लघु कथा -95

शहर का नाम था उज्जवलपुर, पर वहाँ रहने वाले बहुत से लोगों की ज़िंदगी उतनी उजली नहीं थी। वहीं रहता था राघव—सीधा, शांत और दिल का साफ इंसान। वह मानता था कि इंसान की असली पहचान उसके काम से होती है, न कि उसकी बातों से।
राघव एक छोटी-सी फैक्ट्री में काम करता था। तनख़्वाह ज़्यादा नहीं थी, लेकिन वह ईमानदारी से काम करता था। एक दिन फैक्ट्री के मालिक ने उससे कहा, “अगर तुम कुछ माल चोरी से बाहर भिजवा दो, तो तुम्हें अच्छी रकम मिलेगी।”
राघव चौंक गया। उसके घर में माँ बीमार थी, दवाइयों के पैसे चाहिए थे। पल भर के लिए उसका मन डगमगाया, लेकिन उसने कहा, “मालिक, मैं ग़लत काम नहीं कर सकता।”
मालिक ने दूसरा आदमी ढूँढ लिया—नाम था विकास। विकास चालाक था, पैसों का भूखा और मौके का फायदा उठाने वाला। उसने तुरंत हाँ कर दी। कुछ ही दिनों में वह ज़्यादा पैसे कमाने लगा। नए कपड़े, नई बाइक, शहर में नाम—सब मिलने लगा।
उधर राघव अपनी पुरानी ज़िंदगी में लगा रहा। माँ की दवा के लिए उसने दोहरी मेहनत शुरू कर दी—दिन में फैक्ट्री, रात को एक गोदाम में मजदूरी। लोग कहते, “इतनी मेहनत क्यों करता है, थोड़ा चालाक बन, तो ज़िंदगी आसान हो जाएगी।”
विकास हँसता और कहता, “देखो, अच्छाई से पेट नहीं भरता, दिमाग से भरता है।”
कुछ महीनों बाद फैक्ट्री में छापा पड़ा। चोरी का माल पकड़ा गया। जाँच शुरू हुई। मालिक ने सारा दोष विकास पर डाल दिया। विकास घबरा गया। जिन दोस्तों के साथ वह शराब पीता था, वे सब गायब हो गए। पैसे भी ज़ब्त हो गए।
विकास को जेल भेज दिया गया। कोर्ट में खड़ा होकर उसने रोते हुए कहा, “मैंने सोचा था कि बुराई का दाम तुरंत मिलता है, लेकिन पता नहीं था कि उसकी कीमत एक दिन पूरी ज़िंदगी से चुकानी पड़ेगी।”
उधर फैक्ट्री को नया मालिक मिला। उसने पुराने रिकॉर्ड देखे और राघव की ईमानदारी से प्रभावित हुआ। उसने राघव को सुपरवाइज़र बना दिया और तनख़्वाह भी बढ़ा दी। गाँव में लोग कहने लगे, “देखो, राघव की अच्छाई रंग लाई।”
एक दिन जेल से छूटकर विकास राघव से मिलने आया। उसका चेहरा थका हुआ था, आँखों में पछतावा। उसने कहा, “राघव, तुम सही थे। अच्छाई की कीमत मिलती है, लेकिन देर से। और बुराई की कीमत चुकानी पड़ती है—और वो बहुत भारी होती है।”
राघव ने उसके कंधे पर हाथ रखा, “अभी भी देर नहीं हुई, विकास। अब से अच्छा करोगे, तो उसका फल ज़रूर मिलेगा।”
विकास ने नया काम शुरू किया—छोटी-सी दुकान। शुरुआत मुश्किल थी, लोग उस पर भरोसा नहीं करते थे। लेकिन वह रोज़ मेहनत करता, सच बोलता, सही तौल देता। धीरे-धीरे लोग लौटने लगे।
कई साल बाद, उज्जवलपुर में दो नाम इज्ज़त से लिए जाते थे—राघव, जिसकी अच्छाई ने उसे ऊँचाई तक पहुँचाया, और विकास, जिसने बुराई की कीमत चुकाकर अच्छाई का रास्ता चुना।
शहर के बुज़ुर्ग अक्सर कहते,
“आदमी की अच्छाई और बुराई—दोनों की कीमत होती है। फर्क बस इतना है कि अच्छाई की कीमत मिलती है, और बुराई की कीमत चुकानी पड़ती है।”

लघु कथा -99

छोटे से शहर नीलपुर में अर्जुन नाम का युवक रहता था। उसका स्वभाव इतना सरल और सीधा था कि लोग कहते थे—“अर्जुन तो मिट्टी जैसा है, जैसा चाहो वैसा ढाल लो।” वह हर किसी की बात मान लेता, बिना ना कहे, बिना सवाल किए।
पड़ोस में रहने वाला विक्रम चतुर था। वह जानता था कि अर्जुन कभी मना नहीं करेगा। कभी पैसे उधार लेने हों, कभी काम टालना हो, कभी किसी का बोझ किसी और पर डालना हो—सब अर्जुन पर डाल देता। अर्जुन हर बार सोचता, “कोई बात नहीं, मेरा क्या जाता है।”
ऑफिस में भी यही हाल था। अर्जुन मेहनती था, लेकिन उसका बॉस उसका काम दूसरों के नाम से दिखा देता। अर्जुन चुप रहता। उसे लगता, “मुझे क्या चाहिए, मैं तो अपना काम कर रहा हूँ।”
धीरे-धीरे लोगों को उसकी आदत समझ आ गई। जैसे सूखे कपड़े बिना सोचे बिजली के तार पर डाल दिए जाते हैं, वैसे ही लोग अपनी ज़िम्मेदारियाँ अर्जुन पर टांगने लगे।
एक दिन अर्जुन की माँ बीमार पड़ गई। अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। अर्जुन को पैसों की ज़रूरत थी। वह सबसे पहले विक्रम के पास गया, जिसने उससे कई बार मदद ली थी।
विक्रम ने कहा, “अरे यार, अभी मेरे पास तो कुछ नहीं है, बाद में देखेंगे।” और दरवाज़ा बंद कर लिया।
अर्जुन ऑफिस गया और बॉस से बोला, “सर, मुझे कुछ दिन की छुट्टी चाहिए और अगर हो सके तो मेरी ओवरटाइम की पेमेंट…”
बॉस ने कहा, “अभी कंपनी की हालत ठीक नहीं है, तुम एडजस्ट कर लो, वैसे भी तुम तो समझदार हो।”
अर्जुन पहली बार टूटा। उसे लगा जैसे पूरी ज़िंदगी वह लोगों के लिए तार बना रहा और लोग उस पर अपने-अपने कपड़े सुखाते रहे, लेकिन जब उसे खुद रोशनी चाहिए थी, तब कोई करंट नहीं दिया।
उसी रात वह माँ के पास बैठा था। माँ ने कमजोर आवाज़ में कहा, “बेटा, अच्छे बनो, लेकिन इतने नहीं कि लोग तुम्हें इस्तेमाल करने लगें। जिन तारों में करंट नहीं होता, उन पर ही लोग कपड़े सुखाते हैं।”
ये शब्द अर्जुन के दिल में उतर गए।
अगले दिन से उसने बदलना शुरू किया। जब विक्रम फिर से उधार माँगने आया, अर्जुन ने साफ कहा, “इस बार नहीं, मुझे खुद ज़रूरत है।”
विक्रम चौंका, बोला, “तू भी बदल गया?”
अर्जुन शांत स्वर में बोला, “नहीं, अब मैं खुद को समझने लगा हूँ।”
ऑफिस में जब बॉस ने फिर से उसका काम किसी और के नाम से दिखाया, अर्जुन ने मीटिंग में कहा, “सर, ये प्रोजेक्ट मैंने किया है, और मैं चाहता हूँ कि इसका क्रेडिट मुझे मिले।” कमरे में सन्नाटा छा गया। बॉस को मजबूरन मानना पड़ा।
धीरे-धीरे लोग समझने लगे कि अर्जुन अब वह पुराना तार नहीं है जिस पर कोई भी कपड़े टांग दे। उसमें अब आत्मसम्मान का करंट था।
कुछ लोगों ने उससे दूरी बना ली, क्योंकि उन्हें फायदा नहीं मिल रहा था। लेकिन कुछ नए लोग उसकी ज़िंदगी में आए, जो उसे इंसान की तरह समझते थे, इस्तेमाल की चीज़ की तरह नहीं।
एक दिन अर्जुन ने खुद से कहा, “सरल होना बुरा नहीं, लेकिन इतना सरल होना कि लोग मुझे कुचल दें—यह मेरी गलती थी।”
अब वह वही करता था जो सही और ज़रूरी होता। वह मदद करता, लेकिन अपनी सीमा में।
और पहली बार, उसे लगा कि उसके अंदर सच में रोशनी जल रही है।

लघु कथा -98

गाँव का नाम था नवलपुर। वहाँ रहने वाले शंकरलाल सीधे-सादे और बेहद मददगार इंसान थे। उनका मानना था कि अच्छा किया जाए तो उसका हिसाब भगवान रखता है, इंसान नहीं। इसी सोच के साथ वे बिना किसी अपेक्षा के लोगों की मदद करते रहते थे।
पास ही रहने वाला सुरेश बिल्कुल अलग स्वभाव का था। वह हर बात का हिसाब रखता—किसने क्या दिया, कब दिया, और बदले में क्या मिला। उसकी एक छोटी-सी कॉपी थी, जिसमें वह सब लिखता रहता। लोग मज़ाक में उसे “हिसाबू” कहने लगे थे।
एक दिन गाँव में तेज़ बारिश आई। कई घरों में पानी घुस गया। शंकरलाल ने अपने घर के दरवाज़े सबके लिए खोल दिए। जिस किसी को जगह चाहिए, वह आ सकता था। उन्होंने अपने अनाज का भंडार भी बाँट दिया। किसी से कुछ नहीं पूछा।
सुरेश भी मदद कर रहा था, लेकिन हर किसी से कहता, “देख लेना, मैंने तुम्हें क्या-क्या दिया है।” वह अपनी कॉपी में सब लिख रहा था—तीन किलो चावल, दो कंबल, पाँच सौ रुपये।
कुछ महीने बाद हालात ठीक हुए। लोग अपने काम में लग गए। शंकरलाल फिर से अपनी दिनचर्या में लौट आए, जैसे कुछ हुआ ही न हो। सुरेश इंतज़ार करने लगा कि लोग उसका एहसान चुकाएँ।
एक दिन गाँव की पंचायत बैठी। किसी बात पर चर्चा हो रही थी, तभी सुरेश खड़ा हो गया और बोला, “मैंने बारिश के समय कितनों की मदद की, उसका हिसाब मेरे पास है। अब लोग पूछते हैं—‘तुमने हमारे लिए किया ही क्या है?’ तो मैं सब दिखा सकता हूँ।”
उसने अपनी कॉपी खोलकर नाम पढ़ने शुरू किए। लोग चुप हो गए। कुछ के चेहरे झुक गए, कुछ असहज हो गए। माहौल भारी हो गया।
तभी शंकरलाल उठे और बोले, “सुरेश, तुमने सच में बहुत मदद की, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन अगर मदद का हिसाब किताब में रहेगा, तो वह बोझ बन जाता है, उपकार नहीं।”
सुरेश ने कहा, “लेकिन आजकल लोग जल्दी भूल जाते हैं। कल को कोई पूछे—‘तुमने मेरे लिए किया ही क्या है?’ तो जवाब देने के लिए सबूत तो होना चाहिए।”
शंकरलाल मुस्कराए, “साहब, हिसाब ज़रूर रखा करो, लेकिन दिल में नहीं, काग़ज़ में नहीं—अपने कर्मों में। अगर किसी ने तुम्हारी मदद भूल भी जाए, तो क्या हुआ? तुम्हारा काम तो हो चुका।”
उसी समय भीड़ में से एक बुज़ुर्ग बोले, “शंकरलाल, याद है, मेरे बेटे की शादी में तुमने बिना बुलाए आकर सब संभाल लिया था। तुमने कभी बताया नहीं, लेकिन मैं आज भी नहीं भूला।”
फिर एक महिला बोली, “जब मेरा घर गिरा था, सबसे पहले शंकरलाल ही आए थे।”
धीरे-धीरे कई लोग खड़े होकर शंकरलाल के काम गिनाने लगे। शंकरलाल हैरान हो गए, उन्हें खुद याद नहीं था कि उन्होंने कब क्या किया।
सुरेश चुपचाप अपनी कॉपी बंद करने लगा। उसे समझ आ गया कि जिन रिश्तों में दिल से दिया जाता है, वहाँ हिसाब ज़ुबान पर नहीं आता, लेकिन यादों में अपने आप बस जाता है।
सभा खत्म हुई। बाहर निकलते हुए सुरेश ने शंकरलाल से कहा, “आज समझ आया कि सच्चा हिसाब वही है, जो सामने वाले के दिल में दर्ज हो जाए।”
शंकरलाल ने मुस्कराकर कहा, “और जो दिल में न रहे, वह काग़ज़ पर रहकर भी बेकार होता है।”

