सुनील एक साधारण कस्बे में रहने वाला युवक था। उसके पिता चाहते थे कि वह सिर्फ पढ़ाई में आगे बढ़े, माँ चाहती थीं कि वह संस्कारी बने, और दोस्त चाहते थे कि वह हमेशा मौज-मस्ती करे। सुनील इन तीनों के बीच उलझा रहता। उसे लगता, “क्या एक साथ सब कुछ बनना संभव है?”
कॉलेज में एक दिन उसके शिक्षक ने कहा,
“सच्चा विकास शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा—चारों का साथ-साथ बढ़ना है।”
यह बात सुनील के दिल में उतर गई।
उसने निश्चय किया कि वह खुद को हर दिशा में सुधारने की कोशिश करेगा। सुबह वह जल्दी उठकर दौड़ने जाने लगा। पहले पाँच मिनट में ही थक जाता, पर रोज़ कोशिश करता। कुछ महीनों में उसका शरीर मजबूत होने लगा। वह पहले से ज्यादा चुस्त और आत्मविश्वासी हो गया।
मन को शांत करने के लिए वह शाम को थोड़ी देर चुपचाप बैठने लगा। पहले उसका मन भटकता—कभी फोन, कभी दोस्तों की बातें याद आतीं। लेकिन धीरे-धीरे उसे अपने भीतर झाँकने की आदत पड़ गई। गुस्सा कम होने लगा, बेचैनी घटने लगी।
बुद्धि के विकास के लिए वह सिर्फ परीक्षा की किताबें नहीं पढ़ता था। वह जीवन, इतिहास, विज्ञान और अच्छे विचारों की किताबें पढ़ने लगा। बहस में वह अब चिल्लाता नहीं, तर्क से बात करता।
आत्मा के लिए वह किसी मंदिर या मस्जिद से ज्यादा इंसान की सेवा को धर्म मानने लगा। हर रविवार वह पास के वृद्धाश्रम जाता, बुज़ुर्गों से बातें करता, उनके लिए फल ले जाता। वहाँ उसे अजीब-सी शांति मिलती।
एक साल में लोग कहने लगे, “सुनील बदल गया है।”
वह पहले जल्दी हार मान लेता था, अब संघर्ष से डरता नहीं था। पहले वह सिर्फ अपने बारे में सोचता था, अब दूसरों की तकलीफ भी समझता था।
एक दिन कस्बे में बाढ़ आ गई। लोग घबरा गए। सुनील ने दोस्तों को इकट्ठा किया। किसी ने खाना बनाया, किसी ने दवाइयाँ जुटाईं, किसी ने बच्चों को सुरक्षित जगह पहुँचाया। सुनील सबको जोड़कर काम करवा रहा था—न चिल्लाकर, न दिखावा करके, बस शांत और मजबूत बनकर।
उस दिन लोगों ने देखा कि सुनील में सिर्फ ताकत नहीं थी, समझ भी थी; सिर्फ ज्ञान नहीं था, करुणा भी थी; सिर्फ भक्ति नहीं थी, कर्म भी था।
बूढ़े मास्टरजी ने कहा,
“यह लड़का नहीं, चलता-फिरता संतुलन है—शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का मेल।”
सुनील ने मन ही मन सोचा—
“पूर्णता कोई मंज़िल नहीं, रोज़ का संघर्ष है। पर यही संघर्ष हमें असली इंसान बनाता है।”
समय के साथ ऐसे कई युवक-युवतियाँ सुनील से प्रेरित होकर बदले। कस्बा पहले से ज्यादा साफ, शांत और सहयोगी हो गया।
लोग कहते,
“जब इंसान खुद बदलता है, तब समाज बदलता है। और जब बहुत से लोग खुद को संवारते हैं, तब देश अपने गौरव की ओर लौटता है।”
सुनील बस मुस्करा देता—क्योंकि वह जानता था, असली जीत दिखावे में नहीं, भीतर के परिवर्तन में होती है।
Author: Rajeev Verma
लघु कथा – 39
सुरेश एक सरकारी स्कूल में शिक्षक था। उसकी उम्र चालीस के करीब थी, पर मन बच्चों जैसा कोमल और समझदार था। उसे हमेशा लगता था कि बच्चे सिर्फ किताबों से नहीं, बल्कि इंसानों से सीखते हैं। इसलिए वह पहले खुद को ठीक रखने की कोशिश करता—समय पर आना, साफ बोलना, किसी से कठोरता से बात न करना।
उसके स्कूल में एक लड़का था—अमित। बहुत संवेदनशील। ज़रा-सी डाँट पर उसकी आँखें भर आतीं। दूसरे शिक्षक कहते, “यह लड़का कमजोर है, इसे सख्ती चाहिए।”
सुरेश चुप रहता। वह जानता था कि हर फूल को एक-सा पानी नहीं चाहिए।
एक दिन अमित बिना बताए स्कूल से गायब हो गया। सब घबरा गए। प्रधानाचार्य ने कहा, “उसके माता-पिता को बुलाओ, जरूर कोई गड़बड़ है।”
सुरेश ने कहा, “पहले सच जान लेते हैं।”
शाम को वह चुपचाप अमित के मोहल्ले गया। पता चला कि उसके पिता बीमार हैं और अमित अस्पताल में उनके साथ था। उसने किसी को बताया नहीं, क्योंकि डरता था कि सब डाँटेंगे।
अगले दिन सुरेश ने कक्षा में कुछ नहीं कहा। बस पढ़ाते-पढ़ाते बोला,
“गलती अज्ञान से होती है, जानबूझकर नहीं। गलती करने वाले को डर नहीं, समझ चाहिए।”
अमित की आँखें भर आईं। छुट्टी के बाद वह सुरेश के पास आया और सब सच बता दिया।
सुरेश ने उसके सिर पर हाथ रखा,
“बेटा, अगली बार बस बता देना। दोस्ती में डर नहीं होता।”
धीरे-धीरे बच्चे सुरेश को सिर्फ शिक्षक नहीं, दोस्त मानने लगे। वे अपने डर, अपनी गलतियाँ, सब उससे कह देते। सुरेश कभी किसी को सबके सामने अपमानित नहीं करता। वह अच्छाइयों को उभारता, गलतियों को प्यार से सुधारता।
एक बार स्कूल में झगड़ा हो गया। दो लड़के मारपीट पर उतर आए। बाकी शिक्षक सजा देने की सोच रहे थे। सुरेश ने दोनों को अलग कमरे में बुलाया, चाय पिलाई और पूछा,
“तुम दोनों में से कौन बुरा है?”
दोनों चुप।
सुरेश बोला,
“बुरा कोई नहीं होता, बस समझ कभी-कभी खो जाती है।”
बातों-बातों में सारा झगड़ा खुल गया और दोनों रो पड़े। सजा की जगह उन्हें समझ मिली।
साल के अंत में बच्चों ने एक छोटा कार्यक्रम रखा। अमित मंच पर आया और बोला,
“सुरेश सर ने हमें पढ़ाया नहीं, बनाया है। उन्होंने हमें डर से नहीं, भरोसे से बदला है।”
सुरेश की आँखें नम हो गईं। वह समझ गया कि दीपक खुद जले बिना रोशनी नहीं दे सकता। अगर शिक्षक का जीवन साफ हो, तो बच्चे अपने आप सीख जाते हैं।
उस दिन सुरेश ने मन ही मन कहा—
“बच्चों को सुधारने से पहले खुद को सुधारना पड़ता है। प्यार, धैर्य और विश्वास—यही सच्ची शिक्षा है।”
लघु कथा – 38
रामचंद्र एक छोटे कस्बे में रहता था। वह न तो बहुत पढ़ा-लिखा था, न ही किसी बड़े पद पर था, लेकिन उसमें एक बात खास थी—वह डर से नहीं, समझ से जीता था। लोग अक्सर अंधविश्वास में डूबे रहते। कोई कहता, “आज अमावस है, नया काम मत शुरू करो।” कोई कहता, “उस पेड़ के नीचे मत बैठो, वहाँ भूत रहता है।” रामचंद्र बस मुस्करा देता।
एक दिन कस्बे में खबर फैली कि पुराने कुएँ के पास रात को अजीब आवाजें आती हैं। लोग डरने लगे। कोई पानी भरने नहीं जाता था। औरतें दूर से ही लौट आतीं। बच्चों को सख्त मना था उस रास्ते पर जाने से।
रामचंद्र ने कहा, “डर से पेट नहीं भरता। पानी तो चाहिए ही।”
उसने तय किया कि रात को वही कुएँ पर जाएगा।
लोगों ने मना किया—“तू पागल है क्या? वहाँ आत्मा रहती है।”
रामचंद्र बोला, “अगर आत्मा होती, तो दिन में क्यों नहीं दिखती? अँधेरे में ही क्यों जागती है?”
