51. ज़िंदगी को अपनाया कर

ख़ुद को इतना भी मत बचाया कर,
बारिश आए तो भीग जाया कर।

चाँद कोई थाली में नहीं देगा,
अपने चेहरे से जगमगाया कर।

दर्द हीरा है, दर्द मोती है,
आँखों से इसे न बहाया कर।

इन लम्हों को सहेज कर दिल में,
अपनी ताक़त बनाया कर।

होंठ हसीन हैं मुस्कान के लिए,
बातों में रस घोल जाया कर।

धूप अगर मायूस लौटे,
छत पे बहाना बन आया कर।

दिल मिलाना मुश्किल सही,
हाथ तो आगे बढ़ाया कर।

तन्हाइयों से यूँ न घबराया,
खुद से भी गुफ़्तगू किया कर।

आईने में झाँक के देख कभी,
खुद को भी सराहा कर।

हर सवाल का जवाब न दे,
कभी चुप रह समझाया कर।

हर मोड़ नई कहानी लाए,
ज़िंदगी को यूँ अपनाया कर।

पगडंडियों से दोस्ती कर,
शहर की दौड़ से छुट्टी लिया कर।

जहाँ दिल को सुकून मिले,
उन राहों पर भी जाया कर।

ख़्वाब सिर्फ़ सोने के नहीं,
उन्हें सच में आज़माया कर।

गिर भी जाए तो शिकवा नहीं,
हर बार खुद को उठाया कर।

जो अपना न बन सका कोई,
खुद से न दूर जाया कर।

दिल की धड़कन कुछ कहती है,
उसकी आवाज़ सुन जाया कर।

सपने सब देखा करते हैं,
तू हौसलों को जगाया कर।

हर सुबह नई शुरुआत है,
कल की फिक्र भुलाया कर।

बीते लम्हों की धूल झाड़,
नए रंगों से सजाया कर।

हँसी को आदत बना ले,
आँसू को कम ही बुलाया कर।

छोटी खुशियों को गले लगा,
रंजिश को दूर भगाया कर।

ये जीवन तेरा अपना है,
इसे खुलकर निभाया कर।

ख़ुद को इतना भी मत रोका कर,
ज़िंदगी को जी भर अपनाया कर।

50. सब्र का आख़िरी अश्क

पलकों की हद लाँघ कर, दामन पे आ गिरा।
एक अश्क मेरे सब्र की, तौहीन कर गया।

बरसों से दिल में जो, तूफ़ान छुपाए बैठा था।
हर दर्द को हँसी की, चादर में ढाँपे बैठा था।

टूटी थीं साँसें भीतर, नींदें भी बिखरी थीं।
फिर भी हर सुबह खुद को, सपनों में जकड़े बैठा था।

हर घाव पे मुस्कान रखी, चेहरा नया बना लिया।
दुनिया को कुछ न दिखे, ऐसा नक़ाब सजा लिया।

मगर उस रोज़ जब तुमने, किसी और का नाम लिया।
नज़रें मेरी आँखों से, चुपके से फेर लिया।

दिल की ऊँची मीनार से, एक ईंट सरक गई।
सालों की मज़बूत ख़ामोशी, अंदर ही दरक गई।

जो अश्क कैद था बरसों से, पलकों की सलाखों में।
आज आज़ाद हो बह निकला, मेरे ही दामन की राहों में।

वो सिर्फ़ एक आँसू न था, ख़ामोशी की चिट्ठी था।
जिसमें लिखा था थक कर—“अब बस… बहुत हो चुका।”

दिल चीखना चाहता था, पर आवाज़ दगा दे गई।
एक कतरा बोल गया सब, सब्र नज़रें छोड़ गया।

लोगों ने पूछा हँसकर—“क्यों उदास हो आजकल?”
मैंने कहा “कुछ नहीं…”, और छुपा लिया फिर हलचल।

सच ये है कि नींद नहीं आती, और आए तो ख़्वाब तुम्हारे।
हर रात वही कहानी, वही अधूरे इशारे।

वो एक अश्क अब रोज़, पलकों पे दस्तक देता है।
याद दिलाता हर पल— सब्र का भी किनारा होता है।

हर सहने की सीमा होती, हर चुप्पी का स्वर होता है।
जो बाहर आ ही जाता है, जब दिल बहुत बेबस होता है।

अब मैं जान गया हूँ ये, आँसू भी सच कहते हैं।
जब शब्द साथ न दें, तो अश्क बयान करते हैं।

पलकों की हद लाँघ कर जो, दामन पे आ गिरा था।
वो कतरा ही बता गया— सब्र भी कभी थका

49. जनता की हुंकार

सिंहासन खाली करो,
कि जनता अब आती है।

     न्याय-अग्नि सी धधकती,
     नई वेदी सजाती है।

भूखे पेट भी जिसने,
सपनों को था पाला।

     अब जागा है वो जन-मन,
     तोड़ चुका है जाला।

आँसू अब अंगार हुए,
सवाल बने तलवार।

     झूठ की चादर फट जाएगी,
     सच की होगी बौछार।

महलों में बैठे सुन लें,
नक़ाब नहीं बच पाएगा।

     हर गद्दार और जालिम का,
     चेहरा सामने आएगा।

ये भीड़ नहीं जनसागर है,
जिसे न रोके दीवार।

     धर्म-जाति सब हारेंगे,
     जीतेगा जन-विचार।

रोटी का जो हक छीना,
वो अब लौटाया जाएगा।

     हर अन्याय का हिसाब,
     ब्याज समेत चुकाया जाएगा।

हर नारे में आग जगी,
हर कदम नई मिसाल।

     सिंहासन खाली करो,
     आया जनता का काल।

48. तेरी ही मेहर

ये जो न्यामत मिली है मुझे,
ये जो साँसें चल रही हैं।
धड़कनों की मधुर लय में,
मानो वीणा बज रही है।

