135. माँ

हँसती हुई माँ से ज्यादा खूबसूरत कुछ नहीं,
उसकी मुस्कान से बढ़कर कोई सूरत नहीं।

     उसके चेहरे की चमक में सवेरा होता है,
     उसकी हँसी में ही मेरा बसेरा होता है।

थकी हुई आँखों में भी उजाला रखती है,
अपने दुखों को हमेशा ताला रखती है।

     मेरी जीत पर जो सबसे पहले खिलती है,
     वो माँ ही है जो दिल से मिलती है।

उसकी हँसी में दुआओं की छाया है,
उसने ही तो जीवन सजाया है।

     रातों की नींदें जो उसने गँवाईं,
     मेरी हर खुशी में वो मुस्कुराईं।

उसके आँचल में सारा जहाँ है,
उसके बिना सब वीरान है।

     जब माँ खुलकर हँसती है,
     तब किस्मत भी सजती है।

उसकी मुस्कान ही मेरी दौलत है,
उसकी खुशी ही मेरी इबादत है।

     माँ की हँसी में रब दिखता है,
     हर दर्द वहीं आकर सिमटता है।

दुनिया की हर चमक फीकी है,
माँ की हँसी ही असली दीखी है।

     हँसती रहे वो यूँ ही हरदम,
     यही है मेरी सबसे बड़ी सरगम।

150. वो सख़्त वाला बचपन

हम उस ज़माने के हैं भाई,
जब प्यार में भी मिलती थी धुनाई।

रोते हुए को चुप कराने के लिए,
दोबारा पीटा जाता था जी भर के लिए।

मम्मी कहती, “रोना बंद करो वरना…”,
और “वरना” में छिपा होता था सारा तजुर्बा।

पापा की एक खाँसी ही काफी थी,
पूरी शरारत वहीं माफ़ी थी।

होमवर्क भूलो तो क्लास में मार,
घर आओ तो फिर से सत्कार।

टीवी पर कार्टून देखना सपना था,
रिमोट पर पापा का ही कब्जा अपना था।

गलती से गिलास अगर टूट जाता,
सारा खानदान जज बन जाता।

बाहर खेलते-खेलते देर जो हो जाए,
दरवाज़े पर प्रवचन तैयार मिल जाए।

फिर भी वो बचपन बड़ा निराला था,
मार में भी छिपा प्यार वाला था।

ना टेंशन, ना कोई बहाना था,
बस डर ही हमारा खज़ाना था।

आज के बच्चे समझ नहीं पाएंगे,
उस सख़्ती में भी मज़े थे—ये जान न पाएंगे।

हम उस जमाने के हैं जनाब,
जहाँ थप्पड़ भी थे—पर प्यार भी।

149. साथ खड़े हैं, पर अपने नहीं!

जो साथ है, वो तुम्हारे हैं—जरूरी नहीं,
          हर तालियाँ बजाने वाला सहारे हैं—जरूरी नहीं।

कुछ लोग बस भीड़ बढ़ाने आते हैं,
          सेल्फी लेकर चुपचाप खिसक जाते हैं।

साथ चलेंगे कहकर हाथ मिलाते हैं,
          मोड़ आते ही दिशा बदल जाते हैं।

मीटिंग में सब “हम-हम” चिल्लाते हैं,
          काम पड़े तो “तुम-तुम” बतलाते हैं।

मुफ्त की सलाह रोज़ दिलाते हैं,
          मदद की बारी में गायब हो जाते हैं।

कंधे से कंधा कहने में तेज़ होते हैं,
          वजन उठाने में बहुत कमज़ोर होते हैं।

पर घबराना नहीं, ये खेल पुराना है,
         जीवन ने हर किसी को आज़माना है।

जो सच में अपने होते हैं,
          वे शोर नहीं, असर में होते हैं।

वे कम बोलते, ज्यादा निभाते हैं,
         भीड़ नहीं, भरोसा बन जाते हैं।

इसलिए पहचान सीखो मुस्कान से,
         नहीं शब्दों की मीठी उड़ान से।

जो अंत तक संग निभा जाए,
        वही अपना कहलाए।

बाकी तो बस राह के यात्री हैं,
        तुम्हारी कहानी के अस्थायी पात्र ही हैं।

148. अपने-पराए का चश्मा

जीवन में खुश रहना है तो पहले ये मानो,
हर मुस्कुराता चेहरा अपना है—ये मत जानो।
कुछ लोग बस वाई-फाई जैसे होते हैं,
पास हों तो सिग्नल, दूर हों तो सोते हैं।

