गाँव के छोटे से मोहल्ले में पंडित रमेश का आश्रम था। वे सरल जीवन जीते थे, अपने कर्मों के लिए आदरित थे। लोग दूर-दूर से उनसे मार्गदर्शन लेने आते थे। उसी मोहल्ले में मोहन नाम का युवक रहता था। गरीबी और कठिनाइयों ने उसे चोरी करने पर मजबूर कर दिया था। लोग उसे चोर कहते थे, लेकिन मोहन जानता था—यह उसकी कमजोरी थी, उसकी मजबूरी नहीं।
एक रात मोहन ने तय किया कि वह आश्रम से चंदाने की चीज़ चुरा लेगा। उसने चुपचाप आश्रम में घुसने की कोशिश की, पर जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला, पंडित रमेश ने उसे पकड़ लिया।
“तुम यहाँ क्यों आए हो, बेटा?” पंडित ने शांत लेकिन सख्त स्वर में पूछा।
मोहन डर और शर्म के मारे कांप उठा। उसने झूठ बोलने की कोशिश की,
“मैं… मैं कुछ देख रहा था, कुछ नहीं।”
लेकिन पंडित रमेश ने उसकी आँखों में देखा और उसकी झूठ की कोशिश को चुपचाप नकार दिया।
“मोहन, सच बोलो। क्या तुम चोरी करने आए थे?”
मोहन की आँखों में आँसू थे। “हाँ, पंडित जी… मैं चोरी करने आया था, पर… मुझे लगता था कि कोई रास्ता नहीं है।”
पंडित रमेश ने गहरी साँस ली।
“मोहन, सुनो। तुम्हारा वंश, तुम्हारा परिवार, या हालात तुम्हारा मूल्य तय नहीं करते। ‘कर्मों से उद्धार, वंश से नहीं’। आज तुमने गलत सोचा, लेकिन अभी भी तुम्हारे पास विकल्प है।”
मोहन और भी डर गया। “पर पंडित जी, लोग मुझे हमेशा चोर कहते हैं। क्या मैं कभी सही इंसान बन पाऊँगा?”
पंडित ने गंभीर स्वर में कहा,
“जो इंसान अपने कर्म बदल लेता है, वही असली बदलाव करता है। तुम्हारे पुराने कर्म तुम्हें रोक नहीं सकते। लेकिन साहस चाहिए—ईमानदार होना और सही राह चुनना सबसे कठिन काम है।”
मोहन की आँखों में आँसू बहने लगे। पंडित ने उसके हाथ पकड़कर कहा,
“तुम्हारे पास अभी भी मौका है। और याद रखो—जो व्यक्ति दूसरों की बुराई सुनाता है, उसका असली चेहरा वही सामने आता है। कर्मों से ही उद्धार मिलता है, नाम या हालात से नहीं।”
मोहन ने अगले दिन अपने निर्णय को अमल में लाना शुरू किया। लेकिन मोहल्ले के लोग जानते थे कि वह चोरी करने वाला था। उसी शाम, मोहन गाँव के बाजार में पकड़ा गया। लोग जमा हो गए। उसकी निंदा और अपमान हुआ। मोहन का चेहरा लाल हो गया, दिल डर और शर्म से धक-धक कर रहा था।
तभी पंडित रमेश वहाँ पहुंचे। उन्होंने भीड़ को शांत किया।
“देखो, यह लड़का अपनी गलती समझ चुका है। तुम उसकी पिछली आदतों के बारे में सोचो, लेकिन उसकी भविष्य की राह पर विश्वास करो। कर्मों से उद्धार मिलता है, वंश या अपमान से नहीं।”
मोहन ने अपनी गलती स्वीकार की और प्रतिज्ञा की कि अब वह ईमानदार और मेहनती जीवन जिएगा। धीरे-धीरे उसने गाँव के बुजुर्गों की मदद करनी शुरू की, बच्चों को पढ़ाया, और जरूरतमंदों का सहारा बना।
कुछ महीनों बाद, वही लोग जिन्होंने उसकी निंदा की थी, अब उसकी तारीफ़ करने लगे। मोहन ने समझ लिया कि असली बदलाव केवल कर्मों से आता है, न कि नाम या हालात से।
एक दिन वह पंडित रमेश के पास आया और सिर झुकाया।
“आपकी शिक्षा ने मेरी ज़िंदगी बदल दी, पंडित जी। मैंने जाना कि सम्मान और उद्धार केवल मेरे कर्मों से आते हैं, किसी वंश या परिस्थितियों से नहीं।”
पंडित मुस्कुराए।
“याद रखो बेटा, कठिन परिस्थितियाँ सबको आज़माती हैं। पर सही कर्म चुनने का साहस ही इंसान को महान बनाता है।”
और उस दिन मोहन ने तय किया—अब उसके कर्म ही उसकी पहचान होंगे, और उसकी पुरानी आदतें केवल याद बनकर रह जाएँगी।
लघु कथा-19
मुंबई के एक पुराने मोहल्ले में दो परिवार रहते थे—शर्मा और वर्मा। शर्मा परिवार साधारण, मेहनती और शांत प्रकृति का था। पिता राजेश, माँ सीमा और उनका बेटा करण। वर्मा परिवार थोड़े दिखावे वाले और चर्चा में रहते थे—राकेश, लता और उनकी बेटी प्रिया। मोहल्ले के लोग अक्सर दोनों परिवारों के व्यवहार की तुलना करते रहते थे।
वर्मा परिवार की आदत थी—हर बात पर दूसरों की निंदा करना। नई दुकान खुली, बच्चों के कपड़े थोड़े अलग, पड़ोसी ने नया गार्डन बनाया—हर चीज़ उनकी आलोचना का विषय बन जाती थी। मोहल्ले में यह चर्चा बन गई थी कि वर्मा परिवार हमेशा सबकी निंदा करता रहता है।
एक दिन मोहल्ले में नया स्कूल खुला। वर्मा परिवार अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ चाय पर बैठा था। राकेश हंसते हुए बोला,
“शर्मा परिवार के बच्चे भी कमाल के हैं, सब आलसी और असंगठित। अगर हमारे बच्चे वैसे ही होते, तो हम शर्मिंदा होते।”
सीमा और राजेश ने यह सब सुना। राजेश ने अपनी पत्नी से कहा,
“देखो, सीमा। अब हमें प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए। बस सुनो। जो लोग दूसरों की निंदा करते हैं, वह अपने आप को दिखा रहे होते हैं।”
करण ने यह सब ध्यान से सुना। उसके मन में उठ रही कई भावनाएँ शांत हो गईं। वह समझ गया कि आलोचना करने वाला केवल अपने भीतर की कमजोरी और डर दिखा रहा है।
कुछ हफ्ते बाद, स्कूल में आदित्य ने देखा कि कुछ बच्चे प्रिया की छोटी-छोटी गलतियों पर हँस रहे थे और उसके दोस्तों के सामने उसकी निंदा कर रहे थे। आदित्य का दिल टूटता, पर उसने पिता की सीख याद की। उसने अपने दोस्तों से पूछा,
“तुम सच में प्रिया को समझते हो या सिर्फ उसकी कमजोरियों को बढ़ा रहे हो?”
सभी चुप हो गए। आदित्य ने फिर कहा,
“जो दूसरों की निंदा करता है, वह अपने अंदर की कमजोरी दिखाता है। किसी की आलोचना करने से पहले खुद को देखो।”
यह बात उन बच्चों के लिए झकझोरने वाली थी। उन्होंने महसूस किया कि दूसरों के दोष ढूँढने में समय बर्बाद करना खुद पर ध्यान न देने जैसा है।
वहीं मोहल्ले में वर्मा परिवार की बेटी प्रिया धीरे-धीरे समझ गई कि उनका व्यवहार दूसरों के लिए कितना बोझिल है। उसने अपनी माँ से कहा,
“माँ, हम हमेशा दूसरों की निंदा क्यों करते हैं? क्या हम इससे खुश होते हैं?”