रात को वह टॉर्च लेकर गया। दिल मजबूत था, कदम सीधे। उसने देखा कि हवा से पुराने पेड़ की सूखी टहनियाँ टकरा कर आवाज करती हैं। पास की झोपड़ी में रहने वाला एक बूढ़ा बीमार था और कराहता था। आवाजें वही थीं, जिन्हें लोग भूत समझ रहे थे।
रामचंद्र ने बूढ़े को पानी पिलाया, दवा दिलवाई और अगली सुबह सबको सच बताया। लोग शर्मिंदा हुए। अंधविश्वास टूट गया।
कुछ दिन बाद एक और बात फैली—“फलाँ घर में देवी आई है, वहाँ चढ़ावा चढ़ाओ, वरना अनिष्ट होगा।” लोग पैसे और अनाज लेकर दौड़ पड़े। रामचंद्र ने देखा कि एक चालाक आदमी यह सब रचा रहा है।
रामचंद्र ने भीड़ से कहा,
“देवी डर से नहीं आती। अगर ईश्वर है, तो वह सच्चाई और मेहनत में है, न कि डर फैलाने में।”
उसने उस आदमी को पकड़वाया। सच सामने आया—वह लोगों को डरा कर लूट रहा था।
अब कस्बे में लोग रामचंद्र को सिर्फ बहादुर नहीं, समझदार भी मानने लगे। वह न तलवार उठाता था, न भाषण देता था। उसकी बहादुरी सोच में थी, उसकी ताकत डर से लड़ने में थी।
एक दिन बच्चों ने उससे पूछा,
“भैया, ताकत क्या होती है?”
रामचंद्र बोला,
“मजबूत शरीर से ज़्यादा ज़रूरी है मजबूत दिमाग। जो डर से नहीं, सच से चलता है—वही सच्चा बहादुर है।”
लोग समझ गए कि धर्म रहस्य नहीं, जीवन का साहस है। अंधविश्वास कमजोरी है, और सच्चाई ताकत। रामचंद्र का जीवन यही संदेश था—हमें नरम, डरपोक सोच नहीं चाहिए, बल्कि मजबूत दिल, साफ दिमाग और साहसी जीवन चाहिए।
लघु कथा – 37
प्रेमचंद शहर के एक पुराने मोहल्ले में रहते थे। उम्र साठ पार कर चुकी थी, पर आँखों में अब भी करुणा और जिम्मेदारी की चमक थी। जीवन भर उन्होंने दूसरों के लिए जिया—कभी परिवार के लिए, कभी समाज के लिए, कभी ऐसे लोगों के लिए भी, जिन्हें वे ठीक से जानते तक नहीं थे। लेकिन इस भागदौड़ में वे खुद को कहीं पीछे छोड़ आए थे।
एक दिन वे अचानक बीमार पड़ गए। डॉक्टर ने साफ कहा, “अब आपको सबसे पहले अपना ध्यान रखना होगा। वरना आप किसी के काम नहीं आ पाएँगे।” यह बात प्रेमचंद के दिल में उतर गई। उन्होंने पहली बार सोचा—क्या सच में मैं खुद को भूल गया हूँ?
पहले वे सुबह उठते ही दूसरों की चिंता में लग जाते थे—किसके घर में क्या कमी है, किसे मदद चाहिए, कौन दुखी है। पर अब उन्होंने निश्चय किया कि कुछ समय के लिए वे खुद पर ध्यान देंगे। सुबह टहलने जाने लगे, पुराने गीत सुनने लगे, और अपनी टूटी हुई सेहत को जोड़ने की कोशिश करने लगे।
पास ही रहने वाली छोटी बच्ची राधा रोज उनसे पूछती, “बाबा, आज किसी की मदद करने नहीं जाओगे?”
प्रेमचंद मुस्करा कर कहते, “आज पहले अपनी मदद कर रहा हूँ बेटी।”
शुरू में उन्हें अजीब लगता था। जैसे वे कोई अपराध कर रहे हों। पर धीरे-धीरे उन्हें समझ आने लगा कि अगर साधन ही कमजोर हो जाए, तो मंज़िल तक पहुँचना कैसे संभव है? वे सोचते, “अगर मेरा मन और शरीर शुद्ध नहीं होगा, तो मैं दुनिया को क्या दूँगा?”
दिन बीतने लगे। प्रेमचंद का चेहरा फिर से चमकने लगा। आँखों में नई रोशनी थी। वे अब शांत थे, संतुलित थे। एक दिन मोहल्ले में बड़ा झगड़ा हो गया। दो परिवार आपस में कटुता से भर गए। लोग प्रेमचंद को बुलाने आए, क्योंकि वे हमेशा बीच-बचाव करते थे।
प्रेमचंद गए, पर इस बार वे थके हुए नहीं थे, बल्कि भीतर से मजबूत थे। उन्होंने दोनों परिवारों से कहा,
“दुनिया तभी सुधरेगी, जब हम खुद सुधरेंगे। अगर दिल में मैल है, तो बाहर शांति कैसे होगी?”
उनकी बातें सीधे दिल में उतर गईं। झगड़ा शांत हो गया।
शाम को प्रेमचंद अकेले बैठे सोच रहे थे—“दुनिया को अच्छा बनाने की चाह में मैं खुद को भूल गया था। पर आज समझ आया कि दुनिया मेरे भीतर से ही शुरू होती है। अगर मेरा जीवन पवित्र होगा, तो उसका असर दूसरों पर पड़ेगा।”
अब वे पहले की तरह हर समय भागते नहीं थे, पर जब भी किसी को उनकी जरूरत होती, वे पूरे मन और पूरी ताकत से मदद करते थे। लोग कहते, “प्रेमचंद पहले भी अच्छे थे, पर अब तो जैसे और भी उजले हो गए हैं।”
प्रेमचंद मन ही मन मुस्कराते और सोचते—
“हम साधन हैं, दुनिया परिणाम है। अगर साधन शुद्ध होगा, तो परिणाम अपने आप शुद्ध हो जाएगा।”
लघु कथा – 36
गाँव के किनारे एक छोटा-सा घर था, जहाँ बूढ़े गोपाल रहते थे। लोग उन्हें किसी बड़े पद या उपलब्धि के कारण नहीं जानते थे, बल्कि उनकी सादगी के कारण पहचानते थे। गोपाल न तो कभी सरपंच रहे, न ही किसी सभा में भाषण दिया, पर उनके छोटे-छोटे काम ही उनकी पहचान थे।
हर सुबह वे सबसे पहले उठते। अपने आँगन को बुहारते, फिर पास के कुएँ से पानी भरकर पड़ोस की बुज़ुर्ग अम्मा के घर रख आते, जो चल नहीं पाती थीं। किसी ने उनसे कभी यह काम करने को नहीं कहा था। वे बस चुपचाप करते और मुस्करा कर लौट आते।
दिन में जब बच्चे स्कूल जाते, तो गोपाल उन्हें रास्ता पार करवाते। कभी किसी बच्चे का जूता टूट जाए, तो वे अपनी जेब से पैसे निकालकर ठीक करवा देते। न उन्होंने इसका ढिंढोरा पीटा, न किसी से धन्यवाद की उम्मीद की।
एक दिन गाँव में बड़ा कार्यक्रम हुआ। कई नेता आए, भाषण दिए, वादे किए। लोग तालियाँ बजाते रहे। उसी भीड़ में गोपाल चुपचाप खड़े थे। अचानक एक बच्चा गिर पड़ा। नेता मंच पर थे, लोग भाषण में खोए थे, पर गोपाल दौड़कर बच्चे को उठाने पहुँचे, उसके घुटने पर दवा लगाई और उसे पानी पिलाया।
शाम को जब सब घर लौटे, तो लोगों ने देखा कि गोपाल फिर से अपने आँगन में बैठे सब्ज़ियाँ काट रहे थे—आधी अपने लिए, आधी बीमार पड़ोसी के लिए।
तब गाँव के एक युवक ने कहा,
“आज तो बड़े-बड़े लोग आए थे, पर असली बड़ा आदमी तो गोपाल ही है।”
लोग समझ गए कि महानता भाषणों में नहीं, पदों में नहीं, बल्कि रोज़ के छोटे-छोटे कामों में छिपी होती है। गोपाल कोई हीरो नहीं कहलाते थे, पर उनके साधारण काम ही बताते थे कि उनका चरित्र कितना महान था।
लघु कथा – 35
शिवम ने गुस्से और झिझक के बीच अपने पिता से कहा,
“मेरे घर मत आना। मैं और मेरी पत्नी नहीं चाहते कि हमारे बच्चे आपकी ज़िंदगी की कमज़ोरियाँ सीखें। आप हमेशा बच्चों को मेरे बचपन की बातें बताते हैं, और मुझे सबके सामने छोटा बना देते हैं। इससे मुझे बहुत तकलीफ़ होती है।”
उसके शब्द तीर की तरह थे। पिता कुछ नहीं बोले। बस अपनी चप्पल सीधी की और बिना देखे लौट गए।
शिवम को लगा, उसने सही किया। उसे अपने घर का “सम्मान” बचाना था। उसे लगता था कि उसके पिता असफल रहे, कमज़ोर रहे, और वही कमज़ोरी उसके बच्चों में न उतर जाए।
दिन बीतते गए। घर शांत था। कोई पुरानी कहानी नहीं, कोई टोका-टोकी नहीं। पर इस शांति में कुछ खाली-सा था। बच्चों ने एक दिन पूछा,
“पापा, दादाजी अब क्यों नहीं आते?”
