Undeniable truths of life

Rajeev Verma

Points to ponder

1) When the axe came to the forest, the trees said the handle was one of us. Until they felt its cuts:. BETRAYAL IS within.

2) When a kid grows up, a pencil is replaced by a pen just to make the kid realize that now it is not easy to erase the mistake.

3) If loyalty was real, water is not supposed to cook the fish.

4) How I wish RIP means Return If Possible.

5) One sad truth about life is that you may not even be part of the future you’re stressed about.

6) The day you lose your father is the day you will realize that you have lost the only man who wanted to see you better than him.

7) The sheep lived all her life, fearing the wolf, but it was the shepherd that finally ate it.

8) When we were kids, we cried loudly to be noticed. But now we cry silently because we don’t want anyone to know.

9) My mom always said, “don’t talk while eating.” I never knew she was talking about life.

10) Just because you’re a good person, doesn’t mean the world owes you kindness.

11) When the blind man sees, he throws away the stick that has been helping him for years.

12) Nowadays, you MAY need money to become a member of your own family.

13) FAMILY is like a FOREST from a distance. They are all close until you get closer to see how SEPARATED trees are !

✨ कविता ✨ जलने दो, इस घर में सबको !

  • राजीव वर्मा

रोटी जली,

रसोइए ने कहा – “तवा बदल दो।”

बीवी बोली – “तवा बदल दूँ ?

अरे तवा तो सास की दहेज का है,

इसको बदलना गुनाह है !

“रोटी फिर जली,

रसोइए ने कहा – “आटा बदल दो।”

ससुरजी बोले – “हमारा गेहूँ ऑर्गेनिक है,

पिसवाया था शर्मा चक्की से,

आटे को मत कोसो,

अपने नसीब को कोसो ! “

रोटी फिर जली,

रसोइए ने कहा – “पानी बदल दो।”

बच्चे बोले –

“हम तो मिनरल वाटर पीते हैं,

अगर पानी बदला तो हमें भी पेट दर्द होगा,

क्योंकि हमारा पेट भी VIP है !”

रोटी फिर जली,

रसोइए ने कहा – “चूल्हा बदल दो।”

पड़ोसी दौड़े आए – “अरे भाई, चूल्हा मत बदलो,

गैस कनेक्शन हमारा नाम से है,

पकड़ी जाएगी ब्लैक लिस्टिंग !”

रोटी जलती रही,

काला धुआँ छत तक जाता रहा,

कुत्ता भी सोच में पड़ गया,

“ये रोटी है या कोयला ?”

आख़िर में दादी बोलीं –

“बेटा, एक काम करो,

या तो शादी बदल दो,

या फिर रसोइया बदल दो !”

लेकिन हिम्मत किसी में न हुई,

सबने बहाने ही ढूँढे,

रोटी जलती रही…

और रसोइया हँसता रहा –

“जलने दो, इस घर में सबको

बदला चाहिए, पर बदलाव नहीं !”

