रवि और अमन बचपन के दोस्त थे। एक ही गली में पले, एक ही स्कूल में पढ़े और आज भी उसी शहर में रहते थे, बस ज़िंदगी उन्हें अलग-अलग रास्तों पर ले आई थी। रवि अब एक प्राइवेट कंपनी में मैनेजर था, और अमन एक छोटा-सा चाय का ठेला चलाता था। पैसे और हैसियत में फर्क आ गया था, पर दोस्ती अब भी वैसी ही थी।
एक शाम दोनों नदी किनारे बैठे थे। सूरज ढल रहा था और पानी पर सुनहरी रोशनी बिखरी हुई थी। अमन ने चाय का कुल्हड़ रवि की तरफ बढ़ाया और बोला,
“यार, लोग कहते हैं—बेकसूर कौन होता है इस ज़माने में… बस सबके गुनाह पता नहीं चलते।”
रवि कुछ देर चुप रहा। फिर बोला,
“सच है। लोग दूसरों को जल्दी जज कर लेते हैं, पर अपने गुनाहों पर परदा डाल लेते हैं।”
अमन हँसा नहीं, बस गहरी साँस ली।
“तुझे पता है, लोग मुझे बड़ा सीधा समझते हैं। पर सच ये है कि मैं भी कभी बहुत गलत रास्ते पर था।”
रवि चौंका, “तू? तुझसे ज़्यादा शरीफ आदमी मैंने नहीं देखा।”
अमन ने नदी की तरफ देखते हुए कहा,
“शरीफ इसलिए हूँ क्योंकि मैंने गलत करके देख लिया है। कॉलेज के दिनों में मैं गलत संगत में पड़ गया था। छोटे-मोटे चोरी-चकारी, झूठ, और धोखा—सब किया। एक दिन एक आदमी की वजह से जेल जाते-जाते बचा। उसी रात मैंने खुद से कहा—बस, अब और नहीं।”
रवि को यकीन नहीं हो रहा था।
“पर किसी को पता क्यों नहीं चला?”
अमन मुस्कराया, “क्योंकि हर गुनाह शोर नहीं मचाता। कुछ चुपचाप इंसान के अंदर दब जाते हैं।”
अब रवि भी कुछ बेचैन हो गया। थोड़ी देर बाद बोला,
“तूने अपनी बात कह दी… अब मेरी सुन। लोग मुझे सफल और ईमानदार समझते हैं। पर सच ये है कि मेरी तरक्की में एक झूठ शामिल है।”
अमन ने उसकी तरफ देखा।
“कैसा झूठ?”
रवि बोला,
“एक बार ऑफिस में मेरे सीनियर ने गलती की थी। मैंने उसे सुधार दिया, पर सामने ऐसा दिखाया जैसे वो मेरी मेहनत थी। प्रमोशन मुझे मिल गया। वो आदमी कुछ नहीं बोला, पर उसकी आँखों में मैंने खुद को गिरते देखा।”
अमन ने धीरे से कहा,
“तो फिर तू खुद को बेकसूर समझता है?”
रवि ने सिर हिला दिया,
“नहीं। पर दुनिया मुझे बेकसूर मानती है।”
दोनों कुछ देर चुप बैठे रहे। हवा में सिर्फ नदी की आवाज़ थी।
अमन बोला,
“शायद इसी लिए कहा जाता है—इस ज़माने में बेकसूर कोई नहीं होता। फर्क बस इतना है कि किसी के गुनाह दिख जाते हैं, और किसी के छुपे रह जाते हैं।”
रवि ने कहा,
“पर क्या गुनाह छुपा लेने से वो खत्म हो जाता है?”
अमन ने मुस्कराकर जवाब दिया,
“नहीं। वो इंसान के अंदर रहकर उसे खाता रहता है, जब तक वो खुद को माफ़ नहीं कर ले और सुधर न जाए।”
रवि ने गहरी साँस ली।
“मैं उस आदमी से माफी माँगना चाहता हूँ।”
अमन ने उसका कंधा थपथपाया,
“और मैं चाहता हूँ कि मेरी पुरानी गलतियों से कोई और न भटके। इसलिए मैं बच्चों को मुफ्त में पढ़ाता हूँ, ताकि वो वो रास्ता न चुनें जो मैंने चुना था।”
शाम गहरी हो गई थी। दोनों उठने लगे।
रवि बोला,
“आज समझ आया—बेकसूर होना शायद नामुमकिन है, पर अपने गुनाहों को पहचानकर बदल जाना मुमकिन है।”
अमन हँसा,
“हाँ दोस्त, गुनाह छुपाने से आदमी बड़ा नहीं बनता, उन्हें स्वीकार करके सुधरने से बनता है।”
दोनों अलग-अलग रास्तों पर चले गए, पर दिल में एक ही बात लेकर—
कि इस दुनिया में असली बहादुरी गुनाह न करना नहीं,
बल्कि गुनाह करके भी इंसान बने रहना है।
Author: Rajeev Verma
लघु कथा – 59
सतीश और कंचन की मुलाकात किसी फिल्मी मोड़ पर नहीं हुई थी, न ही किसी बड़े आयोजन में। दोनों एक छोटे-से कस्बे की लाइब्रेरी में मिले थे। सतीश हर शाम वहाँ किताबें पढ़ने आता था और कंचन वहीं बच्चों को पढ़ाने के लिए नोट्स तैयार करती थी। दोनों एक-दूसरे को रोज़ देखते थे, पर कभी ज़्यादा बात नहीं हुई।
सतीश शांत स्वभाव का था। न दिखावा, न शोर। वह न किसी से अपनी तारीफ करवाता, न खुद को खास साबित करने की कोशिश करता। लोग उसे साधारण समझते, पर उसके भीतर गहराई थी। वह हर काम पूरे मन से करता—चाहे किसी बूढ़े को सड़क पार करानी हो या लाइब्रेरी की टूटी कुर्सी ठीक करना।
कंचन ने यह सब चुपचाप देखा। उसे सतीश में कोई चमक-दमक नहीं दिखती थी, पर एक सुकून ज़रूर महसूस होता था। एक दिन उसने खुद ही बात शुरू की,
“आप रोज़ यहाँ आते हैं, पर कभी बात नहीं करते।”
सतीश मुस्कराया, “किताबों से बात हो जाती है, इंसानों से धीरे-धीरे होती है।”
इसके बाद बातचीत बढ़ने लगी। कंचन को पता चला कि सतीश एक स्कूल में पढ़ाता है और अपने बूढ़े माता-पिता का बहुत ध्यान रखता है। वह ज़्यादा बोलता नहीं, पर जो कहता है, सच कहता है। न वादों की बारिश, न मीठे-मीठे झूठ।
एक बार कंचन बीमार पड़ गई। कई दिन लाइब्रेरी नहीं आई। सतीश ने बच्चों से पता लगवाया और उसके घर तक किताबें छोड़ आया, बिना किसी दिखावे के। दरवाज़े पर बस इतना कहा,
“पढ़ने की आदत मत छोड़ना, जल्दी ठीक हो जाओ।”
कंचन को उस दिन समझ आया कि सतीश उन लोगों में से है जिन्हें तारीफ की ज़रूरत नहीं होती। वह वही करता है जो सही लगता है, चाहे कोई देखे या न देखे।
समय के साथ दोनों करीब आए। पर उनका रिश्ता शोर भरा नहीं था। न रोज़ “आई लव यू”, न बड़ी-बड़ी बातें। बस साथ बैठकर चाय पीना, एक-दूसरे की चुप्पी समझना और मुश्किल में बिना कहे साथ खड़े हो जाना।
एक दिन कस्बे में एक बड़ा अफसर आया। सब लोग उसकी खुशामद में लगे थे। सतीश को भी बुलाया गया। उसने सीधे कहा,
“मैं अपनी ड्यूटी करूँगा, चापलूसी नहीं।”
लोगों ने उसे घमंडी कहा, पर कंचन ने उस दिन उसकी आँखों में सच्चाई देखी।
कंचन ने उससे कहा,
“आपको बुरा नहीं लगता जब लोग आपकी तारीफ नहीं करते?”