शिवम ने टाल दिया,
“वो बिज़ी हैं।”
कुछ हफ्तों बाद खबर आई—पिता बीमार हैं। शिवम अस्पताल पहुँचा। वही आदमी, जिसे उसने “कमज़ोर” कहा था, अब बिस्तर पर लेटा था, पर आँखों में वही सादगी थी।
पिता ने धीमे से कहा,
“मैं तुम्हें छोटा नहीं करना चाहता था, बेटा। मैं बस उन्हें बताता था कि तुम कैसे मुश्किलों से निकले। ताकि वे समझें—कमज़ोरी से भी ताकत निकलती है।”
शिवम चुप रह गया। उसे याद आया—वह बचपन में कैसे गरीबी में पढ़ा, कैसे पिता ने अपने सपने छोड़कर उसे आगे बढ़ाया।
पिता ने आगे कहा,
“अगर मेरी बातें तुम्हें चोट देती थीं, तो माफ़ करना। मैं बस तुम पर गर्व करता था।”
शिवम की आँखें भर आईं। उसे समझ आ गया—जिसे वह “नुकसान” समझ रहा था, वही असल में उसकी जड़ों की कहानी थी।
वह पिता का हाथ पकड़कर बोला,
“पापा, घर आपके बिना सूना है। आइए… बच्चों को बताइए कि कमज़ोरी से भी इंसान बनता है।”
उस दिन शिवम ने जाना—शर्म अतीत से नहीं, उसे नकारने से आती है। और घर वही होता है, जहाँ अपने होने की इजाज़त हो।
लघु कथा – 34
रविन्द्र ने जिस दिन अपना घर छोड़ा था, उसे लगा था कि वह बहुत बड़ा कदम उठा रहा है—आजाद होने का, अपने सपनों को जीने का। माँ की नम आँखें, पिता की चुप्पी और आँगन में खड़ी नीम की छाँव—सब उसे पीछे खींच रहे थे, पर वह आगे बढ़ गया।
शहर बड़ा था, चमकदार था। नौकरी मिली, पैसा आया, दोस्त बने। पर जितना वह ऊपर जाता गया, उतना ही भीतर खाली होता गया। उसे कभी माँ के हाथ की बनी दाल याद आती, कभी पिता का बिना कहे समझ जाना। वह फोन करता, पर जल्दी काट देता—काम का बहाना, थकान का बहाना।
साल बीतते गए। एक दिन उसे गाँव से खबर मिली—पिता बीमार हैं। वह दौड़ता हुआ पहुँचा। वही कच्चा रास्ता, वही नीम का पेड़, पर आँगन सूना था। पिता चारपाई पर लेटे थे, आँखें कमजोर, आवाज़ धीमी। रविन्द्र उनके पास बैठा तो पिता ने बस इतना कहा,
“आ गया बेटा?”
रविन्द्र रो पड़ा। उसे लगा जैसे सारी सफलता उस एक वाक्य के आगे छोटी पड़ गई हो।
माँ रसोई में थी। उसने बेटे को देखा, तो हाथ से आँचल गिर पड़ा। बिना कुछ कहे उसके सिर पर हाथ रखा। रविन्द्र को लगा, यही तो वह जगह है जहाँ उसकी सारी थकान उतर जाती है।
उस रात वह अपने पुराने कमरे में सोया। दीवारों पर बचपन की खरोंचें थीं, छत पर वही पुराना पंखा। उसे याद आया—कैसे वह कभी यहाँ से भाग जाना चाहता था। अब उसे लग रहा था—कहीं असली घर से तो वह तब ही दूर नहीं हो गया था?
सुबह पिता ने धीरे से कहा,
“घर छोड़ना गलत नहीं था, बेटा। पर घर को भूल जाना गलत था।”
ये शब्द रविन्द्र के दिल में गहरे उतर गए। उसे समझ आ गया—वह बाहर तो बहुत आगे बढ़ गया, पर भीतर पीछे रह गया।
कुछ दिन बाद वह वापस शहर लौटा, पर इस बार अलग इंसान बनकर। उसने तय किया—अब घर सिर्फ यादों में नहीं रहेगा। वह हर महीने आएगा, हर दिन बात करेगा, हर फैसले में माँ-पिता को जगह देगा।
एक साल बाद वह हमेशा के लिए लौट आया। नौकरी छोड़कर नहीं, बल्कि नौकरी को गाँव के पास ले आया। उसने उसी नीम के नीचे कुर्सी रखी, पिता को धूप में बैठाया और माँ के हाथ की चाय पी।
उस दिन उसने खुद से कहा—
“घर छोड़ना आसान था, पर घर से दूर रहकर जीना सबसे मुश्किल।”
रविन्द्र जान चुका था—दुनिया की कोई भी ऊँचाई उस आँगन से बड़ी नहीं, जहाँ किसी ने बिना शर्त उसे अपना कहा था।
लघु कथा – 33
आशु आठ साल का था। उसका सपना था—दौड़ में सबसे तेज़ बनना। वह रोज़ स्कूल के मैदान में बच्चों को तेज़ दौड़ते देखता और सोचता,
“एक दिन मैं भी सबसे आगे रहूँगा।”
लेकिन सच यह था कि आशु जल्दी थक जाता था। पहली ही दौड़ में वह पीछे रह जाता। कुछ बच्चे उसका मज़ाक उड़ाते,
“तू तो कछुए जैसा दौड़ता है!”
आशु उदास हो जाता, पर हार नहीं मानता। उसने अपने पापा से कहा,
“मुझे तेज़ बनना है।”
पापा मुस्कराए,
“लक्ष्य चाहे छोटा हो या बड़ा, उसे पाने के लिए निरंतर प्रयास, सही मेहनत और धैर्य चाहिए।”
अगले दिन से आशु ने नई शुरुआत की। वह रोज़ सुबह जल्दी उठता। पहले धीरे-धीरे दौड़ता, फिर थोड़ा तेज़। कुछ दिन तो उसके पैर दुखते, साँस फूलती, पर वह रुकता नहीं।
पापा उसे समझाते,
“ताकत सिर्फ शरीर में नहीं, मन में भी होती है। खुद पर भरोसा रखो।”
आशु ने अपने कमरे में एक काग़ज़ चिपका दिया—
“मैं तेज़ बन सकता हूँ।”
हर दिन वह उस लाइन को पढ़ता और दौड़ने चला जाता। बारिश हो या धूप, वह मैदान पहुँचता। कभी वह खुद से कहता,
“आज कल से एक कदम ज़्यादा दौड़ूँगा।”
महीने बीत गए। उसके कदम मजबूत होने लगे, साँस लंबी होने लगी। मज़ाक उड़ाने वाले बच्चे अब उसे ध्यान से देखने लगे।
स्कूल की स्पोर्ट्स डे आई। सौ मीटर की दौड़ थी। आशु का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। उसे पुराने दिन याद आए—हार, मज़ाक, थकान। फिर उसे पापा की बात याद आई—
“खुद को मजबूत बनाओ, तभी खुद पर भरोसा आएगा।”
सीटी बजी। सब दौड़े। आशु ने सिर्फ एक बात सोची—
“रुकना नहीं है।”
उसके पैर ज़मीन से बात कर रहे थे, साँस हवा से। वह आगे बढ़ता गया। आख़िरी मोड़ पर वह दूसरे नंबर पर था, पर उसने ताकत लगाई—शरीर की नहीं, मन की। और वह सबसे आगे निकल गया।
जब वह फिनिश लाइन पर पहुँचा, लोग तालियाँ बजा रहे थे। वही बच्चे जो हँसते थे, अब कह रहे थे,
“तू तो सच में तेज़ बन गया!”
आशु ने आसमान की ओर देखा और मुस्कराया। उसे समझ आ गया—लक्ष्य तक पहुँचने का रास्ता ताकत, मेहनत और धैर्य से बनता है। और जो खुद पर भरोसा करना सीख ले, वही दुनिया को प्रेरित करता है।
लघु कथा – 32
आरव चौदह साल का था। बाहर से देखने पर वह बिल्कुल सामान्य लड़का लगता—स्कूल जाता, दोस्तों से हँसता, क्रिकेट खेलता। लेकिन उसके भीतर एक ऐसी दुनिया थी जहाँ सोच कभी रुकती ही नहीं थी।
पिछले साल एक घटना ने उसे बदल दिया था। स्कूल से लौटते समय उसका एक्सीडेंट होते-होते बचा था। बाइक तेज़ थी, ब्रेक फिसल गया था, और आरव बस कुछ इंच से बचा था। उसके बाद से उसका दिमाग हर समय चौकन्ना रहने लगा।
अब वह हर बात पर सोचने लगता—
“अगर मैं गलत बोल दूँ तो?”
“अगर टीचर मुझसे सवाल पूछ लें और मुझे न आए तो?”
“अगर दोस्त मेरा मज़ाक उड़ाएँ तो?”
रात को बिस्तर पर लेटते ही उसका दिमाग फिल्म की तरह पुरानी बातें चलाने लगता। वह सोचता—
“काश उस दिन मैं सड़क जल्दी पार न करता।”
“काश मैं थोड़ा और सावधान होता।”
वह बार-बार उसी घटना को याद करता, जैसे दिमाग उसे भूलने ही नहीं देना चाहता।
यह था उसका रूमिनेशन—बीते हुए डर को बार-बार जीना।
दिन में भी उसका दिमाग शांत नहीं रहता। वह भविष्य की चिंताओं में खोया रहता—
“अगर कल टेस्ट में खराब नंबर आ गए तो?”