✨ कविता ✨ सांझ और भोर के बीच

– राजीव वर्मा

बहुत समय बाद, जब हम यहाँ न होंगे,

फिर भी हमारी स्मृतियाँ हवा में तैरती रहेंगी।

हमारा प्रेम, जिसने दिलों पर अमिट छाप छोड़ी,

एक ऐसा रंग, जिसमें कोई बंधन नहीं,

बस भावनाओं का उफान,

अनियंत्रित, असीम, अनंत।

समय ने हमें इस स्थान से उठा लिया है,

मगर हम सचमुच कहीं खोए नहीं हैं।

हम बस ठहर गए हैं उस संध्या में,

जहाँ सूरज डूबते-डूबते

रात की चादर में घुलने लगता है।

जहाँ भोर की पहली किरण

अभी जन्म लेने को है,

पर रात का आलिंगन भी ढीला नहीं हुआ।

हम वहाँ हैं—

जहाँ न पूरा अंधेरा है, न पूरी रोशनी।

जहाँ यादें धुंध की तरह फैलती हैं,

और हर सांस में बीते दिनों की गंध है।

तुम अगर कभी चुपचाप आँखें मूँद लो,

तो हमें महसूस कर सकोगे—

तुम्हारी हथेलियों की गर्माहट में,

तेरे दिल की धड़कनों में,

तुम्हारे आँसुओं की नमी में।

हमारी हँसी की गूँज

अब भी हवा में बहती है,

जैसे पत्तों के बीच से

कोई पुराना गीत गुजर रहा हो।

हमारी बातों की सरगम

अब भी तट पर बैठी लहरों की तरह लौटती है,

हर बार थोड़ी और गहराई लेकर।

हाँ, समय हमें ले गया है,

पर हमें मिटा नहीं सका।

हम उस अमर आलोक में बस गए हैं,

जहाँ प्रेम का कोई अंत नहीं।

तो जब तुम अगली बार

सांझ और भोर के बीच ठहरो,

उस क्षणिक उषाकाल में,

जहाँ आकाश बैंगनी और सुनहरा हो जाता है,

याद रखना—

हम वहीं हैं,

तुम्हारे पास,

तुम्हारे हर सांस के साथ।

डाक रनर

राजीव वर्मा

पहाड़ों की डाक और जज़्बे की कहानीपहाड़ों में डाक व्यवस्था का इतिहास जितना पुराना है, उतना ही संघर्षों से भरा हुआ भी। सड़कें पक्की बनने से पहले, पहाड़ी गाँवों और कस्बों को जोड़ने का एकमात्र जरिया हुआ करता था—डाक रनर। ये वो लोग थे जो पैदल ही घाटियों, जंगलों, नदी-नालों और खतरनाक चढ़ाइयों को पार करके डाक पहुँचाते थे।

कच्चे और पक्के पोस्ट ऑफिस का नेटवर्क

पहाड़ी इलाकों में बड़े कस्बों और बाज़ारों में पक्के पोस्ट ऑफिस होते थे। वहीं, दूर-दराज़ के गाँवों में कच्चे पोस्ट ऑफिस होते, जिन्हें प्रायः किसी स्थानीय दुकानदार, शिक्षक या ग्राम प्रधान द्वारा संचालित किया जाता। पक्के पोस्ट ऑफिस से कच्चे पोस्ट ऑफिस तक डाक पहुँचाने का ज़िम्मा होता था—डाक रनर पर।

डाक रनर का सफ़र

डाक रनर रोज़ाना तय समय पर अपनी यात्रा शुरू करते। उनके पास एक लकड़ी या लोहे का डाक बॉक्स होता, जिसे वे कंधे पर टांगकर चलते।सुबह-सुबह पक्के पोस्ट ऑफिस से डाक लेतेघाटियों, जंगलों और पगडंडियों से होते हुए कच्चे पोस्ट ऑफिस तक पहुँचतेवहाँ से वापस लौटते हुए दूसरी जगह की डाक लेकर आतेबरसात हो, बर्फ़बारी हो, या तेज़ धूप—इनका सफ़र कभी नहीं रुकता। पहाड़ों में कई बार नदियाँ उफान पर होतीं, तो इन्हें पानी में उतरकर पार करना पड़ता। सर्दियों में बर्फ़ और बर्फ़ीली हवाओं से जूझते हुए भी ये लोग समय पर डाक पहुँचाते।

खतरा और जिम्मेदारी

डाक रनर का काम केवल पैदल चलना नहीं था—यह जान जोखिम में डालने जैसा था।जंगली जानवरों का डर (भालू, तेंदुआ, जंगली सुअर)फिसलन भरी पगडंडियाँतेज़ बहाव वाली नदियाँअचानक बदलता मौसमफिर भी, ये लोग डाक को समय पर पहुँचाना अपनी जिम्मेदारी मानते थे।

सिर्फ पत्र नहीं, उम्मीदें भी

डाक रनर सिर्फ खत और पार्सल ही नहीं लाते थे—वे गाँव वालों के लिए उम्मीदें, खुशखबरियाँ, और कभी-कभी दुखभरी खबरें भी लेकर आते थे।किसी बेटे का विदेश से भेजा खतशादी का निमंत्रणपरीक्षा का रिज़ल्टसरकारी सूचनामनी ऑर्डर की रकमगाँव वाले डाक रनर को दूर से आता देख पहचान लेते और बेसब्री से इंतज़ार करते।

पहाड़ों में डाक बॉक्स की परंपरा

पहले गाँवों में लाल रंग के लोहे के डाक बॉक्स होते थे। लोग अपने खत उसमें डाल देते और डाक रनर उन्हें निकालकर साथ ले जाता। कई बार किसी छोटे गाँव में डाक बॉक्स के पास कोई बुज़ुर्ग बैठा मिलता, जो आने-जाने वालों को चाय-पानी भी पिलाता।