     हर सवेरा सुनहरा लगता,
     हर निशा में नूर है।
     मेरे जीवन की गागर में,
     तेरा ही भरपूर है।

करूँ ईश्वर तेरा शुक्रिया,
हर लम्हा, हर बात पर।
तेरी ही छाया में खड़ा हूँ,
तेरे ही प्रभात पर।

     दुःख को तू कफूर करे,
     सुख का दे संसार।
     हर संकट में बन जाता,
     तू मेरा आधार।

तेरा न्याय अपार प्रभु,
तेरी रचना महान।
हर रेखा में लिखा हुआ,
तेरा ही विधान।

     कभी आँसू, कभी मुस्कान,
     दोनों तेरा खेल।
     तेरी लीला अद्भुत लगती,
     हर दिन एक नया मेल।

जब-जब गिरा, तूने थामा,
टूटे मन को जोड़ा।
खोया जब खुद को मैंने,
तूने फिर से मोड़ा।

     मैं तो धूल बराबर हूँ,
     तू ही सच्चा रहबर।
     तू ही धरती, तू ही अम्बर,
     तू ही मेरा अंबर।

शब्द सभी छोटे पड़ते,
तेरी महिमा गाने को।
तू ही मेरी हर प्रेरणा,
जीवन सजाने को।

     शुक्र है तेरे न्याय का,
     तेरे पावन विधान का।
     तेरी कृपा से ही टिका हूँ,
     अपने आत्म-सम्मान का।

अंधियारे में दीप बने,
जब कोई न साथ।
भटकूँ तो तू राह दिखाए,
थकूँ तो दे विश्राम।

     भूलूँ तेरा नाम अगर,
     फिर भी दे पहचान।
     जो भी हूँ मैं आज प्रभु,
     सब तेरा ही दान।

तेरी कृपा असीम है,
तेरा प्रेम संजीवनी।
तू ही मेरा सारथी,
तू ही मेरी जीवनी।

47. जाम और ज़मीर

हे रम-प्रेमी ग़ालिब के भाई,
हाथों में तेरे जाम की मलाई।

साक़ी से गिलास भरवाया तूने,
पर दिल का हाल कब समझाया तूने?

महफ़िल में शेर सुनाता रहा,
दर्द भी अपना ही पिलाता रहा।

जाम कितना था, ये बात नहीं,
दिल में छुपी थी लाचारी कहीं।

शौक़ में खुद को मत जला,
नशे में अपना घर मत जला।

जिंदगी में भी रंग सजा,
हर खुशी को दिल से रचा।

नदी-नालों की हूरें झूठी,
ख़्वाबों की दुनिया बहुत ही रूठी।

जो शबाब दे, वो शबख़ून करे,
जो जाम दे, ज़हर भी भरे।

साक़ी की बातों में मत आ,
अपनी राहों को मत भुला।

पैमाना बस उतना ही ले,
होश रहे, दुनिया भी दिखे।

जश्न रहे पर ज़मीर भी साथ,
निगाहों में सच्चाई की बात।

धुएँ में सच को मत जलाना,
लफ़्ज़ों से रोशनी जगाना।

ग़ालिब के हमदर्द शायर तू,
कलम भी है तेरे हाथ में यूँ।

कभी जाम रख, कभी कलम उठा,
अपनी पहचान को यूँ न मिटा।

हद में रख जाम की रवानी,
वरना खो जाएगी कहानी।

जो दिल से निकली सच्ची बात,
डूब न जाए नशे की रात।

46. कानों की आत्मकथा

हम हैं कान…
जी हाँ वही, दो अनजान।

चुपचाप सब कुछ सुनते हैं,
पर खुद कभी न सुने जाते हैं।

हम दो हैं जुड़वां भाई,
लेफ्टू-राइटू नाम रखाई।

किस्मत ने ऐसा खेल रचा,
एक-दूजे को न देख सका।

पैदा होते ही श्राप मिला,
उल्टी दिशा में टंगा किला।

Zoom मीटिंग भी न हो पाई,
ज़िंदगी भर दूरी निभाई।

हमें मिला बस सुनने का काम,
ऑडियो रिकॉर्डर सुबह-शाम।

गालियाँ हों या मीठी बात,
सब दर्ज है दिन और रात।

धीरे-धीरे खूंटी समझे गए,
चश्मे-मास्क हम पर टंगे।

एयरफोन ठूसे, बाल कटे,
दर्द हमारे हिस्से पड़े।

अरे चश्मा आँखों के लिए है,
फिर हम पर क्यों लटकाए है?

हम कोई हैंगर थोड़े हैं,
जो बोझ सभी का ढोते हैं।

बचपन में टीचर झिंझोड़े,
“कान खींच दूँगा!” शब्द छोड़े।

जैसे खींचने से बुद्धि जागे,
हम ही हर सज़ा को भोगे।

जवानी आई, छेद हुए,
झुमके-बालियाँ हम पर सजे।

बोरवेल हमने झेला भाई,
तारीफ चेहरे ने पाई।

कानों के लिए न क्रीम कोई,
न कविता में तारीफ होई।

आँखों-होंठों का गुणगान,
हम पर बस कट और तान।

बाल कटाते ब्लेड जो चलती,
हम पर ही वह रेखा जलती।

डिटॉल कहता “शेरू चुप हो”,
दर्द मगर फिर भी न थमो।

अब मास्क युग भी आ गया,
हुक हमारा ही पा गया।

सरकारी खूंटी समझ लिया,
हर बोझ हमें ही दे दिया।

न रो सकते, न कुछ कह पाते,
बस लटके-लटके मुस्काते।

सब सुन लेते, राज छुपाते,
चुप रहकर भी साथ निभाते।

तो अगली बार जो मास्क लगाओ,
या चश्मा हम पर टिकाओ।

झुमका पहनो, गीत सुनो,
बस “थैंक यू” कहना न भूलो।

हम भी थोड़े सेंसिटिव हैं,
दिल से थोड़े पॉज़िटिव हैं।

हँसते रहो और याद रखो,
कान हैं तो कॉन्फिडेंस रखो।

45. कर्म ही सच्ची पहचान

तपोबल से धरती पर होते शूर महान,
‘जाति-जाति’ का शोर मचाएँ कायर और अज्ञान।

     धर्म नहीं जो बाँटे मानव ऊँच-नीच के नाम,
     सच्चा धर्म वही जो दे सबको सम सम्मान।