सब “भाई-भाई” कहकर गले लगाते हैं,
जरूरत पड़े तो मोबाइल साइलेंट पाते हैं।
चाय पर बड़े-बड़े वादे हो जाते हैं,
काम के वक्त सब गुम हो जाते हैं।

फैमिली ग्रुप में सब दिल भेजते हैं,
ऑफलाइन में हाल नहीं पूछते हैं।
स्टेटस पर “हम साथ हैं” लिखते हैं,
साथ देने में पसीने से भीगते हैं।

कुछ अपने सिर्फ त्योहारों में खिलते हैं,
बाकी दिन यादों में ही मिलते हैं।
रिश्तों की दुकान बड़ी निराली है,
यहाँ “सेल” में भी भाव-ताव की लाली है।

जो सच में अपने होते हैं,
वे कम बोलते पर संग होते हैं।
बाकी बस भीड़ बढ़ाने आते हैं,
फोटो खिंचवा कर घर को जाते हैं।

इसलिए दिल का दरवाज़ा सोच समझ खोलो,
हर “अपना” कहने वाले पर मत डोलो।
भ्रम का चश्मा जब उतारोगे यार,
तभी सच्ची खुशी देगी दस्तक बार-बार।

147. समय पर खिसकने का वरदान

सही समय पर गलत जगह से निकल जाना,
कभी-कभी भगवान का ही इशारा माना।
जहाँ मुफ्त की सलाहों की बारिश होती है,
वहाँ समझदारी अक्सर फरार होती है।

ऑफिस में जब बॉस का मूड गरम हो जाए,
और फाइलों का पहाड़ सामने आ जाए,
तभी मोबाइल पर नकली कॉल आ जाए,
और इंसान धीरे से बाहर निकल जाए।

शादी में जब रिश्तेदार घेर लें चारों ओर,
और पूछें “कब करोगे?” बार-बार जोर,
तभी अचानक याद आए जरूरी काम,
और जूते पहन भागो श्रीराम!

दोस्तों की बहस जब राजनीति छेड़ दे,
और चाय की टेबल को संसद बना दे,
तभी मुस्कुरा कर पानी पी लेना,
और चुपचाप दरवाज़े से खिसक लेना।

कभी-कभी चुप रहना भी जीत है,
समय पर हट जाना ही प्रीत है।
हर जगह वीर बनना जरूरी नहीं,
कभी-कभी बच जाना भी कमाल सही।

तो याद रखो जीवन का ये ज्ञान,
समय पर खिसकना भी है वरदान।
जहाँ दिमाग कहे “अब बस, निकल लो भाई”,
वहीं समझो ऊपरवाले ने घंटी बजाई।

146. जीते जी वाला समर्थन

अंतिम यात्रा में भीड़ उमड़ आती है,
सबकी आँखों में अचानक नमी छा जाती है।
दूर-दूर से रिश्तेदार दौड़े चले आते हैं,
फूलों से ज्यादा फोटो खिंचवाते हैं।

कंधा देने में सब आगे हो जाते हैं,
जीते जी कंधा मांगो तो बहाने बनाते हैं।
वहाँ सब कहते, “बहुत नेक इंसान था”,
जीते जी बोले, “थोड़ा परेशान था!”

माला, भाषण, श्रद्धांजलि की लाइन लगती है,
पर मदद की बारी आए तो घड़ी रुकती है।
वहाँ चाय-समोसे भी गरम मिल जाते हैं,
जीते जी हाल पूछो तो लोग सिमट जाते हैं।

सब कहते, “हम तो परिवार जैसे थे”,
जीते जी महीनों तक नज़र नहीं आते थे।
वहाँ आँसू भी टाइम से टपकाए जाते हैं,
जीते जी मैसेज का रिप्लाई टलवाए जाते हैं।

अंतिम यात्रा में सब साथ निभाते हैं,
जीते जी साथ देने से घबराते हैं।
वहाँ यादों का पिटारा खुल जाता है,
जीते जी दरवाज़ा बंद ही रह जाता है।

इस दुनिया का अजब है ये व्यवहार,
जीते जी कम, बाद में अपार प्यार।
इसलिए भाई, जीते जी मुस्कुरा लेना,
जो पास हैं, उन्हें गले लगा लेना।