लघु कथा -97

गुजरात के सौराष्ट्र इलाके के एक छोटे-से कस्बे में केशवभाई रहते थे। लोग उन्हें “केशव काका” कहकर बुलाते थे। उनके चेहरे पर हमेशा सादगी और आँखों में अपनापन झलकता था। केशवभाई भावुक इंसान थे। उनके लिए रिश्ते किसी सौदे की तरह नहीं, बल्कि दिल के धागों से बुनी गई डोर थे।
उनके बचपन का दोस्त था—मनोज। मनोज प्रैक्टिकल किस्म का आदमी था। वह हर रिश्ते को हिसाब-किताब से तौलता। फायदा दिखे तो साथ, नहीं तो दूरी। तीसरा किरदार था—राहुल शाह, एक बड़ा बिजनेसमैन, जो पास के शहर में फैक्ट्री चलाता था। राहुल पूरी तरह प्रोफेशनल था। उसके लिए रिश्ता तभी मायने रखता, जब उससे कोई लाभ हो।
एक साल गाँव में भयंकर सूखा पड़ा। पानी की किल्लत से किसान परेशान थे। केशवभाई ने अपने घर के पास एक पुराना कुआँ साफ करवाया और सबके लिए खोल दिया। उन्होंने किसी से कुछ नहीं माँगा। जो भी आता, वह प्यार से पानी भरने देता। लोग कहते, “केशव काका दिल के बहुत बड़े हैं।”
मनोज ने यह देखा तो सोचा, “अगर मैं केशव के साथ रहूँ, तो गाँव में मेरी इज्ज़त बढ़ेगी।” वह रोज़ उनके साथ बैठने लगा, लोगों से मिलवाने लगा और धीरे-धीरे अपनी छोटी दुकान के लिए ग्राहक भी वहीं से खींचने लगा। वह रिश्ते का फायदा उठा रहा था, लेकिन ऊपर से दोस्ती दिखा रहा था।
उधर राहुल शाह ने भी यह सब सुना। उसने सोचा, “अगर मैं गाँव में पानी की टंकी बनवाऊँ, तो मेरी कंपनी का नाम चमकेगा, और सरकारी ठेके भी मिल सकते हैं।” वह केशवभाई के पास आया और बोला, “काका, आपके नाम से हम एक बड़ा प्रोजेक्ट करेंगे। आपका नाम होगा, खर्चा मेरा।” केशवभाई खुश हो गए कि गाँव का भला होगा, लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि राहुल का असली मकसद सिर्फ फायदा था।
काम शुरू हुआ। टंकी बनी, पानी आया, गाँव खुश हुआ। केशवभाई हर दिन मज़दूरों को अपने हाथ से चाय पिलाते। उन्हें किसी का दुख दिखता तो बिना पूछे मदद कर देते। मनोज अपनी दुकान का प्रचार करता रहा और कमाई बढ़ाता रहा। राहुल अखबारों में अपनी फोटो छपवाता रहा और बड़े अधिकारियों से पहचान बनाता रहा।
कुछ महीनों बाद, राहुल को शहर में बड़ा प्रोजेक्ट मिल गया। उसने गाँव आना बंद कर दिया। टंकी की मरम्मत की ज़िम्मेदारी भी उसने किसी पर नहीं छोड़ी। मनोज की दुकान खूब चलने लगी, लेकिन जब एक दिन केशवभाई बीमार पड़े, तो मनोज ने कहा, “आज दुकान बंद नहीं कर सकता, काका, बहुत भीड़ है।” वह उन्हें अस्पताल तक छोड़ने भी नहीं गया।
गाँव के लोग ही केशवभाई को लेकर गए। इलाज के बाद जब वे लौटे, तो पूरे गाँव ने उनका स्वागत किया। किसी ने कहा, “काका, आपने बिना मतलब के सबका साथ दिया, इसलिए आज सब आपके साथ हैं।”
केशवभाई मुस्कराए और बोले, “भावुक लोग रिश्ते निभाते हैं, प्रैक्टिकल लोग रिश्ते से कमाते हैं, और प्रोफेशनल लोग फायदा देखकर रिश्ता बनाते हैं। पर अंत में साथ वही देते हैं, जिनके दिल में रिश्ता होता है, हिसाब नहीं।”
उस दिन मनोज को अपनी गलती समझ आई और राहुल शाह का नाम लोग धीरे-धीरे भूल गए। लेकिन केशव काका आज भी गाँव के दिल में ज़िंदा हैं—एक सच्चे रिश्ते की तरह।

लघु कथा -96

कश्मीर की वादियों में बसा एक छोटा-सा गाँव—पहल्गाम के पास। वहीं रहता था आदिल, बीस साल का नौजवान, जो कविताएँ लिखा करता था। उसकी कविताएँ अजीब थीं—न उनमें साफ़ मतलब होता, न कोई सीधी बात। लोग कहते,
“ये क्या लिखता है? न समझ आता है, न दिल को छूता है। पूरी की पूरी अर्थहीन कविताएँ हैं।”
आदिल को इससे फर्क नहीं पड़ता था। वह कहता,
“जो दिल में है, वही काग़ज़ पर उतरता है। अगर वह उलझा है, तो कविता भी उलझी होगी।”
आदिल के पिता सेब के बाग़ में काम करते थे। माँ घर संभालती थीं। परिवार साधारण था, पर आदिल का मन बहुत उलझा हुआ था। कभी घाटी में शांति होती, कभी डर का साया। कभी स्कूल बंद, कभी दुकानें। उसके भीतर जो भाव थे, वे साफ़ शब्दों में निकल ही नहीं पाते थे।
एक दिन गाँव में एक बूढ़े उस्ताद आए—नाम था हबीब साहब। वे कभी बड़े शायर रह चुके थे। लोग उनके पास सलाह लेने जाते थे। किसी ने आदिल की कविताएँ उन्हें दिखा दीं।
हबीब साहब ने कविताएँ पढ़ीं। फिर आदिल को बुलाया और बोले,
“तेरी कविताएँ सच में अर्थहीन लगती हैं।”
आदिल का सिर झुक गया।
“तो क्या मैं लिखना छोड़ दूँ?”
हबीब साहब मुस्कराए,
“नहीं। सवाल यह नहीं कि कविता में अर्थ है या नहीं। सवाल यह है कि तू क्या कहना चाहता है।”
आदिल बोला,
“मैं खुद नहीं जानता। मेरे भीतर डर है, गुस्सा है, उम्मीद है, सब मिला-जुला है। जब लिखता हूँ, सब टूटे-फूटे शब्द बन जाते हैं।”
हबीब साहब ने कहा,
“जब दिल टूटा होता है, तो भाषा भी टूट जाती है। तेरी कविताएँ अर्थहीन नहीं हैं, वे अधूरी हैं।”
कुछ दिन बाद गाँव में एक घटना हुई। एक छोटी बच्ची, आयशा, अपने पिता को खो बैठी। पूरा गाँव उदास था। आदिल भी चुप था। उस रात उसने एक कविता लिखी—बहुत छोटी, बहुत टूटी हुई:
“घर में चूल्हा है,
पर रोटी रो रही है।”
सुबह उसने यह कविता हबीब साहब को दिखाई। हबीब साहब की आँखें भर आईं।
“बेटा, इसमें बहुत अर्थ है। तूने बस बड़ी बातें छोड़कर सच्ची छोटी बात लिख दी।”
आदिल को पहली बार लगा कि शायद उसकी कविता किसी तक पहुँची है।
धीरे-धीरे वह बदलने लगा। अब वह लिखते समय यह नहीं सोचता था कि कविता बड़ी हो, सुंदर हो या मुश्किल हो। वह बस यह सोचता—जो देखा, जो महसूस किया, वही लिख दूँ।
उसने लिखा—
बर्फ़ पर चलती बूढ़ी माँ के कदम,
स्कूल जाते बच्चे की ठंडी साँस,
बंद दुकान के ताले की खामोशी।
लोग अब भी सब कुछ नहीं समझते थे, पर उन्हें महसूस होने लगा था।
एक दिन किसी ने कहा,
“पहले तेरी कविताएँ अर्थहीन थीं, अब कुछ तो कहती हैं।”
आदिल मुस्कराया,
“पहले मैं खुद अर्थहीन था। अब मैं अपने दर्द को पहचानने लगा हूँ।”
हबीब साहब ने जाते समय कहा,
“कविता का काम समझाना नहीं, महसूस कराना है। जो महसूस करा दे, वह कभी अर्थहीन नहीं होती।”
आदिल अब भी कश्मीर की वादियों में घूमता, लिखता, सोचता। उसकी कविताएँ शायद पूरी तरह साफ़ नहीं थीं, पर अब वे खाली भी नहीं थीं। वे उसी घाटी की तरह थीं—कभी धुंधली, कभी उजली, पर हमेशा ज़िंदा।
वक़्त बीतता गया। हबीब साहब वापस अपने शहर चले गए, पर उनके शब्द आदिल के भीतर रह गए। अब आदिल रोज़ सुबह बाग़ में पिता के साथ काम करता, दोपहर में माँ की मदद करता और शाम को पहाड़ियों पर जाकर बैठ जाता। उसके पास कोई बड़ी डायरी नहीं थी, बस जेब में रखा छोटा-सा काग़ज़ और टूटा हुआ पेन।
कभी वह लिखता—
“पेड़ खड़े हैं, जैसे किसी के इंतज़ार में।”
कभी बस एक पंक्ति—
“आज घाटी चुप है, पर चुप्पी भारी है।”
गाँव के लोग अब उसे अजीब नहीं कहते थे। वे कहते, “ये लड़का अलग है, पर बुरा नहीं।”
एक दिन स्कूल के मास्टर साहब ने उससे कहा, “आदिल, बच्चों को कविता सुनाया कर। किताब की नहीं, अपनी।”
आदिल घबरा गया, “मेरी कविता बच्चे समझेंगे?”
मास्टर साहब बोले, “अगर वे हँसें, चुप हों, या सोच में पड़ जाएँ—तो समझ लेना, समझ गए।”
आदिल पहली बार स्कूल गया। बच्चों के सामने उसने वही कविता पढ़ी—
“घर में चूल्हा है, पर रोटी रो रही है।”
कक्षा एकदम शांत हो गई। फिर एक छोटी बच्ची बोली, “सर, रोटी क्यों रो रही है?”
आदिल ने कहा, “जब घर में कोई नहीं हँसता, तब चीज़ें भी उदास हो जाती हैं।”
बच्ची चुप हो गई। उसकी आँखों में वही उदासी थी, जो कभी आयशा की आँखों में थी। आदिल समझ गया—कविता पहुँच गई।
उस दिन के बाद वह हफ्ते में एक बार स्कूल जाने लगा। बच्चे उसकी कविताएँ कॉपी में लिखते, चित्र बनाते, कुछ अपनी पंक्तियाँ भी जोड़ते। आदिल को लगा—उसकी उलझन अब किसी और की आवाज़ बन रही है।
एक शाम वह नदी के किनारे बैठा था। सूरज डूब रहा था। उसने लिखा—
“डूबता सूरज भी कहता है, मैं हार नहीं रहा, बस आज का काम पूरा कर रहा हूँ।”
उसने आसमान की तरफ देखा और धीरे से कहा, “मैं भी हार नहीं रहा हूँ।”
अब उसकी कविताएँ न पूरी तरह साफ़ थीं, न पूरी तरह उलझी। वे इंसान की तरह थीं—थोड़ी टूटी, थोड़ी जुड़ी, थोड़ी डर से भरी, थोड़ी उम्मीद से चमकती।
और कश्मीर की वादियों में, जहाँ हर चीज़ के अपने ज़ख़्म थे, वहाँ आदिल की कविताएँ मरहम नहीं थीं—
पर वे यह ज़रूर कहती थीं कि
दर्द अगर बोला जाए, तो वह अकेला नहीं रहता।