सतीश ने हल्के से कहा,
“सच्चे लोग तारीफ के मोहताज नहीं होते। जैसे असली फूलों पर कभी इत्र नहीं लगाया जाता। उनकी खुशबू अपने आप होती है।”
वह बात कंचन के दिल में बस गई।
कुछ महीनों बाद दोनों ने शादी करने का फैसला किया। न कोई बड़ा समारोह, न दिखावा। बस परिवार, कुछ दोस्त और सादा-सा जीवन।
शादी के बाद भी कुछ नहीं बदला। सतीश वही शांत, सच्चा इंसान रहा। कंचन ने महसूस किया कि प्यार शोर नहीं करता, बस साथ चलता है। वह समझ गई कि असली प्यार वो नहीं जो सबको दिखे, बल्कि वो है जो बिना बोले निभे।
लोग आज भी कहते हैं, “सतीश बहुत साधारण है।”
और कंचन मुस्कराकर सोचती है—
“हाँ, बिल्कुल असली फूल की तरह…
जिसे इत्र की ज़रूरत नहीं होती।”
लघु कथा – 58
शहर के पुराने हिस्से में एक छोटा-सा घर था, जहाँ मदम और सुनित अपने दो बच्चों के साथ रहते थे। घर साधारण था, पर सपने बड़े थे। मदम एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था और सुनित गृहिणी थी। बाहर से देखने पर सब ठीक लगता था, पर भीतर धीरे-धीरे दरारें पड़ रही थीं।
सुनित बहुत भावुक थी, पर समझदारी में कमजोर। छोटी-छोटी बातों को दिल पर ले लेती। अगर मदम देर से आता, तो वह सोचती—“शायद अब उसे मेरी परवाह नहीं।” अगर सास ने कुछ कह दिया, तो उसे लगता—“इस घर में मेरी कोई इज्जत नहीं।” वह बिना सोचे-समझे बोल जाती, कभी बच्चों के सामने, कभी पड़ोसियों के सामने। बात बढ़ती जाती।
मदम मेहनती था, पर समझदार नहीं। वह सोचता—“मैं कमाता हूँ, बस यही काफी है।” सुनित की भावनाओं को वह कमजोरी समझता। जब सुनित रोती, वह कहता—“ड्रामा मत करो।” जब वह शिकायत करती, तो मदम चुप हो जाता या गुस्से से जवाब देता—“तुम कभी खुश रह ही नहीं सकती।”
धीरे-धीरे घर में बात कम और तकरार ज़्यादा होने लगी। बच्चों ने हँसना कम कर दिया। बेटी डरने लगी, बेटा चिड़चिड़ा हो गया। घर जो कभी सुकून देता था, अब बोझ लगने लगा।
एक दिन सुनित का धैर्य टूट गया। सास ने बस इतना कहा, “आज सब्ज़ी ठीक नहीं बनी।” सुनित रोते हुए बोली, “मुझसे कुछ भी ठीक नहीं होता, यही समझो।” और वह बच्चों को लेकर मायके चली गई।
मदम को लगा, “चली गई तो गई, दो दिन में खुद लौट आएगी।”
पर दिन बीतते गए, सुनित नहीं आई।
इधर सुनित मायके में भी खुश नहीं थी। माँ ने कहा, “बेटी, हर बात पर टूट जाना समझदारी नहीं। घर सिर्फ भावनाओं से नहीं चलता, सोच से चलता है।”
सुनित पहली बार चुप रही। उसे लगा—शायद वह भी हर बार आग में घी डाल देती थी।
उधर मदम के घर में सन्नाटा था। बच्चों की आवाज़, सुनित की झुंझलाहट, सब याद आने लगा। उसने महसूस किया—कमाना ही सब कुछ नहीं होता। किसी के मन को समझना भी जिम्मेदारी है।
एक दिन वह सुनित के मायके गया। न गुस्सा, न शिकायत। बस बोला,
“मैंने तुम्हें कभी समझने की कोशिश नहीं की। मैं सोचता था, मैं सही हूँ। शायद तुम भी हर बात को बहुत दिल से लगा लेती हो। पर अगर हम दोनों न बदलें, तो घर नहीं बचेगा।”
सुनित की आँखों में आँसू थे। उसने कहा,
“मैं भी हर बात पर टूट जाती हूँ। सोचती नहीं, बस महसूस करती हूँ। शायद इसी से घर कमजोर हुआ।”
दोनों ने तय किया—
सुनित भावनाओं के साथ समझदारी जोड़ेगी।
मदम जिम्मेदारी के साथ संवेदना जोड़ेगा।
वे लौट आए। घर धीरे-धीरे फिर से घर बनने लगा। तकरार कम हुई, बात बढ़ी। बच्चे फिर हँसने लगे।
लोग कहते हैं—
अगर घर की स्त्री समझदार न हो, तो घर टूट जाता है।
और अगर पुरुष समझदार न हो, तो उस घर की स्त्री टूट जाती है।
पर जब दोनों समझदार बनें—तभी घर सच में बसता है।
लघु कथा – 57
शिवू काका को पूरे गाँव में लोग “शांत सरोवर” कहते थे। उम्र अस्सी साल, सफ़ेद बाल, काँपते हाथ, लेकिन मन बिल्कुल स्थिर। कोई कितना भी कड़वा बोल दे, उनका चेहरा वैसा ही रहता—शांत।
लोग पूछते, “काका, गुस्सा आता ही नहीं?”
वह मुस्कराकर कहते, “आता है, पर टिकता नहीं।”
एक दिन गाँव में नई सड़क बन रही थी। ठेकेदार ने काका की ज़मीन का थोड़ा-सा हिस्सा बिना पूछे घेर लिया। काका कुछ बोले नहीं। गाँव के नौजवान भड़क गए।
“काका, चुप क्यों हैं? लड़ो! कोर्ट चलो!”
काका ने बस इतना कहा, “पहले बात करेंगे।”
वे ठेकेदार के पास गए। ठेकेदार अकड़ में बोला, “जो होना है हो गया, अब कुछ नहीं बदल सकता।”
काका शांत रहे, “बदल सकता है, अगर मन बदले।”
ठेकेदार ने उन्हें धक्का-सा दिया। लोग भड़क गए।
“काका, अब तो बोलो!”
काका बोले, “अगर मैं भी आग बन जाऊँ, तो बुझाएगा कौन?”
अगले दिन काका फिर गए—इस बार कुछ काग़ज़ और गाँव वालों की सहमति लेकर। उन्होंने बिना चिल्लाए, बिना गाली दिए, बस सच्चाई रखी। ठेकेदार ने देखा—यह आदमी न डरता है, न लड़ता है। उसे अपनी गलती समझ आ गई। उसने ज़मीन लौटा दी।
गाँव में चर्चा फैल गई—
“काका ने बिना झगड़े काम करा दिया।”
एक लड़का आया और बोला,
“काका, आप डरते नहीं?”
काका बोले, “डर तो सबको लगता है, पर मैं डर को डूबने देता हूँ, तैरने नहीं।”
लड़का बोला, “आप ऐसे कैसे बन गए?”
काका कुछ देर चुप रहे, फिर बोले,
“मैंने बहुत आग जलाई है—गुस्से की, बदले की। सब जल गया, बस मैं बचा। तब समझ आया—जो खुद जलता है, वही दूसरों को जलाता है।”
अब गाँव में जब भी कोई झगड़ा होता, लोग काका को बुलाते। वह बस दोनों पक्षों को सुनते, फिर शांत-सा समाधान बता देते।
एक दिन किसी ने कहा,
“काका, आप तो सच में शांत सरोवर हैं।”
काका मुस्कराए,
“इसलिए खुश हूँ। क्योंकि जो खुद को ठंडा रखता है, वही दुनिया की आग बुझा सकता है।”
लघु कथा – 56
शर्मा जी सुबह से ही परेशान थे। अख़बार के पहले पन्ने पर बड़ी-बड़ी सुर्खियाँ थीं—सेंसेक्स ऊँचाई पर, सोना और महँगा, ज़मीन-घर के दाम आसमान छूते हुए। शर्मा जी ने गहरी साँस ली और बोले, “अब आदमी लगाए तो लगाए कहाँ? सब कुछ इतना महँगा हो गया है।”
उनकी पत्नी वंदना ने रसोई से जवाब दिया, “लगाने की फिक्र छोड़ो, पहले चाय तो ठीक से पी लो, ठंडी हो गई है।”
शर्मा जी ने ध्यान ही नहीं दिया। उनके दिमाग में बस शेयर और रेट घूम रहे थे।
तभी उनके दोस्त गुप्ता जी आ गए। वे हमेशा हँसमुख रहते थे। शर्मा जी को ऐसे परेशान देखकर बोले, “लगता है आज शेयर बाज़ार ने आपकी नींद भी ले ली।”
शर्मा जी बोले, “यार, समझ नहीं आता, निवेश कहाँ करूँ। सब कुछ इतना महँगा हो गया है कि आदमी सोचता ही रह जाए।”
गुप्ता जी हँसते हुए बोले, “तुमने एक जगह कोशिश की है?”
“कहाँ?”
“रिश्तों में।”
शर्मा जी को लगा दोस्त मज़ाक कर रहा है। “उसमें क्या मिलेगा?”
गुप्ता जी बोले, “सबसे बढ़िया रिटर्न।”
उस दिन शर्मा जी ने सोचा, चलो, देख लेते हैं। सबसे पहले उन्होंने घर आकर पत्नी से कहा, “आज तुम रसोई मत सँभालो, बाहर से खाना मंगा लेते हैं।”
वंदना हैरान रह गई, “आज कौन-सा शेयर गिर गया?”
फिर शर्मा जी बेटे के पास गए और बोले, “चल, साथ बैठकर खेलते हैं।”
बेटा बोला, “पापा, आप ठीक तो हैं?”
शाम को शर्मा जी अपनी बूढ़ी माँ के पास बैठ गए। माँ ने बस इतना कहा, “बहुत अच्छा लगा, बेटा, आज तू मेरे पास बैठा।”
अगले दिन शर्मा जी ने पड़ोसी मिश्रा जी से हालचाल पूछा, जिनसे वे महीनों से सिर्फ “नमस्ते” तक सीमित थे। मिश्रा जी खुश होकर बोले, “आज तो शर्मा जी बड़े बदले-बदले लग रहे हैं।”
कुछ ही दिनों में घर का माहौल बदल गया। पहले जहाँ सब अपने-अपने मोबाइल में लगे रहते थे, अब बातें होने लगीं। बेटा खुद आकर अपनी बातें बताने लगा। वंदना भी खुश रहने लगी।
एक दिन शर्मा जी ने गुप्ता जी से कहा, “यार, ये कैसा निवेश है? बिना पैसे लगाए, रोज़ फायदा हो रहा है।”
गुप्ता जी बोले, “और सबसे अच्छी बात—न घाटा, न टैक्स।”
उस शाम शर्मा जी फिर अख़बार पढ़ रहे थे। वंदना ने पूछा, “आज क्या हाल है सेंसेक्स का?”
शर्मा जी मुस्कराए, “ऊँचा ही होगा। सोना भी महँगा होगा, घर भी सस्ते नहीं होंगे।”
फिर बोले, “पर अब मुझे फर्क नहीं पड़ता। मैंने सबसे सुरक्षित जगह पैसा लगा दिया है।”
“कहाँ?”
“रिश्तों, भावनाओं और दोस्ती में।”
बेटा हँसते हुए बोला, “और रिटर्न?”
