कैसे बीत गया जीवन का सफ़र,
समय का यह कारवाँ कब गुजर गया, पता ही नहीं चला।
क्या पाया जीवन में, क्या खो दिया राहों में,
हिसाब लगाने बैठे तो कुछ समझ ही नहीं आया।
सपनों के पीछे भागते रहे उम्र भर,
कब सपने बदले और हम बदल गये, पता ही नहीं चला।
बीती जवानी हँसते-हँसते,
और बुढ़ापा आकर दरवाज़े पर खड़ा हो गया।
कल तक जो खुद बेटा कहलाते थे,
कब ससुर बन गये, पता ही नहीं चला।
पिता की जिम्मेदारियाँ निभाते-निभाते,
कब नाना-दादा बन गये, पता ही नहीं चला।
कोई कहे बुढ़ऊ, कोई पुकारे पापा,
अपनी असली पहचान क्या है, समझ ही नहीं आया।
पहले माँ-बाप की मरज़ी से चलते रहे,
फिर पत्नी की बातों में ढलते रहे।
उसके बाद बच्चों की दुनिया में उलझ गये,
अपनी इच्छा कब दब गई, पता ही नहीं चला।
पत्नी मुस्कुराकर कहती है,
अब तो समझदार हो जाओ।
पर क्या समझें और क्या समझाएँ,
ये फ़र्क भी कभी साफ़ नहीं हुआ।
दिल आज भी कहता है, जवान हूँ मैं,
उम्र आईने में सच दिखा जाती है।
इस उधेड़बुन में चलते-चलते,
घुटनों की आवाज़ कब बढ़ गई, पता ही नहीं चला।
काले बालों में चाँदी उतर आई,
चेहरे की रेखाएँ गहरी हो गईं।
कदमों की रफ़्तार धीमी पड़ी,
चाल कब बदल गई, पता ही नहीं चला।
समय ने करवट बदली कई बार,
हम भी उसके साथ बदलते रहे।
मित्रों की महफ़िलें छँटती चली गईं,
कौन साथ रहा, कौन छूट गया, पता ही नहीं चला।
कल तक मस्ती के किस्से सुनाते थे,
आज वरिष्ठ नागरिक कहलाने लगे।
नाती-पोते की खिलखिलाहट आई घर में,
सूनी पड़ी दोपहरें भी मुस्कुरा उठीं।
उदासियों की परतें हटती चली गईं,
खुशियों ने कब दस्तक दी, पता ही नहीं चला।
जीवन की भागदौड़ में साँसें थमती रहीं,
पर चाहतें कभी पूरी नहीं हुईं।
अब सोचता हूँ खुलकर जी लूँ हर पल,
कल का भरोसा किसे है यहाँ।
ऐ दोस्त, जी भर के जी ले आज,
कहीं ऐसा न हो कि अंत आ जाए अचानक,
और हम बस इतना ही कहते रह जाएँ,
मौत कब आ गई, पता ही नहीं चला।
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