लघु कथा -100

पश्चिम बंगाल के शांत शहर शांतिनिकेतन के पास एक छोटा-सा गाँव था—बेलघरिया। वहीं रहते थे वृद्ध शिक्षक अनिरुद्ध बाबू। वे रिटायर हो चुके थे, पर गाँव के बच्चों को अब भी रोज़ शाम पेड़ के नीचे बैठाकर पढ़ाते थे। उनकी जेब में पैसे कम थे, पर अनुभवों की दौलत बहुत बड़ी।
गाँव में एक लड़का था—रोहन। पढ़ाई में तेज था, पर बहुत अधीर। वह चाहता था कि जल्दी बड़ा आदमी बने, बड़ा घर हो, बड़ी गाड़ी हो। उसे छोटे कामों से चिढ़ थी। वह कहता,
“इन छोटी-छोटी बातों से क्या होगा? कुछ बड़ा करना चाहिए।”
एक दिन रोहन ने देखा कि अनिरुद्ध बाबू सड़क किनारे गिरे एक घायल पंछी को उठा रहे हैं। रोहन बोला,
“बाबू, इस छोटे से पंछी के लिए इतना समय क्यों खराब कर रहे हैं? इससे दुनिया थोड़े बदल जाएगी।”
अनिरुद्ध बाबू मुस्कराए,
“दुनिया बदले या न बदले, इस पंछी की दुनिया तो बदल जाएगी।”
रोहन चुप हो गया, पर बात उसके मन में बैठ नहीं पाई।
कुछ दिनों बाद गाँव में बारिश के कारण कच्ची सड़क टूट गई। स्कूल जाने वाले बच्चों को बहुत परेशानी होने लगी। रोहन ने सोचा—यह सरकार का काम है, हम क्या कर सकते हैं। लेकिन उसने देखा कि अनिरुद्ध बाबू रोज़ दो-तीन पत्थर लाकर गड्ढों में भर देते थे।
रोहन हँसते हुए बोला,
“बाबू, आपके दो पत्थर से क्या होगा? पूरी सड़क तो नहीं बन जाएगी।”
अनिरुद्ध बाबू ने कहा,
“अगर हर आदमी दो पत्थर डाल दे, तो सड़क बन जाएगी।”
अगले दिन रोहन ने भी मज़ाक में दो पत्थर डाल दिए। फिर उसके दोस्त ने भी, फिर कुछ और बच्चों ने भी। एक हफ्ते में रास्ता चलने लायक हो गया। रोहन हैरान था—छोटा काम, पर बड़ा असर।
एक और दिन रोहन ने देखा कि बाबू हर सुबह अपनी दुकान से अखबार लेने वाले दुकानदार को मुस्कराकर धन्यवाद कहते हैं। रोहन ने पूछा,
“बाबू, इसमें क्या खास बात है?”
बाबू बोले,
“मुस्कान मुफ्त होती है, पर किसी का दिन बना सकती है।”
उसी दिन रोहन ने भी पहली बार बस कंडक्टर से मुस्कराकर बात की। कंडक्टर ने उसे बिना चिढ़े सही स्टॉप बता दिया। रोहन को अच्छा लगा।
सबसे बड़ा सबक उसे तब मिला, जब गाँव में एक बूढ़ी विधवा बीमार पड़ी। कोई उसके पास नहीं जाता था। अनिरुद्ध बाबू रोज़ उसके लिए थोड़ा खाना ले जाते। एक दिन रोहन भी साथ गया। बूढ़ी अम्मा ने कांपते हाथों से उसका सिर छुआ और बोली,
“बेटा, आज किसी ने मुझे इंसान समझा।”
रोहन की आँखें भर आईं। उसे लगा कि वह बड़े सपनों में उलझकर छोटे इंसानों को भूल गया था।
शाम को रोहन ने अनिरुद्ध बाबू से कहा,
“बाबू, मुझे समझ आ गया। बड़े बदलाव छोटे कामों से ही शुरू होते हैं।”
अनिरुद्ध बाबू मुस्कराए,
“बिलकुल। छोटी बातों को जो सम्मान देता है, वही बड़ी बातें समझ पाता है।”
अब रोहन हर दिन कोई न कोई छोटा अच्छा काम करने लगा—कभी किसी बच्चे को पढ़ा देता, कभी किसी बूढ़े का थैला उठा देता, कभी रास्ते से कचरा हटा देता।
उसके सपने अब भी बड़े थे, पर उसका दिल पहले से बड़ा हो गया था। और वह समझ गया था—
छोटे किस्से ही एक दिन बड़ी कहानी बनाते

लघु कथा -94

पंजाब के लुधियाना जिले के एक छोटे से गाँव में हरप्रीत सिंह रहता था। उसके पिता किसान थे और माँ घर संभालती थीं। हरप्रीत पढ़ाई में ठीक था, पर बहुत संकोची। उसे हमेशा लगता था कि वह कुछ खास नहीं कर सकता। जब भी कोई उससे पूछता, “बेटा, आगे क्या बनोगे?” वह सिर झुका कर कह देता, “पता नहीं।”
पिता चाहते थे कि हरप्रीत इंजीनियर बने। उन्होंने खेत बेचकर उसकी पढ़ाई के लिए पैसे जुटाए। शहर भेजते समय पिता ने कहा,
“बेटा, मेहनत करना। सफलता कर्म से मिलती है।”
हरप्रीत ने मन ही मन सोचा, “मेहनत तो कर लूँगा, पर क्या मैं सच में सफल हो पाऊँगा?”
कॉलेज में कई लड़के उससे ज्यादा तेज, ज्यादा बोलने वाले और ज्यादा आत्मविश्वासी थे। हरप्रीत मेहनत करता था, पर जब भी कोई प्रतियोगिता या प्रस्तुति होती, वह डर के मारे पीछे हट जाता। एक बार प्रोफेसर ने कहा,
“तुम मेहनती हो, पर तुम्हारे भीतर आत्मविश्वास की कमी है। बिना ईंधन के गाड़ी नहीं चलती।”
यह बात उसके दिल में बैठ गई।
एक दिन कॉलेज में स्टार्टअप प्रतियोगिता हुई। हरप्रीत के पास एक अच्छा विचार था—किसानों के लिए मोबाइल ऐप, जिससे वे सही दाम पर फसल बेच सकें। पर उसे लगा, “मेरे जैसे साधारण लड़के की बात कौन सुनेगा?” उसने फॉर्म भरने का मन बना ही लिया था, फिर फाड़ दिया।
उसी रात उसे पिता की याद आई—उनके खुरदरे हाथ, उनकी उम्मीद भरी आँखें। उसे लगा कि पिता ने केवल उसके कर्म पर भरोसा नहीं किया, उसके ऊपर भी भरोसा किया है। अगर वह खुद पर भरोसा नहीं करेगा, तो मेहनत भी बेकार हो जाएगी।
अगले दिन उसने फिर से फॉर्म भरा।
तैयारी के दिन बहुत मुश्किल थे। वह दिन-रात मेहनत करता, पर साथ ही आईने के सामने खड़े होकर बोलने का अभ्यास भी करता। शुरू में उसकी आवाज काँपती, पर धीरे-धीरे मजबूत होने लगी। वह खुद से कहता,
“मेहनत मेरे पहिए हैं, और आत्मविश्वास मेरा ईंधन।”
प्रतियोगिता के दिन उसका नाम पुकारा गया। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। पर उसने गहरी साँस ली और मंच पर चढ़ गया। उसने अपने गाँव, अपने पिता और किसानों की मुश्किलों की बात की। फिर अपने ऐप का विचार बताया। इस बार वह नहीं डरा। वह बोलता गया, और शब्द खुद-ब-खुद रास्ता बनाते गए।
तालियाँ बजीं।
नतीजा आया—हरप्रीत दूसरा नहीं, पहला आया।
जब वह गाँव लौटा तो पिता ने उसे गले लगा लिया। पिता बोले,
“बेटा, तूने कमाल कर दिया।”
हरप्रीत की आँखों में आँसू आ गए।
“पिताजी, मैंने सीखा कि सिर्फ मेहनत काफी नहीं होती। मेहनत तो गाड़ी है, पर उसे चलाने के लिए आत्मविश्वास का ईंधन चाहिए।”
कुछ महीनों बाद उसका ऐप सच में किसानों के काम आने लगा। लोग अब उसे उदाहरण के रूप में देते। वही हरप्रीत, जो कभी खुद पर भरोसा नहीं करता था, अब दूसरों को सिखाता था—
“सफलता कर्म के पहियों पर चलती है, पर आत्मविश्वास के बिना वह एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकती।”

