91. सत्य की समझ

सत्य को समझने के लिए कान नहीं।
धैर्य की गहरी पहचान चाहिए।

शब्दों से ज्यादा चुप्पी बोलती है।
भीतर की आँखें खुली चाहिए।

जल्दी में सत्य नहीं मिलता है।
समय के साथ ही खिलता है।

हर बात सुनना जरूरी नहीं।
हर आवाज़ सच की धुरी नहीं।

मन को थोड़ा शांत करना है।
सच को भीतर से पढ़ना है।

गुस्से को धीरे छोड़ देना है।
समझ को आगे जोड़ देना है।

धैर्य ही सत्य की कुंजी है।
यही जीवन की असली पूंजी है।

सच का मार्ग कठिन जरूर है।
पर आत्मा का वही नूर है।

कानों से नहीं, मन से सुनो।
सत्य के दीपक भीतर चुनो।

धैर्य रखो, राह खुल जाएगी।
सत्य की महिमा समझ आएगी।

90. अच्छे लोगों की पहचान

अच्छे लोगों में एक खास बात होती है।
वो बुरे वक्त में भी अच्छे होते हैं।
दिल में उनके सच्चाई बसती है।
हर हाल में अच्छाई ही दिखती है।

क्रोध भी उनके आगे झुक जाता है।
धैर्य का दीपक जलता जाता है।
परिस्थिति चाहे कितनी भी कठिन हो।
उनका मन कभी नहीं दीन हो।

दूसरों का दर्द समझ लेते हैं।
खुशियाँ भी बाँट कर लेते हैं।
शब्दों में उनके मिठास रहती है।
नज़रों में सादगी खास रहती है।

नफ़रत से दूरी बनाए रखते हैं।
मोहब्बत को आगे बढ़ाए रखते हैं।
समय के साथ वो ढलते नहीं।
सच के रास्ते से हटते नहीं।

अच्छाई उनकी पहचान बनती है।
इंसानियत ही उनकी शान बनती है।
अंधेरे में भी रोशनी देते हैं।
अच्छे लोग यही संदेश देते हैं।

89. अंत का सच

अंत में कुछ भी ठीक नहीं होता।
अंत में सिर्फ अंत ही होता।

     किसी के सपनों का अंत होता है।
     किसी की उम्मीदों का अंत होता है।

किसी की भावनाएँ टूट जाती हैं।
यादें चुपचाप सो जाती हैं।

     किसी के किरदार का अंत होता है।
     कहानी का एक अध्याय बंद होता है।

समय अपने पंख समेट लेता है।
सच भी चुपचाप लेट जाता है।

     हँसी भी कहीं खो जाती है।
     आँखें बस नम हो जाती हैं।

जो था, वह पीछे रह जाता है।
जो है, वह भी बदल जाता है।

     सपनों की राहें मिट जाती हैं।
     इच्छाएँ धीरे थक जाती हैं।

अंत एक मौन सा संदेश है।
जीवन का अपना विशेष है।

     शुरुआत भी अंत में छुपी रहती है।
     नई कहानी फिर जन्म लेती है।

88. बोझ का सागर

हमेशा याद रखिए यह बात।
ज्यादा बोझ डुबो देता है साथ।
     क्रोध का बोझ मन पर मत रखो।
     शांति का दीपक भीतर ही रखो।

बदले की आग भी जलाती है।
धीरे धीरे आत्मा गलाती है।
     अभिमान का भार भारी होता है।
     अंत में सब बेकार होता है।

जो बोझ उठाए, वही थकता है।
समय के आगे सब झुकता है।
     हल्का मन ही आगे चलता है।
     सच का सूरज उसी में पलता है।

नफ़रत का बोझ मत ढोना कभी।
दिल को घायल मत करना सभी।
     मोहब्बत से राह आसान बनती है।
     जिंदगी खुद मुस्कान चुनती है।

छोड़ दो जो मन को भारी करे।
साधारण जीवन ही सार भरे।
     जो हल्का चले, वही जीतता है।
     शांति में ही जीवन जीता है।

