मनुष्य हर दुःख को सह लेता है,
समय के संग खुद को ढाल लेता है।
पर जब घर में अशांति बस जाती है,
आत्मा भीतर से कांप जाती है।
बाहर की ठोकरें कम लगती हैं,
घर की चोटें गहरी लगती हैं।
जहाँ सुकून का आँगन होना था,
वहीं तनाव का कोना होना था।
दीवारें जब गवाह बन जाती हैं,
खामोशियाँ भी चुभने लग जाती हैं।
मीठे शब्द जब विष बन जाएँ,
अपने ही दिल को छल जाएँ।
मनुष्य सब कुछ सह जाता है,
पर घर का क्लेश तोड़ जाता है।
थका हुआ जब वो लौटकर आए,
और अपनापन भी दूर नज़र आए।
तब साहस भी डगमगा जाता है,
विश्वास भी बिखर सा जाता है।
गृह शांति ही असली धन है,
यही जीवन का पावन वन है।
जहाँ प्रेम का दीप जलता है,
वहीं हर दुःख हल्का पड़ता है।
इसलिए शब्दों में मधुरता लाओ,
घर को मंदिर सा बनाओ।
क्योंकि घर ही जब संबल बनता है,
तभी मनुष्य सच्चा जीवन जीता है।