“अगर मम्मी-पापा नाराज़ हो गए तो?”
“अगर मेरे साथ फिर कुछ बुरा हो गया तो?”
यह था उसका वॉरिंग—आने वाले कल से डरना।
धीरे-धीरे आरव चिड़चिड़ा होने लगा। छोटे फैसले भी उसे परेशान करने लगे—कौन सी पेंसिल लूँ, कौन सी कॉपी, किस दोस्त के साथ बैठूँ। उसका मन हर पल खतरा ढूँढता रहता, जैसे दिमाग अब भी उसे बचाने की कोशिश कर रहा हो।
एक दिन उसकी टीचर ने नोटिस किया कि वह चुप रहने लगा है। उन्होंने उसे बुलाया और प्यार से पूछा,
“आरव, तुम इतने खोए-खोए क्यों रहते हो?”
पहले तो वह चुप रहा, फिर उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उसने सब बता दिया—एक्सीडेंट, डर, रातों की नींद, लगातार सोचते रहना।
टीचर ने कहा,
“तुम्हारा दिमाग तुम्हें सुरक्षित रखना चाहता है। लेकिन कभी-कभी वह ज़रूरत से ज़्यादा चौकन्ना हो जाता है। इसे ही ट्रॉमा कहते हैं।”
उन्होंने उसे एक तरीका सिखाया।
“जब भी दिमाग बहुत सोचने लगे, अपने आसपास पाँच चीज़ें देखो, चार चीज़ें छुओ, तीन आवाज़ें सुनो। इससे दिमाग वर्तमान में लौट आता है।”
आरव ने कोशिश शुरू की। जब भी सोच का तूफ़ान आता, वह खिड़की से बाहर देखता, पेड़ गिनता, पंखे की आवाज़ सुनता, किताब छूता। धीरे-धीरे उसका मन वापस ‘अभी’ में आने लगा।
उसने डायरी लिखना भी शुरू किया—जो बीत गया, उसे काग़ज़ पर छोड़ देना; जो आने वाला है, उसे भरोसे पर छोड़ देना।
एक दिन उसने खुद से कहा,
“मैं डर नहीं हूँ। मैं वो हूँ जो डर के बावजूद आगे बढ़ रहा है।”
समय के साथ उसकी सोच धीमी होने लगी। वह समझ गया—सोचना ज़रूरी है, पर जब सोच ही ज़िंदगी रोक दे, तब उसे थामना सीखना पड़ता है।
आरव अब जानता था—घाव शरीर पर ही नहीं, दिमाग पर भी लगते हैं। और जैसे शरीर भरता है, वैसे ही मन भी भर सकता है—थोड़े धैर्य, थोड़ी समझ और थोड़े प्यार से।
लघु कथा – 31
दिनेश एक साधारण, लेकिन बहुत समझदार आदमी था। उसने ज़िंदगी किताबों से कम और अनुभवों से ज़्यादा सीखी थी। उसका बेटा राजेश पढ़ाई में ठीक था, पर उसे हर बात पर बोलने की आदत थी। चाहे किसी को पूरी बात कहनी हो या नहीं, राजेश बीच में बोल पड़ता।
एक शाम राजेश दोस्तों से बहस करके घर आया। गुस्से में बोला,
“पापा, सब लोग गलत हैं, बस मैं ही सही हूँ।”
दिनेश मुस्कराया और बोला,
“अच्छा, तो ज़रा बैठ और मुझे पूरी बात सुनने दे।”
राजेश बोलता गया, दिनेश चुपचाप सुनता रहा। जब राजेश थक गया, तब दिनेश ने पूछा,
“अब बताओ, तुमने दूसरों की पूरी बात कितनी सुनी?”
राजेश चुप हो गया।
दिनेश ने कहा,
“बेटा, थोड़ा पढ़ना, ज़्यादा सोचना, कम बोलना और ज़्यादा सुनना — यही बुद्धिमान बनने के उपाय हैं।”
अगले दिन दिनेश ने राजेश को अपने साथ बाज़ार ले गया। एक दुकानदार और ग्राहक में बहस हो रही थी। राजेश तुरंत बोलने लगा, पर दिनेश ने इशारे से उसे रोक दिया। कुछ देर सुनने के बाद राजेश खुद समझ गया कि गलती दोनों की थी, सिर्फ एक की नहीं।
घर लौटते समय राजेश बोला,
“पापा, अगर मैं शुरू में बोल पड़ता तो शायद गलत समझ लेता।”
दिनेश मुस्कराया,
“यही तो सीख है। जो ज़्यादा सुनता है, वह ज़्यादा समझता है।”
दिनेश ने राजेश को एक किताब दी और कहा,
“इसे रोज़ थोड़ा पढ़ना, फिर उस पर सोचना। हर बात पर तुरंत मत बोलना।”
कुछ दिनों बाद राजेश में बदलाव दिखने लगा। वह पहले सुनता, फिर सोचता, फिर बोलता। दोस्त भी कहने लगे,
“अब तू ज़्यादा समझदार लगने लगा है।”
एक दिन वही दोस्त फिर बहस करने लगे। इस बार राजेश चुप रहा, सबकी बात सुनी और फिर शांति से बोला। सब मान गए।
घर आकर उसने दिनेश से कहा,
“पापा, आज समझ आया — बुद्धिमानी आवाज़ में नहीं, समझ में होती है।”
दिनेश ने बेटे के सिर पर हाथ रखा और कहा,
“जो सुनना सीख गया, उसने सीखने की आधी मंज़िल तय कर ली।”
लघु कथा – 30
रवि और मोहन बचपन के दोस्त थे। एक ही गली में पले, एक ही स्कूल में पढ़े, पर जैसे-जैसे बड़े हुए, उनकी सोच अलग दिशाओं में उड़ने लगी—बिलकुल मधुमक्खी और मक्खी की तरह।
रवि को किताबें, नए विचार और मेहनत से कुछ बनाने का शौक था। उसे फूलों की तरह सुंदर अवसर दिखते थे—सीखने के मौके, आगे बढ़ने के रास्ते। वह कहता,
“ज़िंदगी में कुछ ऐसा करना है, जिससे खुद पर गर्व हो।”
मोहन को मज़ा, तात्कालिक सुख और आसान रास्ते पसंद थे। उसे वहीं जाना अच्छा लगता, जहाँ भीड़ हो, शोर हो, और बिना मेहनत के मज़ा मिल जाए। वह कहता,
“ज़िंदगी है यार, इतना सोच-वोच कर क्या करना!”
कॉलेज के बाद रवि एक छोटे से शहर में नौकरी करने लगा और साथ-साथ अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। मोहन शहर में ही रह गया, दोस्तों के साथ समय बिताता, काम बदलता, पर कहीं टिकता नहीं।
रवि हर बार मोहन को समझाने की कोशिश करता,
“यार, कुछ तय कर, मेहनत कर, कल को पछताएगा।”
मोहन हँस देता,
“तू बहुत सीरियस है, ज़िंदगी एन्जॉय कर।”
एक दिन रवि ने मोहन को अपने ऑफिस बुलाया। साफ-सुथरा माहौल, काम में लगे लोग, सब कुछ एक मकसद के साथ। मोहन बोला,
“इतनी शांति में बोरियत नहीं होती?”