वीर वही जो कर्मठ बन तप में लीन रहे,
जनसेवा के पथ पर चलकर जग में दीन सहे।

     वर्ण नहीं है जन्म से तय होने वाला अधिकार,
     कर्मों से ही मिलती जग में गौरव की धार।

जो कहे “मैं ब्राह्मण हूँ” पर न तप, न ज्ञान,
वह केवल एक परछाईं है, न उसमें कोई प्राण।

     क्षत्रिय वही जो रक्षा करे निर्भय होकर सदा,
     न कि केवल नाम का धारी, भीरुता में बँधा।

वैश्य वही जो लोकहित में व्यापार चलाए,
लोभ-मोह से ऊपर उठकर सेवा निभाए।

     शूद्र नहीं जो सेवा करे, वह तो पूज्य महान,
     नीच वही जो बाँट रहा मानव का सम्मान।

कायरता है जाति गिनाना जब कर्म हों खोखले,
बलशाली वह है जग में जिसके तप हों अनोखे।

     उठो युवा! पहचानो खुद को कर्मों की उड़ान,
     जातिवाद की जंजीरें तोड़ो, करो नव

44. दोस्ती का हसीन कर्ज

मुझ पर दोस्तों का प्यार,
यूँ ही उधार रहने दो।
बड़ा हसीन है ये कर्ज,
मुझे कर्जदार रहने दो।

     हर मुलाक़ात में जादू सा है,
     हर हँसी में महकती बात है।
     उनके बिना ये जिंदगी,
     जैसे अधूरी सी किताब है।

इस किताब-ए-ज़िंदगी को,
यूँ ही खुमार रहने दो।
उनकी यादों के पन्नों पर,
रंग हज़ार रहने दो।

     जो आँखें छलकती हैं,
     ग़म में, खुशी में मेरे लिए।
     उन सभी आँखों में सदा,
     प्यार बेशुमार रहने दो।

कभी आँसू बन बहती हैं,
कभी दुआ बन कहती हैं।
हर मोती में छुपा हुआ,
रिश्ता बेमिसाल रहने दो।

     उन निगाहों का जो नूर है,
     जीवन का उजास बनने दो।
     उनके संग हर अंधियारा,
     रोशन सा एहसास रहने दो।

मौसम चाहे बदलते रहें,
बसंत-पतझड़ आते रहें।
मेरे यारों को उम्र भर,
यूँ ही सदाबहार रहने दो।

     बरसातों में भीगती हँसी,
     सर्दी की चाय की गर्मी।
     हर राह पर साथ कदम,
     नाम एक साथ रहने दो।

कभी मनमुटाव, कभी मनुहार,
पर दिलों में न हो दीवार।
दोस्ती का ये मधुर राग,
हर पल त्यौहार रहने दो।

     विश्वास की इस बगिया में,
     स्वार्थ का बीज न पनपे।
     बस अपनापन हर डाली पर,
     झूमता हर बार रहने दो।

वो मस्ती, वो शरारतें,
न तुम भूलो, न हम भूलें।
उम्र भले आगे बढ़ती जाए,
दिल का बचपन रहने दो।

     क्लास की वो धीमी हँसी,
     कैंटीन की अधूरी चाय।
     कॉपी में छिपे राज सभी,
     बिन कहे समझ जाना रहने दो।

कल हम भले बूढ़े हो जाएँ,
पर दिल जवाँ ही रहने दो।
हमारी दोस्ती को हर दिन,
जीवन का त्योहार रहने दो।

     जो रिश्ते दिल से बनते हैं,
     वो वक़्त से टूटते नहीं।
     बस उनमें थोड़ा सा प्यार,
     और यादों का संसार रहने दो।

43. जंगल की वापसी

कभी था घना, सघन साया,
जहाँ पवन गाए, पंछी आया।

पेड़ों की गोद में जीवन पलता,
हर प्राणी निर्भय होकर चलता।

फिर लोहे ने दस्तक दी एक दिन,
सड़कें उगीं, मशीनों का छिन-छिन।

इंसानी चाहत बढ़ती गई,
हरियाली चुपचाप घटती गई।

ईंटों ने धरती को जकड़ा,
धुएँ ने नभ का गला पकड़ा।

चमकते भवन, शोर बाज़ार,
जंगल का मौन हुआ लाचार।

साल बदले, बदले मौसम,
कभी सूखा, कभी भीषण आलम।

बाढ़ की लहरें सब बहा ले गईं,
प्रगति की नींव भी ढहा ले गईं।

दरकती मिट्टी से अंकुर फूटा,
धरती ने फिर से स्वर को छूटा।

जड़ों की सरसराहट आई,
सोई हरियाली फिर मुस्काई।

जो जंगल चुपचाप गया था,
अब अपना अधिकार कह गया था।

“ये मिट्टी मेरी थी, मेरी रहेगी,
मैं जीवन हूँ—फिर से उगूंगी।”

42. नदी की यादें

सदियों पुरानी बातें हैं,
बुजुर्गों की आवाज़ें हैं।
आज भी कानों में गूंजती,
वक़्त की सीढ़ियाँ चढ़ती-उतरती।