145. अच्छे बनने का साइड इफेक्ट

जरूरी नहीं कि गलती करने से ही दुख मिले,
कभी-कभी ज्यादा अच्छे बनो तो भी बिल मिले।

हमने सोचा भलाई में ही भला है,
दुनिया बोली, ये तो सीधा-सा भला है।

हर किसी को हाँ में हाँ मिलाई,
अपनी ही नींद उधार चढ़ाई।

दोस्त ने कहा, जरा नोट दिला दो,
हम बोले, ले लो, और क्या दिला दो।

रिश्तेदार बोले, तुम तो बहुत न्यारे,
काम पड़े तो सबसे पहले तुम्हारे।

ऑफिस में भी यही कहानी,
मेहनत हमारी, वाहवाही अनजानी।

ना कहना सीखा ही नहीं,
इसलिए चैन देखा ही नहीं।

जितना झुको उतना झुकाते,
फिर कहते, तुम तो बड़े भाते।

एक दिन हमने थोड़ा सा टाला,
सबने बोला, देखो बदला ये निराला।

तब समझ आया सीधा फंडा,
ज्यादा मिठास भी बनती पंगा।

अब भलाई भी सोच समझकर करते,
दिल रखते, पर दिमाग भी धरते।

अच्छा बनो पर थोड़ा सयाना,
वरना बन जाओगे सबका बहाना।

हँसते-गाते यही सिखाना,
अच्छाई में भी बैलेंस लाना।

144. दादाजी की ज्ञान सभा

बुढ़ापा एक ऐसी अवस्था है निराली,
जहाँ ज्ञान की खुल जाती है तिजोरी खाली।

हर सवाल का उत्तर तैयार रहता है,
पर पूछने वाला कहीं बाहर रहता है।

दादाजी बोले, सुनो मेरी कहानी,
पोते बोले, बाद में दादाजी, अभी है रवानी।

अनुभव की गठरी कंधे पर लटकी,
पर श्रोता सब मोबाइल में अटके।

वो कहें, हमारे ज़माने में ऐसा था,
बच्चे कहें, गूगल पर वैसा था।

चश्मा ढूँढते-ढूँढते सिर पर मिल जाता,
फिर खुद पर ही हँसी का दौर आ जाता।

दाँतों की चर्चा, दवाइयों की बात,
फिर भी दिल से जवान हर रात।

हर विषय पर प्रवचन दे डालें,
चाहे कोई सुने या टालें।

राजनीति से लेकर रसोई तक ज्ञान,
हर मुद्दे पर उनका ही बयान।

कहते हैं, हमसे सीखो अनुभव प्यारे,
बच्चे बोले, पहले WiFi तो सँवारे।

बुढ़ापा सच में कमाल की चीज़,
फ्री सलाह और किस्से अतीत।

उत्तर सारे जेब में रखे होते,
पर प्रश्न पूछने वाले कम ही होते।

फिर भी मुस्कुराकर कहते हैं जनाब,
हम ही हैं चलता-फिरता जवाब।

143. आत्मा की संतुष्टि

इस संसार में आपका समय सीमित है,
हर सांस का हिसाब निर्धारित है।

इसलिए भीड़ को खुश करने में मत खोइए,
अपनी आत्मा की आवाज़ को संजोइए।

समाज हर पल राय बदलता है,
पर मन का सच स्थिर रहता है।

लोगों की तालियाँ क्षणिक होती हैं,
आत्मा की शांति अनंत होती है।

दूसरों की अपेक्षाएँ अंतहीन हैं,
पर आपकी इच्छाएँ ही प्रामाणिक हैं।

जो सबको रास आए,
वह स्वयं को भूल जाए।

स्वीकृति की दौड़ थका देती है,
पर सच्चाई सुकून दे देती है।

अपनी राह खुद चुनिए,
अपने सपनों को गुनिए।

हर निर्णय दिल से कीजिए,
भीतर की आवाज़ ही लीजिए।

क्योंकि समय लौटकर नहीं आता,
और पछतावा साथ रह जाता।

जीवन छोटा है, यह जान लीजिए,
आत्मा को संतुष्ट करना मान लीजिए।

समाज कल भी कुछ कहेगा,
पर आपका मन ही सच सहेगा।

142. सीधी राह

हर भौंकने वाले पर मत रुकना।
हर आवाज़ पर पत्थर मत फेंकना।

रास्ते में शोर बहुत होगा।
हर मोड़ पर कोई रोकेगा।

कुछ लोग यूँ ही बोलेंगे।
कुछ लोग यूँ ही डोलेंगे।

हर बात का जवाब जरूरी नहीं।
हर चुनौती से लड़ना जरूरी नहीं।

जो लक्ष्य पर नज़र रखता है।
वही मंज़िल तक पहुँचता है।

रुक-रुक कर समय गँवाओगे।
तो सफर लंबा बनाओगे।

अपनी ऊर्जा बचाकर रखना।
उसे सपनों में ही लगाना।

दुनिया का काम है कहना।
तुम्हारा काम है बस बढ़ना।

ध्यान अगर भटक जाएगा।
मंज़िल भी छूट जाएगा।

शोर को पीछे छोड़ देना।
सीधे आगे बढ़ते रहना.