87. सच की आवाज़

जब तुम उनकी भाषा में बोलने लगते हो।
लोग अपनी ही बात से चौंकने लगते हैं।

सच की चुभन भी हल्की नहीं होती है।
झूठ की नींद अचानक टूट जाती है।

जब जवाब आईना बनकर आता है।
चेहरा अंदर का सच दिखाता है।

अपने शब्द भी भारी लगने लगते हैं।
अपने ही तर्क टकराने लगते हैं।

सत्य की राह आसान कहाँ होती है।
हर आवाज़ सबको रास कहाँ होती है।

अपनी ही परछाईं से डर लगता है।
जब सच की किरणें भीतर जगता है।

लोगों को अपनी तारीफ पसंद होती है।
सच सुनने की हिम्मत कम होती है।

जब शब्द बराबरी से जवाब देते हैं।
अहंकार के पर धीरे टूटते हैं।

सच बोलना भी एक संघर्ष है।
खामोश रहना भी एक विकल्प है।

लेकिन सत्य कभी चुप नहीं रहता।
धीरे धीरे अपना मार्ग चुन लेता।

86. इंसान की परतें

किसी से मिलते ही फैसला ना किया करो।
     इंसान है, परतों में धीरे खुलता है।

पहली नज़र में सच कहाँ मिलता है।
     हर चेहरा अंदर कुछ और रखता है।

हँसी के पीछे भी दर्द छुपा रहता है।
     खामोश आँखों में शोर छुपा रहता है।

हर बात को समझने का वक्त चाहिए।
     हर राज़ को खुलने का हक चाहिए।

जल्दी में किसी को परखो मत।
     दिल की किताब यूँ ही पढ़ो मत।

हर शख्स कहानी लेकर चलता है।
     हर जख्म निशानी लेकर चलता है।

शब्दों से ज्यादा चुप्पी बोलती है।
     धीरे से ही सच्चाई खोलती है।

परत दर परत पहचान बनती है।
     समय से ही तस्वीर साफ़ होती है।

नफ़रत भी अक्सर डर से जन्मती है।
     मोहब्बत भी अंदर से ही पलती है।

धैर्य रखो, समझ बढ़ती जाएगी।
     इंसानियत खुद राह दिखाएगी।

85. आत्मा की पुकार

इस संसार में समय सीमित है।
भीतर की आवाज़ ही सही जीत है।
     हर किसी को खुश करना जरूरी नहीं।
    अपनी आत्मा को संतुष्ट करना ही सही।

लोगों की भीड़ बदलती रहती है।
उनकी सोच भी चलती रहती है।
     अपनी राह खुद चुननी होती है।
     दिल की बात भी सुननी होती है।

झूठी तारीफों का जाल न बुनो।
सच के दीपक मन में चुनो।
     दिखावे की दुनिया से दूर रहो।
     अपने सच्चे स्वरूप में ही रहो।

समाज की मंज़ूरी जरूरी नहीं है।
स्वाभिमान से बड़ी कोई खुशी नहीं है।
     अपनी शांति को मत खोना कभी।
     अंदर की रोशनी को संजोना सभी।

समय एक दिन चुपचाप जाएगा।
सिर्फ कर्म ही साथ निभाएगा।
     आत्मा संतुष्ट रहे यही प्रार्थना है।
     जीवन की सबसे बड़ी साधना है।

खुद से प्रेम करना सीख लो।
सच्चे सत्य को ही जी लो।

84. बुढ़ापे की खामोशी

बुढ़ापा एक ठहरा हुआ समंदर है।
     जहाँ लहरें कम, यादें ज्यादा हैं।

हर सवाल का जवाब भीतर रहता है।
     पर सुनने वाला कोई पास नहीं रहता है।

आँखों में बीते कल का साया है।
     हाथों में अनुभव की गहरी माया है।

कदम धीरे चलते, मन तेज भागता है।
     बीता बचपन फिर से पुकारता है।

चुप्पी भी अब दोस्त सी लगती है।
     रातें अक्सर लंबी सी लगती हैं।

पुरानी तस्वीरें मुस्कुराती हैं।
     खामोश कहानियाँ दोहराती हैं।

सपनों की उम्र अब थक गई है।
     इच्छाओं की दौड़ भी रुक गई है।

अपनों की भीड़ कम होती जाती है।
     यादों की दुनिया ही संग रह जाती है।

दिल में बातें बहुत छुपी रहती हैं।
     पर होंठों पर हँसी सजी रहती है।

समय अपने कदम धीरे रखता है।
     बुढ़ापा भीतर से चुपचाप बहता है।

हर उत्तर है, कोई प्रश्न नहीं है।
     फिर भी जीवन में पूर्ण विराम नहीं है।

83. वक्त का सफर

वक्त का काम है चुपचाप गुजर जाना,
अच्छा हो तो हँसकर, बुरा हो तो सह जाना।

सुख आए तो पल भर का मेहमान समझो,
दुख आए तो धैर्य का इम्तिहान समझो।

हर सुबह नई उम्मीद की कहानी लिखती है,
टूटे दिलों में भी खुशियों की रवानी दिखती है।