     अक्सर दादा कहते थे,
     धीरे-धीरे समझाते थे—
     “नदी के पास घर मत बसाना बेटा,
     ये अपना रास्ता कभी नहीं भूलता।”

हम हँसकर टाल दिया करते,
उन शब्दों को हल्का समझते।
कहते—वो पुरानी बात थी,
अब तो दुनिया नई सौगात थी।

     अब रिवर-व्यू बिकते हैं,
     सपनों जैसे दिखते हैं।
     लॉन में झूले, सजी बालकनी,
     सेल्फी कॉर्नर, चमकती रवानी।

रेत को सीमेंट से ढक डाला,
पत्थरों को गहना बना डाला।
गूगल मैप से मोड़ मिटाए,
नदी के पथ भी भूल बताए।

     नाम रख दिए व्यास-व्यू,
     हर दृश्य लगा मानो न्यू।
     पर नदी चुपचाप बहती रही,
     अपनी स्मृतियों संग रहती रही।

ना वो भूली, ना थकी,
ना कभी अपनी जिद से हटी।
धीरे से कहती घाटी में—
“मैं मालकिन हूँ इस बस्ती की।”

     फिर एक दिन बादल गरजे,
     आसमान जैसे फटकर बरसे।
     घनघोर बारिश ने फाइलें खोलीं,
     प्रकृति ने अपनी बातें बोलीं।

नदी आई शांत स्वभाव,
ना क्रोध, ना कोई दाव।
बस धीरे से कहती गई—
“मैं यहीं थी, तुम ही भूले भाई।”

     दीवारें टूटीं, छतें बहीं,
     आँखों में बस चीखें रहीं।
     लोग बोले—सब लुट गया,
     किस्मत ने जैसे साथ छोड़ दिया।

सरकार को सबने कोसा,
राजनीति ने मुद्दा रोपा।
पर नदी बस मुस्कराई,
सच की लौ फिर से जगाई।

     “मैं तो वही कर रही हूँ,
     जो बुजुर्ग कहते रहे सुनो।
     मैं मेहमान नहीं इस घाटी की,
     मालकिन हूँ हर थाती की।”

अब भी वक़्त है, समझ जाओ,
मुझको दुश्मन मत बनाओ।
मैं जीवन हूँ, मैं धारा हूँ,
हर खेत की मैं सहारा हूँ।

     बस इतना सा मान रखो,
     मेरा अपना स्थान रखो।
     मुझे मत रोको, मत बाँधो,
     मेरे प्रवाह को मत आँधो।

अगर सच में सुख पाना हो,
प्रकृति से नाता निभाना हो—
तो याद रखो हर जन-जन,
मैं हूँ धरती की स्पंदन।

     मुझे बहने दो, मुझे बहने दो,
     मेरे संग जीवन गहने दो।

41. हम वहीं हैं

बहुत समय बाद जब हम यहाँ न होंगे,
हमारी स्मृतियाँ फिर भी हवाओं में होंगी।

     हमारा प्रेम, अमिट रंग बनकर,
     दिलों पर अपनी छाप रखेगा ठहरकर।

समय हमें इस देह से ले गया सही,
पर सच में हम कहीं खोए नहीं।

     हम ठहरे हैं उस संध्या की लहर में,
     जहाँ सूरज घुलता है रात के शहर में।

जहाँ भोर की किरण जन्म लेने को है,
पर अंधेरे का आलिंगन भी ढीला न हो।

     हम वहीं हैं—
     जहाँ न पूरी रोशनी, न पूरा अंधकार।

जहाँ यादें धुंध-सी फैल जाती हैं,
और हर सांस में बीते कल की महक आती है।

     तुम यदि चुपचाप आँखें मूंद सको,
     तो हमें अपनी धड़कनों में छू सको।

तुम्हारी हथेलियों की गर्माहट में,
तुम्हारी पलकों की नमी की आहट में।

     हमारी हँसी अब भी हवा में बहती है,
     जैसे कोई पुरानी धुन कहती है।

समय हमें ले गया, पर मिटा न सका,
प्रेम का दीप कभी बुझा न सका।

     जब सांझ और भोर के बीच ठहरो,
     बैंगनी-सुनहरे आकाश को निहारो।

याद रखना उस शांत क्षण में,
हम वहीं हैं—तुम्हारे हर श्वास-तन में।

40. जली हुई रोटी का सच

रोटी जली तो रसोइए ने कहा — “तवा बदल दो।”
बीवी बोली — “ये दहेज का है, इसे बदलना मत बोलो।”

रोटी फिर जली तो आवाज़ आई — “आटा बदल डालो।”
ससुरजी बोले — “ऑर्गेनिक है हमारा, नसीब को ही टालो।”

रोटी तीसरी बार भी काली हो गई,
रसोइए ने कहा — “पानी बदलो, बात सरल हो गई।”

बच्चे बोले — “हम मिनरल वाटर ही पिएँगे,
हमारा पेट VIP है, रिस्क क्यों लिएँगे?”

फिर भी रोटी जली तो बोला — “चूल्हा बदल दो।”
पड़ोसी दौड़े आए — “गैस हमारे नाम है, ये मत छेड़ो।”

धुआँ उठता रहा छत तक काला,
कुत्ता भी सोच में पड़ा — “ये खाना है या ज्वाला?”

दादी ने आखिर समझाया हँसकर,
“या तो शादी बदलो, या रसोइया बदलो खुलकर।”

पर हिम्मत किसी में भी न आई,
हर किसी ने अपनी दलील सुनाई।

रोटी जलती रही, बहाने पकते रहे,
सब अपने-अपने तर्क में सिमटते रहे।

घर में सबको बदलाव चाहिए था,
पर बदलने का साहस किसी में नहीं था।

रसोइया मुस्कुराया और धीरे से बोला,
“यहाँ हर कोई बदलना चाहता है — पर खुद को नहीं तोला।”

39. मर्द को भी चाहिए प्यार

मंदिर की घंटी-सी खनकती आवाज़,
पर दिल की तन्हाई में अनकहा सा राज़।

     बीवी की हँसी, बच्चों की बात,
     फिर भी अधूरा-सा हर दिन की सौगात।

          माँ की ममता, पिता की छाया,
          बहन-भाई ने हर दर्द सहलाया।

                    फिर भी मन में उठता है सवाल,
                    क्या मर्द को भी मिलता है निस्वार्थ ख्याल?