समय के साथ बदलाव

सड़कें बनने लगीं, मोटरसाइकिल और जीप से डाक पहुँचने लगी। मोबाइल और इंटरनेट के आने से खत लिखने की परंपरा भी कम होती गई। आज डाक रनर की संख्या बहुत कम रह गई है, लेकिन जो अभी भी इस काम में हैं, वे पहाड़ की डाक व्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं।

सम्मान और स्मृति

डाक रनर केवल एक कर्मचारी नहीं, बल्कि पहाड़ की आत्मा का हिस्सा हैं। उन्होंने दशकों तक अपनी मेहनत और ईमानदारी से पहाड़ों को जोड़े रखा।आज भी कई बुज़ुर्ग उनके किस्से सुनाते हैं—कैसे एक डाक रनर बर्फ़ीले तूफ़ान में भी डाक लेकर पहुँचा, या कैसे किसी बीमार को दवा दिलाने में मदद की।

डाक रनर पहाड़ों के सच्चे नायक हैं—जिन्होंने बिना किसी आधुनिक सुविधा के, केवल अपने पैरों की ताकत और कर्तव्य भावना से डाक और दिलों को जोड़े रखा। ये सिर्फ डाक नहीं, बल्कि रिश्तों और उम्मीदों के संदेशवाहक थे।

✨ कविता ✨ The River’s Memory

Rajeev Verma

The river remembers…

Stories from centuries ago…

The voices of elders…

Still echo today…

Elders often said,

“Never build your home by the river, my child,

For she never forgets her path…

“But today’s generation smiles and says,

“That’s an old tale, Grandpa,

Now we sell river-view apartments,

With lawns, swings, and selfie corners too!”

But the river…

Never forgot, never stopped, never tired,

She just kept flowing…

With her memories,

With her resolve…

“I am the mistress of this valley…”

We adorned her with stone jewelry,

We covered her sand with cement,

We erased her streams from Google Maps,

Gave them names like River View, Vyasa View…

And then one day…

A torrential rain opened the old files,

The river came…

Not angry, not violent…

Just to say —”I was always here,

It’s you who forgot me…”

Walls crumbled, roofs washed away,

People cried —

“We’ve lost everything!”

They blamed the government, stirred politics,

But the river only smiled…

And softly said…

“I’m only doing

What your elders once told you,

It’s you who forgot

That I’m not a guest…

I am the mistress of this valley…

“There’s still time, listen well,

Do not make the river your enemy,

She is life…If only you…Let her flow…

“Let her flow…”

✨ कविता ✨ मुझे बहने दो…

राजीव वर्मा

नदी की यादें…

सदियों पुरानी बातें…

बुज़ुर्गों की आवाज़…

गूंज रही है आज…

अक्सर बुज़ुर्ग कहते थे,”

नदी के पास घर मत बसाओ बेटा,

वो अपना रास्ता…

कभी नहीं भूलती…

“आज की पीढ़ी हँस के कहे,”

अब वो पुरानी बात है दादाजी,

अब तो रिवर-व्यू बिकते हैं,

लॉन में झूले, सेल्फ़ी कॉर्नर भी होते हैं जी!

पर नदी…

ना भूली, ना थमी, ना थकी,

बस बहती रही…

अपनी यादों के साथ,

अपनी ज़िद के साथ…

“मैं मालकिन हूँ इस घाटी की…”

हमने पत्थरों के गहने पहनाए,

रेत को सीमेंट से ढक डाला,

गूगल मैप से मिटा दिए रास्ते,

नाम दे दिए रिवर-व्यू, व्यास-व्यू…

फिर एक दिन…

घनघोर बारिश ने फाइलें खोलीं,

नदी आई…ना नाराज़, ना हिंसक…

बस कहने —

“मैं यहीं थी,तुम्हीं भूले हो जी…”

दीवारें टूटीं, छतें बहीं,

लोग चिल्लाए —

“सब लुट गया!”