लता ने सिर झुकाया। “हमें लगता था कि दूसरों की बुराई दिखाने से हमारी अहमियत बढ़ेगी। अब लगता है, यह सिर्फ़ नकारात्मक ऊर्जा फैलाता है।”
एक शाम, मोहल्ले की चौपाल पर सभी लोग इकट्ठा हुए। राजेश ने शांत स्वर में कहा,
“बच्चों, जब कोई आपके सामने किसी की निंदा करता है, तो पहले सुनो, लेकिन ध्यान उसी पर दो जो बोल रहा है। उस व्यक्ति को पहचानो, न कि जिसे वह लेकर आलोचना कर रहा है। जो व्यक्ति दूसरों की बुराई करता है, उसका असली चेहरा वहीं सामने आता है।”
मोहल्ले के लोग चुप हो गए। यह सरल बात थी, पर असर गहरा था।
धीरे-धीरे मोहल्ले का माहौल बदलने लगा। बच्चे अब दूसरों की निंदा सुनकर खुद को नहीं घबराते। लोग समझने लगे कि आलोचना करने वाला अपने भीतर की असुरक्षा दिखा रहा होता है। शर्मा और वर्मा परिवारों के रिश्ते पहले से अधिक सम्मान और समझदारी भरे हो गए।
एक दिन करण ने पिता से कहा,
“पापा, अब मैं समझ गया—जो लोग दूसरों की निंदा करते हैं, वो अपने अंदर की कमजोरी दिखा रहे होते हैं। हम दूसरों की आलोचना सुनकर खुद की अहमियत नहीं घटा सकते।”
राजेश मुस्कुराए।
“बिलकुल बेटा। यही असली शिक्षा है। कम बोलो, गहराई से सुनो—और दूसरों को उनकी आलोचना करने से खुद पहचानने का मौका दो। यही असली बुद्धिमत्ता है।”
और उस दिन मोहल्ले में एक छोटी सी सीख फैल गई—“किसी की निंदा सुनो, पर उसके असली चेहरे को समझो। और अपनी आत्मा को शांत और सशक्त रखो।”
लघु कथा-18
रवि ने बहुत दिनों से अपने बेटे आदित्य में एक अजीब सा बदलाव देखा था। वह पहले जैसा खुलकर बात नहीं करता था। नज़रें झुका कर चलता, जल्दी कमरे में चला जाता, और छोटी-छोटी बातों पर चौंक जाता। रवि समझ गया था—यह उम्र का बदलाव है, शरीर का भी और मन का भी।
एक शाम आदित्य छत पर बैठा आसमान देख रहा था। हवा हल्की थी, लेकिन उसके चेहरे पर बोझ था।
रवि चुपचाप जाकर उसके पास बैठ गया।
“सब ठीक है, बेटा?” उसने धीरे से पूछा।
आदित्य ने कंधे उचका दिए। “पता नहीं, पापा… लोग कुछ-कुछ कहते रहते हैं। स्कूल में, दोस्तों में… क्या सही है, क्या गलत—समझ नहीं आता।”
रवि ने गहरी साँस ली।
“जब इंसान बड़ा होता है, तो सिर्फ़ लंबाई नहीं बढ़ती, भावनाएँ भी बदलती हैं। शरीर भी बदलता है, सोच भी। यह डरने की नहीं, समझने की उम्र होती है।”
आदित्य ने झिझकते हुए कहा, “पर लोग कहते हैं कि कुछ बातें सोचनी भी गलत होती हैं… कि अगर मन में कुछ अजीब आए तो इंसान खराब हो जाता है।”
रवि हल्के से मुस्कराया।
“दुनिया ने बहुत सी बातें डर से बना ली हैं, सच से नहीं। ज़्यादातर मिथक डर से पैदा होते हैं—ताकि लोग सवाल न करें।”
उसने आदित्य के कंधे पर हाथ रखा।
“बेटा, तुम्हारा शरीर तुम्हारा है। उसका बदलना, नई भावनाओं का आना—ये सब प्रकृति का नियम है। इसमें शर्म की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। शर्म तब पैदा होती है, जब बिना समझे डर सिखाया जाता है।”
आदित्य की आँखों में पानी भर आया।
“तो… मैं गलत नहीं हूँ?”
रवि ने प्यार से कहा,
“नहीं। तुम इंसान हो। और इंसान होना मतलब महसूस करना, सवाल करना, सीखना।”
फिर वह थोड़ा गंभीर हुआ।
“लेकिन एक बात हमेशा याद रखना—
अपनी और दूसरों की इज़्ज़त सबसे ऊपर है।
निजता का सम्मान ज़रूरी है।
और कोई भी काम ऐसा नहीं होना चाहिए जिससे किसी को चोट पहुँचे—खुद को भी नहीं, किसी और को भी नहीं।”
आदित्य धीरे-धीरे शांत होने लगा।
“आप मुझे डांटेंगे नहीं?”
रवि ने सिर हिलाया।
“डर से इंसान नहीं बनता, बेटा। समझ से बनता है।
जो पिता सिर्फ़ डांटता है, वह चुप कराता है।
जो पिता समझाता है, वह इंसान बनाता है।”
उस रात आदित्य बहुत देर बाद चैन से सोया। उलझन पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी, लेकिन शर्म खत्म हो चुकी थी। अब सवाल डर के साथ नहीं, भरोसे के साथ आते थे।
और रवि भी बहुत कुछ सीख गया था। उसने समझा—
बच्चों को सही रास्ता नियमों से नहीं, रिश्तों से मिलता है।
डर दिखाकर नहीं, भरोसा देकर मिलता है।
चुप कराकर नहीं, सुनकर मिलता है।
कभी-कभी पिता का सबसे बड़ा उपहार
सीख नहीं होता,
डाँट नहीं होती—
बस यह भरोसा होता है कि
“तुम जैसे हो, वैसे ही ठीक हो…
और मैं तुम्हारे साथ हूँ।”
लघु कथा -17
अनिरुद्ध और मीरा की शादी को आठ साल हो चुके थे। उनका जीवन शांत था, पर कहीं न कहीं एक खालीपन था—जैसे बातें होती थीं, पर दिल नहीं खुलता था; साथ रहते थे, पर जुड़ाव कम हो गया था। दोनों ने इसे समय की थकान समझकर अनदेखा कर दिया।
इसी दौरान मीरा की ज़िंदगी में आर्यन आया—उसके ऑफिस का नया सहकर्मी। आर्यन ध्यान से सुनता था, छोटी बातों पर भी मुस्कराता था, मीरा की थकान को शब्दों में पहचान लेता था। मीरा को पहली बार लगा कि कोई उसे सच में “देख” रहा है। धीरे-धीरे बातें बढ़ीं, मैसेज लंबे हुए, और एक दिन मीरा ने खुद से स्वीकार किया—वह आर्यन से प्रेम करने लगी है।
पर उसके भीतर अपराधबोध भी था। वह अनिरुद्ध से नज़र नहीं मिला पाती थी। उसका व्यवहार बदल गया—चुप, उलझी हुई, और अक्सर खोई-खोई। अनिरुद्ध ने यह सब देखा, पर कुछ नहीं कहा। वह प्रतीक्षा करता रहा—सच के अपने आप सामने आने की।
एक रात मीरा टूट गई। उसने काँपती आवाज़ में कहा,
“मैंने किसी और से प्रेम कर लिया है… मैं तुम्हें धोखा दे रही हूँ।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। मीरा रोने लगी, सिर झुका लिया। उसे लगा अब सब खत्म हो जाएगा—गुस्सा, अपमान, तिरस्कार।
पर अनिरुद्ध कुछ देर चुप रहा, फिर बोला,
“तुम्हें यह कहने में बहुत हिम्मत लगी होगी। मैं सुन रहा हूँ… बताओ, तुम्हें क्या मिला जो मुझसे छूट गया?”
मीरा हैरान रह गई। उसने धीरे-धीरे सब कहा—अपनी अकेलापन, अनसुनी चाहें, और आर्यन के साथ मिली भावनात्मक नज़दीकी।
अनिरुद्ध की आँखें नम हो गईं, पर उसकी आवाज़ स्थिर थी।
“शायद मैंने तुम्हें समय नहीं दिया। शायद मैं तुम्हें समझ नहीं पाया।”
मीरा रो पड़ी,
“मैं गलत हूँ, अनिरुद्ध। मैं माफ़ी के लायक नहीं हूँ।”
अनिरुद्ध ने उसका हाथ थाम लिया।
“क्षमा मनुष्य के चरित्र का वह उज्ज्वल पक्ष है, जिसकी चमक सबसे कठिन परिस्थितियों में भी मंद नहीं पड़ती। अगर मैं तुम्हें तोड़ दूँ, तो हम तीनों टूटेंगे। अगर मैं माफ़ कर दूँ, तो शायद कोई संभल सके।”
उसने आर्यन से मिलने की बात कही। मीरा डर गई, पर अनिरुद्ध शांत था।
अगले दिन तीनों मिले। आर्यन शर्म से झुका हुआ था। अनिरुद्ध ने कहा,
“मैं तुमसे लड़ने नहीं आया। मैं बस सच जानना चाहता हूँ—तुम मीरा को क्या दे सकते हो?”
आर्यन ने कहा,
“मैं उसे समझता हूँ, पर मैं उसे वैसा जीवन नहीं दे सकता जैसा आप देते हैं। मैं उसकी खुशी चाहता हूँ, अपने लिए नहीं।”
अनिरुद्ध ने मीरा की ओर देखा,
“फैसला तुम्हारा है। मैं तुम्हें बाँधूँगा नहीं। अगर तुम जाओगी, मैं रोकूँगा नहीं।”
मीरा रोती हुई बोली,
“मैंने समझ लिया… मुझे प्रेम नहीं, अपनापन चाहिए। और वह मुझे तुमसे मिला है।”
उसने आर्यन से विदा ली। आर्यन ने कहा,
“तुम दोनों को देखकर समझ आया—क्षमा उन फूलों के समान है, जो कुचले जाने के बाद भी खुशबू देना बंद नहीं करते।”
मीरा और अनिरुद्ध घर लौटे। रास्ता वही था, पर मन हल्का था।
मीरा ने कहा,
“तुमने मुझे बचा लिया।”
अनिरुद्ध बोला,
“नहीं, क्षमा ने हमें बचाया।”
और उस दिन दोनों ने जाना—
क्षमा दिल को हल्का करती है, रिश्तों को गहरा करती है, और जीवन को सरल बना देती है।
लघु कथा-16
नीलम को लगता था, “यही तो परिवार है।”
शेखर को लगता था, “यही मेरी दुनिया है।”
पर समय के साथ रिश्तों में एक नई चीज़ जुड़ गई—अपेक्षा।
नीलम चाहती थी कि शेखर हर बात समझे बिना कहे।
शेखर चाहता था कि नीलम उसकी थकान बिना बताए समझ ले।
बच्चे चाहते थे कि माँ-पापा हर इच्छा तुरंत पूरी करें।
और शेखर के माता-पिता चाहते थे कि अब भी सब कुछ उनके हिसाब से चले।
धीरे-धीरे घर में आवाज़ें बढ़ने लगीं, मुस्कानें कम।
हर किसी को लगता था—“मैं सही हूँ, बाकी नहीं समझते।”
एक दिन नीलम ने कहा,
“तुम्हें मेरी कोई परवाह ही नहीं।”
शेखर ने जवाब दिया,
“तुम मेरी मेहनत नहीं देखती।”
बच्चों ने कहा,
“आप लोग कभी खुश नहीं रहते।”
माँ ने कहा,
“आजकल कोई हमारी नहीं सुनता।”
घर, जो कभी सुकून था, अब अदालत बन गया था।
एक शाम बिजली चली गई। अँधेरे में सब चुपचाप बैठे रहे। कोई टीवी नहीं, कोई मोबाइल नहीं।
पायल बोली,
“माँ, पहले जब लाइट जाती थी, हम खेलते थे न?”