प्यार की राह में नहीं कोई फ्री पास,
हर मुस्कान के पीछे छुपी होती है आस।

      बीवी कहे—“प्यार है तो साबित करो,”
      बच्चे कहें—“सपनों का घर लाकर भरो।”

          बहन पुकारे—“थोड़ा साथ निभाओ,”
          पिता कहें—“और आगे बढ़ जाओ।”

               माँ की ममता भी चिंता में ढली,
               हर दुआ में जिम्मेदारी पली।

मर्द की दुनिया जद्दोजहद की बात,
जहाँ चुप्पी में छिपे रहते हैं जज़्बात।

     हर रिश्ता जैसे लेन-देन का हिसाब,
     हर अपनापन पूछे कोई जवाब।

          दोस्तों की महफिल भी फीकी लगे,
          हर मुलाक़ात में मतलब जगे।

               सिर पर सपने, हाथ में बही-खाता,
               भावनाओं का भी बन गया नाता।

कभी सोचा था प्यार बेमोल होगा,
बिना शर्त, बिना तौल होगा।

     पर अब हर एहसास का रेट है तय,
     हर मुस्कान के पीछे कोई शर्त नई।

          क्यों हर रिश्ते की कीमत आँकी जाती है?
          क्यों मोहब्बत भी तोली जाती है?

               मर्द भी चाहता है स्नेह का स्पर्श,
               बिना कारण कोई दे दिल का हर्ष।

वो भी चाहे कोई यूँ ही मुस्कुराए,
बिना हिसाब उसे गले लगाए।

     वो भी थकता है इस दौड़ में रोज़,
     चुपके से पोंछे अपने ही ओझल आँसू रोज़।

          उसकी खामोशी को कौन पढ़ेगा?
          उसके भीतर का दर्द कौन गढ़ेगा?

               हर दिन सवालों की बौछार,
               “क्यों नहीं बना पाया बड़ा संसार?”

प्यार यहाँ मुफ्त नहीं मिलता,
हर भावना का मूल्य यहाँ सिलता।

     पर सच ये भी है गहराई में कहीं,
     अब भी बचा है स्नेह सच्चा यहीं।

          प्यार कमाया जाता है विश्वास से,
          सींचा जाता है धैर्य और एहसास से।

               मर्द को भी चाहिए अपनापन,
               बस सच्चाई से भरा एक आलिंगन।

ना हो लेन-देन का कोई खेल,
ना हो हर रिश्ते में सौदे का मेल।

     मर्द भी चाहता है वही प्यार,
     जो मिले दिल से—बिना हिसाब, हर

38. थोड़ा ठहर जा ऐ ज़िंदगी

थोड़ा ठहर जा ऐ ज़िंदगी, ज़रा साँस तो लेने दे,
तेरी भागती दौड़ से निकल, मुझे खुद से मिलने दे।

     हर सुबह नई उम्मीदों का दीप जला जाती है,
     हर शाम अधूरी-सी थकान थमा जाती है।

तेरे सफ़र में बहुत कुछ पाया है मैंने,
पर दिल अब भी सुकून को तरसता है सपने।

     तेरे इम्तिहान रोज़ नए रंग दिखाते हैं,
     कभी आँसू, कभी मुस्कान बनकर आते हैं।

इस भीड़ में कहीं खुद को खो दिया है,
अपनी ही तलाश में भटकता-सा हो लिया है।

     ऐ ज़िंदगी, ज़रा रुककर तो देख,
     मेरे सपनों का कुछ तो बोझ कम कर दे एक।

हर सवाल का कोई जवाब तो मिले,
दिल की उलझनें भी आज साफ़ हो चलें।

     कभी तो सन्नाटा भी सुनने दे मुझे,
     कभी तो खुदा से जुड़ने दे मुझे।

कभी आईने में सच मेरा दिख जाए,
कभी अपना ही चेहरा अपना लग जाए।

     तेरे संघर्षों ने हिम्मत सिखाई है,
     हर ठोकर ने नई राह दिखाई है।

पर अब एक लम्हा चैन का भी चाहिए,
जहाँ दर्द नहीं, बस सुकून का साया हो।

     थोड़ा ठहर जा ऐ ज़िंदगी, तेरी रफ़्तार बहुत तेज़ है,
     मेरे अरमान अभी अधूरे हैं, सफ़र के कुछ राज़ अभी शेष हैं।

37. आह से अहा तक

अभी रूबरू भी नहीं हुआ हूँ मैं, ऐ ज़िंदगी, तुझसे पूरी तरह,
आपाधापी की आंधी में तेरा चेहरा खोजता रहा हर पहर।

     अंधी दौड़ में तेरे असली लुत्फ़ को टटोलता रहा,
     तू सामने होकर भी जैसे ओझल-सी रही सदा।