141. बुद्धि की असली शक्ति

इतिहास गवाह है इस बात का,
बल से बड़ा होता है मस्तिष्क का।

शक्तिशाली शरीर दिखते महान,
पर दिशा देता है बुद्धिमान।

बाहुबल से युद्ध जीते जाते,
पर रणनीति से साम्राज्य बनते।

तलवारें बस वार कर पाती हैं,
विचार ही विजय दिलाती हैं।

जिसके पास सूझबूझ होती है,
उसी की दुनिया में पूछ होती है।

शरीर पहरा दे सकता है,
पर दिमाग ही नेतृत्व करता है।

मांसपेशियाँ थक भी जाती हैं,
पर सोच नई राह दिखाती है।

बल क्षणिक प्रभाव दिखाता है,
बुद्धि इतिहास रच जाता है।

शक्ति का सही अर्थ यही है,
विचारों में छुपी असली महिमा है।

जो दिमाग से खेल रचाता है,
वही समय को भी झुकाता है।

इसलिए तन से पहले मन गढ़ो,
ज्ञान से अपना पथ गढ़ो।

क्योंकि अंत में वही महान कहलाता,
जो बुद्धि से संसार चलाता।

140. इल्ज़ाम और इंसाफ़

गलत लोग गलती करके भी शर्मिंदा नहीं होते।
          सही लोग इल्ज़ाम सुनकर ही टूट जाते हैं।
झूठे चेहरे अक्सर बेखौफ ही रहते हैं।
          सच्चे दिल बेवजह ही रोते रहते हैं।
दोषी लोग सिर ऊँचा करके चलते हैं।
          निर्दोष लोग नज़रें झुकाकर ही चलते हैं।
छल करने वाले खुलकर हँसते रहते हैं।
          सत्य वाले भीतर ही सिसकते रहते हैं।
अपराधी हर रात चैन से सोते हैं।
          निर्दोष हर रात जागते ही रहते हैं।
झूठ को भीड़ सहारा देती रहती है।
          सच को तन्हाई घेरे रहती है।
धोखा देने वाले आगे बढ़ जाते हैं।
          ईमान वाले पीछे रह जाते हैं।
दुनिया अक्सर उलटी चलती रहती है।
          कसौटी सच्चों पर ही पड़ती है।
फिर भी सच कभी झुकता नहीं।
          उसका उजाला कभी रुकता नहीं।
इल्ज़ाम इंसान को तोड़ भी देता है।
          समय हर सच को जोड़ भी देता है।

139. सच की मुस्कान

सच की मुस्कान
      कोई मेरे बारे में गलत कहे,
तो उससे बस इतना पूछना।
      क्या तुम मुझे ठीक से जानते हो,
या यूँ ही मन हल्का कर रहे हो।
     मैं वैसा नहीं जैसा सुनाई देता हूँ,
मैं वैसा हूँ जैसा निभाई देता हूँ।
     कुछ लम्हों से फैसला मत करना,
पूरी कहानी सुने बिना मत भरना।
     मैंने रिश्तों को सहेज कर रखा है,
हर अपने को दिल में रखा है।
     अगर कभी गलत समझा गया हूँ,
तो शायद कम समझा गया हूँ।
     मेरा इरादा साफ रहा है,
हर कदम पर दिल साथ रहा है।
     लोग बातें बनाते रहेंगे,
हम मुस्कान सजाते रहेंगे।
     क्योंकि सच को सफाई नहीं चाहिए,
उसे बस थोड़ी समझ चाहिए।
     जो मुझे जानता है, वो मुस्कुराता है,
जो नहीं जानता, वो अफवाहें फैलाता है।
     मैं दिल से जीता हूँ हर पल,
न किसी से द्वेष, न कोई छल।
     इसलिए जो पूछे, उसे प्यार से बताना,
मैं जैसा हूँ, वैसा ही रहना।