नीलम को पुरानी बातें याद आ गईं।
शेखर ने धीमे से कहा,
“तब हमारे पास कम था, लेकिन शिकायत भी कम थी।”
माँ ने कहा,
“तब हम एक-दूसरे से उम्मीद कम करते थे, साथ ज़्यादा देते थे।”
उस अँधेरे में सबको एक बात साफ दिखी—
रिश्ते तब तक हल्के रहते हैं, जब तक उनमें सिर्फ अपनापन होता है, हिसाब नहीं।
अगले दिन नीलम ने चाय शेखर को बिना कुछ कहे दी।
शेखर ने बच्चों के साथ बैठकर होमवर्क किया।
माँ ने किसी बात में टोका नहीं, बस मुस्कराईं।
बच्चों ने भी ज़िद कम कर दी।
सबने एक छोटा सा फैसला किया—
कम उम्मीद, ज़्यादा समझ।
कम शिकायत, ज़्यादा साथ।
धीरे-धीरे घर का माहौल बदलने लगा।
झगड़े पूरी तरह खत्म नहीं हुए, पर कड़वाहट कम हो गई।
एक दिन आदित्य ने कहा,
“अब हमारा घर फिर से घर जैसा लगने लगा है।”
शेखर ने मुस्कराकर कहा,
“क्योंकि अब हम रिश्ते निभा रहे हैं, बोझ नहीं बना रहे।”
नीलम ने धीरे से जोड़ा,
“रिश्ते दर्द तब देते हैं, जब हम उनसे ज़्यादा माँगते हैं, कम देते हैं।”
और उस दिन सब समझ गए—
रिश्ते प्यार से बनते हैं,
पर टिकते हैं समझ से।
लघु कथा -15
रमेश शहर के बाहरी हिस्से में एक छोटी सी झोपड़ी में रहता था। दिन भर वह ईंट-भट्ठे पर काम करता, धूप, धूल और थकान के बीच अपनी ज़िंदगी घसीटता। उसकी कमाई कम थी, जरूरतें ज़्यादा। घर में बूढ़ी माँ, बीमार पत्नी और दो छोटे बच्चे—हर चेहरा उससे उम्मीद लगाए देखता था।
रमेश की सबसे बड़ी दुश्मन गरीबी नहीं थी, चिंता थी।
वह हर समय सोचता रहता—
कल काम मिला तो?
मालिक ने निकाल दिया तो?
बच्चों की फीस कैसे भरूँगा?
दवा के पैसे कहाँ से आएँगे?
ये सवाल उसके दिमाग में ऐसे घूमते जैसे मच्छर रात में कान के पास। उसे चैन से सोने नहीं देते।
एक दिन काम पर मालिक ने कहा, “आज काम कम है, कुछ लोग छुट्टी पर रहेंगे।”
रमेश का दिल बैठ गया। उसने बिना कुछ पूछे काम छोड़ दिया और घर लौट आया। रास्ते भर वह डरता रहा—अब क्या होगा?
घर पहुँचकर उसने गुस्से और घबराहट में पत्नी से कहा,
“अब सब खत्म है। कुछ नहीं बचेगा।”
पत्नी ने डरते हुए कहा,
“ठीक से बात तो करो, हुआ क्या?”
लेकिन रमेश सुनने की हालत में नहीं था।
शाम को पास के मोहल्ले में उसके दोस्त शंकर से मुलाकात हुई। शंकर ने पूछा,
“काम से इतनी जल्दी?”
रमेश ने सारी बात कह दी।
शंकर बोला,
“तूने पूछा नहीं कि छुट्टी किसकी होगी? कभी-कभी सिर्फ़ आधे दिन का काम होता है।”
रमेश का सिर चकरा गया। वह डर में फैसला कर बैठा था।
अगले दिन वह फिर भट्ठे पर गया। मालिक ने कहा,
“कल आधे दिन का ही काम था, इसलिए कुछ लोग पहले चले गए थे। आज पूरा काम है। तू क्यों नहीं आया?”
रमेश को लगा जैसे किसी ने उसके माथे पर थपकी दी हो।
उसे पहली बार समझ आया—
चिंता ने उसे सच देखने नहीं दिया।
डर ने उससे पूछना भी छीन लिया।
उसी दिन उसकी माँ ने धीरे से कहा,
“बेटा, हालात से मत डर। डर से हालात और बिगड़ते हैं।”
उसकी बातें रमेश के दिल में उतर गईं।
धीरे-धीरे रमेश ने अपनी आदत बदली।
अब वह हर डर के साथ सवाल पूछता।
हर परेशानी को पहले समझता, फिर फैसला करता।
एक दिन पैसे खत्म हो गए। पुराना रमेश घबरा जाता, छुप जाता। नया रमेश पास के स्कूल गया, मास्टर से बोला,
“कुछ दिन फीस देर से हो जाए तो चलेगा?”
मास्टर ने कहा, “हाँ, हालात ठीक होने तक।”
रमेश ने महसूस किया—
चिंता अक्सर हालात को और बिगाड़ देती है।
वह सोच को धुंधला कर देती है,
डर में फैसले करवा देती है।
पर जब इंसान डर की जगह समझ से चलता है,
तो रास्ते अपने आप दिखने लगते हैं।
उस रात रमेश पहली बार चैन से सोया।
झोपड़ी वही थी, गरीबी वही थी,
लेकिन मन हल्का था।
उसे पता चल गया था—
गरीबी से लड़ा जा सकता है,
पर चिंता से नहीं।
चिंता को छोड़कर ही
ज़िंदगी को थामा जा सकता है।
लघु कथा -14
अभय और निखिल बचपन के दोस्त थे। स्कूल से लेकर कॉलेज तक, दोनों साथ चले। फर्क सिर्फ़ इतना था कि अभय हमेशा “समझदार” बनना चाहता था और निखिल हमेशा “सुनना” चाहता था।
अभय को सलाह देना अच्छा लगता था।
कोई दुखी हो—वह रास्ता बता देता।
कोई उलझा हो—वह हल निकाल देता।
उसे लगता था कि यही दोस्ती है।
निखिल कम बोलता था। वह ज़्यादा सुनता था। दोस्त रोते, गुस्सा करते, टूटते—निखिल बस उनके साथ बैठता। कभी-कभी सिर्फ़ चाय पकड़ाता, कभी चुपचाप कंधा दे देता।
एक दिन निखिल की ज़िंदगी बिखर गई। उसकी शादी टूट गई। लोग तरह-तरह की बातें करने लगे। वह अंदर से टूट चुका था। वह सीधे अभय के पास गया।
अभय ने उसे देखा और तुरंत शुरू हो गया—
“देख, मैंने पहले ही कहा था, तुमने जल्दबाज़ी की।”
“तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था।”
“अब तुम्हें ये करना चाहिए, वो करना चाहिए…”
निखिल चुप बैठा रहा।
पर उसकी आँखें खाली थीं।
कुछ दिन बाद निखिल अभय से मिलने नहीं आया।
फिर हफ्ते बीते, फिर महीने।
एक दिन अभय ने खुद जाकर पूछा,
“तू मुझसे दूर क्यों हो गया?”
निखिल ने धीरे से कहा,
“तू मुझे ठीक करना चाहता था…
मुझे समझना नहीं।”
अभय चुप हो गया।
कुछ समय बाद अभय की अपनी ज़िंदगी में उथल-पुथल हुई। नौकरी छूट गई, रिश्ता टूटने लगा, घर में तनाव बढ़ गया। वह बिखर गया। पहली बार वह निखिल के पास गया—बिना किसी सवाल के, बिना किसी योजना के।
वह बोला, “आज कुछ मत कहना… बस बैठ जा मेरे साथ।”
निखिल आकर उसके पास बैठ गया।
न कोई सलाह, न भाषण।
बस चुप्पी, और साथ।
उस शाम अभय बहुत रोया।
निखिल ने सिर्फ़ इतना किया—उसके पास बैठा रहा।
घर लौटते समय अभय ने कहा,
“आज समझ आया…
तू मुझे ठीक नहीं कर रहा था,
तू मुझे टूटने की जगह दे रहा था।”
निखिल मुस्कराया।
कुछ दिनों बाद अभय फिर संभलने लगा—अपने तरीके से, अपनी गति से।
एक दिन अभय ने कहा,
“अब मुझे समझ आ गया है—
जीवन की सबसे अच्छी सलाह यही है—
किसी को सलाह मत दो।
सुनो।
समझो।
साथ दो।
सम्मान करो।”
निखिल ने कहा,
“क्योंकि हर इंसान अपने जीवन का सबसे बड़ा शिक्षक खुद होता है।
और जब वह खुद सीख लेता है,
तो किसी सलाह की ज़रूरत नहीं पड़ती।”
अभय ने सिर हिलाया।
“कम बोलो, गहराई से सुनो—
यही असली बुद्धिमत्ता है।”
लघु कथा-13
नीरज और कविता की शादी को दस साल हो चुके थे। शुरुआत में दोनों सपनों की तरह साथ चलते थे—एक ही दिशा, एक ही उम्मीद। पर जैसे-जैसे समय बीता, ज़िंदगी ने अपने रंग दिखाने शुरू किए। कभी नीरज की नौकरी बदली, कभी कविता की तबीयत बिगड़ी, कभी पैसों की तंगी, कभी बच्चों की चिंता। हर साल कुछ न कुछ बदलता रहा।
कविता को शिकायत करने की आदत पड़ गई थी।
“हमेशा ही गलत समय क्यों आता है?”
“हमारी योजनाएँ ही क्यों बिगड़ती हैं?”