रवि मुस्कराया,
“यही शांति मुझे ताकत देती है।”
कुछ महीनों बाद मोहन को पैसों की ज़रूरत पड़ी। वह रवि के पास आया। रवि ने मदद की, पर फिर समझाने लगा। इस बार मोहन चिढ़ गया,
“तू हमेशा उपदेश क्यों देता है? हर कोई तेरी तरह नहीं बन सकता।”
उस रात रवि बहुत सोचता रहा। उसे समझ आ गया कि वह बार-बार अपनी ऊर्जा उस दोस्त को बदलने में लगा रहा है, जो बदलना ही नहीं चाहता।
अगले दिन रवि ने बस इतना कहा,
“मोहन, मैं तुझे दोस्त मानता हूँ, पर मैं अब तुझे वही बनने को नहीं कहूँगा जो तू बनना नहीं चाहता।”
वक़्त बीता। रवि मेहनत से आगे बढ़ता गया। उसके सपनों का शहद धीरे-धीरे बनने लगा। मोहन वहीं रहा—भीड़ में, शोर में, अस्थायी खुशियों में।
एक दिन मोहन ने रवि से कहा,
“शायद तू सही था।”
रवि बोला,
“मैं सही नहीं था, मोहन। बस मेरी राह अलग थी, तेरी अलग।”
रवि जान चुका था—मधुमक्खी फूल ढूँढती है, मक्खी गंदगी। दोनों बुरी नहीं, बस अलग हैं। और किसी को उसकी प्रकृति से अलग उड़ने को मजबूर करना, अपनी ताकत खो देना है।
लघु कथा – 29
शहर में हर कोई आदित्य मल्होत्रा को जानता था। बड़ी कंपनी का मालिक, सैकड़ों कर्मचारियों का नेतृत्व करने वाला, ऊँची गाड़ियों में चलने वाला आदमी। लोग कहते थे—वह सबसे सफल इंसान है। पर जो बात उसे सच में अलग बनाती थी, वह उसकी दौलत नहीं, उसका स्वभाव था।
आदित्य कभी यह नहीं कहता था कि उसे सम्मान चाहिए। वह जानता था—सम्मान माँगा नहीं जाता, कमाया जाता है। और यह कमाई पैसे से नहीं, आदतों से होती है।
सुबह ऑफिस पहुँचते ही वह सबसे पहले गार्ड को नमस्ते करता, फिर सफाई करने वाले कर्मचारी से हाल-चाल पूछता। मीटिंग में अगर कोई जूनियर गलती करता, तो वह उसे डाँटने के बजाय समझाता। वह कहता,
“गलती इंसान की पहचान नहीं, उसे सुधारने का तरीका पहचान है।”
उसके पास ताकत थी, पद था, पर घमंड नहीं था। वह वादे कम करता, निभाता ज़्यादा। अगर किसी से कह दिया कि कल फोन करेगा, तो चाहे कितना भी व्यस्त हो, फोन ज़रूर करता।
एक बार कंपनी को बड़ा नुकसान हुआ। सब डर गए कि अब छँटनी होगी। पर आदित्य ने कहा,
“गलती मेरी है, नुकसान मेरी जिम्मेदारी है। मेरे लोग इसकी कीमत नहीं चुकाएँगे।”
उस दिन कर्मचारियों ने पहली बार महसूस किया—यह सिर्फ बॉस नहीं, इंसान है।
आदित्य हर सफलता का श्रेय टीम को देता और असफलता का भार खुद उठाता। वह कभी किसी की पीठ पीछे बुराई नहीं करता। जो कहना होता, सामने कहता—शांत, साफ और सच्चे शब्दों में।
लोग उसके सामने खड़े होते तो सीधे खड़े हो जाते, डर से नहीं, आदर से। बच्चे उसे देखकर मुस्कराते, बूढ़े उसे आशीर्वाद देते। क्योंकि उसके भीतर दिखावा नहीं, सच्चाई थी।
किसी ने एक दिन उससे पूछा,
“आप इतने सम्मानित कैसे बन गए?”
आदित्य मुस्कराया और बोला,
“मैंने कभी सम्मान माँगा नहीं। बस हर दिन कोशिश की कि मेरा व्यवहार ऐसा हो कि लोग खुद देना चाहें।”
वह जानता था—सम्मान न ताली से मिलता है, न तालियों की आवाज़ से टिकता है। वह उन आदतों से बनता है जो रोज़ निभाई जाती हैं—ईमानदारी, नम्रता, समय की पाबंदी, दूसरों की इज़्ज़त, और अपने सिद्धांतों पर अडिग रहना।
उस दिन सब समझ गए—सफल वही नहीं जो ऊँचाई पर पहुँचे, बल्कि वही है जो ऊँचाई पर जाकर भी इंसान बना रहे। और ऐसा इंसान बिना शोर किए, बिना माँगे, अपने जीवन से सम्मान कमा लेता है।
लघु कथा – 28
आरव और सिया की मुलाकात कॉलेज के पहले दिन हुई थी। लाइब्रेरी में एक ही किताब के लिए दोनों के हाथ एक साथ बढ़े थे, और वहीं से उनकी कहानी शुरू हुई। डेटिंग के दिनों में वे घंटों कैंपस में घूमते, चाय की छोटी-सी दुकान पर बैठकर सपनों की बातें करते और बारिश में बिना छाते भीगते हुए हँसते रहते।
शादी के बाद ज़िंदगी तेज़ हो गई। ऑफिस, मीटिंग, ट्रैफिक और थकान—सब कुछ उनके बीच आ गया। प्यार था, लेकिन वक़्त कम हो गया था। बातें ज़रूरी बातों तक सिमट गईं—बिल, काम, नींद।
एक शाम सिया ने महसूस किया कि कई दिनों से वे कहीं साथ बाहर नहीं गए। उसने आरव से कहा,
“हम दोनों एक साथ होते हैं, लेकिन साथ नहीं होते।”
आरव ने उसकी बात को गंभीरता से लिया। उसने तय किया कि अब वह सिर्फ साथ रहने नहीं, बल्कि “साथ जीने” की कोशिश करेगा।
अगले रविवार उसने सिया को बिना बताए तैयार होने को कहा। वे उसी पुरानी चाय की दुकान पर गए जहाँ पहली बार बैठे थे। वही मेज़, वही खिड़की, बस वक़्त बदल गया था। सिया की आँखों में चमक लौट आई। उन्होंने पुराने किस्से याद किए, हँसे, और महसूस किया कि प्यार को ज़िंदा रखने के लिए वक़्त देना पड़ता है।
आरव ने एक नई आदत शुरू की। कभी सिया के बैग में छोटा सा नोट रख देता—
“आज भी तुम मेरी सबसे प्यारी आदत हो।”
कभी तकिए के नीचे—
“सपनों में भी मुस्कराती रहना।”
सिया भी पीछे नहीं रही। वह सुबह आरव के उठने से पहले उसकी पसंद की कॉफी बना देती। कभी ऑफिस जाते समय उसकी जेब में उसका पसंदीदा चॉकलेट रख देती। छोटी-छोटी चीज़ों में वे फिर से एक-दूसरे को ढूँढने लगे।
वे हर हफ्ते एक दिन सिर्फ अपने लिए रखने लगे—कभी मूवी डेट, कभी पार्क में टहलना, कभी यूँ ही स्कूटर पर शहर घूम आना। वे वही सब करने लगे जो कभी डेटिंग के दिनों में किया करते थे।
धीरे-धीरे एकरसता टूटने लगी। अब उनके पास सिर्फ जिम्मेदारियाँ नहीं, बल्कि यादें भी बनने लगीं। वे एक-दूसरे को फिर से जानने लगे—नए सपने, नए डर, नई चाहतें।
एक रात सिया ने आरव से कहा,
“प्यार बड़ी-बड़ी बातों से नहीं, इन छोटे पलों से बनता है।”
आरव ने मुस्कराकर जवाब दिया,
“और इन पलों को बनाने के लिए सबसे ज़रूरी है—वक़्त देना।”
उस दिन दोनों ने समझा कि गुणवत्तापूर्ण समय सिर्फ साथ बैठना नहीं, बल्कि दिल से साथ होना है। जब दो लोग जानबूझकर एक-दूसरे के लिए वक़्त निकालते हैं, तो प्यार हर दिन नया हो जाता है—बिलकुल उनकी कहानी की तरह।
लघु कथा – 27
अनु की सबसे बड़ी शिकायत झगड़ों से नहीं थी, बल्कि उस खामोशी से थी जो धीरे-धीरे उसके घर में बस गई थी। पहले वह और रोहन घंटों बात करते थे—दिन कैसा गया, क्या अच्छा लगा, क्या बुरा। अब रोहन घर आते ही फोन में खो जाता। उसकी उँगलियाँ किसी और के नाम पर चलती रहतीं, और अनु सामने बैठी होती, फिर भी जैसे मौजूद ही न हो।
एक दिन अनु ने धीरे से कहा,
“रोहन, तुम मुझसे कुछ शेयर क्यों नहीं करते अब?”
रोहन चिढ़ गया, “हर बात बताना ज़रूरी नहीं होता। तुम बेवजह परेशान हो जाती हो।”
अनु को लगा, जैसे उसकी भावनाओं को कोई नाम ही नहीं दिया जा रहा—बस “चिढ़चिढ़ापन” कहकर टाल दिया जाता है। उसने देखा, रोहन किसी और से खुलकर हँसता है, उसी से अपने ऑफिस की परेशानियाँ, अपने डर, अपने सपने शेयर करता है। जो बातें कभी अनु के लिए होती थीं, अब किसी और की हो चुकी थीं।
रातें बदल गई थीं। पहले जिन पलों में पास होने का सुख था, अब वहाँ दूरी थी। पास होकर भी दूर। न वैसी चाह, न वैसा अपनापन। अनु को लगता, जैसे उसका शरीर ही नहीं, उसका मन भी अकेला हो गया है।
रोहन ने अपने फोन और लैपटॉप का पासवर्ड बदल दिया। अनु ने जब पूछा, तो वह हँसकर बोला,
“तुम्हें शक करने की आदत हो गई है।”
लेकिन अनु को शक नहीं, खालीपन महसूस होता था। वह देखती थी—चैटिंग बढ़ती जा रही है, पर उससे बातचीत घटती जा रही है।
एक दिन अनु ने हिम्मत करके कहा,
“तुम किसी और से अपने और मेरे झगड़ों की बातें क्यों करते हो? मुझसे क्यों नहीं?”
रोहन ने उल्टा उसे ही दोषी बना दिया,
“अगर तुम इतनी नेगेटिव न होती, तो मुझे बाहर बात करने की ज़रूरत ही न पड़ती।”
हर तुलना उसे तोड़ देती थी—
“वो मुझे समझती है, तुम नहीं।”
“वो कभी चिड़चिड़ी नहीं होती, तुम हर बात पर रो देती हो।”
अनु सोचती—क्या प्यार का मतलब किसी और जैसा बन जाना है?