शर्मा जी बोले, “इतना कि अब दिल अमीर हो गया है।”
अब शर्मा जी रोज़ थोड़ा समय, थोड़ी मुस्कान और थोड़ा अपनापन इसी निवेश में लगाते हैं। उन्हें समझ आ गया है कि जब दिल का खाता भरता है, तब ज़िंदगी सच में मुनाफ़े में चलती है।
लघु कथा – 55
अंकिता सोलह साल की थी—तेज़ दिमाग़ वाली, बातों की जादूगर। स्कूल में उसे सब “स्मार्ट गर्ल” कहते थे। वह शब्दों से लोगों को हँसा भी सकती थी, चुप भी करा सकती थी, और जीत भी सकती थी। बहस हो या भाषण प्रतियोगिता—अंकिता हमेशा आगे रहती।
उसके शिक्षक कहते,
“तुम शब्दों से दुनिया जीत सकती हो।”
अंकिता को यह बात बहुत पसंद थी।
पर एक चीज़ वह नहीं समझती थी—दिल।
उसकी क्लास में नीलम नाम की लड़की थी—शांत, सीधी और बहुत संवेदनशील। वह ज़्यादा नहीं बोलती थी, पर जब बोलती, तो सच बोलती। एक दिन अंकिता ने मज़ाक में उसके बनाए चार्ट की आलोचना कर दी। शब्द चुभने वाले थे, पर अंकिता को लगा वह बस स्मार्ट बन रही है।
नीलम चुप रही, पर उसकी आँखें भर आईं।
अगले दिन नीलम स्कूल नहीं आई। पता चला उसकी माँ अस्पताल में थी। अंकिता को थोड़ा अजीब लगा। उसने सोचा, “मैंने शायद ज़्यादा बोल दिया।”
उस दिन स्कूल में भाषण प्रतियोगिता थी। अंकिता ने मंच पर खड़े होकर शानदार भाषण दिया। तालियाँ बजीं, टीचर खुश हुए। पर अंकिता के दिल में कुछ खाली था। उसे नीलम याद आ रही थी।
शाम को उसने नीलम के घर जाने की हिम्मत की। उसके पास कोई बड़ा भाषण नहीं था, न कोई चालाक शब्द। बस बोली,
“मुझे बुरा लग रहा है कि मैंने तुम्हें दुखी किया। मैं मज़ाक में बोल गई थी।”
नीलम ने धीरे से कहा,
“शब्द चोट करते हैं, अंकिता। कभी-कभी बहुत गहरी।”
अंकिता पहली बार चुप हो गई। उसने महसूस किया—शब्द जीत दिला सकते हैं, पर दिल नहीं।
कुछ दिन बाद नीलम की माँ ठीक होकर घर आ गई। अंकिता रोज़ रास्ते में नीलम का बैग उठा लेती, उसकी मदद करती, बिना दिखावे के। न कोई चालाक बात, न कोई मज़ाक—बस सादा व्यवहार।
धीरे-धीरे नीलम मुस्कराने लगी।
एक दिन उसने कहा,
“अब तुम्हारे शब्द कम, दिल ज़्यादा बोलता है।”
अंकिता समझ गई थी—
दिमाग़ से प्रतियोगिता जीती जाती है,
पर दिल से रिश्ते।
अब भी वह भाषण में जीतती थी, पर उसकी असली जीत तब होती थी, जब कोई उदास दोस्त उसकी वजह से हँस पड़ता।
स्कूल के फेयरवेल में अंकिता ने आख़िरी भाषण दिया। उसने कहा,
“हम शब्दों और दिमाग़ से दुनिया जीत सकते हैं,
पर अगर दिल से नहीं जीते,
तो सब जीत अधूरी रह जाती है।”
नीलम सबसे ज़्यादा ताली बजा रही थी।
अंकिता मुस्कराई—
आज वह सिर्फ स्मार्ट नहीं थी,
समझदार भी थी।
लघु कथा – 54
रघुवीर को कस्बे में सब “मुस्कुराता आदमी” कहते थे। कोई नहीं जानता था कि वह कहाँ से आया, कब आया—बस इतना जानते थे कि जहाँ रघुवीर होता, वहाँ उदासी टिक नहीं पाती।
वह अक्सर कहता,
“जन्म और मौत पर मेरा ज़ोर नहीं चलता, पर आज कैसे जीना है—यह मेरी मर्ज़ी है।”
रघुवीर रिक्शा चलाता था। दिन भर मेहनत करता, पर चेहरे पर शिकन नहीं आने देता। कोई किराया कम दे देता, तो कहता,
“अरे भाई, अगली बार ज़्यादा दे देना, आज मुस्कान दे दो।”
लोग सोचते, यह आदमी बहुत खुशकिस्मत होगा। पर सच्चाई यह थी कि उसकी ज़िंदगी आसान नहीं थी। बचपन में माँ चल बसी थी, पिता शराब में डूब गए थे। रघुवीर ने बहुत कम उम्र में काम शुरू कर दिया था। दुख उसे भी मिला था, पर उसने दुख को अपने ऊपर राज नहीं करने दिया।
एक दिन उसकी रिक्शा में सीमा नाम की लड़की बैठी। वह रो रही थी।
“क्या हुआ बहन?” रघुवीर ने पूछा।
“सब खत्म हो गया,” उसने कहा, “नौकरी चली गई, घर में झगड़े, कुछ समझ नहीं आ रहा।”
रघुवीर ने रिक्शा रोककर कहा,
“देखो, जो होना था, हो गया। पर आज साँस चल रही है, यह तो हमारे हाथ में है। आज को मुस्कुरा कर जी लो, कल अपने आप रास्ता दिखा देगा।”
सीमा ने पहली बार उस दिन रोते-रोते हँसने की कोशिश की।
धीरे-धीरे रघुवीर पूरे इलाके का अपना आदमी बन गया। किसी की शादी हो, वह गाना गा देता। किसी की दुकान बंद हो जाए, वह चुटकुला सुना देता। किसी के घर मौत हो जाए, वह चुपचाप बैठकर साथ देता—बिना उपदेश, बिना दिखावे।
एक दिन वह खुद बीमार पड़ गया। डॉक्टर ने कहा,
“दिल कमजोर है। ज़्यादा तनाव मत लेना।”
रघुवीर हँस पड़ा,
“डॉक्टर साहब, तनाव तो मेरे बस का नहीं, मुस्कान है।”
लोग बोले,
“अब तो हँसना छोड़ दो, बीमारी है।”
रघुवीर ने कहा,
“अगर हँसना छोड़ दूँ, तो जीना किसलिए?”
कुछ महीनों बाद एक रात वह सोते-सोते चला गया। कस्बे में अजीब सन्नाटा छा गया। वही लोग जो रोज़ उसके मज़ाक पर हँसते थे, आज चुप थे।
अगले दिन किसी ने उसकी रिक्शा पर एक कागज़ चिपका दिया था। उस पर लिखा था—
“जन्म और मौत हमारे हाथ में नहीं,
पर रघुवीर ने हमें सिखाया—
जीना हमारे हाथ में है।”
सीमा, जिसे उसने हँसना सिखाया था, अब स्कूल में पढ़ाती थी। उसने बच्चों से कहा,
“अगर कभी दुख आए, तो रघुवीर को याद करना। वह कहता था—मस्ती करना कोई अपराध नहीं, यह जीने की कला है।”
रघुवीर चला गया था, पर उसकी हँसी हवा में रह गई थी—
हर उस दिल में,
जिसे उसने कभी मुस्कुराया था।
लघु कथा – 53
प्रोफेसर अनिरुद्ध वर्मा शहर के सरकारी कॉलेज में पढ़ाते थे। उम्र पचास के करीब, चेहरे पर सादगी और आँखों में धैर्य। वे गणित के अध्यापक थे, पर पढ़ाते सिर्फ सूत्र नहीं थे—वे जीवन भी पढ़ाते थे।
हर साल रिज़ल्ट के दिन कॉलेज में एक ही माहौल होता। जिन बच्चों के नंबर अच्छे आते, उन्हें फूल, मिठाई और फोटो मिलते। जो फेल होते या कम नंबर लाते, वे चुपचाप सिर झुकाए निकल जाते। कोई यह नहीं पूछता कि किसने कितनी मेहनत की, किसने कितनी रातें जागकर पढ़ा।
उस साल रोहित नाम का छात्र प्रोफेसर वर्मा की क्लास में था। वह पढ़ाई में बहुत तेज़ नहीं था, पर मेहनती था। रोज़ लाइब्रेरी में बैठता, सवाल पूछता, बार-बार गलतियाँ करता और फिर सुधारता। प्रोफेसर वर्मा उसकी कोशिशों से खुश रहते।
रिज़ल्ट आया। रोहित बस पास हुआ—तीसरा दर्जा। उसके दोस्त अमन ने टॉप किया। सब अमन के घर बधाई देने गए। रोहित अकेला कॉलेज के मैदान में बैठा था, आँखों में आँसू।
प्रोफेसर वर्मा उसे देखकर पास आए।
“क्या हुआ, रोहित?”
“सर, मैंने इतना पढ़ा… फिर भी कुछ नहीं बना। सब मुझे नाकाम समझेंगे।”
वर्मा जी ने कहा,
“तुम्हें पता है लोग क्या देखते हैं?”
“नंबर,” रोहित बोला।
“हाँ, क्योंकि लोगों को परिणाम से मतलब होता है, प्रयास से नहीं। पर यह दुनिया का नज़रिया है, सच नहीं।”
रोहित चुप रहा।
कुछ दिन बाद कॉलेज में एक प्रतियोगिता हुई—गरीब बच्चों के लिए पढ़ाने की योजना। छात्रों को गाँव जाकर बच्चों को पढ़ाना था। अमन नहीं गया, बोला—“रिज़ल्ट खराब हो जाएगा, समय बर्बाद है।”
रोहित गया। रोज़ बस बदलकर गाँव पहुँचता, बच्चों को अक्षर सिखाता, खुद भी सीखता।
तीन महीने बाद वही बच्चे छोटे-छोटे वाक्य पढ़ने लगे। गाँव वालों ने कॉलेज को पत्र लिखा—
“रोहित नाम का लड़का हमारे बच्चों की ज़िंदगी बदल रहा है।”
कॉलेज में सभा हुई। प्रिंसिपल ने सबके सामने रोहित को बुलाया।
“इसने बिना किसी इनाम की उम्मीद के काम किया।”
तालियाँ बजीं। अमन चुप था।
सभा के बाद रोहित प्रोफेसर वर्मा के पास आया,
“सर, अब लोग मेरी तारीफ़ कर रहे हैं।”
वर्मा जी मुस्कराए,
“अब परिणाम दिख रहा है, इसलिए। पर असली बात यह है—जब कोई देख नहीं रहा था, तब भी तुम प्रयास कर रहे थे।”
रोहित बोला,
“तो क्या हमेशा परिणाम बेकार है?”