वह हर बदलाव से लड़ती थी, जैसे ज़िंदगी उससे दुश्मनी कर रही हो।
नीरज चुपचाप सुनता, लेकिन भीतर से वह भी टूटने लगा था।
एक दिन दोनों पास के पार्क में टहलने गए। वहाँ एक बूढ़ा माली पौधों की कटाई कर रहा था। ठंडी हवा चल रही थी और कुछ पत्ते झर चुके थे। कविता बोली,
“देखो, कितने सूखे पौधे हैं। ये माली ठीक से देखभाल नहीं करता।”
माली ने सुन लिया। वह मुस्कराया और बोला,
“बीबी, ये सूखे नहीं हैं… ये सर्दी की तैयारी कर रहे हैं। हर मौसम का अपना काम होता है।”
कविता चुप हो गई। माली ने आगे कहा,
“मैं मौसम से नहीं लड़ता। मैं उसके साथ काम करता हूँ।
गर्मी में पानी बढ़ाता हूँ,
सर्दी में काट-छाँट करता हूँ,
बरसात में सहारा देता हूँ।
अगर मैं मौसम से लड़ने लगूँ, तो बाग़ ही खत्म हो जाए।”
घर लौटते समय नीरज ने कहा,
“शायद हम भी मौसम से लड़ रहे हैं, कविता। ज़िंदगी के मौसम से।”
उस रात कविता बहुत देर तक सोचती रही। उसे एहसास हुआ कि वह हर बदलती परिस्थिति को दुश्मन समझ रही थी, जबकि वह बस एक नया मौसम थी।
धीरे-धीरे उसने शिकायत कम करनी शुरू की।
पैसों की कमी आई—तो बोली, “चलो, नए तरीके से बचत सीखते हैं।”
नीरज की नौकरी बदली—तो बोली, “नई शुरुआत भी तो अच्छा मौका है।”
बच्चों की परेशानी आई—तो बोली, “साथ बैठकर हल निकालते हैं।”
अब उसकी ऊर्जा शिकायत में नहीं, समाधान में लगने लगी थी।
घर का माहौल हल्का होने लगा।
नीरज ने भी राहत महसूस की। दोनों फिर से एक-दूसरे के साथी बन गए, विरोधी नहीं।
एक दिन कविता ने वही पार्क फिर देखा। पौधों में नई कोपलें आ चुकी थीं। उसने मुस्कराकर कहा,
“देखो नीरज, मौसम बदल गया।”
नीरज बोला,
“और हम भी।”
कविता ने धीरे से कहा,
“अब समझ आया…
ऋतुएँ बदलेंगी ही—चाहे हमें पसंद हों या नहीं।
चुनौतियाँ आएँगी, योजनाएँ बदलेंगी।
पर अगर हम उनसे लड़ने के बजाय उनके साथ चलें,
तो ज़िंदगी आसान नहीं, पर शांत ज़रूर हो जाती है।”
नीरज ने उसका हाथ थाम लिया।
अब उनके बीच शिकायत नहीं थी—
बस समझ थी, और हर बदलते मौसम में साथ चलने का भरोसा।
लघु कथा-12
रवि अपने पिता को बहुत कम बोलते हुए देखता था। घर में अगर कोई सबसे ज़्यादा चुप रहता था, तो वही थे। न डांट, न लंबी सीख, न भाषण। बस रोज़ सुबह तय समय पर उठना, काम पर जाना, शाम को लौटकर किताब पढ़ना और फिर सो जाना—एक सी दिनचर्या, बिना शिकायत।
रवि को कभी-कभी गुस्सा आता।
“पापा कुछ बोलते ही नहीं… जैसे उन्हें फर्क ही नहीं पड़ता,” वह माँ से कहता।
माँ मुस्करा कर कहती, “वह बोलते नहीं, जीते हैं।”
एक दिन रवि परीक्षा में फेल हो गया। उसे उम्मीद थी कि पिता डांटेंगे या कुछ समझाएंगे। वह डरते-डरते घर आया। पिता ने रिपोर्ट कार्ड देखा, कुछ नहीं कहा। बस उसे अपने साथ बैठने को कहा।
उस शाम पिता ने बिना एक शब्द बोले वही किया जो रोज़ करते थे—किताब पढ़ी, समय पर खाना खाया, और रवि से बस इतना कहा,
“कल सुबह मेरे साथ उठना।”
अगली सुबह रवि उनके साथ उठा। पिता खेत में काम करने लगे—मिट्टी खोदना, पौधों को पानी देना, टूटी मेड़ ठीक करना। धूप तेज़ थी, हाथ थक गए, पर पिता बिना रुके काम करते रहे। न शिकायत, न थकान की बात।
रवि धीरे-धीरे समझने लगा—यह चुप्पी खाली नहीं है, इसमें मेहनत भरी है।
कई दिनों तक रवि उनके साथ उठने लगा। पढ़ाई के बाद खेत, फिर किताब, फिर नींद—वही अनुशासन। पिता कभी यह नहीं बोले, “पढ़ाई करो,”
पर उनका हर दिन यही कह रहा था—लगातार चलो, रुको मत।
धीरे-धीरे रवि की आदतें बदलने लगीं। वह समय पर उठने लगा, पढ़ने लगा, खेल छोड़कर मेहनत करने लगा। पिता कुछ नहीं बोले, बस वही करते रहे जो हमेशा करते थे।
सालों बाद रवि बड़ा होकर एक अच्छा अफ़सर बन गया। जब लोग उससे सफलता का राज पूछते, वह कहता,
“मेरे पिता ने कभी भाषण नहीं दिया।
उनका मौन ही मेरा गुरु था।”
एक दिन उसने पिता से कहा,
“आपने कभी मुझे कुछ समझाया क्यों नहीं?”
पिता मुस्कराए और बोले,
“जब गरुड़ उड़ता है, तो वह घोषणा नहीं करता।
जब शेर चलता है, तो वह परिचय नहीं देता।
उनका होना ही संदेश होता है।”
रवि समझ गया—
मौन कर्म के रूप में बोलता है।
मौन अनुशासन बन जाता है।
मौन निरंतरता सिखाता है।
और वही मौन, एक दिन सफलता बनकर सामने आता है।
उस दिन रवि ने जाना—
सबसे ज़ोर से वही बोलता है,
जो बिना बोले जीता है।
लघु कथा-11
आरव और सिया की मुलाक़ात एक बरसाती शाम को हुई थी। शहर की सबसे पुरानी किताबों की दुकान में, जहाँ हवा में काग़ज़ और कॉफी की मिली-जुली खुशबू रहती थी। दोनों एक ही किताब तक बढ़े थे, उँगलियाँ टकराईं और वहीं से कहानी शुरू हुई।
धीरे-धीरे वे साथ चलने लगे—कॉफी, लंबी बातें, खामोशियाँ, हँसी। आरव को लगता था कि सिया उसकी ज़िंदगी का सबसे सुंदर हिस्सा है। पर इसी सुंदरता के साथ एक डर भी बढ़ने लगा—उसे खो देने का डर।
वह सिया के हर दोस्त से असहज हो जाता, हर देर से आए मैसेज पर बेचैन होता। वह चाहता था कि सिया बस उसकी ही रहे—उसकी दुनिया, उसकी धड़कन। सिया यह सब समझती थी, पर कहती कुछ नहीं थी। वह मुस्कराती, समझाती, पर उसके भीतर धीरे-धीरे घुटन भरने लगी थी।
एक दिन सिया ने कहा, “आरव, मुझे कुछ समय अपने लिए चाहिए। मुझे अपनी उड़ान चाहिए।”
आरव का दिल कांप गया। उसे लगा, यही अंत है। उसने पहली बार उसे कस कर पकड़ लेने का मन बनाया—मन से, शब्दों से, वादों से।
लेकिन उसी रात उसने एक पुरानी डायरी में लिखा एक वाक्य पढ़ा—
“अगर किसी को जानकर ही तुम उसे कस कर पकड़ लेना चाहते हो, तो रुक जाओ। अपने डर को पहचानो। और अगर सच में प्रेम करते हो, तो उसे उड़ने दो।”
आरव पूरी रात सो नहीं सका। उसने समझा कि वह सिया से नहीं, अपने डर से लड़ रहा है। वह उसे खोने से नहीं डर रहा था, वह अकेले पड़ जाने से डर रहा था।
सुबह उसने सिया को बुलाया।
उसने कहा, “मैं तुम्हें रोकना चाहता था… पर अब नहीं। अगर तुम जाना चाहो, तो जाओ। मैं तुम्हें प्यार करता हूँ, बाँधना नहीं।”
सिया की आँखों में आँसू आ गए।
“मैं जाना नहीं चाहती थी,” उसने कहा, “मैं बस साँस लेना चाहती थी।”
सिया कुछ समय के लिए अपने काम और अपने सपनों में लग गई। उसने नई जगहें देखीं, नई चीज़ें सीखी। आरव दूर से उसकी खुशी देखता रहा—डर के बिना, उम्मीद के साथ।
कुछ महीनों बाद सिया लौटी।
वह उसी किताबों की दुकान में आई, जहाँ वे पहली बार मिले थे। आरव वहीं बैठा था।
सिया ने कहा, “मैं उड़ कर गई थी… पर लौट कर आई हूँ। क्योंकि जो सच में अपना होता है, वह डर से नहीं, प्रेम से लौटता है।”
आरव मुस्कराया। अब उसका हाथ कस कर नहीं, खुल कर बढ़ा था।
और इस बार सिया ने उसे थामा—अपनी मर्ज़ी से।
लघु कथा-10
अमन अपने ऑफिस और परिवार में सबसे “एडजस्ट करने वाला” इंसान माना जाता था। सब कहते थे, “यह कभी मना नहीं करता।” और वे इसे तारीफ़ समझते थे। लेकिन अमन सच्चाई जानता था—वह थक चुका था, भीतर से खाली होता जा रहा था, और धीरे-धीरे खुद से गायब हो रहा था।
ऑफिस में वह थकने के बाद भी देर तक रुकता था। बॉस कहते, “बस आज ही रुक जाओ,” और अमन सिर हिला देता। सहकर्मी कहते, “तुम यह बेहतर कर लेते हो, तुम ही कर दो,” और अमन मान जाता। घर में वह अपनी योजनाएँ छोड़ देता ताकि बाकी लोग आराम में रहें। दोस्तों के लिए वह हमेशा मौजूद रहता, सबकी बातें सुनता, सबके काम करता, लेकिन किसी ने कभी उससे नहीं पूछा कि वह कैसा है।