सरकार को कोसा,

राजनीति गरमाई,

पर नदी बस मुस्कराई…

धीरे से बोली…

“मैं तो वही कर रही हूँ,

जो तुम्हारे बुज़ुर्ग बताते थे,

तुम्हीं थे जो भूल बैठे,

कि मैं मेहमान नहीं…

मालकिन हूँ इस घाटी की…

“अब भी वक़्त है,

सुन लो बात,

नदी को दुश्मन मत बनाओ,

वो जीवन है…

बशर्ते तुम…

मुझे बहने दो…

मुझे बहने दो…

✨ कविता ✨ From Flowers to Stones

By Rajeev Verma

The games of fate,

destined to play,

have all been played,

Every card of destiny upon the table,

neatly laid.

Yet here we are,

adrift in dreams we could not own,

A broken boat beneath us,

sailing seas unknown.

The waves were high,

the winds sang tales of despair,

But hope still lingered,

trembling in the salt-filled air.

We chased horizons the sun had long forsaken,

And gave our hearts to journeys already shaken.

A fragrance once lingered,

tender and sweet,

Brushed past my hand,

then vanished in retreat.

It left no trace,

no bloom to hold or keep,

Only the memory,

buried quiet and deep.

We gathered flowers,

in colors bright and rare,

Shared them with all,

with love beyond compare.

But in the giving,

our warmth was overthrown,

For we gave away our flowers…

and turned into stone.

✨ कविता ✨ श्रद्धांजलि धराली

*कभी था घना, सघन साया,

जहाँ पक्षी गाते, पवन लहराया।

पेड़ों की गोद में जीवन पलता,

हर प्राणी निडर, निर्भय चलता।

फिर एक दिन लोहे ने दस्तक दी,

सड़कें बनीं, मशीनें आईं।

इंसानों की चाहत बढ़ती गई,

हरियाली पीछे हटती गई।

किनारों पर ईंटें जमने लगीं,

धुआँ आसमान को चूमने लगा।

चमकते भवन, चिल्लाते बाज़ार,

हर पल जंगल को चुप कराने लगा।

साल गुज़रे, मौसम बदले,

कभी सूखा, कभी तूफान आए।

बाढ़ की लहरें शहर लील गईं,

प्रगति की नींव भी बहा ले गई।

अब, दरकती ज़मीन से

फिर वही हरियाली झांक रही है।

जड़ों की सरसराहट सुनाई देती है,

मानो धरती फिर सांस ले रही है।

वो जंगल, जो चुपचाप गया था,

अब लौटकर हक़ मांग रहा है।

वो कह रहा है —

“ये मिट्टी मेरी थी, मेरी ही रहेगी,

मैं जीवन हूँ, मैं फिर उगूंगा।”

– राजीव वर्मा

✨ कविता ✨ “दोस्ती का गुलज़ार”

राजीव वर्मा

मुझ पर दोस्तों का प्यार,

यूँ ही उधार रहने दो,बड़ा हसीन है, ये कर्ज,

मुझे कर्ज़दार रहने दो

हर मुलाक़ात में एक जादू है,

हर हँसी में उनकी बातों की खुशबू है,

उनके बिना ये जिंदगी, जैसे अधूरी कहानी,

इस किताब-ए-ज़िंदगी को यूँ ही ख़ुमार रहने दो।

वो आँखें जो छलकती हैं,

ग़म में, ख़ुशी में, मेरे लिए,

उन सभी आँखों में सदा,

प्यार बेशुमार रहने दो

कभी आँसू बनके बहती हैं,

कभी दुआ बनके कहती हैं,

उन आँखों के हर एक मोती में,

छुपा है एक रिश्ता बेमिसाल।

उन निगाहों का नूर,

मेरे जीवन का उजास बन जाने दो।

मौसम लाख बदलते रहें,

आएँ भले बसंत-पतझड़,

मेरे यारों को जीवन भर,

यूँ ही सदाबहार रहने दो

कभी बरसात की फुहारों में भीगते,

कभी सर्दियों की चाय में घुलते,

वो संग चलना हर राह पर,

हर मोड़ पर नाम हमारा एक साथ रहने दो।

कभी मनमुटाव, कभी मनुहार,

पर दिलों में ना हो दीवार,

दोस्ती का ये संगीत,

हर मौसम में बहार रहने दो।

महज दोस्ती नहीं ये,

बगिया है विश्वास की,प्यार, स्नेह के फूलों से,

इसे गुलज़ार रहने दो

हर रिश्ता तोलता है कुछ पाने में,

पर दोस्ती बस होती है निभाने में,

इस बगिया की माटी मेंना कोई स्वार्थ उगे, ना शिकवा।

बस भरोसे के फूल खिलें,

और अपनापन हर डाली पर झूमता रहे।

वो मस्ती, वो शरारतें,

न तुम भूलों, न हम भूलें,

उम्र बढ़ती है..