धीरे-धीरे रोहन उससे और दूर होने लगा। वह उस “दूसरे व्यक्ति” से मिलकर लौटता और अनु से बात तक नहीं करता। बड़े फैसलों में भी अनु की राय नहीं ली जाती। झगड़े सुलझाने की कोई कोशिश नहीं, बस टालना, चुप रहना, भाग जाना।
एक रात अनु ने कहा,
“रोहन, तुम्हारे आने से पहले और बाद में मैं दो अलग इंसान हो गई हूँ।”
रोहन ने जवाब नहीं दिया। वह फोन में ही उलझा रहा।
तब अनु ने पहली बार अपने दिल की सुनी। उसने समझा—रिश्ते झगड़ों से नहीं टूटते, वे खामोशी से टूटते हैं। जब भावनाएँ बाहर किसी और के पास चली जाएँ, और अपना घर सिर्फ आदत बनकर रह जाए।
अनु ने उस रात तय किया—वह भी अब खुद से बात करेगी, खुद को सुनेगी। क्योंकि जहाँ प्यार नहीं सुना जाता, वहाँ रहकर खुद को खो देना सबसे बड़ा दुख होता
लघु कथा – 26
गांव के आख़िरी छोर पर मिट्टी और टीन से बना एक छोटा सा घर था। उसी घर में रहता था रामु—एक साधारण मजदूर, जिसके हाथों की लकीरों में पसीना और जीवन की सच्चाई दोनों बसते थे। सुबह की पहली अज़ान से पहले ही वह उठ जाता, पत्नी सविता के बनाए सूखे चावल या बासी रोटी खाकर काम पर निकल जाता। उसका काम था ईंट भट्ठे पर—जहाँ धूप आग बनकर गिरती थी और मिट्टी इंसान की साँसों में घुल जाती थी।
रामु जानता था कि उसका शरीर जल्दी थक जाता है, पर मन कभी थकने की इजाज़त नहीं देता। उसके दो बच्चे थे—मोहन और गीता। वह चाहता था कि वे कभी भट्ठे की आग न देखें, कभी अपने हाथों से ईंटें न ढोएँ। वह चाहता था कि उनके हाथों में किताबें हों, उनके सपनों में उजाला हो।
दिनभर ईंटें ढोते-ढोते उसकी कमर झुक जाती, हथेलियाँ फट जातीं, पर वह कभी शिकायत नहीं करता। शाम को जब दूसरे मजदूर काम छोड़ देते, वह अक्सर थोड़ा और रुक जाता—कुछ पैसे ज़्यादा मिल जाएँ, तो बच्चों के लिए दूध या नई कॉपी ला सके।
जब वह घर पहुँचता, तब तक अंधेरा उतर चुका होता। सविता दरवाज़े पर उसकी राह देखती रहती। रोटियाँ कब की बन चुकी होतीं, लेकिन रामु के लौटने तक वे ठंडी हो जातीं। वह मुस्कराकर कहता,
“मेरे हिस्से में तो हमेशा ठंडी रोटियाँ ही आती हैं।”
सविता की आँखें भर आतीं, पर वह कुछ नहीं कहती।
एक दिन मोहन ने मासूमियत से पूछा,
“बाबा, आप जल्दी क्यों नहीं आते? हम आपके साथ गरम रोटी खाना चाहते हैं।”
रामु ने उसे गोद में उठाकर कहा,
“बेटा, अगर मैं जल्दी आ जाऊँ, तो तुम्हारी किताबें, तुम्हारे जूते और तुम्हारे सपने कैसे आएँगे?”
उस रात रामु देर तक सो नहीं पाया। उसे लगा, जैसे उसकी जिंदगी सिर्फ दूसरों के लिए जलने वाली दीया बन चुकी है। पर उसी क्षण उसके मन में एक और विचार जागा—शायद यही उसकी साधना है। जैसे साधु जंगल में तप करते हैं, वैसे ही वह संसार में रहकर तप कर रहा है। बिना मंत्र, बिना पूजा—सिर्फ कर्म।
एक दिन भट्ठे पर एक बूढ़ा मजदूर बीमार पड़ गया। सब लोग काम छोड़कर अलग हो गए, पर रामु ने उसे पानी पिलाया, छाया में बैठाया और उसका काम भी खुद कर दिया। किसी ने पूछा,
“रामु, तुझे क्या मिलेगा इससे?”
रामु ने कहा,
“मुझे कुछ नहीं चाहिए। शायद बस मन की शांति।”
उस शाम जब वह घर पहुँचा, तो सविता ने रोटियाँ फिर गरम कर दी थीं। रामु ने पहली बार गरम रोटी खाई, लेकिन उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उसने कहा,
“आज रोटियाँ गरम हैं, पर मेरा मन तो बरसों से ठंडी रोटियों में ही तप कर मजबूत हो गया है।”
समय बीतता गया। बच्चे बड़े होने लगे। मोहन स्कूल में अच्छा करने लगा, गीता कविता लिखने लगी। एक दिन गीता ने अपनी कॉपी में लिखा—
“मेरे पिता ठंडी रोटियाँ खाते हैं, ताकि मेरे सपने गरम रह सकें।”
रामु ने जब यह पढ़ा, तो उसे लगा, उसकी सारी तपस्या सफल हो गई। उसे समझ आ गया कि ठंडी रोटियाँ कोई अभाव नहीं, बल्कि त्याग की मुहर हैं। जो दूसरों के लिए अपने हिस्से की गरमी छोड़ देता है, वही सच में जीवन की आग को अर्थ देता है।
रामु अब जान चुका था—उसकी जिंदगी कोई साधारण मजदूर की कहानी नहीं, बल्कि एक मौन साधक की यात्रा है, जो हर दिन कर्म के रास्ते ईश्वर तक पहुँचता है।
लघु कथा – 25
सालों की दोस्ती और अनुभव का बोझ लेकर, हर शाम किशोर अपने बगीचे में अपने तीन पुराने मित्रों—अनिल, रमेश और सतपाल—के साथ बैठता। चारों की उम्र अब सत्तर पार कर चुकी थी, लेकिन उनके विचार आज भी युवाओं की तरह तीखे और जीवन के अनुभवों से भरे हुए थे।
उस शाम, चारों दोस्त शांति से बैठकर चाय पी रहे थे। किशोर ने अचानक अपने हाथ में चाय का प्याला लेकर कहा, “दोस्तों, आज मुझे सूरज की याद आई—उगता सूरज और ढलता सूरज। जीवन में यह एक गहरी सीख देता है।”
अनिल ने हँसते हुए कहा, “सूरज भी आज की तरह तुम्हारे दार्शनिक अंदाज का विषय बन गया, किशोर?”