एक शाम अमन अपने बिस्तर पर बैठा दीवार को घूर रहा था। उसे लग रहा था जैसे वह अपनी ही ज़िंदगी में मेहमान है। उसका फोन बजा—फिर कोई काम, फिर कोई फरमाइश। उसकी उँगलियाँ “ठीक है” लिखने ही वाली थीं, जैसे हमेशा लिखता था। तभी उसकी माँ की पुरानी बात उसके मन में गूंज गई—
“दुनिया वही व्यवहार करती है, जिसकी तुम उसे अनुमति देते हो।”
उस रात अमन ने चुपचाप एक फैसला लिया।
अगले दिन बॉस ने फिर कहा, “आज भी देर तक रुकना पड़ेगा।” उसका दिल तेज़ धड़कने लगा, लेकिन उसने शांति से कहा, “मेरा काम पूरा हो चुका है, आज मैं नहीं रुक सकता।” कमरे में सन्नाटा छा गया। बॉस हैरान था। अमन डरा हुआ था, लेकिन भीतर से मजबूत भी महसूस कर रहा था।
कुछ सहकर्मी उससे दूरी बनाने लगे। कुछ कहने लगे कि वह “खुदगर्ज़” हो गया है। लेकिन एक अजीब बात और हुई—कुछ लोग उसका सम्मान करने लगे। वे उससे बात सोच-समझकर करने लगे। अब कोई भी उस पर सब कुछ नहीं डालता था।
दोस्तों के साथ उसने हर समस्या ठीक करना बंद कर दिया। जो दोस्त सिर्फ़ ज़रूरत पर फोन करते थे, उनके फोन वह हर बार नहीं उठाता। कुछ दोस्त दूर हो गए। दर्द हुआ, लेकिन वह समझ गया—वे उसे नहीं खो रहे थे, वे अपनी सुविधा खो रहे थे।
एक दिन एक पुराने दोस्त ने कहा, “तू बदल गया है।”
अमन हल्के से मुस्कराया, “नहीं, मैंने बस खुद को मिटाना बंद किया है।”
धीरे-धीरे उसकी ज़िंदगी हल्की होने लगी। उसे पढ़ने का समय मिलने लगा, टहलने का समय, और खुद के साथ चुपचाप बैठने का सुकून। पहली बार उसे लगा कि वह खुद का है।
एक दिन आईने के सामने खड़े होकर उसने वही चेहरा देखा, लेकिन आँखें बदली हुई थीं—डर नहीं था, शांति थी। उसने खुद से कहा,
“जब मैंने खुद का सम्मान करना शुरू किया, दुनिया ने अपने आप सीख लिया कि मुझे कैसे पेश आना है।”
और उस दिन अमन ने एक सच्चाई को दिल में बसा लिया—
सीमाएँ बनाना स्वार्थ नहीं है।
“ना” कहना बदतमीज़ी नहीं है।
आत्मसम्मान घमंड नहीं है।
यही सच में ज़िंदा होने की शुरुआत है।
लघु कथा-9
“ऐ दोस्त, मैंने दुनिया देखी है…”
यह वाक्य अर्जुन अक्सर खुद से कहता था, जैसे कोई पुराना गीत हो जो हर मोड़ पर उसके भीतर बज उठता हो।
अर्जुन कभी बहुत लोगों से घिरा रहता था। दोस्त, रिश्तेदार, सहकर्मी—हर जगह वही हँसी, वही मज़ाक। लेकिन जैसे-जैसे वह आगे बढ़ा, ज़िंदगी बदलती गई। उसने मेहनत की, अपने सपनों के पीछे चला, और धीरे-धीरे उसे समझ आया कि हर साथ चलने वाला, मंज़िल तक नहीं आता।
पहले जब वह “ना” कहना सीख रहा था, लोग नाराज़ होने लगे।
“अब तू बदल गया है।”
“पहले जैसा नहीं रहा।”
उसे अजीब लगता था—क्या बदल जाना इतना गलत है?
एक दिन अर्जुन ने महसूस किया कि उसके फोन में मैसेज कम हो गए हैं। कोई यूँ ही हाल पूछने वाला नहीं रहा। जो आते भी, किसी न किसी उम्मीद के साथ आते। कोई मदद चाहता, कोई फायदा। उसे समझ आ गया—जहाँ समझ नहीं, सिर्फ़ अपेक्षाएँ होती हैं, वहाँ रिश्ता बोझ बन जाता है।
उसने कुछ रिश्तों से दूरी बना ली। यह दूरी दर्द देती थी, लेकिन भीतर कहीं सुकून भी था। अब शामें शांत थीं। वह अकेले टहलता, आसमान देखता, और पहली बार अपनी ही आवाज़ साफ़ सुन पाता। उसे पता चलता कि वह क्या चाहता है, किससे खुश है, और किससे नहीं।
अकेलापन अब उसे सज़ा नहीं लगता था। यह उसका चयन था।
एक ऐसा चयन, जिसमें वह खुद के करीब था।
एक रात वह पहाड़ी पर बैठा था। शहर की लाइटें नीचे टिमटिमा रही थीं। उसे लगा—भीड़ हमेशा नीचे होती है। ऊपर हवा पतली होती है, रास्ता कठिन होता है, और लोग कम होते हैं। लेकिन जो दिखता है, वह बहुत साफ़ होता है।
उसी रात उसकी पुरानी दोस्त सिया का मैसेज आया—
“सब ठीक है? तुम बहुत चुप रहने लगे हो।”
अर्जुन ने लिखा—
“ऐ दोस्त, मैंने दुनिया देखी है।
ग्रोथ के साथ अकेलापन आता है।
ये अकेलापन सज़ा नहीं, मेरा चयन है।
मैं उन रिश्तों से दूर हो गया हूँ जहाँ समझ नहीं, सिर्फ़ उम्मीदें थीं।”
सिया ने पूछा—“दर्द नहीं होता?”
अर्जुन ने जवाब दिया—
“बहुत होता है।
लेकिन उस दर्द में मैं खुद को पाता हूँ।
वहीं मेरी आवाज़ मिलती है, वहीं मेरी दिशा बनती है।”
कुछ दिन बाद सिया उससे मिलने आई। उन्होंने ज़्यादा बातें नहीं कीं। बस साथ बैठे, चाय पी, और आसमान देखा। सिया बोली,
“तू बदल गया है… लेकिन अच्छा बदला है।”
अर्जुन मुस्कराया।
“नरम रहो, लेकिन दिशा मत बदलो—यही सीखा है मैंने।”
अब अर्जुन हर किसी से नहीं जुड़ता, लेकिन जिससे जुड़ता है, पूरे मन से जुड़ता है। वह जान गया है कि करुणा रखना ज़रूरी है, पर खुद को खोकर नहीं।
और जब कोई उससे पूछता है, “तू इतना अकेला क्यों रहता है?”
वह बस इतना कहता है—
“अकेला नहीं हूँ दोस्त…
मैं बस खुद के साथ हूँ।”
लघु कथा-8
रवि बहुत कम बोलता था, लेकिन बहुत ज़्यादा महसूस करता था। उसे रिश्तों में शोर नहीं, सुकून चाहिए था। वह उन लोगों में से था जो सामने वाले को पूरा समय देते हैं—फोन हाथ में नहीं, दिल हाथ में रखकर बात करते हैं। पर बदले में उसे अक्सर अधूरा सा कुछ मिलता था।
उसकी ज़िंदगी में मीरा आई। मीरा तेज़, व्यस्त और हमेशा “थोड़ी देर बाद बात करते हैं” वाली लड़की थी। रवि हर बार इंतज़ार करता—मैसेज का, कॉल का, मिलने के एक वादे का। कभी मीटिंग, कभी दोस्त, कभी थकान। रवि खुद को समझाता, “व्यस्त है, मुझे समझना चाहिए।” लेकिन यह समझ धीरे-धीरे थकान बन गई।
एक दिन रवि बीमार था। तेज़ बुखार, शरीर टूट रहा था। उसने मीरा को मैसेज किया—“आज बहुत बुरा लग रहा है, क्या थोड़ी देर बात कर सकती हो?”
तीन घंटे बाद जवाब आया—“आज नहीं हो पाएगा, बहुत काम है।”
रवि ने फोन बंद कर दिया। उसे एहसास हुआ कि बात काम की नहीं, प्राथमिकता की है। जिसे सच में परवाह होती है, वह समय “निकालता” नहीं, “बनाता” है।
कुछ दिन बाद रवि ने मीरा से मिलने की ज़िद नहीं की। उसने बस चुप रहना शुरू कर दिया। मीरा को भी कोई खास फर्क नहीं पड़ा। वही पुराना सिलसिला—कभी बात, कभी नहीं; कभी ध्यान, कभी गायब।
एक शाम रवि अपनी पुरानी दोस्त अनन्या से मिला। अनन्या ने बस इतना पूछा, “तू ठीक नहीं लग रहा।”
रवि की आँखें भर आईं। उसने सब बता दिया। अनन्या चुपचाप सुनती रही। फिर बोली,
“रवि, तुम किसी के जीवन में विकल्प बनने के लिए नहीं बने हो। तुम प्राथमिकता बनने के लायक हो। और जहाँ तुम्हें बार-बार यह एहसास दिलाया जाए कि तुम बोझ हो, वहाँ रुकना खुद से नाइंसाफी है।”
ये शब्द रवि के अंदर कहीं बहुत गहरे उतर गए।
उसने मीरा को आख़िरी बार मैसेज किया—
“मैं तुम्हारी ज़िंदगी में जगह मांगकर नहीं रह सकता। जहाँ मुझे बार-बार इंतज़ार करना पड़े, खुद को छोटा महसूस करना पड़े—वहाँ मैं नहीं रहूँगा। अगर कोई सच में चाहता है, तो समय अपने आप बन जाता है।”
मीरा ने कोई खास जवाब नहीं दिया। बस “ओके” लिखा।
और उसी “ओके” में रवि को अपनी सारी सच्चाई मिल गई।
कुछ हफ्तों बाद रवि ने खुद पर ध्यान देना शुरू किया। उसने वही किया जो उसे अच्छा लगता था—लिखना, घूमना, लोगों से खुलकर बात करना। अनन्या अक्सर हाल पूछ लेती। बिना जताए, बिना थकाए। जब भी रवि उदास होता, अनन्या का एक छोटा सा मैसेज आ जाता—“खाना खाया?”