लघु कथा -93

महाराष्ट्र के एक छोटे से शहर सातारा में गणेश पाटिल रहते थे। बचपन से ही उनके मन में बड़ी-बड़ी इच्छाएँ थीं—बड़ा अफसर बनना, शहर में बंगला खरीदना, लोग उनका नाम आदर से लें। पढ़ाई में वे ठीक थे, पर हालात हमेशा उनके मन के अनुसार नहीं बने। नौकरी मिली, पर साधारण सी। गणेश मन ही मन दुखी रहने लगे। उन्हें लगता था कि जिंदगी ने उनके साथ अन्याय किया है।
घर में बूढ़े माँ-बाप थे, पत्नी सविता और दो छोटे बच्चे। माँ अक्सर बीमार रहतीं। पिता अब चल भी ठीक से नहीं पाते थे। गणेश जब घर आते, तो थके मन से कहते,
“मेरे सपने अधूरे रह गए। जिंदगी में कुछ खास नहीं कर पाया।”
सविता चुपचाप सब सुनती, पर एक दिन बोली,
“तुम्हारे सपने बड़े थे, पर तुम्हारे फर्ज भी तो बड़े हैं।”
गणेश को यह बात अच्छी नहीं लगी। उन्हें लगा कि कोई उनकी पीड़ा नहीं समझता।
एक दिन उनके दफ्तर में एक बुज़ुर्ग अधिकारी सेवानिवृत्त हुए। विदाई समारोह में उन्होंने कहा,
“मैंने बड़े पद नहीं पाए, पर अपने फर्ज निभाए। माता-पिता की सेवा की, बच्चों को अच्छा इंसान बनाया, ईमानदारी से काम किया। आज इसी में मुझे शांति मिलती है।”
यह बात गणेश के दिल में कहीं गूँज गई।
उसी शाम गणेश घर लौटे तो देखा—माँ को तेज बुखार था, पिता उन्हें सहारा देकर बैठा रहे थे। सविता बच्चों को पढ़ा रही थी। गणेश पहली बार ध्यान से यह सब देख रहे थे। उन्हें लगा—ये लोग हर दिन अपना फर्ज निभा रहे हैं, और मैं केवल अपनी अधूरी इच्छाओं का रोना रोता हूँ।
उन्होंने माँ के पास बैठकर कहा,
“आई, आपको दवा दिलवाने ले चलता हूँ।”
माँ ने प्यार से सिर सहलाया,
“बेटा, तू साथ है, यही मेरे लिए काफी है।”
अस्पताल जाते हुए गणेश को अजीब-सी शांति महसूस हुई। उन्हें लगा जैसे दिल का बोझ हल्का हो रहा हो।
अगले दिन उन्होंने बच्चों के साथ समय बिताया। उन्हें कहानी सुनाई, अच्छे-बुरे का फर्क समझाया। बच्चे खुश होकर बोले,
“बाबा, आप रोज हमारे साथ बैठा करो।”
गणेश के चेहरे पर पहली बार सच्ची मुस्कान आई।
कुछ दिनों बाद उन्होंने अपने पिता से कहा,
“बाबा, अब मैं रोज सुबह आपके साथ टहलने चलूँगा।”
पिता की आँखें भर आईं,
“बेटा, तेरी यह बात सुनकर ही मेरा मन खुश हो गया।”
धीरे-धीरे गणेश का नजरिया बदलने लगा। अब वे यह नहीं सोचते थे कि उन्हें क्या नहीं मिला। वे यह देखते थे कि वे क्या कर सकते हैं—माँ-बाप की सेवा, बच्चों को अच्छे संस्कार, पत्नी का साथ, ईमानदारी से नौकरी।
एक दिन सविता ने कहा,
“आजकल तुम बहुत शांत लगते हो।”
गणेश मुस्कराए,
“क्योंकि अब मैंने इच्छाओं को पीछे रख दिया है। अब मैं यह देखता हूँ कि मैंने आज अपना फर्ज निभाया या नहीं। अगर निभाया, तो मैं खुश।”
उन्हें समझ आ गया था कि स्वर्ग कोई दूर की जगह नहीं है। वह वहीं बनता है, जहाँ इंसान अपने कर्तव्यों को प्रेम से निभाता है। इच्छाएँ पूरी हों या न हों, अगर दिल में यह संतोष हो कि “मैंने जो करना था, वह किया”—तो वही सच्ची खुशी है।
अब गणेश पाटिल बड़े आदमी नहीं बने, पर अच्छे बेटे, अच्छे पिता और अच्छे पति जरूर बन गए। और इसी में उन्हें वह सुख मिल गया, जिसकी तलाश वे बरसों से कर रहे थे।

लघु कथा -92

मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के एक छोटे से कस्बे में कैलाश प्रसाद रहते थे। बचपन से ही उनके मन में बड़े-बड़े सपने थे। वे कहते थे, “मैं बहुत बड़ा आदमी बनूँगा, बड़ा घर होगा, कई गाड़ियाँ होंगी, लोग मेरा नाम आदर से लेंगे।” गाँव के लोग हँसते, पर कैलाश अपने सपनों में ही जीते रहते।
पढ़ाई पूरी करके वे शहर गए। सोचा था, कुछ ही सालों में करोड़पति बन जाएँगे। पर नौकरी छोटी मिली, तनख्वाह कम थी। कैलाश हर समय दुखी रहते। कहते,
“मेरे सपने इतने बड़े थे, और जिंदगी ने मुझे इतना छोटा क्यों बना दिया?”
उन्होंने कई काम बदले—कभी दुकान खोली, कभी एजेंसी ली, कभी शेयर बाजार में पैसा लगाया। हर बार उम्मीद बहुत बड़ी होती, पर नतीजा छोटा निकलता। कभी घाटा हुआ, कभी बस बराबर। कैलाश को लगता, दुनिया उनके खिलाफ है।
एक दिन वे अपने गाँव लौटे। रास्ते में बस खराब हो गई। सब यात्री एक ढाबे पर रुके। वहाँ एक बूढ़ा चायवाला बैठा था—नाम था हरिहर। वह चाय बनाते हुए गुनगुना रहा था।
कैलाश ने कहा,
“बाबा, तुम्हें कोई चिंता नहीं है क्या? इतनी छोटी दुकान, इतना कम काम।”
हरिहर मुस्कराया,
“चिंता तो सबको होती है, बेटा। पर मैं उतनी ही करता हूँ, जितनी मेरी ताकत है। बाकी भगवान और दुनिया पर छोड़ देता हूँ।”
कैलाश बोला,
“पर आपके बड़े सपने नहीं हैं?”
हरिहर हँसा,
“बड़े सपने हों, यह बुरा नहीं। पर उन्हें पूरा होना मेरी मुट्ठी में नहीं है। इसके लिए रास्ता, लोग और हालात भी साथ देने चाहिए। अगर वे साथ न दें, तो क्या मैं रो-रोकर मर जाऊँ?”
कैलाश चुप हो गया। उसे लगा जैसे बूढ़े ने उसके दिल की बात कह दी हो।
गाँव पहुँचकर कैलाश ने देखा कि उसके बचपन का दोस्त मोहन खेती कर रहा है। उसके पास न बड़ी गाड़ी थी, न बड़ा घर, पर चेहरा शांत था।
कैलाश ने पूछा,
“मोहन, तुझे कभी नहीं लगता कि तू कुछ बड़ा कर सकता था?”
मोहन बोला,
“कर सकता था, पर जो मिला है, उसी में मैं खुश हूँ। मैं कोशिश करता हूँ, पर अगर मौसम खराब हो जाए, बारिश न आए, तो क्या मैं आसमान से लड़ूँ?”
कैलाश को समझ आने लगा—वह हमेशा दुनिया से वही चाहता रहा, जो शायद दुनिया दे ही नहीं सकती।
कुछ दिन गाँव में रहकर कैलाश ने अपने सपनों पर दोबारा सोचा। उसने तय किया कि अब वह कोशिश करेगा, पर नतीजे से लड़ाई नहीं करेगा। वह नौकरी करेगा, साथ में छोटा व्यापार भी, पर इतना ही सपना रखेगा जितना हालात पूरा कर सकें।
शहर लौटकर उसने एक साधारण काम पकड़ा और शाम को बच्चों को पढ़ाने लगा। पैसा बहुत नहीं बढ़ा, पर मन हल्का हो गया।
एक दिन उसने सोचा,
“दुख इस बात का नहीं था कि सपने पूरे नहीं हुए। दुख इस बात का था कि मैंने मान लिया था—उन्हें पूरा होना ही चाहिए।”
अब कैलाश जान गया था—दुनिया सिर्फ उसके लिए नहीं बनी। हालात, लोग और समय—सब मिलकर ही किसी सपना को सच करते हैं। इसलिए आदमी का काम है कोशिश करना, बाकी को स्वीकार करना।
अब कैलाश पहले से ज्यादा शांत था। उसके सपने छोटे हो गए थे, पर उसकी नींद बड़ी हो गई थी।