“हाँ, और यह विषय सिर्फ दर्शन नहीं, बल्कि अनुभव है। सोचो—उगता सूरज और ढलता सूरज दोनों ही सुंदर हैं, दोनों ही आकर्षक हैं। पर असल में, उगते सूरज को ज्यादा महत्व और सम्मान दिया जाता है। उसे पूजा जाता है, उसकी तारीफ होती है। और जो सूरज ढलता है, उसके लिए कोई उत्सव या पूजा नहीं होती। उसे बस देखा जाता है और भुला दिया जाता है।”
रमेश ने सिर झुकाते हुए कहा, “तो इसका मतलब यह है कि हम भी जीवन में केवल शुरुआत को महत्व देते हैं और अंत को नजरअंदाज कर देते हैं।”
किशोर ने गंभीर स्वर में कहा, “बिलकुल। हम अक्सर नई नौकरी, नए प्रोजेक्ट, नए प्रयास की तारीफ करते हैं। पर जब वही व्यक्ति या वही प्रयास अपनी पूरी क्षमता तक पहुँचता है, और मुश्किलें आने लगती हैं, तो लोग उसे नजरअंदाज कर देते हैं। ढलते सूरज की तरह उसका महत्व छुप जाता है, लेकिन वह कम महत्वपूर्ण नहीं होता। जीवन में हर सूरज—चाहे वह उगता हो या ढलता हो—महत्वपूर्ण है।”
सतपाल ने धीरे से कहा, “मुझे याद है, मेरे बेटे ने पहली बार कोई पुरस्कार जीता था, पूरा मोहल्ला खुश था। पर अब जब वह बड़ा होकर संघर्ष कर रहा है, कोई उसकी मेहनत की सराहना नहीं करता। शायद यही कारण है कि लोग केवल शुरुआत को महत्व देते हैं, अंत को नहीं।”
अनिल ने कहा, “और यही जीवन की सच्चाई है। हम अपने करियर, अपने रिश्तों और अपने प्रयासों में अक्सर केवल शुरुआत की प्रशंसा करते हैं। लेकिन जैसे जैसे हम या हमारे प्रयास परिपक्व होते हैं, लोग नजरअंदाज कर देते हैं। यही असली चुनौती है—ढलते सूरज की तरह, अपनी मेहनत, अपनी कड़ी मेहनत और अपने अनुभव को मूल्यवान बनाना, भले ही कोई नोटिस न करे।”
किशोर ने अपने हाथ उठाए और कहा, “दोस्तों, यही कारण है कि मैं चाहता हूँ कि हम ढलते सूरज को भी सम्मान दें। अपने जीवन में अपने अनुभवों, संघर्षों और परिपक्वता की कद्र करें। उगते सूरज को देखकर प्रेरणा लो, लेकिन ढलते सूरज से सीखो कि स्थायित्व और शांति भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। हम सभी ढलते सूरज की तरह हैं—हमारी उम्र बढ़ती है, हमारी चुनौतियाँ बढ़ती हैं, लेकिन हमारा मूल्य और सुंदरता कम नहीं होती।”
चारों मित्र चुप हो गए। धीरे-धीरे, सूरज ढल रहा था, उसकी सुनहरी किरणें चारों के चेहरे पर पड़ रही थीं। उस क्षण उन्होंने महसूस किया कि ढलते सूरज की शांति और स्थिरता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी उसकी पहली किरण।
किशोर ने मुस्कराते हुए कहा, “आज, इस शाम, मैं सिर्फ उगते सूरज की पूजा नहीं करना चाहता। मैं ढलते सूरज को भी सम्मान देना चाहता हूँ—जैसे हम अपने जीवन के परिपक्व अनुभवों और संघर्षों को सम्मान देते हैं। यही जीवन की सच्ची समझ है।”
रमेश, सतपाल और अनिल ने सिर हिलाया। चारों ने न केवल सूरज को देखा, बल्कि उसकी ढलती सुंदरता और स्थिरता को भी महसूस किया। और उसी शाम, उन्होंने जीवन की यह गहरी सीख अपने दिल में उतार ली—हर सूरज, चाहे वह उगता हो या ढलता हो, समान रूप से महत्वपूर्ण है, और जीवन का असली सौंदर्य इसे समझने में है।
लघु कथा – 24
मेरे प्यारे बच्चों,
आज जब मैं तुम्हारे कमरे में तुम्हारे खिलौनों और किताबों को देखकर चुपचाप खड़ी थी, मेरे मन में यादों की एक धारा बह उठी। तुम्हारे छोटे कदम, तुम्हारी हँसी, तुम्हारे प्रश्न—सब मेरे सामने जीवित हो उठे। और मुझे एहसास हुआ कि समय कितनी तेजी से बदलता है। तुम्हारे लिए मैं हमेशा वहाँ रही, पर कभी-कभी मैं चाहती हूँ कि तुम मेरी भावनाओं को भी समझो।
बच्चों, मैं जानती हूँ कि कभी-कभी तुम सोचते हो कि मैं कहीं और अधिक व्यस्त या किसी और के साथ जुड़ी हुई हूँ। तुम यह महसूस कर सकते हो कि मेरा प्यार तुम्हारे लिए कम हो गया है। पर सच यह है कि मेरा प्यार तुम्हारे लिए हमेशा उतना ही गहरा, उतना ही अटूट रहा है। जीवन की चुनौतियाँ, उम्र का बोझ, स्वास्थ्य की छोटी परेशानियाँ—ये सब मेरे भीतर एक अलग तरह की जिम्मेदारी और अकेलापन ले आती हैं। मैं उसे संभालने की कोशिश करती हूँ ताकि जब मैं तुम्हारे पास रहूँ, तब पूरी तरह से तुम्हारे लिए रह सकूँ।
जीवन के इन बचे हुए वर्षों में मैंने अपने आप को ढालने की कला सीखी है। कभी-कभी यह तुम्हारे लिए अलगाव जैसा दिखता है, लेकिन यह केवल मेरा तरीका है खुद को मजबूत रखने का, ताकि मैं तुम्हारे लिए हमेशा सहारा बन सकूँ। तुम्हें मेरी कमजोरियाँ, मेरी थकान या मेरी व्यस्तता को समझना चाहिए, न कि उस पर नाराज़ होना।
तुम मेरे जीवन का सबसे कीमती हिस्सा हो। तुम्हारे लिए मैंने अपने सुख, अपने समय और अपनी ऊर्जा को हमेशा समर्पित किया। मेरी चिंता केवल तुम्हारे कल की नहीं, बल्कि तुम्हारे दिल और तुम्हारी आत्मा की भी है। और यही कारण है कि मैं चाहती हूँ कि तुम मेरी उपस्थिति और मेरी चुप्पी, दोनों को महसूस करो। मेरा साया तुम्हारे सिर पर है, और जब तक यह साया है, तुम्हारी दुनिया सुरक्षित है।
मुझे यह जानकर बहुत खुशी होती कि तुम मेरे साथ समय बिताना चाहते हो, मेरी बातों को सुनते हो और कभी-कभी बस मेरे पास बैठते हो। बच्चों, याद रखो—माँ का प्रेम न तो कभी घटता है, न कभी खत्म होता है। यह केवल अनुभव, समझ और समय के साथ और गहरा होता जाता है।
मैं जानती हूँ कि कभी-कभी मैं कठोर लगती हूँ, कुछ नियम बनाती हूँ या तुम्हारी आज़ादी में सीमाएँ डालती हूँ। यह सब तुम्हारे हित में ही है, ताकि तुम समझ सको कि जीवन केवल खुशियों का नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और अनुशासन का भी खेल है।
मेरे प्यारे बच्चों, मैं केवल एक माँ नहीं हूँ—मैं तुम्हारे जीवन की सबसे महत्वपूर्ण स्त्री हूँ। तुम्हारे अस्तित्व का हिस्सा हूँ, तुम्हारे अनुभव का साक्षी हूँ। इसलिए मेरा हाथ थामो, मेरी आँखों में देखो और जानो कि मेरा प्रेम हमेशा तुम्हारे लिए यहाँ है। समझो, समय बिताओ और मुझे महसूस करो, ताकि जब भी मैं तुम्हारे साथ रहूँ, वह पल केवल सुख और सुकून दे।
सदैव तुम्हारी,
माँ
लघु कथा – 23
अखिल अपनी छोटी सी टेबल पर बैठा था। कमरा सुनसान था। बाहर बारिश की हल्की बूँदें खिड़की पर गिर रही थीं, और उसका मन भीतर से और भी भारी महसूस कर रहा था। वह गहरे उदासी और आत्म-शंका में डूबा हुआ था। अखिल ने कल ही अपने पिता की आँखों में असंतोष देखा था, और आज उसने फैसला किया—जो मन में है, वह शब्दों में उतारेगा।
उसने कागज़ और कलम निकाले और लिखा:
“पापा,
मैं जानता हूँ कि आप मुझसे बहुत उम्मीदें रखते थे। मैंने हमेशा कोशिश की, लेकिन लगता है कि मैं वह नहीं बन पाया जो आप चाहते थे। मेरे अंदर वो दृढ़ता, वो सफलता, वो अनुशासन शायद नहीं था जो आप चाहते थे। और शायद इसी कारण मैं आज इस कागज़ पर अपनी भावनाएँ लिख रहा हूँ।
मुझे डर है कि आप निराश होंगे। मुझे डर है कि आप सोचेंगे—‘अखिल ने मेरे विश्वास को नहीं निभाया’। पापा, मैं जानता हूँ कि आप हमेशा चाहते थे कि मैं बेहतर बनूँ, कि मैं आपके सपनों को जीऊँ। लेकिन अब लगता है कि मैं वह नहीं बन पाया।
कभी-कभी मैं खुद से भी सवाल करता हूँ—क्या मैं आपके और खुद के मानकों पर खरा उतरा? क्या मैं वह बेटा बन पाया जो आप गर्व से अपने मित्रों और रिश्तेदारों के सामने पेश कर सकें? मेरे अंदर बहुत कुछ है, लेकिन लगता है कि वह पर्याप्त नहीं है।
पापा, शायद आपको मेरे इस पत्र से गहरा दुख होगा, लेकिन मैं चाहता हूँ कि आप जानें—मैं हर दिन कोशिश करता रहा। हर असफलता के बाद उठता रहा, हर गलती से सीखने की कोशिश की, पर फिर भी लगता है कि मैं आपके लिए, और खुद के लिए भी, पर्याप्त नहीं हूँ।
मैं जानता हूँ कि आप मुझसे बेहतर के हकदार थे। और शायद यही कारण है कि मैं खुद को इतना छोटा महसूस करता हूँ। मैं जानता हूँ कि आप हमेशा मेरे लिए सोचते हैं, मेरे भविष्य के बारे में चिंता करते हैं। शायद आज आपको यह पत्र पढ़कर लगे कि मैं असफल हूँ, लेकिन पापा, मेरे अंदर वह प्यार और सम्मान हमेशा रहा है जो आपको चाहिए।
मुझे सिर्फ यह डर है कि मैंने आपकी उम्मीदों को पूरा नहीं किया। मैं चाहता हूँ कि आप मुझे समझें। मैं अपनी सीमाओं को जानता हूँ, लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि आप हमेशा मेरे लिए वहाँ रहे हैं। मेरी असफलताओं के बावजूद, आपका प्यार और विश्वास मेरे लिए सबसे बड़ी ताकत है।
पापा, यह पत्र सिर्फ मेरी भावनाओं का इज़हार है। मैं जानता हूँ कि मैं गलतियाँ करता हूँ, और मैं हमेशा आपकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाता। लेकिन मैं हर दिन कोशिश करूँगा—खुद को बेहतर बनाने की, आपके विश्वास के योग्य बनने की।
आपका बेटा,
अखिल”
पत्र लिखते हुए अखिल की आँखों से आँसू टपकने लगे। उसने उसे लिफाफे में रखा और पिता के कमरे के पास रख दिया। वह जानता था कि यह पत्र केवल शब्दों का नहीं, बल्कि उसकी आत्मा का इज़हार था।
अखिल की उम्मीद थी कि पिता यह पत्र पढ़कर समझेंगे—कि वह चाहे कितना भी कमजोर या असफल दिखे, उसके भीतर उनकी उम्मीदों का सम्मान और प्यार हमेशा जीवित है। और शायद, यही शब्द उसके और पिता के बीच की दूरी को कम कर सकेंगे।
लघु कथा – 22
विक्रम की जिंदगी पिछले कुछ सालों से केवल संघर्ष और तनाव का नाम रह गई थी। वह एक छोटे से शहर में रहता था, जहाँ उसने अपने सपनों को पूरा करने के लिए कई उधार लिए थे। घर बनवाने के लिए, छोटे व्यवसाय को शुरू करने के लिए, बच्चों की पढ़ाई के लिए—हर कदम पर उसने ऋण लिया।
लेकिन अब वह ऋणों के जाल में फंसा हुआ महसूस करता था। बैंक के कॉल, सख्त नोटिस, और पैसे की कमी ने उसके मन को इतना बेचैन कर दिया था कि रातों को नींद नहीं आती थी। दिन में भी वह काम में ध्यान नहीं लगा पाता। हर समय सिर पर कर्ज का बोझ महसूस होता और दिल बेचैनी से भर जाता।
विक्रम अक्सर अपने दोस्तों से कहता,
“सब कुछ खत्म हो जाएगा। मैं अब संभल नहीं पा रहा हूँ। यह जीवन क्यों इतना कठिन है?”