“नहीं,” वर्मा जी ने कहा, “पर परिणाम हमारे हाथ में नहीं होता। हमारे हाथ में सिर्फ मेहनत, ईमानदारी और कोशिश होती है। जो इन्हें पकड़ लेता है, वही असली विजेता होता है—चाहे दुनिया माने या न माने।”
कुछ साल बाद रोहित खुद शिक्षक बन गया। एक दिन उसके एक छात्र ने कहा,
“सर, मैं फेल हो गया हूँ, बेकार हूँ।”
रोहित ने वही बात दोहराई जो उसने सीखी थी—
“तू बेकार नहीं है। तू कोशिश कर रहा है, यही तेरी असली जीत है।”
और प्रोफेसर अनिरुद्ध वर्मा दूर से यह सब देखकर मन ही मन बोले—
“जब एक इंसान अपने प्रयास को सम्मान देने लगता है, तब परिणाम खुद झुककर उसके पीछे आ जाते हैं।”
लघु कथा – 52
जय गोपाल कस्बे के सबसे बुज़ुर्ग आदमी थे—पचहत्तर साल की उम्र, सफ़ेद दाढ़ी, सीधी चाल और आँखों में गहरी शांति। लोग उन्हें कभी साधु कहते, कभी पागल, तो कभी महान। पर जय गोपाल को इन शब्दों से कोई फर्क नहीं पड़ता था।
वह हर सुबह नदी किनारे जाकर बैठते। न पूजा का दिखावा, न प्रवचन—बस चुपचाप बहते पानी को देखते रहते। कुछ लोग आते, चरण छूते, कहते,
“बाबा, आप तो बहुत बड़े ज्ञानी हैं।”
जय गोपाल मुस्करा देते, जैसे यह बात उनके कानों तक पहुँची ही न हो।
उसी तरह कुछ लोग मज़ाक भी उड़ाते।
“इस उम्र में भी कुछ करता नहीं, बस बैठा रहता है। कामचोर है,”
कोई कहता, “दिमाग़ चल गया है।”
और जय गोपाल? वह वैसे ही शांत रहते।
एक दिन कस्बे में नया शिक्षक आया—रमेश। वह पढ़ा-लिखा था, सवाल पूछने वाला। उसने देखा कि लोग जय गोपाल को लेकर दो हिस्सों में बँटे हैं—कुछ पूजा करते हैं, कुछ हँसते हैं।
रमेश उनके पास गया और बोला,
“बाबा, लोग आपको कभी भगवान मानते हैं, कभी पागल। आपको बुरा नहीं लगता?”
जय गोपाल ने नदी की ओर देखते हुए कहा,
“नदी से पूछो, जब कोई उसे सुंदर कहे या गंदा कहे, तो क्या वह बहना छोड़ देती है?”
रमेश चुप हो गया।
कुछ दिन बाद कस्बे में एक सभा हुई। किसी नेता को बुलाया गया था। उसने मंच से कहा,
“इस कस्बे में एक महान आत्मा हैं—जय गोपाल जी।”
तालियाँ बजीं। लोगों ने जय गोपाल को आगे बुलाना चाहा।
जय गोपाल नहीं गए। लोग कहने लगे,
“इतना सम्मान मिल रहा है, और ये जा भी नहीं रहे!”
कोई बोला, “घमंड है।”
दूसरे दिन वही नेता किसी और जगह चला गया। लोग फिर जय गोपाल को भूल गए।
रमेश को यह सब अजीब लग रहा था। वह फिर उनके पास गया।
“बाबा, आपने सभा में जाने से इनकार क्यों किया? सब आपकी तारीफ़ कर रहे थे।”
जय गोपाल ने कहा,
“तारीफ़ भी एक रस्सी है, और निंदा भी। फर्क बस इतना है कि एक सोने की होती है, दूसरी लोहे की। पर दोनों बाँधती ज़रूर हैं।”
रमेश ने पूछा,
“तो आप खुद को क्या मानते हैं?”
जय गोपाल मुस्कराए,
“जो हूँ, वही हूँ। न तारीफ़ से बड़ा होता हूँ, न आलोचना से छोटा।”
एक दिन कस्बे में किसी ने अफ़वाह फैला दी कि जय गोपाल पाखंडी हैं। कुछ लोग उन पर चिल्लाने लगे।
“तू ढोंगी है!”
जय गोपाल शांत खड़े रहे।
रमेश गुस्से में आ गया,
“बाबा, आप कुछ कहते क्यों नहीं?”
जय गोपाल बोले,
“अगर मैं सच हूँ, तो झूठ की आवाज़ से क्यों डरूँ? और अगर मैं झूठ हूँ, तो सच की आवाज़ से क्यों बचूँ?”
धीरे-धीरे रमेश समझने लगा—
जिसे अपनी सच्चाई का पता हो, वह दूसरों की राय का गुलाम नहीं होता।
कुछ साल बाद रमेश ने कहीं लिखा—
“जय गोपाल ने मुझे सिखाया कि जो खुद को जान लेता है, उसे न तो आलोचना भटका सकती है, न सराहना बहला सकती है।”
और जय गोपाल?
वह आज भी नदी किनारे बैठते हैं—
न तारीफ़ के इंतज़ार में,
न निंदा के डर में—
बस अपने होने में पूरे।
लघु कथा – 51
रवि और नीरज पुराने दोस्त थे। दोनों एक ही शहर में रहते थे, पर ज़िंदगी की दौड़ में मिलना कम हो गया था। एक शाम अचानक नीरज का फोन आया,
“चल, चाय पीते हैं। बहुत दिनों से कुछ दिल से बात नहीं हुई।”
चाय की दुकान पर बैठते ही नीरज ने मोबाइल निकालकर रवि को एक तस्वीर दिखाई। उस पर लिखा था—
“यात्रा करो और किसी को मत बताओ… लोग सुंदर चीज़ों को बर्बाद कर देते हैं।”
रवि मुस्कराया, “अजीब बात है। अच्छी चीज़ें सबको बतानी चाहिए, छुपानी क्यों?”
नीरज ने गहरी साँस ली, “तू नहीं समझेगा। हर सुंदर चीज़ को नज़र लगती है।”
रवि हँस पड़ा, “ये सब बहाने हैं। अगर कुछ अच्छा है, तो दूसरों से बाँटने में क्या बुराई?”
नीरज चुप हो गया। थोड़ी देर बाद बोला, “याद है कॉलेज के दिनों में मेरी वो यात्रा, जब मैं अकेला पहाड़ों पर गया था?”
“हाँ, तू रोज़ फोटो डालता था,” रवि बोला।
“बस वही मेरी गलती थी,” नीरज ने कहा। “लोगों की बातें, ताने, सलाह… सबने उस सफर का मज़ा खराब कर दिया। कोई बोला, पैसे क्यों उड़ा रहा है, कोई बोला, अकेले जाना गलत है। लौटकर मैं खुश था, पर भीतर कहीं टूट भी गया था।”
रवि ने चाय का घूँट लिया। “और प्रेम कहानी?” उसने मुस्कराकर पूछा।
नीरज की आँखों में हल्की नमी आ गई। “मैं एक लड़की से बहुत प्यार करता था। शुरू में सबको बताया—दोस्तों को, घरवालों को, सोशल मीडिया को। सबने अपनी-अपनी राय दी। कोई बोला जाति अलग है, कोई बोला करियर पहले, कोई बोला ये टिकेगा नहीं। धीरे-धीरे हम दोनों खुद पर शक करने लगे। आखिरकार वही हुआ जो दूसरों ने कहा था।”
रवि कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, “तो तू कहना चाहता है कि खुशी भी छुपाकर जीनी चाहिए?”