हवा के संग सपने भी उड़ते चले जाते हैं,
कुछ अपने भी रास्तों में बिछड़ते चले जाते हैं।

गिरकर ही इंसान चलना फिर सीखता है,
अंधेरे में भी रोशनी की उम्मीद रखता है।

शिकायतों का बोझ दिल पर मत रखना,
बीते कल को आँखों में मत बसाना।

आज को अपनाओ, मुस्कुराना सीखो,
छोटी खुशियों में भी जीना सीखो।

वक्त कभी रुकता नहीं किसी के लिए,
न दर्द के लिए, न खुशी के लिए।

जो बीत गया उसे जाने दो पीछे,
नए सपनों को आने दो धीरे-धीरे।

सब्र ही जीवन का सबसे बड़ा धन है,
यही आत्मा का सबसे पवित्र वचन है।

वक्त का खेल है, सबको बदल जाता है,
जो झुकता है वही आगे बढ़ पाता है।

अच्छा है तो शुक्र करो, बुरा है तो सब्र,
यही जीवन का सबसे सुंदर सबक।

82. मौन की शक्ति

उसकी ख़ामोशी भी किसी शोर से कम नहीं थी।
हर चुप्पी में एक अधूरी चीख छिपी रहती थी।

वह दर्द को अपने साथ ओढ़कर चलती रही।
आग में जलकर भी मुस्कान सँभालती रही।

हँसी उसके चेहरे का केवल एक आवरण थी।
अंदर भावनाओं का गहरा तूफ़ान चलता रहा।

हर रास्ते ने उसे थोड़ा मोड़ना चाहा।
पर उसकी हिम्मत ने कभी टूटना नहीं चाहा।

लोग उसे कमजोर समझने की भूल करते रहे।
क्योंकि वह अपनी आवाज़ धीमी रखती रही।

पर शांत लहरों की गहराई कौन समझ पाया?
समंदर की ताकत भी भीतर ही छुपी रही।

उसकी आँखों ने बहुत दर्द सहना सीख लिया।
शिकायत का रास्ता उसने चुनना नहीं सीखा।

जो उसके घावों की गहराई नहीं समझ सके।
उनके बीच भी वह आगे बढ़ती ही रही।

उसकी आत्मा शब्दों से भी आगे चलती थी।
मौन में भी वह अपना सत्य गढ़ती रही।

हर संघर्ष को उसने एक गीत बना लिया।
हर हार से नया साहस चुनती रही।

वह केवल एक स्त्री का किरदार नहीं थी।
वह खुद में एक संपूर्ण दुनिया बन गई थी।

बिना शोर किए अपनी पहचान रचती हुई।
इतिहास में अपनी अमर छाप छोड़ गई थी।

81. उड़ान का हल्का आकाश

अगर उड़ना है, तो वो सब छोड़ना होगा
जो आत्मा पर भारी बोझ बनकर बैठ गया है।

हर डर, हर पछतावा, हर अधूरा वादा
जो अब साँस लेने की ताकत खो चुका है।

तुम भारी पैदा नहीं हुए थे कभी,
तुम्हें दुनिया ने भारी होना सिखा दिया।

अब समय है खुद को हल्का करने का,
अब समय है डर को पीछे छोड़ देने का।

जो दर्द अब कुछ नया नहीं सिखाता,
उसे चुपचाप विदा करने का समय है।

जो डर आगे बढ़ने से रोकता है,
उसे अपनी राह से हटाने का समय है।

उड़ान भागना नहीं, समझ का विस्तार है,
जहाँ यादें बोझ नहीं, हवा का आकार हैं।

कुछ छोड़ने से खाली नहीं हुआ जाता,
बल्कि खुद को फिर से पाया जाता है।

भरोसा रखो इस जीवन के सफर पर,
जो सच में तुम्हारा है, वह नहीं जाएगा।

छोड़ देने से अपना खोता नहीं कभी,
सच अपना रास्ता खुद बना जाएगा।

80. खुश रहने का शांत निर्णय


खुश रहो, क्योंकि दुखी रहकर दुख कम नहीं होता।
दुख बस भीतर-भीतर अपनी जड़ें गहरी करता जाता है।

