सारा गिला।

दिल के आईने से धुंध हटे,
     पछतावे के बादल सब छँटें।
सवेरा आए नई किरण संग,
     जीवन भर दे उजला रंग।

56. समाज की तीन गुत्थियाँ

तीन समस्याएँ बढ़ती जाएँ,
समाज की राहें उलझती जाएँ।

पहली पीड़ा बेरोज़गारी,
     सपनों पर छाई लाचारी।
हाथों में श्रम, मगर काम नहीं,
     आशा का सूरज तमाम नहीं।
रोज़ी की राह में भटके इंसान,
     धीरे-धीरे टूटे अरमान।

दूजी विडंबना अजीब कहानी,
     काम पड़े हैं, पर नहीं है प्राणी।
खेत-खलिहान सूने पड़े,
     कारखानों के पहिए जड़े।
कौशल की कसौटी कौन चढ़े,
     योग्यता की ज्योति कहाँ जले?
श्रम का सूरज धुंध में खोए,
     अवसर के दीपक कम ही संजोए।

तीसरी चिंता सबसे भारी,
     कर्तव्य भूले नौकरीधारी।
दफ़्तर में सपनों के जाल,
     समय हुआ जैसे कंगाल।
मेहनत का मान कहाँ दिखे,
    ईमान की लौ क्यों न बहे?

इन तीनों गाँठों का हल यही,
हुनर-सम्मान की राह सही।
जब हर हाथ को श्रम का मान,
तभी बनेगा सशक्त राष्ट्र महान।

55. नारी शक्ति वंदन

माँ की ममता सबसे न्यारी,
     हर दुख में बनती वह सहारा।
प्यार लुटाए, दीप जलाए,
     जीवन कर दे उजियारा।
बहन-बेटी बन दे दुलार,
     घर-आँगन में घोले बहार।
प्यार का सागर, ममता गंगा,
     हर रिश्ते में अनुपम प्यार।
जय हो नारी, शक्ति तुम्हारी,
     तुमसे है संसार सारा।
सरस्वती बन विद्या देती,
     लक्ष्मी बन भरती भंडारा।
दुर्गा बन साहस जगाती,
     अन्याय से लड़े निरंतर।
जब-जब संकट घिर आए,
     बन जाए रण की रणचंडी प्रखर।
सहनशीलता की मूर्ति तुम,
     करुणा का पावन विस्तार।
त्याग-तपस्या की ज्योति जलाए,
     हर पथ कर दे साकार।
माँ बन जीवन को संवारो,
     संगिनी बन दो आधार।
बेटी बन आशा जगाओ,
     बहन बनो सुख का संसार।
हर रूप में तुम पूजनीय,
     स्नेह-प्रेम की सूरत।
विश्व नारी दिवस की बेला,
     स्वीकारो शत-शत वंदन-स्मृत।

54. तेरे इश्क़ का रंग

तो करो हमारे इश्क़ में रंगने की आरज़ू,
     हम बहके बादलों से फागुन छीन लाएँगे।

तेरे नाम की खुशबू से साँसें महकेंगी,
     तेरे इशारों पे मौसम भी झुकाएँगे।

चुप थी हवाएँ अब तक, आज गीत गाएँगी,
     तेरी बाहों की छाँव में धूप सो जाएगी।

चाँदनी झूमकर तेरे नग़मे सुनाएगी,
     तेरी हँसी से हर रात महफ़िल सजाएगी।

तेरी नज़रों के जादू में रंग जाएगा जहाँ,
     फूल खिल उठेंगे, महकेगा आसमाँ।

बस तू इक बार कह दे मुझे अपना सनम,
     हम कायनात से तेरा हर रंग ले आएँगे हम।

सावन से माँग लेंगे तेरे लिए बारिशें,
     बहारों से चुरा लाएँगे तेरे वास्ते खुशबुएँ।

जो चाहे तू, वही तक़दीर में लिखवा देंगे,
     तेरे इश्क़ में हम खुदा से भी भिड़ जाएँगे।