रवि मुस्करा देता। उसे समझ आ गया कि प्यार शोर नहीं करता, वह साथ देता है।
अब रवि जानता था—
आप किसी के जीवन में “ऑप्शन” नहीं होते।
आप “प्रायोरिटी” बनने के योग्य होते हैं।
जहाँ आपको बोझ महसूस कराया जाए, वहाँ से चले जाना ही आत्मसम्मान है।
और सच यही है—
जो सच में चाहता है, उसके पास कभी “वक़्त नहीं” वाला बहाना नहीं होता।
लघु कथा-7
बाबू को लोग अजीब कहते थे। वह चुप रहता, कम बोलता और अक्सर खिड़की से बाहर देखते हुए घंटों बैठा रहता। मोहल्ले के बच्चों को लगता था कि बाबू बहुत बूढ़ा है, जबकि उसकी उम्र बस पचास के आसपास थी। सच तो यह था कि बाबू की उम्र उसके चेहरे पर नहीं, उसके अकेलेपन में दिखती थी।
कभी बाबू की ज़िंदगी बहुत भरी हुई थी। उसकी पत्नी सरिता हँसते-हँसते पूरा घर भर देती थी। सुबह चाय बनाते हुए वह कुछ न कुछ गुनगुनाती रहती और बाबू अखबार के पीछे से मुस्कराता हुआ उसकी बातें सुनता। शाम को दोनों छत पर बैठकर दिन भर की छोटी-बड़ी बातें करते। तब समय कैसे बीत जाता, पता ही नहीं चलता था। एक घंटा एक पल जैसा लगता था।
लेकिन सरिता के जाने के बाद सब बदल गया। घर वही था, कमरे वही थे, लेकिन उनमें जान नहीं थी। बाबू के लिए अब दिन बहुत लंबे हो गए थे। सुबह उठता तो घड़ी की टिक-टिक उसे चुभने लगती। दोपहर काटने को दौड़ती और रातें तो जैसे खत्म ही नहीं होतीं। वह अक्सर सोचता—जब सरिता थी, तब तो समय उड़ जाता था, अब हर मिनट बोझ क्यों लगता है?
बाबू ने अकेलेपन से लड़ने की बहुत कोशिश की। कभी रेडियो चला देता, कभी टीवी, कभी अखबार को बार-बार पढ़ता। लेकिन इन सब में कोई अपनापन नहीं था। ये चीज़ें आवाज़ देती थीं, पर साथ नहीं देती थीं। बाबू को एहसास होने लगा कि अकेलापन सिर्फ दिल को नहीं, उम्र को भी बढ़ा देता है। वह खुद को पहले से कहीं ज़्यादा थका हुआ महसूस करने लगा था।
एक दिन मोहल्ले में नया परिवार आया। उनके साथ एक छोटी सी लड़की भी थी—पायल। वह रोज़ शाम को बाबू के घर के सामने खेलती। एक दिन उसकी गेंद बाबू के आँगन में चली गई। पायल डरते-डरते अंदर आई और बोली, “बाबू अंकल, मेरी गेंद दे दोगे?”
बाबू ने पहली बार किसी को अपने घर में मुस्कराकर बुलाया। उसने गेंद दी और धीरे से पूछा, “अकेले क्यों खेल रही हो?”
पायल बोली, “मम्मी काम में हैं, पापा ऑफिस में। पर मुझे अकेले खेलना अच्छा नहीं लगता।”
उस दिन के बाद पायल रोज़ बाबू के पास आने लगी। कभी उसे कहानी सुनाने को कहती, कभी अपने स्कूल की बातें बताती। बाबू भी उसके साथ बातें करने लगा। उसे महसूस हुआ कि जब पायल आती है, तब समय फिर से छोटा हो जाता है। एक घंटा पलक झपकते बीत जाता, जैसे पुराने दिनों में सरिता के साथ बीतता था।
अब बाबू समझ गया था कि उम्र सिर्फ सालों से नहीं बढ़ती, अकेलेपन से भी बढ़ती है। और प्रेम सिर्फ पति-पत्नी के बीच नहीं होता, वह किसी भी रिश्ते में हो सकता है जहाँ अपनापन हो। पायल की हँसी में बाबू को फिर से ज़िंदगी की हल्कापन मिलने लगा था।
आज भी बाबू अकेला रहता है, लेकिन अब वह खुद को अकेला नहीं मानता। वह जान गया है कि जहाँ प्रेम होता है, वहाँ समय सिमट जाता है, और जहाँ खालीपन होता है, वहाँ एक पल भी उम्र बढ़ा देता है।
लघु कथा-6
आज फिर मन बहुत भारी है। बाहर लोग हँस रहे हैं, बातें कर रहे हैं, लेकिन मेरे भीतर जैसे कोई चुपचाप रो रहा है। ऐसा नहीं है कि मेरी ज़िंदगी में कुछ अलग या अनोखा दुख है। शायद वही दुख हैं जो सबके हिस्से आते हैं—पर जब वे दिल के बहुत पास आकर बैठ जाते हैं, तो सांस लेना भी भारी लगने लगता है।
घर में रहते हुए भी मैं अकेला महसूस करता हूँ। सब अपने-अपने कामों में इतने व्यस्त हैं कि किसी को यह देखने का समय नहीं कि मैं चुप क्यों रहता हूँ। जब मैं कुछ कहना चाहता हूँ, तो लगता है कि मेरी बात किसी के पास पहुँचने से पहले ही रास्ते में खो जाएगी। इसलिए मैंने बोलना कम कर दिया है। अब लोग कहते हैं, “तुम बदल गए हो।” काश वे जानते कि मैं बदला नहीं हूँ, बस टूटते-टूटते थक गया हूँ।
दोस्त भी अब पहले जैसे नहीं रहे। कभी जिनके साथ घंटों हँसता था, आज उनसे बात करने के लिए भी शब्द ढूँढने पड़ते हैं। किसी ने कहा, “तुम बहुत नेगेटिव हो गए हो।” किसी ने कहा, “हर बात पर उदास क्यों हो जाते हो?” उन्हें क्या पता कि कुछ उदासियाँ सवाल नहीं पूछतीं, बस आकर बैठ जाती हैं और जाने का नाम नहीं लेतीं।
आज एक वाक्य कहीं पढ़ा—
“खुश रहो, क्योंकि दुखी रहकर कौन-सा दुःख कम हो जाएगा?”
पहले तो मुझे गुस्सा आया। मन में आया कहूँ—अगर खुश रहना इतना आसान होता, तो कौन दुखी रहता? लेकिन फिर देर तक उसी वाक्य के बारे में सोचता रहा। सच में, मेरे उदास रहने से कौन-सी चीज़ बदल रही है? जिन लोगों ने मुझे दुख दिया, उन्हें तो फर्क भी नहीं पड़ता। जिनसे मुझे उम्मीद थी, वे अपनी दुनिया में खुश हैं। और मैं? मैं बस अपनी ही तकलीफ को रोज़ थोड़ा-थोड़ा बढ़ा रहा हूँ।
मैंने अपने कमरे की खिड़की खोली। बाहर हल्की हवा चल रही थी। पेड़ की पत्तियाँ हिल रही थीं, जैसे कह रही हों—“हम गिरते हैं, फिर भी हरे रहते हैं।” मुझे लगा, शायद ज़िंदगी भी यही सिखा रही है। गिरना गलत नहीं है, लेकिन गिरे रहना हमारी अपनी पसंद बन जाता है।
मैंने सोचा—मेरे दुख का कारण मेरे परिवार और मेरे दोस्त हैं, लेकिन मेरे सुख का कारण भी तो मैं खुद बन सकता हूँ। मैं यह तय कर सकता हूँ कि मैं हर बात को दिल में ज़हर बनाकर रखूँ या उसे अनुभव बनाकर आगे बढ़ जाऊँ।
मैं यह नहीं कह रहा कि मैं अचानक खुश हो गया हूँ। नहीं, दर्द अभी भी है। लेकिन आज पहली बार मैंने तय किया है कि मैं अपने दुख को ही अपनी पहचान नहीं बनने दूँगा। मैं अपने अंदर उस छोटे से बच्चे को ढूँढने की कोशिश करूँगा, जो बिना वजह हँस लिया करता था।
शायद मैं कल भी उदास रहूँ। शायद परसों भी। लेकिन अब मैं हर दिन खुद से यह पूछूँगा—
“क्या मेरी उदासी किसी का भला कर रही है?”
और अगर जवाब “नहीं” हुआ, तो मैं कोशिश करूँगा… बस थोड़ी सी कोशिश… कि मैं मुस्करा सकूँ। क्योंकि सच में—दुखी रहकर कौन-सा दुःख कम हो जाएगा?