नीरज ने सिर हिलाया, “हर खुशी नहीं, पर जो बहुत नाज़ुक हो, उसे। जैसे काँच की चीज़—हर हाथ में देने से टूट जाती है।”
रवि सोच में पड़ गया। उसे अपनी ज़िंदगी याद आई—हर छोटी सफलता वह सबको बताता था, हर रिश्ते की तस्वीर डालता था। और फिर वही चीज़ें या तो खत्म हो जातीं या फीकी पड़ जातीं।
वह धीरे से बोला, “शायद तू सही कह रहा है। लोग हमेशा बुरा नहीं चाहते, पर उनकी बातें हमारे मन में ज़हर घोल देती हैं।”
नीरज मुस्कराया, “इसलिए लिखा है—खुशी से जियो और किसी को मत बताओ। क्योंकि खुशी जब दिखावे में बदलती है, तो खुशी नहीं रहती, प्रदर्शन बन जाती है।”
रवि ने कहा, “पर कभी-कभी बाँटना भी ज़रूरी है।”
“हाँ,” नीरज बोला, “पर चुनकर। हर किसी को नहीं, सिर्फ उन्हें जो तोड़ें नहीं, सँभाल सकें।”
शाम ढलने लगी थी। दोनों उठे। रवि ने कहा, “मैं अब कुछ बातें अपने तक ही रखूँगा।”
नीरज हँस दिया, “बस यही सीख है—सुंदर चीज़ों को भी सहेजकर रखना आना चाहिए।”
दोनों अलग हुए, पर रवि के मन में वह पंक्तियाँ गूंजती रहीं—
कुछ खुशियाँ शोर नहीं चाहतीं,
उन्हें बस जीना होता है,
बताना नहीं।
लघु कथा – 50
राहुल और नीरजा की शादी को आठ साल हो चुके थे। बाहर से देखने पर उनकी ज़िंदगी सामान्य लगती थी—दो बच्चे, सुंदर घर, कामकाजी जीवन। लेकिन घर के भीतर माहौल हमेशा तनावपूर्ण रहता।
नीरजा एक ऐसी महिला थी जो अपने अधिकार और सम्मान के लिए हमेशा लड़ती। वह चाहती थी कि घर में हर बात उसके अनुसार हो। अगर राहुल ने किसी काम में छोटा सा भी निर्णय लिया, तो नीरजा तुरंत चिल्ला उठती। उसके लिए हर बात उसकी इच्छाओं के अनुसार होनी चाहिए थी।
राहुल हमेशा शांत रहने की कोशिश करता। वह जानता था कि नीरजा की तकरार करने की आदत केवल उसकी स्वभावगत कमजोरी नहीं, बल्कि एक ज़हरीली प्रवृत्ति है। वह दूसरों की भावनाओं का सम्मान कम करती, लेकिन खुद हर बात में सही होने का दावा करती।
बच्चों के साथ भी यही रवैया था। अगर बच्चे घर में कोई गलती करते, तो नीरजा बिना वजह गुस्सा करती और कभी-कभी उन्हें डराकर अपनी बात मनवाती। राहुल कई बार कोशिश करता कि बच्चों को समझाए कि गलती करना सीखने का हिस्सा है, पर नीरजा उसे रोक देती।
“तुम बच्चे को बहुत नरम बना रहे हो। आज नहीं संभाला, तो कल पछताओगे,” वह कहती।
राहुल ने कई बार खुद को संभालने की कोशिश की। उसने सोचा,
“हर व्यक्ति अपने तरीके से जीता है, लेकिन यह रवैया परिवार को जहर बना रहा है। मेरी जिम्मेदारी है कि मैं घर का संतुलन बनाऊँ।”
एक दिन नीरजा ने राहुल पर आरोप लगाया कि वह बच्चों के साथ समय नहीं बिताता। राहुल चुपचाप मुस्कराया और बोला,
“नीरजा, बच्चों को हमारा प्यार और मार्गदर्शन चाहिए। तकरार से उनका मन दुखी होता है। अगर हम शांत और समझदारी से काम लें, तो घर में हर कोई खुश रहेगा।”
नीरजा ने तिरछी नजरों से देखा और चुप हो गई। यह पहली बार था जब उसने महसूस किया कि उसके गुस्से और आरोपों का असर केवल दूसरों पर नहीं, बल्कि उसके अपने परिवार पर भी पड़ रहा है।
राहुल ने धीरे-धीरे बदलाव लाने शुरू किया। वह नीरजा को टोकने या विरोध करने की बजाय प्रेम और धैर्य के साथ समझाने लगा। बच्चों को भी वह यह सिखाने लगा कि गलती करने में डर नहीं होना चाहिए।
धीरे-धीरे नीरजा को एहसास हुआ कि उसका हर आरोप और हर गुस्सा घर में विष फैला रहा है। उसने खुद से सवाल किया,
“क्या मैं सच में सभी की इज्जत कर रही हूँ, या सिर्फ अपने अहंकार को आगे बढ़ा रही हूँ?”
समय के साथ नीरजा ने अपनी आदतें बदलनी शुरू की। वह छोटे-छोटे मामलों में चुप रहने लगी, बच्चों के साथ प्यार और समझदारी दिखाने लगी। राहुल ने उसका साथ दिया, उसे समझाया, और घर के वातावरण को धीरे-धीरे शांत बनाया।
कुछ सालों में घर का माहौल बदल गया। नीरजा अब अपने गुस्से और आरोपों पर काबू पा चुकी थी। बच्चों ने भी अपने माता-पिता के बीच शांति महसूस की। राहुल ने जाना कि ज़हरीला स्वभाव कभी पूरी तरह मिटता नहीं, लेकिन धैर्य, समझदारी और प्रेम से इसे बदलना संभव है।
और इस तरह, राहुल और नीरजा ने सीखा कि परिवार में संतुलन बनाए रखना केवल नियम या आदेश से नहीं, बल्कि समझदारी, धैर्य और प्रेम से संभव है।
लघु कथा – 49
प्रमोद और अल्करानी की शादी को दस साल हो चुके थे। बाहर से देखने पर उनकी ज़िंदगी ठीक लगती थी—सुंदर घर, अच्छे कपड़े, दो प्यारे बच्चे। लेकिन भीतर का दृश्य बिल्कुल अलग था।
अल्करानी रोज़ सुबह उठकर भगवान की पूजा करती, मंत्र पढ़ती और ध्यान में बैठती। वह तीन-तीन बार विधिवत प्रार्थना करती। हर कोई सोचता कि वह बहुत धर्मात्मा है। पर घर में, वही पूजा करने वाली औरत बच्चों पर छोटे-मोटे कारणों से चिल्लाती, कभी हाथ उठाकर मारती। पति प्रमोद के लिए तो हर दिन एक नई चुनौती था।
“अल्करानी, थोड़ी शांति तो रखो,” प्रमोद अक्सर कहता, पर उसका जवाब हमेशा तीखा होता—“तुम मुझसे क्या समझते हो, तुम खुद देखो तो सही!”
बच्चे डर के मारे धीरे-धीरे अपने कमरे में बैठ जाते। घर में प्रेम और समझ का वातावरण नहीं था। अल्करानी की ध्यान मुद्रा और मंत्र बोलना, घर की अशांति को दबा नहीं पा रही थी।
एक दिन प्रमोद ने देखा कि अल्करानी फिर से पूजा कर रही है, मंत्र पढ़ रही है, लेकिन आँखों में क्रोध और चिंता साफ़ झलक रही थी। उसने धीरे से कहा,
“अल्करानी, पूजा और ध्यान करना अच्छा है, पर क्या यह तुम्हारे मन को शांत कर रहा है? बच्चों और मेरे लिए यह क्रोध और मार क्यों?”
अल्करानी रुकी, मंत्र का उच्चारण बीच में ही ठहर गया। उसने कहा,
“प्रमोद, मैं धर्म का पालन करती हूँ। मैं भगवान की सेवा कर रही हूँ। मुझे घर का काम और बच्चों की डांट नहीं रोकती।”
प्रमोद ने प्यार से समझाया,
“धर्म केवल मंत्र और पूजा नहीं है। धर्म का अर्थ है शांति, मौन, शून्यता। अगर तुम्हारा मन शांत नहीं है, तो यह पूजा केवल एक क्रिया बनकर रह जाती है। धर्म वह है जो हृदय को कोमल बनाए, चेतना को विस्तृत करे। बच्चों को मारकर और मुझसे लड़कर तुम किस धर्म की सेवा कर रही हो?”
अल्करानी की आँखों में आँसू आ गए। वह लंबे समय से खुद भी यह महसूस कर रही थी, लेकिन शब्दों में व्यक्त नहीं कर पा रही थी। उसने सोचा,
“मैं तो दिन में तीन बार भगवान को देखती हूँ, पर खुद का क्रोध और चिंता नहीं देखती।”
उस दिन उसने पहली बार ध्यान करते समय केवल मंत्रों पर नहीं, बल्कि अपने भीतर की अशांति पर ध्यान दिया। उसने महसूस किया कि उसका क्रोध, ईर्ष्या और असंतोष ही उसके धर्म और घर दोनों को नुकसान पहुँचा रहे थे।
धीरे-धीरे अल्करानी ने बच्चों के साथ धैर्य रखना शुरू किया। पहले जो हर छोटी बात पर मार देती थी, अब वह सिर्फ समझाने लगी। प्रमोद की मदद से उसने अपने ध्यान और प्रार्थना को केवल क्रिया से आगे बढ़ाकर आंतरिक शांति बनाने का साधन बनाया।
कुछ महीनों में घर का माहौल बदल गया। बच्चे डर के बजाय प्रेम महसूस करने लगे। प्रमोद ने देखा कि अल्करानी का चेहरा अब केवल क्रोध और चिंता नहीं, बल्कि शांति और कोमलता भी दर्शाता है।
अल्करानी समझ गई—धर्म केवल पूजा और मंत्र नहीं है। धर्म वही है जो भीतर की अशांति को गलाकर जीवन को प्रेम और शांति से भर दे। अब उसका घर भी धर्ममय बन गया, क्योंकि उसने समझ लिया कि सच्चा धर्म दूसरों और अपने मन की शांति में है।
और इस तरह, अल्करानी ने सीखा कि असली पूजा सिर्फ मंदिर या मंत्र में नहीं, अपने जीवन और परिवार में शांति और प्रेम लाने में है।
लघु कथा – 48
आशा एक छोटी-सी कॉलोनी में रहती थी। वह हमेशा दूसरों की मदद करने में विश्वास रखती थी। किसी की तकलीफ़ देखती, तो उसे कमज़ोरी या बहाना नहीं समझती—बल्कि दिल खोलकर सहानुभूति देती।
पवन, उसका पड़ोसी, हमेशा व्यस्त और व्यस्त रहने का दिखावा करने वाला आदमी था। उसे लगता था कि ज़िंदगी में केवल अपने लिए जीना चाहिए। दूसरों के दुख को देखकर वह अक्सर सोचता,
“जो हुआ, वह उसकी खुद की गलती है। यही जीवन का नियम है।”
एक दिन आशा ने देखा कि कॉलोनी के एक बुज़ुर्ग घर में अकेले रहते हैं और बीमार हैं। वह तुरंत उनके लिए दवा और खाना ले गई। पवन ने देखा और टोका,
“आशा, इतनी मेहनत क्यों? ये लोग तो हमेशा परेशान रहते हैं। शायद उनके कर्मों की सज़ा है।”
आशा ने चुपचाप मुस्कराया और अपने काम में लगी रही। पवन ने सोचा, “इस दौर में लोग कितने भावुक हैं, पर ये भावुकता बेकार होती है।”
कुछ महीने बाद आशा और पवन की ज़िंदगी में भी कठिन समय आया। पवन की नौकरी अचानक चली गई, और परिवारिक परेशानियाँ बढ़ गईं। उसकी सोच में बदलाव आने लगा—जो दूसरों के दुख को कर्म की सज़ा मानता था, अब वही उसके जीवन में आया।
आशा ने देखा कि पवन उदास और तनाव में है। उसने पवन से कहा,
“पवन, ज़िंदगी कभी आसान नहीं होती। दुख सबको आता है, और इसे ईश्वरीय परीक्षा कहना आसान है, लेकिन असली मदद वही है जो दर्द को समझकर दिया जाए।”
पवन चुप रहा। उसने महसूस किया कि वह हमेशा दूसरों के दुःख का न्याय करता था, लेकिन जब खुद पर विपत्ति आई, तो उसे सांत्वना की तलाश थी। आशा ने उसे धीरे से समझाया,
“दुख किसी की गलती नहीं, किसी का कर्म नहीं है। यह तो ज़िंदगी का हिस्सा है। और दूसरों के दुख में संवेदनशीलता वही दिखाती है जो इंसानियत कहलाई जाती है।”
पवन ने पहली बार महसूस किया कि उसका दृष्टिकोण कितना संकुचित और स्वार्थी था। उसने कहा,
“मैं हमेशा सोचता था कि दूसरों के दुख उनकी गलती है। पर अब जब वही मेरे जीवन में आया है, तो मुझे समझ में आया कि असली ताकत दूसरों के लिए महसूस करने और मदद करने में है।”
आशा मुस्कुराई। उसने पवन को अपने साथ कॉलोनी के बुज़ुर्ग के पास ले जाकर दिखाया कि कैसे छोटे-छोटे कार्य किसी की जिंदगी में आशा की रोशनी जगा सकते हैं।
पवन ने धीरे-धीरे बदलना शुरू किया। वह अब दूसरों के दुख को देखकर सवाल नहीं करता, बल्कि सोचता,
“मैं उनकी मदद कैसे कर सकता हूँ?”