लघु कथा -91

चेन्नई के पास एक छोटे से कस्बे में श्रीनिवास अय्यर रहते थे। वे एक साधारण स्कूल में गणित पढ़ाते थे। तनख्वाह ज्यादा नहीं थी, पर जीवन शांत था। उनकी पत्नी लक्ष्मी, घर संभालती थीं और दो बच्चे पढ़ते थे। पड़ोस में ही एक बड़ा बंगला था, जहाँ रघुनाथ रेड्डी रहते थे—शहर के बड़े व्यापारी, जिनके पास कारें थीं, नौकर थे, और पैसा था।
लोग अक्सर श्रीनिवास से कहते,
“देखो, रेड्डी साहब कितने सुखी हैं। उनके पास सब कुछ है।”
स्रीनिवास मुस्करा देते,
“सुख चीजों से नहीं, मन से आता है।”
एक दिन स्कूल की छुट्टी के बाद श्रीनिवास रेड्डी के घर गए। रेड्डी साहब ने उन्हें बड़े आदर से बैठाया, पर उनके चेहरे पर थकान और चिंता साफ दिख रही थी।
रेड्डी बोले,
“अय्यर जी, मैं रात को सो नहीं पाता। डर लगता है—कहीं मेरा पैसा डूब न जाए, कहीं मेरा नौकर धोखा न दे दे, कहीं कोई और मुझसे आगे न निकल जाए।”
श्रीनिवास ने कहा,
“पर लोग तो आपको बहुत सुखी समझते हैं।”
रेड्डी हँस पड़े,
“यह सिर्फ दिखावा है। असली बात कोई नहीं जानता।”
उसी शाम श्रीनिवास ने देखा कि रेड्डी के बेटे को डाँट पड़ रही थी, क्योंकि वह दूसरे व्यापारी के बेटे से कम नंबर लाया था। घर में हर बात तुलना से शुरू और तुलना पर खत्म होती थी।
अगले दिन श्रीनिवास अपने दोस्त वेंकट के घर गए। वेंकट एक ऑटो चलाता था। उसका घर छोटा था, पर वहाँ हँसी थी। बच्चे खेल रहे थे, पत्नी गाना गुनगुना रही थी। वेंकट बोला,
“अय्यर जी, आज कमाई कम हुई, पर चावल है, दाल है, बस बहुत है।”
श्रीनिवास ने मन ही मन सोचा—यह आदमी कम में खुश है।
कुछ दिनों बाद कस्बे में बड़ा आयोजन हुआ। रेड्डी साहब ने सबसे बड़ा पंडाल लगवाया, ताकि सब जानें कि वे कितने बड़े हैं। पर उसी दिन खबर आई कि उनका एक बड़ा सौदा टूट गया। रेड्डी साहब घबरा गए। पंडाल में मुस्कराते हुए घूम रहे थे, पर भीतर से टूट चुके थे।
स्रीनिवास ने उन्हें अलग ले जाकर कहा,
“आप ऊपर देखने की आदत में जलते रहते हैं। हमेशा कोई आपसे आगे है—इसी आग में आप जल रहे हैं।”
रेड्डी ने सिर झुका लिया,
“सच कहते हो। मैं कभी नीचे नहीं देखता, कभी अपने पास जो है, उसका सुख नहीं लेता।”
उसी रात रेड्डी साहब बीमार पड़ गए। डॉक्टर ने कहा,
“बहुत तनाव है। अगर मन को शांत नहीं किया, तो शरीर साथ नहीं देगा।”
रेड्डी साहब पहली बार वेंकट के घर गए। वहाँ साधारण खाना था, पर हँसी थी। रेड्डी बोले,
“वेंकट, तुम्हारे पास कम है, फिर भी तुम खुश कैसे हो?”
वेंकट हँसकर बोला,
“साहब, मैं अपने से ऊपर नहीं देखता। जो है, उसी में खुश हूँ।”
रेड्डी की आँखें भर आईं। उन्हें लगा कि वे सारी जिंदगी गलत दौड़ में भागते रहे।
कुछ महीनों बाद रेड्डी साहब ने अपना काम थोड़ा कम कर दिया। बच्चों पर तुलना का बोझ घटाया। उन्होंने सीखा कि सुख और दुख मन के ख्यालों से बनते हैं।
अब कस्बे में लोग कहते,
“रेड्डी साहब बदल गए हैं, अब पहले से ज्यादा शांत हैं।”
स्रीनिवास मुस्कराकर कहता,
“जिसने ऊपर देखना छोड़ दिया और अपने पास देखना सीख लिया, वही सच में सुखी हो गया।”

लघु कथा -90

शहर के एक पुराने मोहल्ले में नरेश रहता था। उसके पास दो कमरों का मकान था, सरकारी दफ्तर की नौकरी थी और घर में माँ-बाप तथा पत्नी थी। फिर भी नरेश हमेशा उदास रहता। उसे लगता था कि उसकी जिंदगी कठिनाइयों से भरी है। वह रोज़ कहता, “मेरे साथ ही सब गलत क्यों होता है? लोग मुझसे आगे निकल गए।”
एक दिन दफ्तर में उसने अपने साथी सुरेश से कहा,
“यार, मेरी तो किस्मत ही खराब है। न प्रमोशन मिला, न गाड़ी खरीद पाया।”
सुरेश मुस्कराया,
“भाई, कभी नीचे भी देखकर तो देखो।”
नरेश को यह बात अजीब लगी, पर उसने कुछ नहीं कहा।
रविवार को सुरेश नरेश को अपने साथ झोंपड़पट्टी ले गया, जहाँ वह समाजसेवा करता था। नरेश पहले मना कर रहा था, पर ज़िद करने पर चला गया। वहाँ उसने जो देखा, उसने उसे हिला दिया। छोटी-छोटी झोपड़ियाँ, गंदा पानी, नंगे पाँव बच्चे, फटे कपड़े, और सूखे चेहरे।
एक आदमी बोला,
“भैया, आज काम नहीं मिला। आज बच्चों को सिर्फ चाय और सूखी रोटी मिलेगी।”
एक औरत पास बैठी थी, जिसकी गोद में बीमार बच्चा था। उसने कहा,
“दवा के पैसे नहीं हैं, भगवान जाने क्या होगा।”
नरेश का सिर झुक गया। उसे याद आया कि वह सुबह इसलिए नाराज़ हुआ था कि उसकी शर्ट ठीक से प्रेस नहीं हुई थी।
वहाँ के बच्चे मिट्टी के ढेर पर खेल रहे थे, टूटे खिलौनों से भी खुश थे। उनकी हँसी में कोई शिकायत नहीं थी, जबकि उनके पास कुछ भी नहीं था।
वापस लौटते समय नरेश बिल्कुल चुप था। सुरेश ने कहा,
“अब बताओ, तुम्हारी जिंदगी सच में इतनी दुखी है?”
नरेश धीरे से बोला,
“नहीं… मैं तो उलटा देख रहा था। मैं हमेशा आसमान की ओर देखता था—जो मेरे पास नहीं है, वही देखता था।”
रात को वह देर तक सोचता रहा। उसे लगा कि उसके दुख असल में तुलना से पैदा हुए थे।
अगली सुबह उसने अपनी माँ से कहा,
“माँ, आज मुझे समझ आया कि हम कितने सुखी हैं।”
माँ ने पूछा,
“कैसे?”
नरेश बोला,
“हमारे पास छत है, रोज़ का खाना है, कपड़े हैं, इलाज की सुविधा है। मैं इन सबको सामान्य समझकर, जो नहीं है उसी का रोना रोता था।”
माँ ने कहा,
“बेटा, जिसने अपना सुख गिनना सीख लिया, वह दुखी नहीं रह सकता।”
कुछ ही दिनों में नरेश बदल गया। अब वह दफ्तर में भी खुश रहता, घर में भी। वह सुरेश के साथ झोंपड़पट्टी जाने लगा। पुराने कपड़े, किताबें और थोड़ा-बहुत पैसा इकट्ठा करके वहाँ देता। उसे लगता था कि देने से उसका मन और हल्का हो जाता है।
एक दिन दफ्तर में किसी ने कहा,
“नरेश, अब तो तुम बहुत खुश दिखते हो।”
नरेश मुस्कराया,
“हाँ, क्योंकि अब मैं उलटा नहीं देखता। पहले मैं ऊपर देखता था—जो मेरे पास नहीं है। अब मैं नीचे और चारों ओर देखता हूँ—जो मेरे पास है और जो दूसरों के पास नहीं है।”
उसे समझ आ गया था कि सुख-दुख परिस्थितियों में नहीं, नजरिए में होते हैं। जो आदमी अपने अभाव गिनता है, वह दुखी होता है। जो अपनी सुविधाएँ गिनता है, वह सुखी होता है।
अब नरेश हर सुबह मन ही मन कहता,
“मैं बहुत सुखी हूँ, क्योंकि मेरे पास जीने के साधन भी हैं और किसी और की मदद करने की ताकत भी।”

लघु कथा -89

शहर के एक मध्यमवर्गीय मोहल्ले में अरुण रहता था। उसके पास पक्के मकान की छत थी, रोज़ का खाना था और एक छोटी-सी नौकरी भी। फिर भी उसका चेहरा हमेशा उदास रहता। उसे लगता था कि उसकी जिंदगी दुखों से भरी है। सुबह उठते ही कहता, “मेरे पास कुछ भी नहीं है। लोग मुझसे आगे निकल गए।”
एक दिन दफ्तर में उसके साथी रमाकांत ने कहा,
“यार, तुम हमेशा दुखी क्यों रहते हो? तुम्हारे पास तो बहुत कुछ है।”
अरुण बोला,
“बहुत कुछ? मेरे पास न बड़ी कार है, न बड़ा घर, न ऊँची पोस्ट।”
रमाकांत चुप हो गया, पर उसके मन में कुछ चल रहा था।
रविवार को रमाकांत अरुण को अपने साथ झोंपड़पट्टी ले गया, जहाँ वह बच्चों को पढ़ाने जाता था। अरुण पहले तो झिझका, पर फिर चला गया। वहाँ उसने देखा—टीन की छत, मिट्टी की दीवारें, गंदा पानी, नंगे पाँव बच्चे। कई बच्चों ने फटी शर्ट पहनी थी। एक बूढ़ा आदमी सड़क किनारे बैठा खाँस रहा था।
एक छोटी बच्ची बोली,
“भैया, आज स्कूल नहीं जाऊँगी, माँ बीमार है, काम करने नहीं गई, आज चूल्हा नहीं जलेगा।”
अरुण का दिल काँप गया। उसे लगा जैसे उसके सारे दुख छोटे पड़ गए हों।
रमाकांत ने कहा,
“इन लोगों के पास न पक्का घर है, न रोज़ की नौकरी, न पक्का खाना। फिर भी देखो, बच्चे खेल रहे हैं, हँस रहे हैं।”
अरुण ने देखा—कुछ बच्चे कंचे खेल रहे थे, कुछ टूटे खिलौने से भी खुश थे। उनकी हँसी में कोई शिकायत नहीं थी।
वापस लौटते समय अरुण चुप था। रात को उसे नींद नहीं आई। उसे याद आया कि वह रोज़ अपने कमरे में बैठकर अपने न होने वाले दुखों का रोना रोता है, जबकि असली दुख तो कहीं और हैं।
अगले दिन सुबह उसने अपनी माँ से कहा,
“माँ, आज मुझे लगा कि मैं बहुत सुखी हूँ।”
माँ चकित होकर बोली,
“अचानक कैसे?”
अरुण बोला,
“मेरे पास छत है, कपड़े हैं, रोज़ का खाना है, नौकरी है। मैं तो आसमान की ओर देखता था—जो मेरे पास नहीं है, वही देखता था। नीचे नहीं देखता था—जिनके पास कुछ भी नहीं है।”
माँ की आँखें भर आईं।
“बेटा, जिसने तुलना करना सीख लिया, वह रोना छोड़ देता है।”
कुछ दिनों बाद अरुण भी रमाकांत के साथ झोंपड़पट्टी जाने लगा। वह बच्चों को पढ़ाने लगा, पुराने कपड़े इकट्ठा करके देने लगा। अब उसे लगता था कि जितना वह देता है, उससे ज्यादा उसे मिलता है—मन की शांति।
एक दिन दफ्तर में वही साथी बोला,
“आजकल तो तुम बड़े खुश रहते हो।”
अरुण मुस्कराया,
“हाँ, क्योंकि अब मैं उलटा नहीं देखता। पहले मैं ऊपर देखता था—जो मेरे पास नहीं है। अब मैं चारों ओर देखता हूँ—जो मेरे पास है और जो दूसरों के पास नहीं है।”
उसे समझ आ गया था कि दुख और सुख चीजों में नहीं, देखने के ढंग में होते हैं। जो आदमी अपने अभाव गिनता है, वह दुखी होता है। जो अपनी सुविधाएँ गिनता है, वह सुखी होता है।
अब अरुण रोज़ सुबह उठकर भगवान को धन्यवाद देता—
“तूने मुझे इतना दिया है कि मैं जी सकूँ और इतना दिया है कि मैं किसी और को भी थोड़ा दे सकूँ।”