लोग कहते थे—तू अनमोल सफ़र है,
जिसमें ठहराव भी गीत है और रफ़्तार भी सुर है।

     मैंने धरती से पाताल तलक तुझे ढूँढा,
     पर सुकून का नखलिस्तान कहीं न मिला।

अब समझ आया, ‘ठहर’ ही वो मंत्र था,
जो जीने का सलीका चुपचाप कहता था।

     पर पैरों को आदत है भागते जाने की,
     दिल को ज़िद है हर पल कुछ पाने की।

रफ़्तार की हवाओं ने महक छीन ली ठहराव की,
थका दिया है इस अंधी चाह ने प्रभाव की।

     चलो अब थोड़ा मद्धिम हो लेते हैं,
     तेज़ कदमों से कुछ पल को मुक्त हो लेते हैं।

ढूँढते हैं वो कोना जहाँ रूह को आराम मिले,
जहाँ हर साँस में अपनापन खिले।

     वहीं के गिर्द अपना आशियाना बना लें,
     खामोशियों संग जीने का बहाना बना लें।

आह से अहा तक का ये सफ़र,
अब तेरे संग मुस्कुराकर तय कर लें।

     जो भी लम्हा बाकी है जीवन में,
     तेरी बाहों में सुकून ढूँढते हुए जी

36. मेरे घर आना, ओ ज़िंदगी

सन्नाटे में धड़कनों की धुन बना लेते हैं,
टूटे सपनों की राख से उजाला सजा लेते हैं।
बुझी उम्मीदों की चिंगारी समेटकर,
हम फिर से परचम हवा में लहरा लेते हैं।

आना ज़िंदगी, ओ मेरी ज़िंदगी,
सूखी साँसों में थोड़ी नमी भर दो।
बिखरे रास्तों की वीरान धूल पर,
किसी चिराग़ की हल्की-सी लौ धर दो।

मेरे घर आना…
वो घर जो ईंट-पत्थर से नहीं बना,
मोहब्बत की मिट्टी से रचा गया है।
जहाँ हर कोना दुआओं से सजा गया है।

जहाँ दीवारें इंतज़ार में खड़ी रहती हैं,
और खामोशियाँ भी बातें कहती हैं।
उस घर का छोटा-सा बस इतना पता है,
नक्शे में दर्ज नहीं, दिलों में बसा है।

दिल की गलियों से होकर गुजरना,
तन्हाई की चौखट पर ज़रा ठहरना।
मेरे घर के आगे “मोहब्बत” लिखा है,
वो शब्द जो कभी नहीं मिटा है।

न बारिश उसे धुंधला कर पाती है,
न आँधी उसे गिरा पाती है।
वक़्त की धूल भी हार मान जाती है,
उसकी इबारत अमर हो जाती है।

मेरे घर की दीवारें गुम-सी हैं,
और छत भी कहीं धुंधली-सी है।
खुला है आसमान का हर टुकड़ा यहाँ,
सितारों की चादर ओढ़ लेता हूँ जहाँ।

चाँद को दिया बनाकर रख देता हूँ,
रात की पेशानी पर सजा देता हूँ।
मेरे घर का कोई दरवाज़ा नहीं,
न ताले हैं, न कोई चौखट कहीं।

तुम्हारी चाहत ही मेरी दस्तक बने,
तुम्हारा नाम ही मेरी चाबी बने।
तुम्हारा होना ही मेरी हिफाज़त हो,
तुम्हारी आहट ही मेरी राहत हो।

आना ज़िंदगी, ओ मेरी ज़िंदगी,
क्योंकि बिन तेरे ये ठिकाना अधूरा है।
तेरे बिना हर सुर बेसुरा है,
हर रंग फीका, हर मौसम सूना है।

तू आएगी तो हवाओं में गुनगुनाहट होगी,
सन्नाटे में भी सरगम की आहट होगी।
अभी तो हम गीत यूँ ही गा लेते हैं,
टूटे तारों से स्वर मिला लेते हैं।

पर सच ये है कि तेरे बिन सब अधूरा है,
हर उजाला थोड़ा-सा धुँधला है।
तू आएगी तो रौशनी मुकम्मल होगी,
हर धड़कन में नई हलचल होगी।

मेरे घर की साँसें तेरा इंतज़ार करती हैं,
हर आहट पर तेरी पुकार करती हैं।
आ जा कि ये वीराना घर बन जाए,
तेरे संग हर दर्द सफर बन जाए।

मेरे घर आना, ओ ज़िंदगी,
तेरे कदमों से ही ये आँगन खिलेगा।
तू आएगी तो ये सन्नाटा भी,
एक मधुर राग में ढलकर जी लेगा।

35. वो घर अब भी इंतज़ार में है

निमंत्रण की ज़रूरत नहीं वहाँ जाने को,
न बताने की कि कब लौटकर आने को।
कपड़े कैसे हैं, चेहरा कैसा है, कोई मायने नहीं,
वो घर तो बस आपके आने के लिए ही सही।

     दरवाज़ा सदा खुला रहता है वहाँ,
     बचपन की महक तैरती है जहाँ।
     दो आँखें चौखट पर टिकी रहती हैं,
     बस ये सुनने को—कदमों की आहटें सही।

वो घर, जहाँ आप लौटते हैं बिना बताए,
जहाँ थाली बिना माँगे सामने आ जाए।
जहाँ मना करने पर भी प्यार भरी डाँट मिलती है,
हर छोटी ज़िद पर भी हँसी खिलती है।

     जहाँ आपकी चुप्पी भी पढ़ ली जाती है,
     और हर बात दिल में सहेज ली जाती है।
     माँ की नज़र अब भी उतनी ही कोमल है,
     उसकी दुआओं में आज भी वही संबल है।

पापा अब भी मजबूत बनने का अभिनय करते हैं,
अपने जज़्बातों को भीतर ही भीतर धरते हैं।
पर उनकी आँखें सब राज़ खोल देती हैं,
जब आपको चौखट पर खड़ा देख लेती हैं।

     वो घर सिर्फ दीवारों का नाम नहीं होता,
     वो दो धड़कनों का संगम होता।
     एक दिन ये दरवाज़े यूँ ही खुले न मिलेंगे,
     ये इंतज़ार करते चेहरे भी शायद न दिखेंगे।