समय के साथ पवन और आशा दोनों ने महसूस किया कि संवेदनाएँ ही इंसानियत की सबसे बड़ी ताकत हैं। दुख किसी की सज़ा नहीं, और मदद ही वास्तविक सफलता है।
कॉलोनी में लोग आशा की भावुकता और पवन के परिवर्तन को देखकर कहते,
“यह दौर कठिन है, पर इंसानियत अभी भी जीवित है।”
आशा और पवन बस मुस्कराते—क्योंकि उन्होंने जाना कि कलयुग हो या कोई भी समय, संवेदनशीलता और मदद की भावना इंसान को महान बनाती है।
लघु कथा – 47
सरिता बहुत जल्दी किसी से जुड़ जाती थी। उसे लगता था कि रिश्ते ही जीवन की सबसे बड़ी पूँजी हैं। बचपन से उसने माँ को सबके लिए जीते देखा था, इसलिए उसने भी यही सीखा—देना, समझना, निभाना। उसके लिए रिश्ता मतलब था पूरा समर्पण।
शादी के बाद उसने अपने पति में दोस्त खोजा। वह हर छोटी-बड़ी बात उससे साझा करती। शुरू में सब बहुत अच्छा था। पति उसकी बातें ध्यान से सुनता, उसकी भावनाओं को समझता। सरिता को लगा कि यही सच्चा रिश्ता है—जहाँ बिना कहे सब समझ लिया जाए।
फिर उसने कुछ दोस्तों से भी गहरा रिश्ता बनाया। वे साथ हँसते, रोते, सपने देखते। सरिता सबके लिए हमेशा मौजूद रहती—रात को फोन आए तो उठती, कोई बीमार हो तो दौड़ती, कोई दुखी हो तो अपनी तकलीफ भूल जाती।
धीरे-धीरे उसके भीतर एक नई चीज़ जन्म लेने लगी—उम्मीद।
उम्मीद कि जैसे वह देती है, वैसे ही उसे भी मिलेगा।
उम्मीद कि लोग कभी नहीं बदलेंगे।
उम्मीद कि कोई उसे कभी नज़रअंदाज़ नहीं करेगा।
लेकिन समय के साथ सब बदलने लगा। पति काम में ज्यादा व्यस्त रहने लगा। बातें कम हो गईं। दोस्त अपनी-अपनी ज़िंदगी में उलझ गए। पहले जो लोग बिना कहे समझ लेते थे, अब कभी-कभी उसकी बात सुनना भी भूल जाते।
सरिता के मन में सवाल उठने लगे—
“क्या मैं ज़्यादा चाह रही हूँ?”
“क्या मैं किसी पर बोझ बन गई हूँ?”
वह हर रात खुद को दोष देती।
“शायद मुझमें ही कमी है।”
“शायद मैं ही ज़्यादा भावुक हूँ।”
वह रिश्तों को बचाने के लिए और ज़्यादा देने लगी, और ज़्यादा समझने लगी। लेकिन जितना वह देती, उतना ही भीतर से खाली होती जाती।
एक दिन वह अपनी पुरानी डायरी खोलकर बैठी। उसमें सालों पहले लिखा था—
“रिश्ते बिना शर्त सुंदर होते हैं।”
उसने वह लाइन बार-बार पढ़ी। उसे पहली बार समझ आया कि कहीं न कहीं उसने खुद ही शर्तें जोड़ ली थीं—
कि सामने वाला हमेशा वैसा ही रहेगा,
कि वह वैसा ही करेगा जैसा वह चाहती है,
कि वह उतना ही लौटाएगा जितना वह देती है।
उसने खुद से पूछा—
“क्या मैंने लोगों को उनके जैसे रहने दिया?
या मैं उन्हें अपनी उम्मीदों के साँचे में ढालना चाहती रही?”
उसे समझ आया कि दर्द लोगों से नहीं आया, दर्द उसकी उम्मीदों से आया।
उस दिन उसने एक छोटा-सा फैसला किया—
वह रिश्ते निभाएगी, पर उन्हें बाँधकर नहीं रखेगी।
वह देगी, पर बदले में हिसाब नहीं रखेगी।
वह चाहेगी, पर किसी को अपने तरीके से चलने पर मजबूर नहीं करेगी।
अब वह पति से बात करती थी, पर यह उम्मीद नहीं रखती थी कि वह हर बार उसकी भावनाओं को वैसे ही समझे।
दोस्तों से मिलती थी, पर यह शिकायत नहीं करती थी कि वे पहले जैसे क्यों नहीं हैं।
वह अब रिश्तों को पकड़ने की जगह, उन्हें बहने देने लगी।
धीरे-धीरे उसके भीतर का बोझ हल्का होने लगा। वह अब कम दुखी होती थी, क्योंकि अब वह कम माँगती थी। वह जान गई थी कि हर इंसान अपनी सीमाओं के साथ आता है।
एक दिन किसी ने उससे पूछा,
“अब रिश्ते कैसे लगते हैं?”
सरिता मुस्कराई और बोली,
“अब रिश्ते बोझ नहीं, अनुभव हैं।
कोई जितना दे सकता है, उतना ही उसका सच है।
उससे ज़्यादा चाहना अब मैं अपनी गलती मानती हूँ।”
वह समझ चुकी थी—
रिश्ते दर्द नहीं देते,
दर्द हमारी उम्मीदें देती हैं।
और जब उम्मीद हल्की हो जाती है,
तो रिश्ता फिर से हल्का और सुंदर हो जाता है।
लघु कथा – 46
रमन एक शांत स्वभाव का युवक था। बाहर से देखने पर उसकी ज़िंदगी ठीक लगती थी—नौकरी, घर, दोस्त। लेकिन भीतर उसका मन बहुत संवेदनशील था। छोटी-छोटी बातें उसे गहराई तक छू जातीं। कभी किसी की बेरुख़ी, कभी किसी अपने की दूरी—सब उसके भीतर जमा होता जाता।
एक साल में बहुत कुछ बदल गया। माँ की बीमारी, नौकरी में अनिश्चितता और एक टूटता हुआ रिश्ता—इन सबने रमन को थका दिया। वह लोगों के बीच रहता, पर भीतर अकेला महसूस करता। रात को जब सब सो जाते, वह छत पर बैठकर आसमान देखता और सोचता,
“कभी-कभी लगता है… सब यहीं खत्म हो जाए तो शायद शांति मिल जाए।”
यह विचार उसे डराता भी था, और खींचता भी। वह समझ नहीं पाता कि यह थकान है, दुख है, या मन का कोई और ही कोना बोल रहा है।
एक दिन ऑफिस में उसकी पुरानी सहकर्मी ने कहा,
“रमन, तुम अब पहले जैसे नहीं लगते। आँखों में कुछ बुझा-बुझा है।”
रमन चुप रहा, पर वह बात उसके भीतर गूँजती रही।
शाम को वह अपने बचपन के पार्क में चला गया। वही झूला, वही पेड़। वहाँ एक बूढ़े माली ने उसे देखा और पूछा,
“बेटा, उदास क्यों हो?”