लघु कथा -88

गाँव के किनारे एक छोटा-सा घर था, जहाँ भोलानाथ रहते थे। उनका चेहरा हमेशा शिकायतों से भरा रहता। सुबह उठते ही कहते, “धूप बहुत तेज है, काम कैसे करूँ?” बारिश होती तो बोलते, “कीचड़ में पैर फँस जाते हैं।” ठंड आती तो कहते, “हाथ-पैर जम जाते हैं।” लगता था जैसे उन्हें हर मौसम से शिकायत है।
उनके पड़ोस में विजय रहता था। विजय गरीब था, पर हँसमुख। वह सुबह-सुबह खेत जाते हुए पेड़ों से गिरती धूप को देखकर मुस्कराता, पक्षियों की आवाज़ सुनकर गुनगुनाता। लोग कहते, “विजय तो हर हाल में खुश रहता है।”
एक दिन भोलानाथ बहुत उदास बैठे थे। उनकी फसल ठीक नहीं हुई थी। वे बोले,
“जिंदगी ने मुझे कुछ नहीं दिया, बस दुख ही दिया है।”
विजय पास आया और बोला,
“भाई, दुख सबको मिलता है, पर उसे देखने का तरीका अलग होता है।”
भोलानाथ झुँझलाकर बोले,
“तेरे पास क्या है? फिर भी तू हँसता रहता है!”
विजय मुस्कराया,
“मेरे पास हँसने की वजहें हैं—आसमान, हवा, पेड़, नदियाँ, ये सब मुफ्त में मिलते हैं।”
अगले दिन विजय भोलानाथ को अपने साथ ले गया। सुबह-सुबह दोनों नदी किनारे पहुँचे। सूरज निकल रहा था। बादल लाल-पीले रंग में चमक रहे थे। नदी कलकल करती बह रही थी।
विजय ने कहा,
“देख, आसमान हँस रहा है। क्या तुझे नहीं लगता कि ये रंग तुझे बुला रहे हैं मुस्कराने के लिए?”
भोलानाथ ने पहली बार ध्यान से देखा। सच में, दृश्य सुंदर था। उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।
फिर दोनों खेतों में गए। हवा चल रही थी, फसल लहर रही थी। विजय बोला,
“जब हवा खेतों से बात करती है, तो लगता है जैसे धरती गुनगुना रही हो।”
भोलानाथ हँस पड़ा,
“तू तो कवि निकला!”
विजय बोला,
“कवि वही है, जिसे सब कुछ हँसता हुआ दिखाई दे।”
कुछ दिनों तक भोलानाथ विजय के साथ घूमने लगा। कभी बच्चों के खेल को देखता, कभी बारिश में भीगते पेड़ों को। धीरे-धीरे उसकी शिकायतें कम होने लगीं। जो बात पहले उसे खटकती थी, अब उसमें भी मज़ा ढूँढने लगा।
एक दिन गाँव में मेला लगा। पहले भोलानाथ ऐसे मेलों में नहीं जाता था—कहता था, “भीड़ में धक्का लगता है, शोर मचता है।” पर इस बार वह गया। बच्चों की हँसी, ढोल की थाप, रंग-बिरंगे गुब्बारे देखकर उसे अच्छा लगा। वह खुद भी बच्चों के साथ हँसने लगा।
लोग चकित थे—
“अरे, ये वही भोलानाथ है जो हमेशा रोता-झींकता रहता था?”
भोलानाथ ने कहा,
“हाँ, वही हूँ। पर अब समझ गया हूँ कि शिकायतों से जिंदगी भारी हो जाती है। हँसी से हल्की।”
कुछ समय बाद भोलानाथ बीमार पड़ा। डॉक्टर ने कहा,
“तुम पहले बहुत तनाव में रहते थे, इसलिए शरीर कमजोर हो गया। अब तुम खुश रहते हो, इसलिए जल्दी ठीक हो जाओगे।”
भोलानाथ ने विजय का हाथ पकड़कर कहा,
“तूने मुझे जिंदगी का राज बता दिया—जो हँसना जानता है, वही सच में जीना जानता है।”
उस दिन से भोलानाथ जहाँ जाता, लोगों को यही कहता,
“जो है, उसी में मुस्कराना सीखो। आकाश, नदी, हवा—सब हमें हँसने का बहाना दे रहे हैं। बस आँख और दिल खुले होने चाहिए।”

लघु कथा -87

शहर की सबसे भीड़भाड़ वाली गली में मोहनलाल रहते थे। कभी यह गली भाईचारे के लिए जानी जाती थी। एक-दूसरे के घर बिना बुलाए लोग चले जाते, दुख-सुख बाँटते। पर अब हर घर के दरवाज़े पर मोटे ताले लगे रहते, और हर चेहरे पर शक की रेखाएँ।
मोहनलाल का परिवार बड़ा था, पर मन छोटा होता जा रहा था। भाइयों में जमीन को लेकर झगड़ा चल रहा था। हर कोई डरता था कि दूसरा कहीं धोखा न दे दे। माँ की बीमारी में भी सब गिन-गिनकर पैसे देते, और उसी में तकरार हो जाती।
एक दिन मोहनलाल की पुरानी पड़ोसन, शांति बुआ, बीमार पड़ गईं। उनका बेटा शहर से बाहर था। पहले के जमाने में पूरा मोहल्ला उनकी सेवा करता, पर इस बार कोई आगे नहीं आया। सब बोले,
“किसके चक्कर में पड़ें? कल को उल्टा हमें ही फँसा दें।”
मोहनलाल का दिल बेचैन हुआ। उसने पत्नी से कहा,
“अगर आज हम चुप रहे, तो कल हमारे लिए भी कोई नहीं बोलेगा।”
पत्नी डरी हुई थी,
“आजकल किसी के लिए कुछ करो तो लोग शक करने लगते हैं। फालतू में मुसीबत मोल क्यों लें?”
फिर भी मोहनलाल शांति बुआ के घर गया। उनके लिए दवा लाया, खाना बनाया। बुआ की आँखों में आँसू आ गए।
“बेटा, आजकल तो अपने भी अपने नहीं रहे। तूने तो मुझे जीने की हिम्मत दे दी।”
इधर घर में हंगामा मच गया। भाई बोले,
“तू पराए के लिए इतना करता है, और हमारे हिस्से की जमीन पर नज़र रखता है!”
मोहनलाल चुप रहा। उसे लगा कि आदमी दुश्मनों से कम, अपने ही लोगों से ज़्यादा डरने लगा है।
कुछ दिनों बाद गली में आग लग गई। एक घर से उठी चिंगारी कई घरों तक फैल गई। लोग घबरा गए। पहले सब मिलकर बुझाते, पर अब हर कोई पहले अपना सामान बचाने लगा। शांति बुआ अपने घर से निकल नहीं पा रही थीं।
मोहनलाल दौड़ा और उन्हें सहारा देकर बाहर लाया। उसकी देखा-देखी दो-तीन और लोग आगे आए। आग बुझी, बड़ा नुकसान टल गया।
तभी लोगों को एहसास हुआ कि अगर मोहनलाल अकेला ही सोचता रहता, तो शायद कई जानें चली जातीं। शांति बुआ ने सबके सामने कहा,
“अगर आज भी हम सिर्फ अपना ही सोचते रहे, तो आदमी जिंदा रहेगा, पर इंसान मर जाएगा।”
उस दिन मोहल्ले में चुप्पी छा गई। सबको लगा कि सच में आत्मीयता खत्म होती जा रही है—बढ़ती भीड़, बढ़ता स्वार्थ, बढ़ती चालाकी ने दिलों को छोटा कर दिया है।
मोहनलाल ने भाइयों से कहा,
“जमीन बाँट लोगे, पैसे बाँट लोगे, पर दिल अगर बँट गया तो कोई किसी का नहीं रहेगा।”
धीरे-धीरे लोगों ने फिर एक-दूसरे की ओर देखना शुरू किया। पूरी तरह पुराना जमाना तो नहीं लौटा, पर इतना जरूर हुआ कि कोई बीमार पड़े तो कोई न कोई हाल पूछने आ जाता।
मोहनलाल समझ गया—बुरे समय में भी अगर कुछ लोग मनुष्यता बचाए रखें, तो आदमी के भीतर का इंसान पूरी तरह नहीं मरता। बस, उसे ज़िंदा रखने के लिए किसी एक को शुरुआत करनी पड़ती है।