दुख चिल्लाने से नहीं, समझने से थोड़ा शांत होता है।
आँसुओं से नहीं, स्वीकार करने से हल्का होता है।

जो मिला नहीं, उसकी सूची बहुत लंबी हो सकती है।
पर जो मिला है, वही जीवन की असली पूँजी है।

हर रात अँधेरा ही नहीं, कुछ उम्मीद भी साथ लाती है।
हर मौन हार नहीं, कुछ उत्तर मौन में ही जन्म लेते हैं।

खुश रहना कोई बड़ा उत्सव नहीं होता।
यह खुद को टूटकर भी संभालने का निर्णय होता है।

दर्द रहेगा, पर वह जीवन का मालिक नहीं बनेगा।
स्मृतियाँ रहेंगी, पर भविष्य वे तय नहीं करेंगी।

मुस्कान दुख का इनकार नहीं होती।
मुस्कान दुख पर जीत का सबसे शांत तरीका होती है।

आँसू आएँ, पर मन को बंद न करें।
समय आएगा और घाव भी भर जाएगा।

खुद से प्रेम करना सबसे बड़ी समझदारी है।
छोटी खुशियों में भी जीवन खोज लेना चाहिए।

अंधेरे में भी रोशनी की एक उम्मीद रखना चाहिए।
खुश रहना एक शांत और सुंदर निर्णय है।

79. खाली जेब का शोर

भटक रहे बंद गिरधारी, न गठरी भारी, न जेब भरी।
हाथ खाली, माथा तना, पर शोर ऐसा जैसे दौलत खड़ी।

न लुटिया उनकी, न थाली, न घर में दाल मसाली।
मंच सजा, माइक खड़ा, आवाज़ ऊँची, बात निराली।

चौराहे पर खड़े होकर बोले—”लूट मची है भारी!”
भीड़ ने पूछा—”किसकी?” बोले—”हमारी, बस हमारी!”

किसने लूटा? कब लूटा? माल कहाँ पर गया सारा?
बोले मुस्काकर—”अंधेरे में था कोई अपना प्यारा।”

गली-गली पोस्टर चिपके, आँसू जैसे फोटोशॉप किए।
कैप्शन लिखा—”न्याय चाहिए”, नीचे सिग्नेचर कई लिए।

कुर्सी को जो कल तक माँ कहते, आज ज़मीन पर रोते हैं।
ज़मीन खिसकने का डर दिखाकर नए बहाने बोते हैं।

कल तक जिनके जेब में हाथ थे अपने आराम से।
आज वही चिल्ला रहे हैं—”सपने कटे हैं काम से!”

न बटुआ गया, न पोटली, न चप्पल गई, न रूमाल।
दर्द ऐसा जताया जैसे गिर गया इतिहास का लाल।

एक बोला—”हम ईमानदार थे, जनाब!”
पीछे से आवाज़ आई—”तभी बदला जनता का हिसाब!”

फिर शुरू हुआ भाषण भारी, आँकड़े, इतिहास पुराना।
साथ आँसू, थोड़ी गाली, भविष्य का डर दिखाना।

भीड़ में बच्चा बोला—”चोरी क्या होती है चाचा?”
चाचा बोले—”जब वोट न मिले, वही समझो माचा!”

कोई बोला—”जनता नासमझ है, जनता बहक गई!”
किसी ने कहा—”शायद हमारी समझ ही थक गई।”

हवा में हाथ, ज़मीन पर पैर, आँखों में साज़िश धूल।
हर हार के बाद उगता है नया ‘चोरी’ वाला फूल।

रात को स्टूडियो में बैठकर फिर वही कहानी कहते।
एंकर पूछे—”सबूत?” वो बोले—”भावना को सबूत कहते!”

तालियाँ बजीं, विज्ञापन आया, तर्क को मिली सजा।
सुबह फिर चौराहा, फिर माइक, फिर वही पुराना मज़ा।

गिरधारी फिर भटके हुए, जिनके पास कुछ था नहीं।
पर शोर ऐसा जैसे दुनिया की सारी कुर्सी वही कहीं।

कविता हँसकर पूछे—अगर जेब ही खाली थी भाई।
तो चोरी कहाँ से हुई, इतना शोर क्यों मचाई?