लघु कथा-5
देवेश्वर अक्सर शाम को छत पर बैठकर डूबते सूरज को देखता था। उस समय उसके मन में अजीब से सवाल उठते—ज़िंदगी हमें कहाँ से कहाँ ले आई। बचपन की गलियाँ, मिट्टी की महक, और नंगे पाँव भागने की आज़ादी जैसे कहीं पीछे छूट गई थी।
उसे याद था, जब किताबों पर जिल्द चढ़ाना और उन्हें नए थैले में रखना किसी त्यौहार से कम नहीं लगता था। नई कॉपियाँ, नई स्लेट, और स्लेट की बत्ती को जीभ से चाटकर “कैल्शियम” पूरी करने की शरारत—वो दिन कितने सच्चे थे। पढ़ाई का तनाव कम करने के लिए पेंसिल का पिछला हिस्सा चबाना, किताब के बीच मोरपंख रखना, और फिर भी पिट जाना—ये सब जैसे ज़िंदगी का हिस्सा था।
देवेश्वर को अपने दोस्त भी याद आते। एक दोस्त साइकिल के डंडे पर बैठता, दूसरा कैरियर पर, और तीनों बिना डरे सड़कों पर निकल पड़ते। न हेलमेट, न नियम, बस दोस्ती और हँसी। स्कूल में मुर्गा बनना भी कोई बड़ी बात नहीं थी। पिटने वाला खुश कि आज कम पिटा, और पीटने वाला खुश कि हाथ साफ हो गया। ईगो नाम की कोई चीज़ थी ही नहीं।
माता-पिता को भी ज्यादा फ़िक्र नहीं रहती थी। सालों तक उनके कदम स्कूल में नहीं पड़े। उन्हें बस इतना पता होता था कि बच्चा पढ़ने जाता है, बस। हम किस कक्षा में हैं, ये पूछने का वक़्त भी किसके पास था। लेकिन प्यार इतना था कि कभी महसूस ही नहीं हुआ कि कुछ कम है।
देवेश्वर को यह भी याद आया कि वह कभी अपने माँ-बाप से “आई लव यू” नहीं कह पाया। उसे ये शब्द ही नहीं आते थे। पर जब माँ बीमार होती, वह चुपचाप उनके पास बैठ जाता। जब पिता थके होते, उनका थैला खुद उठा लेता। प्यार बोलकर नहीं, करके दिखाया जाता था।
फिर ज़माना बदला। दादाजी गुनगुनाते थे—“मेरा नाम करेगा रोशन जग में मेरा राज दुलारा।” देवेश्वर ने गाया—“पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा।” और अब उसके बच्चे गाते हैं—“बापू सेहत के लिए तू तो हानिकारक है।” गाने बदले, सोच बदली, ज़िंदगी की चाल बदल गई।
आज देवेश्वर के पास मोबाइल है, कार है, आराम है—पर वो मिट्टी की महक नहीं है। बच्चों को अब साइकिल के डंडे पर बैठने नहीं दिया जाता। अब तो भटूरे में ईनो डालकर उसे फुलाया जाता है, और वही भटूरा पेट फुला दे तो ईनो पीकर पेट पिचकाया जाता है।
देवेश्वर हँसते हुए सोचता है—हम सच में कहाँ से कहाँ आ गए। पहले भूख लगती थी तो रोटी अच्छी लगती थी, आज सब कुछ है पर स्वाद कम है। पहले दोस्त थे, आज कॉन्टैक्ट लिस्ट है। पहले माँ-बाप के लिए कुछ कर जाते थे, आज उनके लिए “टाइम निकालना” पड़ता है।
छत से नीचे उतरते हुए उसने तय किया कि वह अपने बच्चों को ये कहानियाँ ज़रूर सुनाएगा—ताकि उन्हें पता चले कि ज़िंदगी सिर्फ़ स्क्रीन और आराम का नाम नहीं है, बल्कि मिट्टी, दोस्ती और सादगी का भी नाम है। क्योंकि अगर हम पीछे मुड़कर नहीं देखेंगे, तो आगे की राह भी शायद खो जाएगी।
लघु कथा-4
देवेश्वर इस समय गहरी नींद में है। उसका छोटा सा हाथ उसके गाल के नीचे दबा हुआ है, जैसे वह अपने ही सपनों को थामे सो रहा हो। माथे पर पसीने की हल्की बूंदें चमक रही हैं और उन्हीं में उसके बालों की एक लट चिपक गई है। मैं दरवाज़े पर खड़ा उसे देख रहा हूँ, जैसे कोई अनमोल चीज़ आँखों से छूट न जाए, इस डर से उसे निहार रहा हूँ।
कुछ देर पहले मैं अख़बार पढ़ रहा था, पर शब्द धुंधले हो गए थे। मन भारी हो गया था। आज का दिन बार-बार आँखों के सामने घूम रहा था। और उसी अपराध-बोध ने मेरे कदम अपने आप देवेश्वर के कमरे तक खींच लाए।
आज मैंने उसे बहुत डांटा। सुबह जब वह स्कूल जाने को तैयार हो रहा था, उसका मुँह ठीक से साफ नहीं था, जूतों पर पालिश नहीं थी, और कमरा बिखरा पड़ा था। मैंने एक के बाद एक शब्दों के तीर चला दिए—“ये क्यों नहीं किया, वो क्यों नहीं किया?” नाश्ते की मेज़ पर भी मैं चैन से नहीं बैठा। “धीरे खाओ… चम्मच ठीक से पकड़ो… कोहनियाँ मत टिकाओ…” वह कुछ नहीं बोला। बस चुपचाप मेरी आँखों में देखता रहा, जैसे पूछ रहा हो—“पापा, मैं इतना बुरा हूँ क्या?”
स्कूल जाते समय उसने मुस्कराकर कहा था—“टा-टा पापा।”
पर मैंने उसकी मुस्कान नहीं देखी, बस उसके गंदे हाथ देखे। डांट दिया—“पहले हाथ धोकर आओ।”
उसकी मुस्कान वहीं कहीं गिर गई थी… शायद फर्श पर।
दोपहर को जब ऑफिस से लौटा, वह घुटनों के बल बैठकर गोलियाँ खेल रहा था। मोज़ों में छेद था। मैंने उसके दोस्तों के सामने ही उसे शर्मिंदा कर दिया। रात को खाने की मेज़ पर मैं उससे बात तक नहीं कर रहा था। वह बार-बार मेरी ओर देखता, जैसे मेरी चुप्पी में कोई जवाब ढूँढ रहा हो। पर मैं पत्थर बना रहा।
अब उसे सोते देख रहा हूँ। उसकी साँसें धीमी-धीमी चल रही हैं। उसकी पलकों के नीचे कोई सपना मुस्करा रहा होगा—शायद एक ऐसा सपना, जिसमें उसका पापा उससे नाराज़ नहीं है।
मुझे समझ आता है—उसके दिल का कुआँ अभी भी प्यार से भरा है। मेरी डांट, मेरी बेरुखी, मेरी चुप्पी—किसी ने भी उसके प्यार को सुखाया नहीं।
मैं उसके पास बैठ जाता हूँ। उसका छोटा सा हाथ अपने हाथ में लेता हूँ। वो नींद में भी जैसे मुझे पहचान गया हो, हल्का सा हिलता है, और उसके होंठों पर एक नन्ही सी मुस्कान आ जाती है।
और उस मुस्कान में मैं टूट जाता हूँ।
मन करता है उसे जगा दूँ, सीने से लगा लूँ और कहूँ—
“देवेश्वर, पापा गलत थे। बहुत गलत।”
पर वह अभी इतना छोटा है कि मेरे शब्दों का बोझ नहीं समझ पाएगा। फिर भी मैं फुसफुसाता हूँ—
“तुम बहुत बड़े हो, मेरे बेटे… अपने दिल से।”
आज मैं अपने आप से एक वादा करता हूँ।
अब मैं सिर्फ़ सुधारने वाला पिता नहीं बनूँगा, समझने वाला भी बनूँगा।
अब मैं उसकी गलतियों में उसे नहीं तोड़ूँगा, बल्कि उसे जोड़ूँगा।
अब मैं उसकी मुस्कान को देखूँगा, सिर्फ़ उसकी कमियाँ नहीं।
मैं धीरे से उठता हूँ, ताकि उसकी नींद न टूटे।
दरवाज़े पर मुड़कर उसे आख़िरी बार देखता हूँ और सोचता हूँ—
काश, वह कभी यह न कहे कि उसका बचपन मेरे शब्दों से डरता था।
मैं चाहता हूँ, वह यह कहे—
“मेरा पापा मेरी सबसे बड़ी ताक़त था।”
लघु कथा-3
बाबूलाल की आत्मा आज बहुत खुश थी। नहीं, इसलिए नहीं कि उसे मोक्ष मिल गया था, बल्कि इसलिए कि उसके बच्चों ने आज बड़ा शानदार ड्रामा किया था। वह ऊपर बैठकर बादलों की रेलिंग से झांक रहा था और ठहाके मार-मार कर हँस रहा था।
“वाह रे मेरे बच्चों!” बाबूलाल बोला, “जिंदा रहते तो मुझे दाल-रोटी में भी मोलभाव करवाते थे, और आज पंडित जी को बुलाकर पूरी-पकवान की दावत उड़ा रहे हैं।”
नीचे घर में बड़ा माहौल बना हुआ था। फूल-मालाएँ, धूपबत्ती, अगरबत्ती, मिठाइयों की खुशबू और पंडित जी का भारी-भरकम स्वर—“स्वाहा… स्वाहा…”। बाबूलाल की आत्मा ने गर्दन खुजाई और बोला, “अरे भाई, जब मैं था तब तो मुझे खांसने पर भी ‘शोर मत करो’ कह देते थे।”
रसोई में उसके तीनों बच्चे दौड़-भाग कर रहे थे। बड़ा बेटा बोला, “पापा को खीर बहुत पसंद थी।”
दूसरा बोला, “नहीं-नहीं, उन्हें हलवा ज्यादा अच्छा लगता था।”
तीसरा बोला, “जो भी बनाओ, बस ज्यादा बनाओ, पंडित जी भूखे न रह जाएँ।”
बाबूलाल ने ऊपर से देखा और हँसते हुए कहा, “वाह! जब मैं जिंदा था तब बोलते थे—‘इतना मत खाओ, डॉक्टर ने मना किया है।’ और आज… आज तो पेट की नहीं, पंडित जी की चिंता है।”
इतना ही नहीं, बच्चों ने कुत्ते और कौवे को भी बुला लिया था। मोहल्ले का कुत्ता पूड़ी खा रहा था और कौवा खीर में चोंच मार रहा था। बाबूलाल बोला, “अरे वाह! इनको भी दावत, और मुझे? मुझे तो जिंदा रहते घर में जगह नहीं मिली थी, इसलिए वृद्धाश्रम भेज दिया था।”
उसे वो दिन याद आया जब बच्चों ने कहा था, “पापा, वहां आपकी अच्छी देखभाल होगी।” और वहां उसकी देखभाल बस दवाई और चुप्पी से होती थी।
अब नीचे देखो—उसका फोटो भगवान के पास लगाया गया था। फोटो को माला पहनाई गई थी, जैसे वो कोई बड़ा संत हो। बाबूलाल बोला, “जब मैं घर में था, तब तो मेरी फोटो भी दीवार से उतार दी थी—कहते थे जगह कम है। आज भगवान के बगल में जगह मिल गई!”