लघु कथा -86

शहर के पुराने मोहल्ले में रामस्वरूप काका रहते थे। उनका मकान बड़ा था, पर दिल उससे भी बड़ा। कभी उनका परिवार छोटा और खुशहाल था—वे, उनकी पत्नी शारदा और दो बच्चे। धीरे-धीरे बच्चों की शादी हुई, बहुएँ आईं, फिर पोते-पोतियाँ। घर हँसी से भर गया, पर साथ ही जिम्मेदारियाँ भी बढ़ती चली गईं।
समय बदला, काम महँगा हुआ, रोटी की कीमत बढ़ी, पानी के लिए लाइनें लगने लगीं। रामस्वरूप काका रोज़ सुबह पानी भरने के लिए दो-दो घंटे कतार में खड़े रहते। घर में बीस लोग हो गए थे। एक कमरे में चार-चार लोग सोते, रसोई में हमेशा झगड़ा रहता—किसने कितना खाया, किसने कम छोड़ा।
एक दिन काका अपने मित्र शिवनारायण से मिलने गए। शिवनारायण जापान में कई साल काम करके लौटा था। उसके घर में सिर्फ वह, उसकी पत्नी और एक बेटी थी। घर छोटा था, पर साफ और शांत। खाना समय पर बनता, सब आराम से खाते।
काका ने कहा,
“भाई, तुम्हारे यहाँ तो बड़ा सुकून है, हमारे यहाँ तो बस शोर और चिंता।”
शिवनारायण मुस्कराया,
“काका, हमने सोच-समझकर छोटा परिवार रखा। आज दुनिया में जनसंख्या इतनी बढ़ रही है कि आदमी को रोटी, पानी, हवा—सबके लिए लड़ना पड़ रहा है। बड़ा परिवार आज सुख नहीं, बोझ बनता जा रहा है।”
काका चुप हो गए। उन्हें याद आया कि उनके घर में रोज़ कोई न कोई बीमार पड़ जाता है, क्योंकि साफ पानी कम पड़ता है। बच्चों की फीस भरने में झगड़े होते हैं। किसी को नई चप्पल चाहिए, तो किसी को किताब। पैसे हमेशा कम पड़ते।
उसी शाम काका घर लौटे। देखा कि बहुएँ रसोई में झगड़ रही थीं—चावल कम पड़ गए थे। एक पोता भूखा बैठा रो रहा था। काका का दिल भर आया।
रात को उन्होंने सबको इकट्ठा किया और बोले,
“बच्चो, जब तुम छोटे थे, तब हमने बिना सोचे-समझे परिवार बढ़ाया। हमें लगा, ज्यादा बच्चे मतलब ज्यादा खुशी। पर आज देख रहा हूँ—हम सब परेशान हैं। खाना कम है, जगह कम है, शांति तो बिल्कुल नहीं।”
एक बेटा बोला,
“पिताजी, अब क्या किया जा सकता है? बच्चे तो हो ही गए।”
काका ने गहरी साँस ली,
“जो हो गया, उसे बदला नहीं जा सकता। पर आगे की पीढ़ी को तो समझा सकते हैं। अगर तुम अपने बच्चों को यही सिखाओ कि छोटा परिवार, सुखी परिवार होता है, तो शायद उनका भविष्य अच्छा हो।”
कुछ दिनों बाद परिवार में एक नई बहू आई। सबने उसे समझाया कि अभी बच्चे की जल्दी न करे, पहले अपने जीवन को सँभाले। बहू ने भी समझदारी दिखाई।
धीरे-धीरे घर में बदलाव आने लगा। बच्चे स्कूल जाने लगे, सबने मिलकर खर्च बाँटना सीखा, पानी और अनाज बचाकर इस्तेमाल होने लगा। झगड़े पूरी तरह खत्म नहीं हुए, पर समझ बढ़ने लगी।
रामस्वरूप काका अक्सर कहते,
“आज हालात ऐसे हैं कि अगर आदमी ने खुद पर काबू नहीं रखा, तो भूख और प्यास ही उसे मार देंगी। एटम बम की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसलिए जो समझदार है, वही है जो कम में खुश रहना सीख ले।”
उनकी बात धीरे-धीरे मोहल्ले में फैल गई। कुछ लोगों ने छोटा परिवार अपनाने का फैसला किया। काका मन ही मन खुश होते—उन्हें लगता था कि शायद आने वाली पीढ़ी भूख और अशांति से नहीं, समझ और संतुलन से जिएगी।

लघु कथा -85

गाँव के बाहर एक छोटा-सा आश्रम था, जहाँ हर दिन सुबह-शाम दीप जलता और घंटियों की मधुर ध्वनि गूँजती। उस आश्रम में दो मूर्तियाँ थीं—एक देवी विद्या की और दूसरी देव करुणा की। गाँव वाले कहते थे कि ये दो अलग-अलग नहीं, बल्कि जीवन के दो रास्तों के प्रतीक हैं—एक आत्म-संस्कार का और दूसरा उदार सेवा का।
आश्रम की देखभाल एक वृद्ध पुजारी करते थे—नाम था हरिनाथ। वे बच्चों को पढ़ाना, बीमारों की सेवा करना और दुखियों को ढाढ़स बँधाना—सब कुछ अपने जीवन का उद्देश्य मानते थे। उनके पास एक शिष्य था—रोहित, जो तेज दिमाग वाला था, पर थोड़ा घमंडी भी। वह विद्या देवी की पूजा में अधिक रुचि रखता था। उसे लगता था कि ज्ञान ही सबसे बड़ा बल है।
एक दिन गाँव में अकाल पड़ा। लोग भूखे रहने लगे। कई परिवार शहर की ओर पलायन करने लगे। रोहित ने देखा कि आश्रम में भी अन्न कम होता जा रहा है। उसने हरिनाथ से कहा,
“गुरुजी, हमें विद्या देवी की पूजा और कठिन करनी चाहिए, ताकि बुद्धि बढ़े और हम कोई उपाय खोज सकें।”
हरिनाथ मुस्कराए और बोले,
“बेटा, उपाय तो बुद्धि से मिलेगा, पर पीड़ा का निवारण करुणा से होता है। अगर सामने कोई भूखा है, तो पहले उसे रोटी चाहिए, तर्क नहीं।”
उसी शाम एक बूढ़ी स्त्री आश्रम आई। उसके हाथ काँप रहे थे, आँखों में आँसू थे। बोली,
“बाबा, मेरे पोते को तीन दिन से कुछ खाने को नहीं मिला।”
रोहित ने सोचा—पहले योजना बनानी चाहिए, तभी मदद होगी। पर हरिनाथ ने बिना देर किए आश्रम का बचा-खुचा अनाज उसे दे दिया। रोहित बोला,
“गुरुजी, अगर हम सब दे देंगे तो खुद क्या खाएँगे?”
हरिनाथ ने शांत स्वर में कहा,
“जो उदारता के लिए खड़ा होता है, उसका पेट कभी खाली नहीं रहता, क्योंकि उसके लिए दुनिया की रसोई खुल जाती है।”
अगले दिन रोहित शहर गया। उसने अपने ज्ञान का उपयोग कर कुछ व्यापारियों को समझाया कि अगर वे गाँव की मदद करेंगे, तो बाद में गाँव उनका स्थायी बाज़ार बनेगा। उसकी बात समझ में आई। व्यापारियों ने अनाज और बीज देने का वादा किया।
जब रोहित लौटा तो देखा कि हरिनाथ बीमारों की सेवा में लगे हैं। वे लोगों के घाव धो रहे थे, बच्चों को अपने हाथों से खिला रहे थे। रोहित को पहली बार समझ आया कि ज्ञान और करुणा अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं।
कुछ दिनों में गाँव की हालत सुधर गई। खेतों में बीज बोए गए, भंडार भरने लगे। गाँव वालों ने आश्रम में आकर धन्यवाद दिया। किसी ने कहा,
“रोहित के ज्ञान ने रास्ता दिखाया।”
दूसरे ने कहा,
“हरिनाथ की करुणा ने हमें जीने की ताकत दी।”
रोहित ने दोनों मूर्तियों के सामने सिर झुकाया। अब उसे समझ आ गया था—देवी-देवताओं को दो वर्गों में बाँटना केवल समझाने के लिए है। असल में जीवन में दोनों का मेल ज़रूरी है—व्यक्तित्व को सँवारने वाला ज्ञान और दूसरों को उठाने वाली उदारता।
उस दिन से रोहित ने प्रण लिया—वह न केवल विद्या की साधना करेगा, बल्कि हर पीड़ित के लिए हाथ भी बढ़ाएगा। क्योंकि सच्ची भक्ति वही है, जो मनुष्य को मनुष्य के काम आने के लिए प्रेरित करे।

लघु कथा -84

शहर के बीचों-बीच एक साफ़-सुथरे घर में रिया रहती थी। बाहर से देखने पर उसकी ज़िंदगी परफेक्ट लगती थी। वह अपने ऑफिस में बहुत मेहनती थी, काम समय पर और बेहतरीन ढंग से करती। बॉस उसकी तारीफ़ करते नहीं थकते। घर में वह शानदार खाना बनाती—उसके हाथ के बने पकवानों की खुशबू पड़ोस तक फैल जाती। रिश्तेदार कहते, “ऐसी बहू किस्मत वालों को मिलती है।”
रिया बातचीत में भी माहिर थी। पड़ोस की खबरें, रिश्तों की बातें, किसके घर क्या चल रहा है—सब उसे पता रहता। लोग कहते, “इसके बिना कॉलोनी की खबर अधूरी है।” अपने पति अमित के साथ भी वह बाहर से बहुत अच्छी दिखती—हँसती, साथ घूमती, सबके सामने आदर्श पत्नी बनकर रहती। लोग सोचते—काम में अच्छी, घर में अच्छी, रिश्तों में अच्छी—कितनी संपूर्ण स्त्री है।
लेकिन इस पूरी तस्वीर में एक दरार थी—और वह थी उसका सच।
अमित उस पर पूरा भरोसा करता था। उसे लगता था कि उसकी पत्नी हर बात में सच्ची है। पर रिया कई बातों में झूठ बोलती थी—कहाँ जा रही है, किससे मिल रही है, क्या सोच रही है—इन सबमें वह सच छुपा लेती। वह बाहर से जितनी मीठी थी, भीतर उतनी ही दोहरी।
कभी कहती—“ऑफिस का काम है,”
तो कभी—“दोस्तों से मिलना है,”
पर असल बात कुछ और होती।
उसे लगता था—अगर सच बोलूँगी तो झगड़ा होगा, सवाल होंगे, रोक-टोक होगी। इसलिए उसने झूठ को आसान रास्ता बना लिया। शुरू में झूठ छोटा था, फिर बड़ा होता गया। धीरे-धीरे वह अपनी ही बनाई हुई कहानी में फँस गई।
अमित को शक नहीं था, लेकिन दूरी महसूस होने लगी। पहले वे हर बात साझा करते थे, अब बातें सतह पर रह जातीं। अमित पूछता—
“तुम पहले जैसी क्यों नहीं रहीं?”
रिया मुस्कराकर टाल देती—
“काम ज़्यादा है।”
एक दिन अमित ने अचानक रिया की कही बातों में फर्क पकड़ लिया। एक झूठ, फिर दूसरा, फिर तीसरा। उसने सीधे सवाल किया। रिया पहले चुप रही, फिर बोली—
“मैं तुम्हें दुखी नहीं करना चाहती थी, इसलिए सच नहीं कहा।”
अमित की आँखों में आँसू आ गए। उसने कहा—
“तुमने मुझे दुख से नहीं, झूठ से तोड़ा है। अगर सच कहती, तो शायद हम साथ मिलकर हल निकाल लेते।”
उस दिन रिया पहली बार समझी—
काम में अच्छा होना,
घर में अच्छा होना,
बातों में अच्छा होना—
सब कुछ होते हुए भी,
अगर रिश्ते में सच नहीं है,
तो वह रिश्ता खोखला है।
उसे याद आया—कितनी बार उसने झूठ को सुविधा समझा, पर वह धीरे-धीरे ज़हर बन गया। उसने अमित के सामने सिर झुका दिया। बोली—
“मैं सब कुछ अच्छा करना चाहती थी, बस सच से डर गई।”
अमित ने कहा—
“सच कभी रिश्ता नहीं तोड़ता,
झूठ तोड़ता है।”
रिया ने उस दिन तय किया—अब चाहे मुश्किल हो, सवाल हों, बहस हो—पर वह सच बोलेगी। क्योंकि उसने देख लिया था—
सब कुछ अच्छा होते हुए भी,
अगर रिश्ते में ईमानदारी नहीं,
तो वह रिश्ता
बस दिखावा बनकर रह जाता है।