धड़कनों में तेरी चाहत का सुर बसाएँगे,
     हर लम्हे को तेरे नाम से सजाएँगे।

तेरे ख्वाबों की राहों पे दीप जलाएँगे,
     हर अँधेरे को मिलकर दूर भगाएँगे।

तू बस आरज़ू कर हमारे रंग में ढलने की,
     हम बादलों से फिर फागुन छीन लाएँगे।

53. पहली बार खुद की क़दर

पहली बार जब बिस्तर पर पड़ी,
तब अपनी कीमत समझ में पड़ी।

झाड़ू-पोछा, बर्तन-कपड़े,
हर काम के भाव थे चढ़े।

खाना चार हज़ार बताया,
चाय-नाश्ते का भी हिसाब लगाया।

ड्रेसिंग, सफ़ाई, सारा काम,
दस हज़ार में भी अधूरा नाम।

घर में कोई बाई टिक न पाई,
और मैं बरसों से यहाँ निभाई।

बिना सैलरी के सेवा की,
चुपचाप हर जिम्मेदारी ली।

बीस बरस यूँ ही गुज़र गए,
सपनों से घर के रंग भर गए।

कहते रहे—“कमाती नहीं”,
पर बचत मेरी गिनी नहीं।

मकान को घर बनाया मैंने,
हर कोना सजाया अपने सपने से।

तुम बाहर दुनिया से लड़े,
मैं भीतर दीवारों से जूझी खड़े।

तन्हाई से भी बात की,
हर आहट में सौगात दी।

काश समझ पाते मेरे काम,
न कहते इसे बस एक नाम।

“घरवाली” से आगे पहचान,
एक इंसान का भी हो सम्मान।

अब जब थकान ने घेरा डाला,
तब खुद का मूल्य नज़र में डाला।

क्योंकि मैं थी तो घर भी था,
मेरे होने से ही सुकून भी था।

52. ज़िंदगी की विडंबना

ज़िंदगी अजीब तमाशा है, हर चेहरा अपना-सा लगता है।
पर भीतर कहीं गणित छुपा, हर रिश्ता लाभ में तौलता है।

वकील की दुआ यही रहे, तू किसी मुकदमे में फँस जाए।
कानून की मोटी किताबें, तेरे ही ख़िलाफ़ खुल जाएँ।

डॉक्टर चाहे तू बीमार पड़े, तेरे दर्द में उसकी कमाई हो।
तेरी दवा और तेरी जाँच से, उसकी क्लिनिक में रौनक छाई हो।

पुलिसवाला देखे शक की नज़र, तेरे जुर्म में उसका मान बढ़े।
तेरी हथकड़ी उसकी शोभा, तेरी गिरफ़्तारी से पद चढ़े।

गुरुजन चाहे तू नासमझ रहे, ताकि पाठशाला चलती जाए।
तेरी कमजोरी की सीढ़ी से, उसकी विद्या फलती जाए।

मकान मालिक मन ही मन कहे, तू कभी अपना घर न बनाए।
तेरे किराए की हर तारीख़, उसकी जेब में सुख भर लाए।

दाँतों का डॉक्टर मुस्काए, जब दर्द तेरे दाँतों में हो।
तेरी सड़न उसके लिए, रोज़ी-रोटी का संयोग हो।

मकैनिक चाहे गाड़ी रुके, रास्ते में तेरा पहिया थमे।
तेरी परेशानी के पल से ही, उसके औज़ारों के दिन जमे।

कफ़न बेचने वाला सोचे, मौत से उसका व्यापार सजे।
तेरे अंतिम सफ़र की आहट से, उसका भविष्य आगे बढ़े।

हर कोई अपने हित में डूबा, तेरी हालत से लाभ गिने।
तेरी मुश्किल उसका अवसर, तेरी ठोकर उसकी सीढ़ी बने।

पर एक अजीब सा मोड़ भी है, जो सोच को हिला जाता है।
वो है चोर जो दुआ करे, तू चैन से सोता रह जाता है।
वो चाहता है घर में सुख हो, ताकि खिड़की बंद ही रहे।

तेरा जीवन सुरक्षित बीते, ताकि उसे मौक़ा न मिले।

विडंबना है इस जीवन की, कैसा गहरा ये हिसाब।

जो तुझे लूटने निकला था, वही दे जाए सच्चा ख़्वाब।