सच अगर हल्का था इतना, तो आवाज़ भारी क्यों लगाई?
दर्द अगर अपना था, तो दुनिया पर कहानी क्यों बनाई?

खाली हाथों का भी कभी इतना अहंकार कहाँ होता।
सच अगर कमजोर हो तो इतना प्रचार कहाँ होता।

भटके हुए शब्द भी कभी खुद का बोझ ढोते हैं।
और झूठ के पहाड़ अक्सर शोर में ही सोते हैं।

78. जिंदगी से एक खामोश बातचीत

ज़िंदगी से कभी बहुत ज्यादा नहीं माँगा मैंने।
न सोने का ताज, न हर दिन की जीत माँगी मैंने।

बस सुबह आँख खुलने की एक वजह चाही।
और रात सोते समय हल्का दिल चाहा।

कभी ज़िंदगी ने मुस्कान उधार दे दी।
कभी आँखों में चुपचाप आँसू रख दिए।

कभी हाथ थाम लिया, कभी अकेला छोड़ दिया।
पर हर दिन मुझे थोड़ा और मजबूत बना दिया।

भीड़ में एक ऐसा चेहरा चाहिए था।
जहाँ कमज़ोरी दिखाना भी आसान लगे।

जहाँ बिना बोले भी समझ मिल जाए।
जहाँ दिल का बोझ हल्का हो जाए।

मैंने दोस्ती माँगी थी इस दुनिया से।
किस्मत ने दिलों की बारात भेज दी।

कुछ लोग हँसी से पहले चुप्पी समझ गए।
कुछ लोग दर्द के पीछे छिपी बात पढ़ गए।

कुछ रिश्ते अचानक नहीं आते जीवन में।
वे धीरे-धीरे खून की धड़कन बन जाते हैं।

पहले नाम बनते हैं, फिर आदत बन जाते हैं।
फिर एक दिन हमारी ज़रूरत बन जाते हैं।

जब दुनिया सवालों की भाषा बोलती है।
तब यही लोग जवाब बनकर खड़े रहते हैं।

जब रास्ते टूटकर अंधेरा बना देते हैं।
तब यही लोग कंधों का पुल बना देते हैं।

भरोसा कोई तैयार खरीदी चीज नहीं है।
यह समय की आग में तपकर बनता है।

मुसीबत की बारिश में भीगकर निखरता है।
टूटने से पहले खुद को बचाता है।

हमारे रिश्ते इत्र की खुशबू जैसे नहीं।
दबाव में महकें और जल्दी खत्म हो जाएँ।

यह रिश्ते बारिश की बूंदों जैसे हैं।
गिरकर मिट्टी में नया जीवन उगाएँ।

यह साथ किसी कागज़ का समझौता नहीं।
जिसे समय आसानी से मिटा सके।

यह वह एहसास है जो गिरने से पहले।
हमें चुपचाप संभाल लेना जानता है।

अगर जीवन थका देने लगे कभी।
तो यही लोग आराम बनकर आते हैं।

अगर डर दिल को घेरने लगे कभी।
तो यही लोग हौसला बनकर गूंजते हैं।

हम सिर्फ अच्छे दिनों के साथी नहीं।
हम बुरे समय की असली पहचान हैं।

हम हँसी में भी साथ मुस्कुराते हैं।
और आँसुओं में भी बराबर खड़े हैं।

यह रिश्ता केवल साँसों तक नहीं रहता।
यह यादों की दुनिया में भी जीवित रहता है।

जीवन के साथ भी चलता हुआ मिलता है।
और जीवन के बाद भी कहानी बन जाता है।

क्योंकि कुछ लोग ईश्वर का जवाब होते हैं।
उन दुआओं का जो हमने कभी माँगी ही नहीं।

77. डायरी के अधूरे पन्ने

जीवन से बड़ी माँग नहीं की कभी।
हर सुबह जीत की ज़िद नहीं की कभी।

जो मिला, उसे सच्चा ही माना।
जो गया, उसने कुछ सिखाया माना।

ज़िंदगी ने सुनी भी, अनसुनी भी की।
खुशी कभी दी, कभी सन्नाटा दिया।

हथेली में कभी रोशनी रख दी।
कभी खाली चुप्पी भी दे दी।

हर दिन नया अध्याय बनकर आया।