खूब बढ़े,जवाँ ये किरदार रहने दो

कभी क्लास में खामोश हँसी,

कभी कैंटीन की अधूरी चाय,

वो कॉपी में छिपे हुए राज़,

वो बिना कहे समझ जाना…

वो ‘चल यार, कहीं चलते हैं’,

बस यूँ ही हर दास्ताँ मेंहमेशा जिंदा रहने दो।

उम्र की राहों में भले ही रफ्तार आ जाए,

पर दिलों का मिज़ाज बचपन सा रह जाए,

हम सब बुज़ुर्ग हों कल भले,

पर हमारी दोस्ती को हर रोज़ का त्योहार रहने दो।

अंत में बस इतना ही कहूँगा:

“जो रिश्ते दिल से बनते हैं,

वो वक़्त के साथ टूटते नहीं,

बस उन रिश्तों में, थोड़ा सा प्यार,थोड़ा सा समर्पण, और

थोड़ी सी यादें रहने दो…”

✨ कविता ✨ लो नव प्रस्थान ….

राजीव वर्मा

हैं सम्मान तपोबल से भूतल पर शूर,

‘जाति-जाति’ का शोर मचाते केवल कायर क्रूर।

धर्म नहीं जो बाँटे मानव को ऊँच-नीच के नाम,

सच्चा धर्म वही जो दे सबको समान सम्मान।

वीर बनें वे कर्मठ नर जो तप में तन्मय हों,

जाति-प्रपंचों से ऊपर जो जनसेवा में रत हों।

वर्ण नहीं कोई जन्मजात जो तय करे अधिकार,

कर्मों से मिलती है जग में सच्चे गौरव की धार।

जो बोले ‘मैं ब्राह्मण हूँ’, पर तप नहीं, न ज्ञान,

वह नर केवल छाया है, न उसमें कोई प्राण।

क्षत्रिय वही जो करे रक्षा, न कि केवल भोगी,

सेवक हो वैश्य वही, जो न देखे केवल लोगी।

शूद्र नहीं वह जो सेवा में है, वह तो सबसे पूज्य,

नीच वही जो बाँट रहा मानव को जाति-भुज।

कायरता है जाति कहें, जब कर्मों में हो खोखल,

बलशाली वह है जगत में, जिसका तप है शोभाल।

उठो युवा! पहचानो खुद को कर्मों से बनो महान,

जातिवाद की जंजीरों को तोड़ो, लो नव प्रस्थान।

✨ कविता ✨ कान की कामिक आत्मकथा

राजीव वर्मा , 20- जुलाई -2025

हम हैं कान…

जी हाँ वही…

जो चुपचाप सब सुनते हैं,

लेकिन खुद कभी सुने नहीं जाते

हम दो हैं – जुड़वां भाई

लेफ्टू और राइटू ..

लेकिन किस्मत ने ऐसा झपट्टा मारा है…

कि अब तक एक-दूसरे की शक्ल तक नहीं देखी

(Zoom मीटिंग तक नहीं हुई भाई!)

लगता है पैदा होते ही

कोई तांत्रिक श्राप मिला था

जाओ बच्चो,

ज़िंदगी भर उल्टी दिशा में टंगे रहो!

अब देखो सीन क्या है…

हमें सिर्फ़ “सुनने” का डिपार्टमेंट मिला है…

गालियाँ हों या बीवी की चिल्लाहट,

प्यारी बात हो या बॉस की बकवास

सबका हम ही

ऑडियो रिकार्डर’ हैं !

धीरे-धीरे हमें खूंटी समझ लिया गया ..

ऊपर से चश्मा लटकाओ,

मास्क अटकाओ, एयरफोन ठूसो,

गुटखा फँसाओ, बाल काटो –

सब काम हमसे ही

अबे चश्मा आँखों के लिए है ना,

तो हम पे क्यों लटकाते हो यार?

हम कोई hanger हैं क्या ? !

हमारी किस्मत में दर्द ही दर्द है…

बचपन में दिमाग न चले तो

टीचर हमारी झिंझोड़ी करते थे!