तब समझोगे घर का असली अर्थ क्या है,
अपनों के बिना हर कोना कितना सूना सा है।
सारी दौलत, सारे महल फीके लगेंगे,
उनकी एक झलक को तरसते रहेंगे।

     एक और आलिंगन की चाह जागेगी,
     एक और डाँट दिल को भागेगी।
     वो मुस्कान, वो आशीष भरा हाथ,
     सब याद आएगा हर एक साथ।

इसलिए अगर आज भी वो घर बुला रहा है,
तो समय को यूँ ही मत गँवा रहा है।
जाइए, गले लगाइए, कुछ पल बिताइए,
पुरानी कहानियाँ फिर से दोहराइए।

     माँ की आँखों में चमक भर दीजिए,
     पापा के कंधे पर सिर रख दीजिए।
     उनके संग हँसिए, कुछ आँसू भी बहाइए,
     हर अधूरी बात आज ही कह आइए।

क्योंकि माँ-पापा का घर शाश्वत नहीं होता,
समय का पहिया कभी रुकता नहीं होता।
पर उनका दिया हुआ प्रेम अमर रहता है,
हर सांस में उनका आशीष बसता है।

     जब-जब जीवन की राह कठिन हो जाएगी,
     उनकी सीख ही राह दिखाएगी।
     वो घर भले एक दिन खाली हो जाए,
     पर उसका स्नेह सदा मन में समाए।

आज जो इंतज़ार में दरवाज़ा खुला है,
वो प्रेम ही जीवन का असली किला है।
इससे पहले कि समय आगे निकल जाए,
अपने घर की ओर कदम

34. कागज़ की कश्ती

कागज़ की कश्ती थी, पानी का किनारा था,
न कोई डर था तब, न कोई इशारा था।
     हवा की लहरों संग सपने बह जाते थे,
     हर बूँद में अपने ही रंग नजर आते थे।

बचपन का दिल कितना आवारा था,
हर कोना जैसे अपना ही सहारा था।
     मिट्टी में सजते थे सपनों के महल,
     ना कोई चिंता थी, ना कोई पहल।

पेड़ों पे झूलना, बादलों से बातें,
धूप में छुपना, बारिश की सौगातें।
     हँसी की गूंज से महकता था आँगन,
     सादा था जीवन, और मीठा था स्पंदन।

ना मोबाइल था, ना कोई स्क्रीन,
बस अपनों के संग था हर दिन रंगीन।
     छोटी-छोटी बातों में जादू बसता था,
     हर दिन नया-सा कोई किस्सा सजता था।

गिरकर भी हँसना हमें आता था,
हर हार में जीत का मज़ा पाता था।
     आँसू भी तब मोती बन जाते थे,
     दोस्तों के संग सब ग़म भूल जाते थे।

अब आ गए हैं समझदारी के दलदल में,
जहाँ मुस्कान भी तौली जाती है हलचल में।
     अब खेल नहीं, बस मंजिल की दौड़ है,
     हर चेहरा जैसे जिम्मेदारियों का बोझ है।

ख़ुशी भी भीड़ में कहीं गुम-सी लगती है,
बचपन की मासूमियत अब कम-सी लगती है।
     वो नादान पल कितने सुहाने थे,
     हर दिन जैसे अपने ही तराने थे।

कागज़ की कश्ती अब नहीं बनती,
वो छोटी-सी नदी पास नहीं बहती।
     पर यादों में अब भी लहरें उठती हैं,
     मासूम दिनों की तस्वीरें सिमटती हैं।

जब-जब मन थककर बैठ जाता है,
वो बचपन चुपके से पास आ जाता है।
     यादों की धूप अब भी चमकती है,
     मन की खिड़की से झांकती है।

काश फिर वही दिन लौट आते,
जहाँ दिल से हम दुनिया सजाते।
     जहाँ रिश्तों में सच्चाई का नाता था,
     हर चेहरा बस अपनापन जताता था।

जहाँ नफरत का कोई किनारा न था,
बस प्यार ही सबसे बड़ा सहारा था।
     जहाँ हर सुबह नई कहानी लाती थी,
     और हर शाम सुकून सुलाती थी।

अब जीवन की राहें भले बदल गईं,
पर यादों की कश्ती वहीं अटल खड़ी रही।
     मन के सागर में अब भी उतारता हूँ,
     उन पलों को फिर से जीने का प्रयास करता हूँ।

क्योंकि सच तो वही सुनहरा था,
जब हर सपना अपना और गहरा था।
     वो बचपन ही सबसे न्यारा था,
     कागज़ की कश्ती थी, पानी का किनारा था।