पंडित जी को पांच सौ का नोट, मिठाई का डिब्बा और नए कपड़े दिए जा रहे थे। सब बोल रहे थे, “ये सब पिताजी के नाम से है।” बाबूलाल ने सिर पकड़ लिया—“मेरे नाम से? जब मैं जिंदा था तब पचास रुपये भी मांगने पर कहते थे—‘बुढ़ापे में क्या खर्च करोगे?’”
उसे समझ आ गया कि ये सब क्यों हो रहा है। बच्चे आपस में धीरे-धीरे बोल रहे थे, “कहीं पापा का भूत न आ जाए।”
दूसरा बोला, “हाँ, सुना है जिनकी सेवा नहीं होती, वो भूत बनकर सताते हैं।”
तीसरा बोला, “इसलिए सब सही से कर लो।”
बाबूलाल जोर से हँसा, “अरे मूर्खों! मैं भूत बनकर नहीं आता, तुम खुद अपने ज़मीर से डर रहे हो।”
फिर उसने आसमान से सब बच्चों को एक ही बात भेजी—
“मुझे पकवान नहीं चाहिए थे, पैसे नहीं चाहिए थे। बस थोड़ी सी जगह, थोड़ा सा समय और थोड़ा सा प्यार चाहिए था। ये सब मरने के बाद नहीं, जीते जी चाहिए होता है।”
लघु कथा- 2
रमेश ने उस सुबह देर तक आईने में खुद को देखा। चेहरे पर झुर्रियाँ साफ दिख रही थीं, बाल पूरी तरह सफेद हो चुके थे और आंखों में एक अजीब सी थकान थी। वह मन ही मन बोला, “ये सफ़र कब इतना लंबा हो गया, पता ही नहीं चला।” उसे आज भी लगता था कि वह अंदर से वही पुराना रमेश है, लेकिन आईना कुछ और ही कहानी सुना रहा था।
उसे अपना बचपन याद आया, जब वह माँ की उँगली पकड़कर स्कूल जाता था। तब उसे लगता था कि बड़ा होना बहुत मज़ेदार होगा। फिर वह जवान हुआ, नौकरी मिली, शादी हुई। जिम्मेदारियाँ आईं और सपने धीरे-धीरे पीछे छूटते चले गए। उसने कभी ध्यान ही नहीं दिया कि वह खुद कब इतना बदल गया।
पहले माँ-बाप की बातें मानता था, फिर पत्नी की। बाद में बच्चों की ज़रूरतें सबसे ऊपर हो गईं। उसने अपनी पसंद, अपनी थकान और अपने सपनों को हमेशा बाद में रखने की आदत बना ली। कभी सोचा भी नहीं कि उसकी बारी कब आएगी। वह हमेशा दूसरों की खुशी में अपनी खुशी ढूँढता रहा।
आज उसके बच्चे बड़े हो चुके थे। बेटा उसे आराम करने की सलाह देता था, बेटी कहती थी कि ज़्यादा मेहनत मत किया करो। पोते-पोतियाँ उसे “नाना” और “दादू” कहकर बुलाते थे। ये शब्द सुनकर वह खुश भी होता था और थोड़ा चौंक भी जाता था। उसे अब भी याद था, जब कल तक लोग उसे “बेटा” कहकर बुलाते थे। समय कब पलट गया, उसे पता ही नहीं चला।
एक दिन वह पार्क में टहलने गया। पहले वह तेज़ चलता था, लेकिन अब कदम अपने आप धीमे हो जाते थे। घुटनों में हल्का सा दर्द रहने लगा था। वहीं एक बेंच पर बैठकर उसने पुराने दिनों को याद किया—दोस्तों के साथ हँसना, देर रात तक बातें करना, बेफिक्री से सपने देखना। आज उन दोस्तों में से कई दुनिया छोड़ चुके थे और कई अपने-अपने रास्तों में खो गए थे। उसे समझ नहीं आया कि कब सब बिखर गया।
शाम को वह घर लौटा तो पोती उसके पास दौड़कर आई और उसकी गोद में बैठ गई। उसने मुस्कराते हुए कहा, “दादू, कहानी सुनाओ।” रमेश ने उसे कहानी सुनानी शुरू की, लेकिन कहानी के बीच में उसकी आवाज़ थोड़ी भर्रा गई। उसे लगा जैसे वह अपनी ही ज़िंदगी की कहानी सुना रहा हो। पोती ने उसके गाल पर हाथ रखा और बोली, “दादू, आप बहुत अच्छे हो।”
उस पल रमेश की आंखों में नमी आ गई। उसने महसूस किया कि ज़िंदगी ने उससे बहुत कुछ लिया—जवानी, ताकत, कई दोस्त—लेकिन बदले में उसे प्यार, परिवार और यादें भी दीं। उसने खुद से कहा कि शायद यही ज़िंदगी का हिसाब है।
रात को वह बिस्तर पर लेटा और सोचने लगा कि उसने हर किसी के लिए जीया, लेकिन अब वह अपने लिए भी जीना चाहता है। अब वह हर सुबह सूरज को ध्यान से देखेगा, बच्चों और पोते-पोतियों के साथ समय बिताएगा और छोटी-छोटी खुशियों को महसूस करेगा। उसने मन ही मन तय किया कि जब तक साँस है, वह ज़िंदगी को जी भर कर जिएगा, ताकि आख़िर में यह न कहना पड़े कि सब कुछ कब बीत गया, उसे पता ही नहीं चला।
लघु कथा – 1
थोड़ी सी सफेदी उसकी कनपटियों पर ऐसे उग आई थी, जैसे बारिश के बाद आसमान पर हल्की सी उजास। कंधे जिम्मेदारियों के बोझ से झुके रहते, और चेहरा जिंदगी की भट्टी में खुद को गलाने का गवाह था। अनुभव ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी थी, क्योंकि उसी के सहारे वह अपने परिवार को वो सब देने की कोशिश करता था, जो उसे कभी नहीं मिला। समय की धारा में वह चुपचाप बहता जा रहा था, बिना शोर किए, बिना शिकायत किए।
पूरा दिन दुनिया से लड़कर थका-हारा जब वह घर लौटता, तो दिल में बस एक ही चाह होती—थोड़ा सा सुकून। लेकिन दरवाजे पर ही बच्चे खड़े मिलते। “पापा, ये लाए?” “वो क्यों नहीं लाए?” अगर कुछ नहीं लाता तो सवाल, और अगर कुछ लाता तो भी सवाल। वह क्या कहता? कैसे बताता कि आज जेब थोड़ी हल्की थी, सपने थोड़े भारी। कभी प्यार से समझाता, कभी डांट कर। बच्चों को तो उसकी बातें समझ में आ जातीं, लेकिन उनकी मासूम आंखों में उसके मन का बोझ नहीं दिखता। उसकी आंख के कोने में एक बूंद आंसू अक्सर जम जाती, पर वो किसी को नजर नहीं आती।
खाने की थाली में दो रोटियों के साथ पत्नी रोज दस चिंताएं परोस देती। कभी कहती, “तुमने बच्चों को सिर पर चढ़ा रखा है।” कभी शिकायत करती, “हर वक्त डांटते ही रहते हो, कभी प्यार से भी बात कर लिया करो।” बेटी बड़ी हो रही थी, बेटे की राह भटकने का डर था। पड़ोसियों के झगड़े, रिश्तेदारों की बातें, मोहल्ले की शिकायतें—सब वह चुपचाप सुन लेता। पानी का एक घूंट लेता और सारी बातें गले के नीचे उतार लेता, जैसे जहर की घूंट हो, जिसे पीना जरूरी है जिंदा रहने के लिए।
कहते हैं जिसने एक बार हलाहल पिया, वह देवता बन गया। लेकिन यहां तो हर रोज थोड़ा-थोड़ा विष पीना पड़ता है, सिर्फ इसलिए कि घर की सांसें चलती रहें। रात को बिस्तर पर लेटते ही वह जैसे मर जाता—थकान से, चुप्पी से, जिम्मेदारियों के बोझ से। क्योंकि उसे पता था, सुबह फिर जिंदा होना है, फिर काम पर जाना है, फिर कमा कर लाना है, ताकि घर चल सके।
एक दिन वह देर तक नहीं उठा। पत्नी ने आवाज दी, बच्चों ने हिलाया। आंखें नहीं खुलीं। डॉक्टर आया, सिर हिलाया और बोला—“बहुत थक गया था।” उस दिन घर में सन्नाटा था। बच्चे पहली बार समझ पाए कि पापा क्यों कभी हंसते नहीं थे, क्यों उनकी आंखों में हमेशा कुछ रुका रहता था।
समय बीता। बच्चे बड़े हुए। जब वे खुद नौकरी करने लगे, थक कर घर लौटे, तो आईने में अपनी कनपटियों पर हल्की सी सफेदी देखी। तब उन्हें याद आया—वो आदमी, जो हर दिन मरता था, ताकि वे हर दिन जी सकें। और उनकी आंखों के कोने में भी, अब वही बूंद जमने लगी।
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