कुछ हँसकर खुला, कुछ आँखें भिगो गया।

हर पन्ना मुझे थोड़ा इंसान बना गया।
हर अनुभव समझ का बीज बो गया।

भीड़ नहीं, बस सच्चा साथ चाहिए।
शोर नहीं, बस शांत रिश्ता चाहिए।

बिना बुलाए पास बैठने वाला चाहिए।
बिना कहे दिल पढ़ने वाला चाहिए।

दोस्ती नाम की सूची दिलों की मिली।
मेरी थकान पहचानने वाले लोग मिले।

कामयाबी से पहले दर्द समझने वाले मिले।
चुप्पी के भीतर मुझे पढ़ने वाले मिले।

कुछ लोग साँसों की आदत बन जाते हैं।
धीरे-धीरे दिल के करीब आ जाते हैं।

हर रोज़ बात जरूरी नहीं होती है।
पर बात न हो तो दिन अधूरा होता है।

बड़े वादों का बोझ हमने नहीं रखा।
खाली कसमों का शोर हमने नहीं रखा।

मुश्किल समय में बस साथ खड़े रहे।
पीछे हटने का रास्ता हमने नहीं रखा।

भरोसा बाजार से खरीदा नहीं जाता।
गलतफहमियों की धूप में बनता जाता।

मुसीबत की बारिश में भीगकर पनपता।
टूटकर भी हर बार खड़ा होता जाता।

कुछ रिश्ते इत्र जैसे जल्दी उड़ जाते।
कुछ रिश्ते मिट्टी की खुशबू बन जाते।

थोड़े भारी, पर जीवन उगाने वाले।
गिरकर भी फिर से उठ जाने वाले।

दुनिया उँगली उठाए तो कंधा मिलता है।
आत्मविश्वास टूटे तो हौसला मिलता है।

साथ किसी कागज़ का वादा नहीं है।
यह दिलों की मौन सहमति है।

रात की खामोशी में साथ वही होता है।
जब मन प्रश्नों से घिरा होता है।

नींद जब भविष्य से डर जाती है।
तब अपना पास चुपचाप बैठा होता है।

साथ घड़ी की सुइयों से नहीं चलता।
यह यादों की रफ्तार से बढ़ता चलता।

कुछ लोग वर्तमान में साथ रहते हैं।
कुछ दिल के भीतर हमेशा बसते हैं।

यह रिश्ता जीवन से आगे भी चलता है।
कहानियों और यादों में भी पलता है।

कुछ लोग प्रार्थनाओं का उत्तर होते हैं।
जो शब्दों में कभी कहा नहीं जाता है।

76. साथ का एहसास

ज़िंदगी से हर रोज़ कोई बड़ा इनाम नहीं माँगा हमने,
कभी मुस्कान चुनी, कभी हालात को थामा हमने।

धूप के कुछ लम्हे आए, कुछ छाँव में बदल गए,
हर दिन जीने का एक नया बहाना ढूँढा हमने।

बस एक सच्चे कंधे की तलाश इस सफर में रही,
जहाँ चुप होकर भी दिल की बात कही जा सके।

भीड़ के शोर में भी कोई अपना मिले,
जो बिना कहे हर दर्द समझ सके।

दोस्ती शर्तों की नहीं, भरोसे की डोर है,
यहाँ हर रिश्ता वक़्त की कसौटी पर कमजोर नहीं।

पहले साथ चलकर देखा जाता है हर मोड़ पर,
फिर दिल बिना सवालों के सौंप दिया जाता है।

यह रिश्ता इत्र की खुशबू जैसा नहीं जो खत्म हो जाए,
यह तो साँस है जो मुश्किलों में भी चलती जाए।

यह काग़ज़ पर लिखा वादा नहीं जो मिट जाए,
यह वो एहसास है जो हर समय साथ निभाए।

अगर ज़िंदगी सवाल बने, तो ये लोग जवाब बन जाएँ,
अंधेरे रास्तों में भी रोशनी की तरह फैल जाएँ।

हम हँसी में ही नहीं, खामोशी में भी साथ हैं,
आज की कहानी और कल के हालात हैं।

यह रिश्ता साँसों तक नहीं, यादों में भी जिंदा है,
कुछ लोग दुआ बनकर ज़िंदगी से आगे भी साथ हैं।