33. मैं अभी ज़िंदा हूँ

लड़के अक्सर बाप को गले नहीं लगाते,
न उसकी गोद में सिर रखकर सो पाते।
बचपन में जो उंगली पकड़कर चलते थे,
बड़े होकर वही फोन पर कम ही मिलते थे।
कभी बाप हीरो था, सबसे बड़ा सहारा,
हर गिरती चाल में उसने थामा था तुम्हारा किनारा।
स्कूल की फीस, नए जूते, बैग और किताबें,
अपनी जरूरतें भूल, पूरी की तुम्हारी ख्वाहिशें बेहिसाब।
वक्त बदला, बेटा जवान हुआ,
सपनों और दुनिया की दौड़ में गुम हुआ।
अब बाप उतना जरूरी नहीं लगता,
क्योंकि “वो तो है ही”—यही भ्रम मन में बसता।
दूर शहर में जब बेटा घर फोन लगाता है,
मां से हंसकर हाल-चाल पूछ जाता है।
उधर कोने में बैठा बाप धीमे से कहता है,
“कह देना उससे, टेंशन ना ले… मैं अभी ज़िंदा हूँ।”
आवाज़ उसकी हल्की है, मगर दिल भारी,
हर शब्द में छिपी है ममता सारी।
वो खुलकर कुछ भी कह नहीं पाता,
पर हर शाम आंगन में तेरा इंतज़ार सजाता।
जब तू साइकिल से गिरता था कभी,
वो दौड़ता था घबराकर तभी।
अब वही बाप छत पर खड़ा राह निहारे,
कि शायद बेटा अचानक सामने आ उतरे।
आंखें कमज़ोर हुईं, पर नजर तुझ पर रहती है,
झुकी कमर में भी उम्मीद सी बहती है।
वो अब भी मानता है तू उसका अभिमान है,
तेरी हर जीत में उसका सम्मान है।
उसे याद हैं तेरी पहली हंसी की रातें,
पहली साइकिल और बचपन की बातें।
मोबाइल पर जब तेरी आवाज़ सुनाई देती है,
वो अपना हर दर्द उसी पल में छुपा लेता है।
“कह देना उससे, मैं बिल्कुल ठीक हूँ,
बस थोड़ी-सी थकान है, और क्या कहूँ।
सीने में दर्द है तो क्या हुआ,
दिल अब भी उसके लिए धड़कता है पूरा।”
कभी लौटकर देख उस बूढ़े चेहरे को,
जिसकी मुस्कान जुड़ी है बस तेरे नाम से।
तू शायद उलझ गया जीवन की राहों में,
पर वो अब भी जुड़ा है तेरे हर कदम की चाहों में।
जब अगली बार घर की देहरी पर आना,
तो केवल मां को ही गले न लगाना।
उस बाप के कंधे पर भी सिर रख देना,
और धीरे से इतना भर कह देना—
“अब तुम टेंशन मत लेना, मैं साथ खड़ा हूँ,
आपके सपनों का आज भी मैं ही बड़ा हूँ।
आप ही से सीखा है हिम्मत का हुनर,
आप ही से पाया है जीवन का सफर।”
क्योंकि वो जो चुपचाप सब सह जाता है,
वही पिता प्रेम का सागर कहलाता है।
उसकी खामोशी को यूँ अनसुना मत करना,
उसके जीते-जी उसे अपना कहना।
कहीं देर न हो जाए इस एहसास में,
कहीं शब्द रह न जाएँ बस इतिहास में।
आज ही गले लगाकर कह देना उसे,
“आप मेरे दिल में हमेशा ज़िंदा हैं।”

32. क्या मैं अब भी प्रेम में हूँ ?

एक दिन यूँ ही मैंने माँ से पूछा था,
“माँ, क्या तुम अब भी पापा से प्रेम करती हो?”
साठ वर्षों की संगिनी चुपचाप मुस्कुरा उठी,
जैसे जीवन का कोई गहरा सत्य समझा रही हो।

उसकी मुस्कान में शब्दों से अधिक अनुभव था,
मानो प्रेम अब एक शांत और स्थिर स्वर था।
मैं घर लौटकर माँ के शब्दों को सोचने लगा,
प्रेम का अर्थ मन ही मन टटोलने लगा।

उन्होंने लिखा था—
“तुम पूछते हो क्या मैं अब भी उन्हें चाहती हूँ?”
मैं केवल मुस्कुरा देती हूँ, तुम्हारी मूर्खता पर नहीं,
बल्कि इसलिए कि प्रेम अब वैसा नहीं रहा जैसा तुम सोचते हो।

अब प्रेम तितलियों की उड़ान जैसा नहीं है,
न आतिशबाज़ी के शोर और जुनून जैसा है।
अब प्रेम एक जड़ की तरह गहरा और शांत है,
जो तूफानों में भी अडिग विश्वास सा है।

अब दिल तेज़-तेज़ नहीं धड़कता है हर पल,
पर आत्मा को देता है एक गहरा सुकून सरल।
हाथ काँपते नहीं हैं जीवन की थकान से,
पर शक्ति मिलती है हर नए दिन की पहचान से।

अब कोई चौंकाने वाला रोमांच नहीं होता,
बस छोटे-छोटे प्यारे अनुष्ठान साथ होते हैं।
एक ही समय की कॉफी का इंतज़ार रहता है,
तौलिया टाँगने पर बहस का सिलसिला चलता है।

जब छींक आती है तो वह चुपचाप पास आता है,
रजाई खींचकर मेरे ऊपर प्यार से डाल जाता है।
फूलों की प्रतीक्षा अब उतनी जरूरी नहीं लगती,
न ही पत्रों की आस मन को उतनी खलती।

जब पीठ दर्द करे तो उसका सहारा चाहिए होता है,
जब मन भीतर से थककर बिखरने लगता है।
वह बिना शोर के बस मौजूद रहता है सदा,
बिना किसी फ़िल्मी वादे के निभाता है वफ़ा।

उसकी एक दृष्टि ही मेरी भाषा समझ जाती है,
साथ बिताया जीवन गुप्त कहानी बन जाती है।
हँसना, थकना और फिर भी साथ चलते जाना,
यही प्रेम का असली अर्थ धीरे-धीरे जाना।

तो क्या मैं अब भी प्रेम में हूँ?
हाँ, पर उस हलचल वाले प्रेम में नहीं।
मैं उस शांति में हूँ जिसे हमने साथ गढ़ा है,
उस विश्वास में हूँ जिसने हमें जोड़ रखा है।

तूफानों में भी वह मेरा सुरक्षित ठिकाना है,
मेरे जीवन का सबसे सुंदर आश्रय पुराना है।
प्रेम अब शब्द नहीं, एक मौन सहमति है,
साथ रहने की एक गहरी आत्मीय प्रतिबद्धता है।

आरंभ की आग अब धीमी रोशनी बन गई है,
जीवन की सच्ची कहानी वहीं कहीं रुक गई है।
मैं अब भी प्रेम में हूँ,
पर उस प्रेम में जो समय के साथ मजबूत हुआ है।