138. वक़्त का रंगमंच

वक़्त के नाटक में किरदारों को परखना,
जो तुम्हारे दिखते हैं, अक्सर होते नहीं हैं।

          चेहरे कई मुखौटे पहनते हैं,
          इरादे भीतर कुछ और कहते हैं।

मुस्कानें भी अभिनय होती हैं,
बातें भी योजनाबद्ध होती हैं।

          हर तालियों की गूंज सच्ची नहीं,
          हर साथ निभाने वाला अपना नहीं।

मंच सजा है रोशनी से,
पर अंधेरा छिपा है हँसी में।

          जो पास खड़े दिखाई देते हैं,
          वही दूर कहीं खड़े मिलते हैं।

वक़्त ही असली निर्देशक है,
सच का वही परीक्षक है।

          पर्दा जब धीरे से गिरता है,
          चेहरा असली तभी दिखता है।

ताली और आलोचना बदलती रहती है,
पर नियत हमेशा संभलती रहती है।

          इसलिए किरदार नहीं, चरित्र देखो,
          शब्द नहीं, व्यवहार देखो।

वक़्त की कसौटी कठोर सही,
पर निर्णय उसका कमजोर नहीं।

           नाटक खत्म तो सब छँट जाता है,
           सच अंत में ही जगमगाता है।

137. दिल के रिश्ते

रिश्ते खून से ही नहीं बनते,
कुछ लोग दिल से भी जुड़ते।

बिना नाम के बंधन होते,
पर सबसे गहरे स्पंदन होते।

जो मुश्किल में साथ खड़े हों,
वही अपने सच में बड़े हों।

न कोई वंश, न कोई पहचान,
बस अपनापन ही उनकी शान।

कभी दोस्त बनकर आते हैं,
कभी भाई सा साथ निभाते हैं।

बिना कहे जो समझ जाएँ,
वही दिल के करीब आ जाएँ।

सुख-दुख में जो थामे हाथ,
वही होते जीवन का साथ।

खून का रिश्ता मिल जाता है,
दिल का रिश्ता चुना जाता है।

कुछ लोग किस्मत से मिलते हैं,
और आत्मा से जुड़ जाते हैं।

ऐसे रिश्ते अनमोल होते,
हर बंधन से बढ़कर होते।

136. नज़दीकियाँ और माँ की मुस्कान

रखा करो नज़दीकियाँ,

ज़िंदगी का भरोसा नहीं,

कौन कब बिछड़ जाए,

इसका कोई किस्सा नहीं।

आज जो साथ बैठा है,

कल वही दूर हो सकता है।

बातें अधूरी रह जाती हैं,

आँखें नम हो जाती हैं।

फिर कहते हैं लोग अक्सर,

चुपचाप चले गए, बताया भी नहीं।

समय हाथ से फिसल जाता है,

रिश्ता बस याद बन जाता है।

इसलिए अपनों को थामे रखो,

दिल से उन्हें बाँधे रखो।

नाराज़गी लंबी मत करना,

खामोशी गहरी मत करना।

एक गले लगना काफी है,

टूटे मन के लिए वही माफी है।

क्योंकि ज़िंदगी रुकती नहीं,

और मौत बताती नहीं।

इसी जीवन की भीड़ में,

एक सुकून का कोना है।

वो है माँ की हँसी,

जो हर दर्द का सोना है।

हँसती हुई माँ से ज्यादा खूबसूरत कुछ नहीं,

उसकी मुस्कान से बढ़कर कोई सूरत नहीं।

उसकी हँसी में घर बसता है,

उसके बिना सब सूना लगता है।

जब वो मुस्कुराकर देखती है,

हर थकान खुद ही बहती है।

उसके चेहरे की चमक निराली,

जैसे सुबह की पहली लाली।

उसकी हँसी में दुआएँ बसती हैं,

हर संताप वहीं पिघलती हैं।

रातों की नींदें उसने खोईं,

ताकि हमारी राहें हों रोशन हुईं।

उसके आँचल में सारा जहाँ,

वही है मेरा सबसे बड़ा आसमाँ।

इसलिए अपनों से प्यार जताओ,

माँ को हर दिन गले लगाओ।

नज़दीकियाँ ही असली धन हैं,

रिश्ते ही जीवन के वन हैं।

कल का भरोसा किसने देखा,

आज को ही अपना लेखा।

हँसती रहे माँ हर सुबह-शाम,

यही है जीवन का सबसे सुंदर नाम।

134. सच्चों की सज़ा