रमन बोला,
“बस… मन भारी है।”
माली ने कहा,
“मन मौसम जैसा होता है। कभी धूप, कभी बारिश। पर बारिश का मतलब ये नहीं कि सूरज मर गया।”
यह बात रमन के दिल में उतर गई।
उस रात उसने पहली बार अपने मन से लड़ने की जगह, उसे सुना। उसने खुद से कहा,
“तू मरना नहीं चाहता… तू बस दर्द से भागना चाहता है।”
उसे समझ आया कि मौत का ख्याल असल में अंत की चाह नहीं, बल्कि पीड़ा से छुटकारे की तलाश है।
अगले दिन उसने एक दोस्त को सब बता दिया—डर, अकेलापन, थकान। दोस्त ने कहा,
“तू अकेला नहीं है। चल, किसी से बात करते हैं जो समझता हो।”
रमन ने काउंसलर से बात शुरू की। वहाँ उसे पता चला कि दुख और टूटन में ऐसा सोचना कमजोरी नहीं, इंसानी मन की प्रतिक्रिया है। फर्क बस इतना है—कुछ लोग उस मोड़ पर रुक जाते हैं, और कुछ लोग मदद लेकर आगे बढ़ जाते हैं।
धीरे-धीरे रमन ने छोटे-छोटे कदम उठाए—
सुबह टहलना,
मन की बातें लिखना,
पुरानी पसंदीदा किताबें पढ़ना,
और सबसे ज़रूरी—ज़रूरत पड़ने पर बोल देना।
एक दिन वह फिर उसी छत पर बैठा था, पर अब आसमान देखकर यह नहीं सोच रहा था कि “सब खत्म हो जाए।”
वह सोच रहा था,
“अभी दर्द है, पर ये पूरा सच नहीं है। आगे कुछ और भी हो सकता है।”
उसने मन ही मन कहा,
“मेरे भीतर का मन बहुत गहरा है। जब वह अंधेरे में जाता है, तो मुझे उसे हाथ पकड़कर वापस लाना है—मदद से, प्यार से, धैर्य से।”
रमन अब भी कभी-कभी उदास होता है। पर अब वह जानता है—
जब मन अंत की बात करे,
तो असल में वह सुनना चाहता है:
“तू अकेला नहीं है।
और यह दौर भी
लघु कथा – 45
सुमन की शादी को छह महीने हो चुके थे। ससुराल बड़ा था, लोग अच्छे थे, पर फिर भी उसके दिल में एक कोना हमेशा खाली रहता। वह अपने मायके को बहुत याद करती—माँ की डाँट, पिता की चुपचाप मुस्कान, वही पुराना आँगन, वही नीम का पेड़।
लेकिन वह वहाँ जाने से हिचकती थी।
उसे लगता, “अब मैं पराई हो गई हूँ। बार-बार मायके जाना अच्छा नहीं लगता। लोग क्या कहेंगे?”
कई बार माँ फोन पर कहती, “बेटी, आ जा कुछ दिन।”
सुमन टाल देती, “अभी काम है अम्मा, फिर आऊँगी।”
उसके मन में एक अजीब-सा डर था—जैसे मायके जाना कोई गलती हो।
एक दिन राघोराम, उसके ससुर, ने उसे उदास बैठे देखा। वे बहुत शांत स्वभाव के थे, कम बोलते थे लेकिन जब बोलते, तो दिल तक बात पहुँचती।
उन्होंने पूछा,
“बहू, आजकल चुप-सी क्यों रहती हो?”
सुमन बोली,
“कुछ नहीं बाबूजी… बस ऐसे ही।”
राघोराम मुस्कराए।
“ऐसे ही कभी नहीं होता। कुछ तो है।”
थोड़ी देर चुप रहने के बाद सुमन ने कहा,
“बाबूजी, मन तो बहुत करता है मायके जाने का… पर लगता है अब वो मेरा घर नहीं रहा। शादी के बाद लड़की तो… पराई हो जाती है न?”
राघोराम ने गहरी साँस ली। बोले,
“बेटी, घर ईंट-पत्थर से नहीं बनता, यादों से बनता है। और यादों पर किसी की शादी की मुहर नहीं लगती।”
सुमन ने उनकी ओर देखा।
राघोराम बोले,
“तुम्हें वहाँ जाने के लिए न बुलावा चाहिए, न इजाज़त।
तुम जैसे भी हो—थकी, खुश, रोती, हँसती—वो दरवाज़ा तुम्हारे लिए हमेशा खुला है।
वहाँ की हवा में तुम्हारे बचपन की खुशबू है, जो तुम्हें फिर से सुरक्षित महसूस कराती है।”
सुमन की आँखें भर आईं।
राघोराम ने कहा,
“अगर तुम अपने मायके नहीं जाओगी, तो भीतर-ही-भीतर सूख जाओगी। और सूखी बहू किसी घर को हरा-भरा नहीं कर सकती।”
सुमन बोली,
“लेकिन लोग बातें करेंगे…”
राघोराम मुस्कराए,
“लोग तो तब भी करेंगे जब तुम जाओगी, तब भी जब नहीं जाओगी।
पर तुम्हारा दिल कब जिएगा—ये सिर्फ तुम्हें तय करना है।”
उस रात सुमन ने माँ को फोन किया।
“अम्मा… मैं आऊँ?”
माँ की आवाज़ काँप गई,
“बेटी, पूछ क्या रही है… तेरा घर है वो।”
दो दिन बाद सुमन मायके पहुँची। वही दरवाज़ा, वही खुशबू, वही आँगन। माँ ने उसे वैसे ही गले लगाया जैसे बचपन में लगाती थी—बिना सवाल, बिना शर्त।
सुमन को लगा जैसे उसके भीतर का तूफान शांत हो गया हो।
लौटते समय उसने राघोराम के पैर छुए।
बोली,
“बाबूजी, आपने मुझे मेरा घर लौटा दिया।”
राघोराम ने कहा,
“नहीं बेटी… मैंने बस तुम्हें याद दिलाया कि कुछ दरवाज़े कभी बंद नहीं होते—
खासतौर पर वो, जिन पर बचपन की दस्तक होती है।”
लघु कथा – 44
मुनिया एक छोटे से कस्बे में रहती थी। बचपन से ही वह भावुक थी—किसी की बात दिल पर ले लेती, किसी की नाराज़गी से टूट जाती। शादी के बाद उसकी ज़िंदगी और उलझ गई। ससुराल में हर बात पर उसे ही दोष दिया जाता—खाना कम नमक का हो तो मुनिया की गलती, बच्चा रोए तो मुनिया की गलती, घर में तनाव हो तो मुनिया की गलती।
धीरे-धीरे मुनिया को लगने लगा कि वह ही खराब है। वह हर रात खुद से कहती,
“सब मेरी वजह से है… मैं ही गलत हूँ।”
यह सोच उसे अंदर से तोड़ने लगी। वह हँसना भूल गई, बोलना कम कर दिया, और खुद को ही दुश्मन मानने लगी।
एक दिन उसके मायके से उसकी बूढ़ी माँ मिलने आई। माँ ने मुनिया की आँखों में खालीपन देखा। रात को उसने पूछा,
“बेटी, तू इतनी चुप क्यों है?”
मुनिया रो पड़ी। बोली,
“अम्मा, मैं कुछ भी ठीक नहीं कर पाती। सब मेरी गलती होती है।”
माँ ने उसका सिर गोद में रखा और धीरे से कहा,
“गलती समझना बुरा नहीं है, बेटी। लेकिन खुद को सज़ा देना गलत है। गलती पीछे देखती है, पर जिम्मेदारी आगे का रास्ता दिखाती है।”
मुनिया को यह बात पूरी तरह समझ नहीं आई, लेकिन दिल में कहीं टिक गई।
कुछ दिन बाद घर में बड़ा झगड़ा हो गया। मुनिया गुस्से में अपने बच्चे पर चिल्ला पड़ी। बच्चा डर कर चुप हो गया। मुनिया का दिल काँप गया। उसे लगा,
“मेरे गुस्से ने मेरे बच्चे को चोट दी।”
पहले वह खुद को कोसती—“मैं बुरी माँ हूँ।”
लेकिन उस दिन उसे माँ की बात याद आई। उसने सोचा,
“खुद को बुरा कहने से क्या बदलेगा? मुझे जिम्मेदारी लेनी होगी।”
वह बच्चे के पास गई, उसे गले लगाया और बोली,
“माँ से गलती हो गई। माँ गुस्से में थी, पर तुझ पर गुस्सा नहीं था।”
बच्चा मुस्करा दिया। मुनिया की आँखें भर आईं।
उस दिन मुनिया ने तय किया कि वह अपने कर्मों को समझेगी, लेकिन खुद को तोड़ेगी नहीं।
अगर गलती होगी—तो सुधारेगी।
अगर चूक होगी—तो सीख लेगी।
अब जब घर में कुछ गलत होता, वह रोकर नहीं बैठती। वह कहती,
“हाँ, इसमें मेरा हिस्सा है। अब मैं क्या कर सकती हूँ कि आगे अच्छा हो?”
धीरे-धीरे उसका बोलने का ढंग बदला, चलने का ढंग बदला, जीने का ढंग बदला। लोग भी उसे अलग नज़र से देखने लगे—कमज़ोर नहीं, समझदार।
एक दिन उसकी सास ने कहा,
“पहले तू बस रोती थी, अब तू रास्ता दिखाती है।”
मुनिया ने मन ही मन कहा,
“मैं दोष से बाहर आ गई हूँ, अब जिम्मेदारी में हूँ।”
अब वह जान गई थी—
दोष हमें पीछे खींचता है,
शर्म हमें छोटा बनाती है,
पर जिम्मेदारी हमें बड़ा करती है।
और मुनिया ने पहली बार महसूस किया—
वह टूटी हुई नहीं है,
वह बन रही है।
लघु कथा – 43
कमला एक छोटे से शहर में रहती थी। बाहर से देखने पर उसकी ज़िंदगी साधारण थी—घर, बाज़ार, रिश्तेदार, रोज़मर्रा की भागदौड़। लेकिन भीतर, उसके मन में हमेशा शोर रहता था—डर का, तुलना का, शिकायतों का।
वह अक्सर सोचती, “सब लोग मेरे खिलाफ क्यों हैं?”
कभी उसे लगता पड़ोसी ईर्ष्या करते हैं, कभी रिश्तेदार उसकी कमज़ोरी ढूँढते हैं, कभी दुनिया ही उसे गलत लगती।
एक दिन वह बहुत थकी हुई थी। मन में गुस्सा, आँखों में आँसू। वह पास के पुराने मंदिर के पीछे बने बगीचे में जा बैठी। वहाँ एक बूढ़ा बाँसुरी बजा रहा था। धुन इतनी शांत थी कि कमला का रोना अपने आप रुक गया।
बूढ़े ने मुस्करा कर कहा,
“बहन, लगता है तुम्हारे भीतर बहुत शोर है।”
कमला चौंक गई। बोली,
“शोर तो दुनिया करती है। लोग दुख देते हैं।”
बूढ़ा बोला,
“दुनिया बस आवाज़ देती है। शोर तुम खुद बनाती हो।”
यह बात कमला को अजीब लगी।
“मतलब?” उसने पूछा।
बूढ़ा बोला,
“अगर भीतर संगीत हो, तो बाहर का शोर भी ताल बन जाता है। और अगर भीतर शोर हो, तो मीठी बात भी चुभती है।”
कमला चुप हो गई।
उस रात वह सो नहीं पाई। उसने पहली बार खुद से पूछा—
“क्या सच में मेरा दुश्मन बाहर है, या भीतर?”