75. जीवन का मौन संघर्ष

पचपन पार का मर्द चुपचाप जीवन चलता रहता
कनपटियों पर सफेदी उम्र का संगीत सुनाती है
कंधों पर जिम्मेदारी का भारी पहाड़ टिका है
चेहरे की झूठी मुस्कान दर्द छिपाकर रखती है

अधूरे सपने दिल के अंदर कहीं दबे रहते
परिवार की खुशियों में खुद को मिटाता रहता है
समय की धारा में वह धीरे धीरे बहता है
जो नहीं मिला अपनों को दिलाने की ठानता

दिन भर दुनिया से लड़कर थककर टूट जाता
शाम को घर की चौखट पर वापस लौट आता
बच्चों के सवालों के बीच खुद को पाता है
कभी मुस्कुराता है कभी चुपचाप खामोश रहता

“पापा ये लाए वो क्यों नहीं” वह सुनता
जेब का खालीपन शब्दों में कभी नहीं कहता
प्यार से समझाता है कभी डाँट भी देता
आँख का आँसू अंदर ही अंदर पी लेता

पत्नी की बातें घर की चिंता बन जाती
बच्चों की परवरिश पर हर दिन बहस चलती
पड़ोस की बातें भी चुपचाप सह लेता
हर ज़हर जीवन का वह पानी संग पीता

हलाहल पीकर भी नीलकंठ जैसा बन जाता
जीने की चाह में खुद को ही जलाता
रात को बिस्तर पर थककर सो जाता
सुबह फिर सूरज बनकर उठना पड़ता

घर चलता रहे यही उसकी जिम्मेदारी रहती
बच्चों का सपना पूरा करना उसकी नियति
अपनों की खुशी में अपनी खुशी छिपाता
यही जीवन है मर्द चुपचाप जीता जाता

74. यारियाँ जीवन की सबसे बड़ी पूँजी

विवाह के बाद जीवन जिम्मेदारियों में ढल गया,
सपनों का विस्तृत आकाश थोड़ा-सा सिकुड़ गया।

बच्चों की हँसी में अपना बचपन जीता रहा,
घर-परिवार के लिए हर दर्द भी पीता रहा।

उम्र बढ़ी, काम और संघर्ष के दिन भी बीत गए,
अपने-पराये रिश्ते भी धीरे-धीरे छूट गए।

साथी, सहकर्मी और दुनिया ने पहचानना कम किया,
जैसे मैं कभी वहाँ था ही नहीं—ऐसा भ्रम दिया।

पर कुछ दोस्त समय की धूप-छाँव में भी साथ रहे,
दिल के गहरे कोनों में वही सदा खास रहे।

ना दोस्ती बूढ़ी हुई, ना यारियाँ रिटायर हुईं,
खुशी और गम की हर घड़ी में वही सहायक हुईं।

तूफानों में कभी नाव बने, कभी पतवार बने,
मुश्किल रास्तों में वही सबसे बड़े हथियार बने।

दूर होकर भी जो दिल के भीतर धड़कते रहे,
मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी दौलत वही बने।