एक दिन, विक्रम के पिता ने उसे देखकर चुपचाप उसके पास आकर बैठ गए।
“बेटा,” उन्होंने धीरे कहा, “जीवन तब सरल हो जाता है जब हम विरोध छोड़कर प्रवाह में जीते हैं। जैसे पानी धीरे-धीरे पत्थर को तराशता है, वैसे ही शांत मन और निरंतर प्रयास तुम्हारे जीवन का स्वरूप बदल सकते हैं।”
विक्रम ने सिर झुकाया, “लेकिन पापा, यह ऋण, यह दबाव… मुझे लगता है कि मैं डूब रहा हूँ। मैं कहाँ से शुरू करूँ?”
पिता ने हाथ से उसके कंधे को थपथपाया।
“सबसे पहले डर और विरोध को छोड़ो। हर ऋण, हर कठिनाई पर ध्यान न दो। पहले अपने मन को शांत करो। फिर कदम-दर-कदम योजना बनाओ। छोटे प्रयास भी निरंतर रहें, तो प्रवाह धीरे-धीरे दिशा बदल देता है।”
विक्रम ने उस रात पहली बार बिना बेचैनी के सोने की कोशिश की। सुबह उठकर उसने कागज़ और कलम लिया और अपनी सारी आर्थिक स्थिति लिखी। उसने ऋणों को प्राथमिकता के आधार पर बांटा—सबसे जरूरी से सबसे कम जरूरी तक। उसने देखा कि कुछ ऋण पर वह समय से निपट सकता था, कुछ के लिए उसे अतिरिक्त काम करना होगा।
विक्रम ने हर दिन एक योजना बनाई और उसका पालन किया। उसने छोटे व्यवसाय को व्यवस्थित किया, कुछ अतिरिक्त काम लिया और अपने खर्च पर नियंत्रण रखा। धीरे-धीरे, ऋणों का बोझ कम होने लगा।
सबसे महत्वपूर्ण बदलाव उसके मन में हुआ। पहले हर ऋण, हर नोटिस उसे तनाव और विरोध की ओर खींचता था। अब वह उन्हें चुनौती समझकर संयम और निरंतर प्रयास के साथ देखता। उसका मन शांत हुआ, और सोच स्पष्ट हुई।
कुछ महीनों बाद, विक्रम ने देखा कि न केवल आर्थिक स्थिति बेहतर हुई, बल्कि उसका जीवन भी संतुलित और सरल लगने लगा। वह समझ गया कि जीवन का असली परिवर्तन बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि मानसिक स्थिति और निरंतर प्रयास से आता है।
विक्रम ने पिता से मुस्कराते हुए कहा,
“आप सही कह रहे थे, पापा। जब मन शांत रहता है और निरंतर प्रयास होता है, तो कठिनाई भी मार्गदर्शक बन जाती है। जीवन वास्तव में प्रवाह में सरल हो गया है।”
और इसी समझ ने विक्रम को यह सिखाया—विरोध छोड़ दो, प्रवाह में जीओ, और लगातार प्रयास करते रहो। मुश्किल समय भी धीरे-धीरे रास्ता बनाता है।
लघु कथा – 21
अमर और नंदिनी की शादी को दस साल हो चुके थे। शुरुआत में सब कुछ सुंदर था—प्यार, हँसी, एक-दूसरे के लिए समझ और सहयोग। उनके जीवन में संतुलन था, और घर उनके लिए सुकून का ठिकाना था।
लेकिन समय के साथ चीजें बदलने लगीं। छोटे-छोटे बहसों की शुरुआत हुई—पहले खाना, फिर बच्चों की पढ़ाई, फिर परिवार और दोस्तों के मामले। कभी अमर की बातें नंदिनी को चुभतीं, कभी नंदिनी की नर्म टिप्पणियाँ अमर के दिल में चोट कर देतीं।
“तुम हमेशा अपने काम में व्यस्त रहते हो! क्या मुझे तुम्हारे साथ अकेले समय बिताने का कोई अधिकार नहीं?” नंदिनी ने एक दिन गुस्से में कहा।
अमर ने चुप रहकर जवाब दिया, “मैं मेहनत कर रहा हूँ ताकि हमारा घर चले, तुम्हें और बच्चों को सब मिले।”
लेकिन वह जवाब किसी को संतुष्ट नहीं कर पाया। बातचीत धीरे-धीरे बहस में बदल गई। हर छोटी बात पर आरोप, हर शब्द पर कटुता। प्यार की जगह तनाव, स्नेह की जगह ताने, और सुरक्षा की जगह डर आ गया।
एक शाम, नंदिनी और अमर फिर बहस कर रहे थे। बच्चों के कमरे में हल्की-हल्की हँसी सुनाई दे रही थी। अमर ने गहरी सांस ली और खुद से कहा,
“यह घर अब हमारे लिए सुकून का स्रोत नहीं रहा। यह हमारा तनाव, हमारी चोट बन गया है। सिर्फ शादी बचाना ही सब कुछ नहीं हो सकता—खुद को बचाना भी उतना ही जरूरी है।”
अमर ने शांत होकर नंदिनी से कहा,
“नंदिनी, मुझे लगता है कि हम दोनों अब अपने गुस्से और अपेक्षाओं में फंस गए हैं। यह रिश्ता प्यार और सुकून देने के लिए बना था। अगर अब यह दर्द और अपमान का कारण बन रहा है, तो हमें खुद के लिए भी सोचना होगा।”
नंदिनी की आँखों में आँसू थे। उसने धीरे से कहा,
“मैं जानती हूँ, हम दोनों प्यार करते थे… अभी भी करते हैं। लेकिन हमने खुद को और एक-दूसरे को चोट पहुँचाई है। शायद हमें कुछ समय अलग बिताना चाहिए, सोचने के लिए।”
दोनों ने फैसला किया कि कुछ समय के लिए अलग रहकर अपनी भावनाओं और जीवन के मूल्यों को समझेंगे। यह कोई तलाक या अलगाव नहीं था, बल्कि आत्म-प्रतिबिंब का समय था—अपने आप को जानने और समझने का।
कुछ हफ्तों बाद, दोनों ने देखा कि खुद को समझना और स्वीकारना कितना जरूरी था। अमर ने नंदिनी की अच्छाइयों और कमजोरियों को नए नजरिए से देखा। नंदिनी ने भी अमर की मेहनत और धैर्य की कद्र की।
इस छोटे से समय ने उन्हें यह सिखाया कि प्यार और रिश्ते केवल शादी में बँधकर नहीं टिकते। यह समझ, सम्मान और सुकून में टिकते हैं। और कभी-कभी, खुद को बचाना और सीमाएँ तय करना भी उतना ही जरूरी होता है जितना रिश्ते को बचाना।
अमर और नंदिनी ने धीरे-धीरे फिर साथ आने का निर्णय लिया—लेकिन अब बातचीत और प्यार के नए नियमों के साथ। उन्होंने जाना कि जो रिश्ता प्यार, सुकून और सुरक्षा देने के लिए बनाया गया था, अगर वही दर्द और अपमान का कारण बन जाए, तो सिर्फ शादी बचाना ही पर्याप्त नहीं—खुद को बचाना भी उतना ही जरूरी है।
और इस समझ ने उनका रिश्ता पहले से ज्यादा मजबूत और स्थिर बना दिया।
You must be logged in to post a comment.