अगले दिन उसने एक छोटा प्रयोग किया। जब किसी ने उसे ताना मारा, तो उसने जवाब देने की जगह गहरी साँस ली।
जब मन ने कहा, “तू बेकार है,” उसने कहा, “नहीं, तू सीख रही है।”
जब ईर्ष्या उठी, उसने कहा, “उसके पास है, मेरे पास कुछ और होगा।”
धीरे-धीरे उसने देखा—दुश्मन सच में बाहर नहीं था।
वह भीतर था—डर, हीनता, गुस्सा, तुलना के रूप में।
एक शाम वह फिर उसी बगीचे में गई। बूढ़ा फिर बाँसुरी बजा रहा था।
उसने कहा,
“मैंने अपने भीतर एक दोस्त पाया है।”
बूढ़ा हँसा,
“और वह क्या करता है?”
कमला बोली,
“वह मुझे गिरने से पहले संभालता है।
वह मुझे कहता है—तू जैसी है, ठीक है।
वह मुझे सिखाता है कि शोर से नहीं, संगीत से जीना है।”
अब कमला की ज़िंदगी बाहर से बहुत नहीं बदली थी—वही घर, वही लोग, वही शहर।
पर भीतर सब बदल गया था।
अब जब कोई कटु बोलता, तो वह मन में कहती—
“यह उसकी आवाज़ है, मेरा संगीत नहीं।”
अब जब कोई तारीफ करता, तो वह फूलकर नहीं बहकती—बस मुस्करा देती।
धीरे-धीरे लोगों ने कहा,
“कमला अब अलग लगती है… शांत… सधी हुई।”
कमला जानती थी—
वह बदली नहीं, जागी है।
एक दिन उसने अपनी बेटी से कहा,
“बाहर मत ढूँढ दुश्मन और दोस्त।
दोनों तेरे भीतर हैं।
जिसे तू खाना देगी, वही बड़ा होगा।”
उस रात कमला खिड़की के पास बैठी थी। हवा चल रही थी।
उसे लगा जैसे भीतर कोई बाँसुरी बज रही हो—
डर की जगह धैर्य,
शिकायत की जगह स्वीकार,
और शोर की जगह संगीत।
वह मुस्कराई और बोली—
“अब मैं अस्तित्व से तालमेल में हूँ।”
लघु कथा – 42
सोनू पचास की उम्र पार कर चुकी थी। लोग उसे देखकर कहते, “अब तो आराम की उम्र है।”
लेकिन सोनू के भीतर कुछ और ही चल रहा था—एक खालीपन, एक प्यास, जिसे वह शब्दों में ठीक से समझा भी नहीं पाती थी।
उसकी शादी बीस साल चली थी, पर वह शादी कभी रिश्ते जैसी नहीं रही। पति जिम्मेदार था, पर भावनात्मक रूप से दूर। न तारीफ, न स्पर्श में अपनापन, न यह एहसास कि वह किसी की चाह है। बच्चों की परवरिश और घर की जिम्मेदारियों में सोनू ने खुद को भुला दिया।
पचास के बाद जब बच्चे अपने-अपने जीवन में व्यस्त हो गए और पति भी दुनिया छोड़ गया, तब सोनू पहली बार सच में अकेली हुई।
अब उसके पास समय था—खुद के लिए।
और इसी समय उसे एहसास हुआ कि उसने कभी अपने दिल की सुनी ही नहीं।
एक दिन उसकी एक सहेली ने कहा,
“तू अब भी खूबसूरत है, सोनू। तू क्यों खुद को खत्म मान लेती है?”
यह बात सोनू के मन में घर कर गई। उसने आईने में खुद को देखा—झुर्रियाँ थीं, पर आँखों में अभी भी चमक थी। उसने सोचा,
“क्या चाह खत्म होने की कोई उम्र होती है?”
सोनू को सिर्फ शरीर की नहीं, सम्मान की भूख थी। वह चाहती थी कि कोई उसे सिर्फ “माँ” या “विधवा” नहीं, बल्कि एक औरत की तरह देखे—जिसे चाहा जा सके, जिसके पास कोई आना चाहे।
धीरे-धीरे उसने नए लोगों से मिलना शुरू किया। कुछ रिश्ते भावनात्मक थे, कुछ सिर्फ साथ चलने तक सीमित। वह किसी बंधन में नहीं बंधना चाहती थी। उसने खुद से कहा,
“अब मैं किसी के लिए नहीं, अपने लिए जीऊँगी।”
लोग बातें करने लगे—
“इस उम्र में यह सब?”
“शर्म नहीं आती?”
पर सोनू जानती थी कि उसने आधी जिंदगी दूसरों की खुशी में लगा दी थी। अब वह अपनी खुशी चाहती थी—बिना डर, बिना मजबूरी।
उसके लिए यह “असीम आज़ादी” सिर्फ शरीर की बात नहीं थी। यह उस अधिकार की बात थी जो उसने कभी लिया ही नहीं था—अपनी चाह को मानने का अधिकार, अपनी ज़रूरत को सही ठहराने का अधिकार।
वह कहती,
“मैं किसी को धोखा नहीं देती, किसी को मजबूर नहीं करती। जो भी रिश्ता है, साफ है, सहमति से है, इज़्ज़त के साथ है।”
कुछ रिश्ते टिके, कुछ टूट गए। हर अनुभव ने उसे थोड़ा और समझदार बनाया। उसे पता चला कि सिर्फ आकर्षण काफी नहीं होता—सम्मान, संवाद और सच्चाई ज़रूरी होते हैं।
एक दिन उसने अपनी डायरी में लिखा:
“मैं वासना की गुलाम नहीं हूँ। मैं उस औरत की खोज में हूँ, जो कभी बनने नहीं दी गई। अगर इस राह में मुझे प्यार, स्पर्श और साथ मिलता है, तो यह पाप नहीं—यह मेरी ज़िंदगी है।”
सोनू अब किसी से सफाई नहीं देती थी। वह जानती थी—
हर इंसान को चाहने का हक है।
उम्र शरीर की होती है, दिल की नहीं।
लघु कथा – 41
आनंद एक आधुनिक शहर में रहने वाला कॉलेज का छात्र था। उसके पास सब कुछ था—मोबाइल, लैपटॉप, इंटरनेट, गेम्स, सोशल मीडिया। लेकिन उसके पास जो नहीं था, वह था—एकाग्रता। वह घंटों स्क्रीन देखता, पर पाँच मिनट भी किसी किताब या अपने विचारों के साथ नहीं बैठ पाता।
पढ़ाई में वह ठीक-ठाक था, पर मौलिक नहीं। न कोई नया विचार, न कोई गहरी समझ। उसके शिक्षक कहते, “आनंद, तुम होशियार हो, पर सोचते कम हो।” वह हँसकर टाल देता।
एक दिन उसके दादाजी गाँव से आए। उन्होंने आनंद को देर रात तक मोबाइल में डूबा देखा। बोले,
“बेटा, मशीन को याद है सब कुछ, पर तुझे क्या याद है?”
यह बात आनंद के दिल में चुभ गई।
अगले दिन कॉलेज में एक सेमिनार था—“बुद्धि की शक्ति।” वक्ता ने कहा,
“शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा—चारों की ताकत मिलकर इंसान बनता है। लेकिन अगर बुद्धि सोई रहे, तो आदमी मशीन बन जाता है।”
आनंद जैसे अपनी ही कहानी सुन रहा था।
उसने तय किया कि वह अपनी बुद्धि को जगाएगा। उसने सुबह फोन से दूर रहकर पढ़ना शुरू किया। पहले दस मिनट भी भारी लगते, पर धीरे-धीरे आदत बन गई। वह सिर्फ नोट्स नहीं पढ़ता, सवाल पूछता, सोचता, लिखता।
उसने संगीत सीखना शुरू किया। पहले सुर बिगड़ते, पर जब वह तन्मय होकर अभ्यास करता, तो उसे भीतर से खुशी मिलती। उसने महसूस किया कि एकाग्रता से ही सृजन होता है।
धीरे-धीरे वह अपने मन को भी समझने लगा। जब मन कहता, “आज मत पढ़, आराम कर,” तब उसकी बुद्धि कहती, “आराम अच्छा है, पर कर्तव्य छोड़ना ठीक नहीं।” अब वह हर बात मन से नहीं, विवेक से तय करने लगा।
एक दिन उसके दोस्त ने कहा,
“चल, परीक्षा में शॉर्टकट अपनाते हैं।”
मन ललचाया। पर बुद्धि बोली, “यह सुविधा नहीं, धोखा है।” आनंद ने मना कर दिया।
उस रात वह देर तक सोचता रहा—“मन चालाक है, पर बुद्धि सच्ची।”
अब वह सिर्फ अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए भी अच्छा सोचने लगा। वह बच्चों को पढ़ाने लगा, उन्हें सोचने की आदत सिखाने लगा। वह कहता,
“रटना नहीं, समझना सीखो।”
एक दिन ध्यान करते हुए उसे अजीब शांति मिली। जैसे भीतर कोई उजाला जल उठा हो। उसने महसूस किया कि वह सिर्फ शरीर या दिमाग नहीं है—उसके भीतर कुछ शुद्ध, शांत और मजबूत है।
दादाजी ने कहा,
“बेटा, यही आत्मा है—जो न जन्म लेती है, न मरती है।”
अब आनंद का जीवन बदल चुका था। उसमें ताकत थी—शरीर की, मन की, बुद्धि की और आत्मा की। वह मशीन नहीं, इंसान बन चुका था।
वह जान गया था—
“असली शक्ति दिखावे में नहीं, भीतर की जागृति में है।”
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