लघु कथा -83

छोटे से गाँव में कृष्णा नाम का लड़का रहता था। उसके पिता किसान थे और माँ सिलाई का काम करती थीं। घर की हालत साधारण थी, पर सपने बड़े थे। कृष्णा पढ़ाई में ठीक-ठाक था, मगर एक कमी थी—उसे खुद पर भरोसा नहीं था। हर काम से पहले वह सोचता, “मैं नहीं कर पाऊँगा।”
स्कूल में जब भी शिक्षक कोई सवाल पूछते, कृष्णा को जवाब पता होता, फिर भी वह हाथ नहीं उठाता। डर लगता—अगर गलत हो गया तो सब हँसेंगे। दोस्त उसे समझाते—
“तू कर सकता है।”
लेकिन उसका दिल मानता ही नहीं था।
एक दिन स्कूल में भाषण प्रतियोगिता हुई। शिक्षक ने कृष्णा का नाम लिख दिया। कृष्णा घबरा गया। घर आकर बोला—
“माँ, मैं मंच पर नहीं बोल पाऊँगा।”
माँ ने प्यार से कहा—
“बेटा, कोशिश किए बिना हार मत मानो। भगवान ने तुम्हें दिमाग दिया है, आवाज़ दी है, तो उनका इस्तेमाल भी करो।”
कृष्णा ने तैयारी तो की, पर मन में डर बना रहा। मंच पर पहुँचा तो हाथ काँपने लगे, आवाज़ लड़खड़ा गई। लोग फुसफुसाने लगे। वह बीच में ही रुक गया। प्रतियोगिता हार गया, और खुद से और नफ़रत करने लगा।
उसी शाम गाँव के बुज़ुर्ग मास्टरजी उससे मिलने आए। बोले—
“बेटा, सफलता एक वाहन है जो कर्म के पहियों पर चलता है, लेकिन आत्मविश्वास के ईंधन के बिना वह एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता।”
कृष्णा चुपचाप सुनता रहा।
मास्टरजी ने कहा—
“मेहनत तो तू करता है, पर भरोसा नहीं करता। अपने आप पर विश्वास करना भी एक अभ्यास है।”
अगले दिन से कृष्णा ने छोटा-सा नियम बनाया—
हर दिन कोई एक काम बिना डरे करेगा।
पहले दिन शिक्षक से सवाल पूछा।
दूसरे दिन कक्षा में पढ़कर सुनाया।
तीसरे दिन दोस्तों के सामने कविता बोली।
हर बार डर लगा, पर उसने किया। धीरे-धीरे डर कम होने लगा।
कुछ महीनों बाद फिर भाषण प्रतियोगिता हुई। इस बार कृष्णा ने खुद नाम लिखवाया। मंच पर गया तो दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था, पर उसने मन से कहा—
“डर के साथ भी बोल सकता हूँ।”
उसने बोलना शुरू किया। आवाज़ पहले काँपी, फिर मज़बूत हो गई। लोग ध्यान से सुनने लगे। तालियाँ बजीं। वह प्रतियोगिता जीत गया।
घर आकर उसने माँ से कहा—
“माँ, मैं डरता अब भी हूँ, पर अब डर मुझे रोकता नहीं।”
माँ की आँखों में खुशी के आँसू थे।
सालों बाद कृष्णा बड़ा अफ़सर बना। गाँव लौटा तो बच्चों से बोला—
“मेहनत बहुत ज़रूरी है, पर अगर खुद पर भरोसा नहीं होगा, तो मेहनत रास्ते में ही रुक जाएगी।”
फिर उसने वही बात दोहराई जो मास्टरजी ने कही थी—
“सफलता एक वाहन है जो कर्म के पहियों पर चलता है, लेकिन आत्मविश्वास के ईंधन के बिना यात्रा करना असंभव है।”

लघु कथा -82

छोटे से शहर में हरि नाम का एक साधारण आदमी रहता था। उसकी ज़िंदगी बहुत साधारण थी—सुबह दुकान खोलना, शाम को घर लौटना और रात को भगवान के सामने हाथ जोड़कर बैठ जाना। हर दिन वह बस एक ही प्रार्थना करता—
“जो ठीक लगे, वही देना प्रभु। हमारा क्या है, हम तो कुछ भी माँग लेते हैं।”
लोग उसे समझाते—
“कुछ तो माँगा कर—पैसा, तरक्की, बड़ा घर।”
हरि मुस्कराकर कहता—
“मुझे नहीं पता मेरे लिए क्या ठीक है। वह जानता है।”
एक दिन हरि को शहर के बड़े व्यापारी ने साझेदारी का प्रस्ताव दिया। मुनाफा बहुत था, लेकिन तरीका थोड़ा गलत। हरि का मन डगमगाया। रात को वह मंदिर गया और बोला—
“प्रभु, अगर यह रास्ता मेरे लिए ठीक है तो मन को शांति देना, अगर गलत है तो इसे मुझसे दूर कर देना।”
अगले ही दिन व्यापारी किसी घोटाले में पकड़ा गया। हरि समझ गया—जिसे वह “अवसर” समझ रहा था, वह दरअसल एक गिरावट थी।
कुछ समय बाद हरि की दुकान में आग लग गई। सब कुछ जल गया। लोग बोले—
“तू भगवान पर इतना भरोसा करता है, फिर यह क्यों हुआ?”
हरि की आँखों में आँसू थे, लेकिन होंठों पर वही बात—
“जो ठीक लगे, वही देना प्रभु।”
वह मजदूरी करने लगा। सुबह-शाम मेहनत करता। एक दिन उसी मेहनत के दौरान उसने एक बुज़ुर्ग को सड़क पर गिरते देखा। हरि ने उन्हें उठाया और अस्पताल पहुँचाया। पता चला वह बड़े उद्योगपति थे। उन्होंने हरि का नाम-पता लिख लिया।
कुछ महीनों बाद वही बुज़ुर्ग उसके पास आए। उन्होंने कहा—
“तूने बिना कुछ माँगे मेरी जान बचाई। अब मेरी कंपनी में तुझे काम देना मेरा कर्तव्य है।”
हरि को अच्छी नौकरी मिली। धीरे-धीरे उसने अपनी टूटी दुकान से भी बेहतर दुकान खोल ली। अब उसकी ज़िंदगी फिर से सँवर रही थी।
एक दिन हरि बीमार पड़ गया। डॉक्टर ने कहा—
“समय पर इलाज न होता, तो बचना मुश्किल था।”
हरि ने सोचा—
“अगर मैं उस आग में टूटकर बैठ गया होता, तो शायद इस इलाज तक पहुँच ही नहीं पाता।”
अब उसे समझ आने लगा—
कई बार जो हमें नुकसान लगता है,
वही हमें सही जगह तक ले जाता है।
एक शाम हरि मंदिर में बैठा था। उसने आँखें बंद कर कहा—
“प्रभु, आज समझ आया—मैं जो माँगता हूँ, वह हमेशा मेरे लिए ठीक नहीं होता। पर तू जो देता है, वही मेरे लिए सबसे अच्छा होता है।”
पास बैठा एक लड़का बोला—
“भैया, तुम भगवान से कुछ माँगते क्यों नहीं?”
हरि मुस्कराया—
“क्योंकि मैं नहीं जानता कि मेरे लिए क्या सही है। वह जानता है। मेरा काम है भरोसा करना।”
उस दिन हरि को लगा कि उसके पास बहुत कुछ है—
शांति, संतोष और विश्वास।
और उसने मन ही मन फिर कहा—
“जो ठीक लगे, वही देना प्रभु।
हमारा क्या है, हम तो कुछ भी माँग लेते हैं।”

लघु कथा -81

रोहित हमेशा खुद को बहुत व्यस्त आदमी मानता था। उसे लगता था कि दुनिया उसी के काम से चल रही है। सुबह से रात तक दफ़्तर, मीटिंग, मोबाइल, मेल—बस यही उसकी ज़िंदगी थी। माँ-बाप, पत्नी, बच्चे और दोस्त—सब उसके लिए “कल” के लिए टाल दी जाने वाली बातें थीं।
माँ कहतीं—
“बेटा, कभी हमारे साथ बैठकर चाय तो पी लिया कर।”
रोहित हँसकर कहता—
“अभी टाइम नहीं है माँ, बाद में।”
दोस्त फोन करते—
“चल यार, पुराने दिनों की तरह बैठते हैं।”
रोहित जवाब देता—
“अगले हफ्ते पक्का।”
पत्नी कहती—
“बच्चे तुम्हें बहुत याद करते हैं।”
रोहित कहता—
“यह सब मैं उन्हीं के भविष्य के लिए तो कर रहा हूँ।”
समय ऐसे ही भागता गया। रोहित समझता रहा कि सब कुछ हमेशा उसके पास रहेगा।
एक दिन उसे अचानक बड़ी नौकरी का ऑफर मिला—दूसरे शहर में। उसने बिना सोचे हाँ कर दी। जाते वक्त माँ की आँखें नम थीं, पर रोहित ने ध्यान नहीं दिया। बच्चों ने उसका हाथ पकड़ा—
“पापा, जल्दी आना।”
वह मुस्कराकर चला गया।
नए शहर में वह और ज़्यादा व्यस्त हो गया। कॉल कम होते गए। घर से दूरी बढ़ती गई।
एक रात अचानक फोन आया। माँ अस्पताल में थीं। रोहित दौड़ता हुआ पहुँचा, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी। माँ की आँखें बंद थीं। वही माँ, जो हर दिन उसे चाय के लिए बुलाती थीं।
रोहित की आँखों से आँसू रुक नहीं रहे थे। उसे याद आया—कितनी बार उसने “बाद में” कहा था।
कुछ महीनों बाद उसके सबसे पुराने दोस्त की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। वही दोस्त, जो हर महीने मिलने बुलाता था। रोहित अंतिम संस्कार में खड़ा सोच रहा था—
“अगर एक बार भी चला गया होता…”
घर लौटा तो बच्चों में वह अपनापन नहीं रहा। वे उससे बात तो करते थे, पर दूरी थी। पत्नी ने धीरे से कहा—
“तुम हमारे साथ थे ही कहाँ?”
रोहित पहली बार समझा—
वक्त, दोस्त और परिवार मुफ्त में मिलते हैं,
लेकिन उनकी कीमत तब समझ आती है,
जब वे खो जाते हैं।
उसने फैसला किया—अब “बाद में” नहीं। उसने नौकरी बदली, घर के पास आ गया। अब वह हर शाम बच्चों के साथ खेलता, पत्नी के साथ चाय पीता और पिता के पास बैठकर बातें करता।
दोस्तों की कमी हमेशा खलती रही, पर उसने सीखा कि जो बचे हैं, उन्हें खोना नहीं है।
एक दिन वह अपने बेटे से बोला—
“बेटा, याद रखना—
पैसा बाद में कमाया जा सकता है,
लेकिन जो चला गया, वो वक्त, वो लोग, वो रिश्ते
फिर कभी नहीं लौटते।”
बेटा मुस्कराया और उसका हाथ पकड़ लिया।
रोहित ने उस पल महसूस किया—
अब वह सच में अमीर है,
क्योंकि उसके पास
वक्त है,
अपनों का साथ है,
और दिल से निभाए जाने वाले रिश्ते हैं।
और उसने मन ही मन कहा—
“काश, यह कीमत मैंने
खोने से पहले समझ ली होती…”