तीन लोग अक्सर परेशान दिखे।
वफादार, मददगार, दिल के सच्चे।

जो सच के साथ खड़े रहते हैं,
वही अक्सर अकेले रहते हैं।

जो हरदम साथ निभाते हैं,
वही सबसे ज्यादा आज़माए जाते हैं।

जो बिना स्वार्थ के हाथ बढ़ाते हैं,
वही तानों से नवाज़े जाते हैं।

जिनके इरादे पाक होते हैं,
उनके रास्ते ही कठिन होते हैं।

बाकी दोगले मुस्कुराते हैं,
हर माहौल में ढल जाते हैं।

चापलूस हर दर पर सजते हैं,
हर कुर्सी के आगे झुकते हैं।

सच बोलने वाले खटकते हैं,
झूठ बोलने वाले चमकते हैं।

पर वक्त की अपनी पहचान है,
उसका न्याय बड़ा महान है।

जो भीतर से सच्चे होते हैं,
अंत में वही ऊँचे होते हैं।

दोगलापन ज्यादा चल नहीं पाता,
झूठ ज्यादा पल नहीं पाता।

133. उन्नति ही उत्तर

बेइज़्ज़ती का जवाब उन्नति है।
अपमान का उत्तर प्रगति है।
          जो ताने सुनाए गए,
          उन्हें लक्ष्य बनाना चाहिए।
जो हँसे थे राह में,
उन्हें परिणाम दिखाना चाहिए।
          आँसू बहाकर क्या मिलेगा,
          हौसला बढ़ाकर सब मिलेगा।
गिरकर उठना सीख लो,
चुप रहकर जीतना सीख लो।
          शोर से नहीं पहचान बनती,
          मेहनत से उड़ान बनती।
अपमान एक परीक्षा है,
साहस की परिभाषा है।
          जो भीतर आग जला दे,
          वही किस्मत बदलवा दे।
बदला शब्दों से नहीं,
कर्मों से लिया जाता है।
         सम्मान माँगा नहीं जाता,
         योग्यता से पाया जाता है।
इसलिए समय को साथी बनाओ,
खुद को इतना ऊँचा उठाओ।
          कि जिनकी नज़रें झुकी न थीं,
          वो खुद नज़रें झुका जाएँ।

132. सच्ची अमीरी

जो कम में खुश है, वही अमीर है,
जिसका मन संतुष्ट है, वही धनी है।

          सोने-चाँदी से क्या होगा,
          अगर दिल में कमी होगी।

थाली में सादा रोटी सही,
पर चेहरे पर मुस्कान सही।

          छोटा सा घर अगर अपना हो,
          तो महल भी फीका सपना हो।

जिसे चाहतें सीमित रखनी आएँ,
उसे चिंताएँ छू न पाएँ।

          लालच की आग जो बुझा दे,
          वही जीवन को सजा दे।

कम साधन पर ऊँचे विचार,
यही हैं असली उपहार।

          जिसे हर पल का धन्यवाद है,
          उसी के पास असली प्रसाद है।

न शिकायत, न कोई ग़म,
बस संतोष से भरा हर दम।

          जिसकी नींद सुकून भरी है,
          वही दौलत सबसे बड़ी है।

खुशियों का जो रखवाला है,
वही किस्मत का मतवाला है।

          इसलिए कम में खुश रहना सीखो,
          यही अमीरी दिल में !

131. खामोश बद्दुआएँ

उन बद्दुआओं से डरो,
जो बोलकर नहीं दी जातीं।

जो आँसुओं में घुलती हैं,
पर होंठों तक नहीं आतीं।

जो दिल के भीतर सुलगती हैं,
पर आवाज़ नहीं बन पातीं।

जिसे दर्द ने जन्म दिया,
और चुप्पी ने पाला।

जहाँ भरोसा टूट जाता है,
वहीं श्राप पनप जाता है।

मासूमियत जब रोती है,
किस्मत भी कहीं सोती है।

जिसका हक़ तुमने छीना,
वो ऊपर तक जाता है।

जिसे तुमने तुच्छ समझा,
वही समय समझाता है।

खामोश आहें हल्की नहीं होतीं,
उनकी चोटें दिखती नहीं होतीं।

वो दुआ बनती नहीं,
पर असर कर जाती हैं।

इसलिए दिल न दुखाओ,
किसी को यूँ न रुलाओ।

क्योंकि खामोश बद्दुआएँ,
वक्त पर हिसाब चुकाती हैं।