जिम्मेदारियाँ निभाओ, परिवार का मान रखो,
पर सच्ची दोस्ती को हर हाल में पहचान रखो।

उम्र के हर मोड़ पर यारों का साथ संभालो,
थोड़े ही सही, मगर सच्चे दोस्त साथ पालो।

यही जीवन की सबसे अनमोल बचत है,
सच्चे दोस्तों में ही बसती असली जिंदगी है।

73. बच्चों को आज जी लेने दो

आज बच्चों को शोर मचाने दो,
     खुलकर हँसने और गाने दो।

कल जब ये बड़े हो जाएँगे,
     खामोश ज़िंदगी बिताएँगे।

गेंदों से शीशे तोड़ भी लेने दो,
     शरारतों में थोड़ा खो लेने दो।

कल जब ये बड़े हो जाएँगे,
     दिल तोड़ेंगे या खुद टूट जाएँगे।

बोलने दो इन्हें बेहिसाब आज,
     शब्दों की न रुकने दो कोई आवाज़।

कल जब ये बड़े हो जाएँगे,
     शायद इनके होंठ भी सिल जाएँगे।

दोस्तों संग छुट्टियाँ मनाने दो,
     खेल-खेल में दिन बिताने दो।

कल जब ये बड़े हो जाएँगे,
     दोस्ती और छुट्टी को तरस जाएँगे।

भरने दो सपनों की ऊँची उड़ान,
     आकाश छूने का दे दो अरमान।

कल जब ये बड़े हो जाएँगे,
     परिंदों की तरह इनके पंख कट जाएँगे।

बनाने दो काग़ज़ की छोटी कश्ती,
     बचपन में बसती है ऐसी मस्ती।

कल जब ये बड़े हो जाएँगे,
     ऑफिस के काग़ज़ों में खो जाएँगे।

खाने दो जो दिल चाहे इनका,
     रोक-टोक से न बांधो सपना।

कल जब ये बड़े हो जाएँगे,
     हर निवाले की कीमत गिनाएँगे।

रहने दो इन्हें आज मासूम सदा,
     बचपन की दुनिया रहे आबाद सदा।

कल जब ये बड़े हो जाएँगे,
     ये भी “समझदार” कहलाएँगे।

आज इन्हें खुलकर जी लेने दो,
     खुशियों की बारिश में भीग लेने दो।

कल की चिंता अभी मत लाओ,
     मासूम पलों को यूँ ही मुस्काने दो।

इनकी हँसी में दुनिया बसती है,
     इनकी खुशी में जीवन की शक्ति है।

बचपन का हर पल अनमोल है,
     यही जीवन की सच्ची भक्ति है।

आज इन्हें उड़ने का अधिकार दो,
     सपनों को साकार करने का प्यार दो।

कल क्या होगा किसे पता है,
     आज बस बचपन को स्नेह अपार दो।

72. प्रभु, बुढ़ापा ऐसा देना

प्रभु, बुढ़ापा ऐसा देना कि जीवन सरल बना रहे,
हलवा-पूरी भी गटक सकूँ और चना भी चबा रहे।

मेरे तन की शुगर कभी भी बढ़ने न पाए,
जुबाँ की मिठास हमेशा यूँ ही कायम रह जाए।

तन का लोहा ठीक रहे, मन में भी शक्ति बनी रहे,
जीवन की हर चुनौती से लड़ने की हिम्मत जगी रहे।

चलूँ हमेशा सीधा-सादा, कमर कभी न झुक जाए,
यारों की हँसी-ठिठोली और मेल-जोल कभी न रुक पाए।

मस्त-मौला बनकर जीऊँ मैं अपने हर दिन और रात,
प्रभु, ऐसा बुढ़ापा देना जिसमें खुशियों की हो बात।

आँखों पर भले ही चश्मा हो, पर पढ़ सकूँ अख़बार,
टीवी की दुनिया भी समझ सकूँ, बना रहे ज्ञान का आधार।

पास हों या फिर दूर रहें मेरे प्रिय मित्र सभी,
बातचीत का सिलसिला रहे, टूटे न अपनापन कभी।

चाट-पकोड़ी, पानी-पूरी का स्वाद भी लेता रहूँ,
चटखारे लेकर जीवन के हर पल को जीता रहूँ।

बीमारी और कमजोरी मुझसे दूर ही रहें सदा,
मेरे जीवन में न आए कोई भारी चिंता या व्यथा।

सावन हरा-भरा रहे और भादों भी सूखा ही रहे,
मन के भीतर शांति का मीठा सा दीपक जलता रहे।

जीवन की शैली पर कोई भी प्रतिबंध न लग पाए,
अपनों के संग हँसते-हँसते जीवन यूँ ही कट जाए।

जीवनसाथी साथ चले, हर सुख-दुख में हाथ रहे,
दोनों मुस्काते रहें, प्रेम का आशीर्वाद साथ रहे।

आत्मसम्मान से कभी भी समझौता न करना पड़े,
अपने सिद्धांतों के आगे सिर कभी न झुकाना पड़े।

जो भी लिखा है भाग्य में, वही स्वीकार कर सकूँ,
जो होना है जीवन में, शांति से उसे सह सकूँ।

ऐसी करनी करूँ कि गर्व से सबको निहार सकूँ,
हर किसी से प्रेमभाव से आँखें मिलाकर बात कर सकूँ।

प्रभु, ऐसा बुढ़ापा देना जिसमें चिंता न सताए,
हृदय में सदा सुकून और संतोष का दीप जलाए।

जीवन के अंतिम पड़ाव पर भी मुस्कान बनी रहे,
आपकी कृपा से मेरी हर साँस सुगम बनी रहे।

बस यही विनती है मेरी, यह दुआ स्वीकार करना,
प्रभु, मुझे ऐसा सुंदर, स्वस्थ बुढ़ापा देना।