मास्टर जी –

कान खींच दूँगा!

(जैसे खींचने से ब्रेन चालू हो जाएगा

फिर जवानी आई –लौंग, बाली, झुमका, हूप्स…

सब हमारे ऊपर टेस्ट किया गया!

छेद हमारे हुए, और तारीफ – चेहरे की

अरे भैया, बोरवेल हमने झेला,क्रेडिट कोई और ले गया!—

कभी देखा है कानों के लिए कोई फेयरनेस क्रीम?

नहीं ना…!!

आँखों को काजल,

होठों को लिपस्टिक,

गालों को ब्लश…

कानों को – धक्का और कट !!!

और कोई कवि या शायर

हमारे लिए भी दो लाइनें लिखता है क्या ?

नहीं भाई!

उन्हें तो बस आँखें, होठ, जुल्फें …

यही सब रोमांटिक लगता है

हम तो जैसे किसी प्लेट में

बची हुई दो सूखी पूड़ियाँ हैं …

जो बस चेहरा फुल दिखे

इसलिए चिपका दी गईं !

और बाल काटते वक्त जो

काट हमारे ऊपर चलता है,

वो अलग ही दुखद कहानी है …

फिर डिटॉल लगाकर हमें बहलाया जाता है –

चुप हो जा शेरू, थोड़ा सा ही कटा है …

अब तो मास्क वाला युग आ गया है …

मास्क भी हमीं पर टांग दिया !

मतलब हम नहीं,

कोई सरकारी खूंटी हैं क्या ? !

हम न रो सकते हैं,

न बोल सकते हैं …

बस चुपचाप लटके हैं …

जो भी आ जाए, हुक दो भाई कान पर !

लेकिन एक बात है …

हम मजबूती से टंगे हैं,

हर हाल में –

मुस्कुराते हैं, गुनगुनाते हैं …

और सब कुछ सुन जाते हैं

तो अगली बार जब मास्क लगाओ,

चश्मा लटकाओ या झुमका पहनो …

हम कानों को थैंक यू बोल देना …

हम भी इंसान हैं यार

थोड़े सेंसिटिव हैं !

हँसते रहिए –

और कानों को सलाम ठोंकिए !

कान है तो कान्फिडेंस है!

✨ कविता ✨ जाम, जज़्बात और जरा सी चेतावनी

राजीव वर्मा

हे रम प्रेमी ग़ालिब के भाई,

तेरे हाथों में है जाम की मलाई।

साकी से तूने गिलासिया भरवाई,

पर दिल की धड़कन तूने कब समझाई?

शराबी महफ़िल में तू शेर सुना,

पर जो पी, वो दर्द भी खुद चुना।

बात ये नहीं कि जाम कितना था भारी,

बात ये है, दिल में छुपी थी लाचारी।

तो ध्यान खुद के कलेजे का रखना,

मुर्ग खा, पर जला उसका कलेजा, ध्यान रखना।

न शौक़ में दिल जला, न तंदूर बना,

शराब में नहीं, ज़िंदगी में भी कुछ रंग जमा।

रहना नदी नालों से तू दूर,

वहीं पे बसी हैं हूरों की हूर।

पर याद रख, ये हूरें सिर्फ़ बातों की हैं,

हक़ीक़त में वो झीलें काली रातों की हैं।

कहीं साकी की बातों में न आ जाना,

कहीं भीगे हुए ख़्वाबों में बह जाना।

जो शबाब दे, वो शबखून भी मार सकता है,

और जो जाम दे, वो ज़हर भी पिला सकता है।

कोई साकी जेब कतर न ले,

तेरी औक़ात और इज़्ज़त उधार न ले।

पैमाना बस इतना ही ले,

कि होश रहे, और दुनिया भी दिखे।

जश्न में हो मगर ज़मीर साथ हो,

बातों में न सही, निगाहों में बात हो।

सिगरेट का धुआं नहीं, सच्चाई जले,

तेरे लफ़्ज़ों से कोई मयकशी चले।

हे ग़ालिब के हमदर्द, तू भी शायर है,

तेरी क़लम में भी इश्क़ का ज़हर है।

पर मदहोशी में अपनी राहें न गुमा,

कभी जाम रख, कभी कलम भी उठा।

इस शेर के साथ करूं ख़त्म मैं बात —

“रख हद में जाम, वरना खुद को भूल जाएगा,

जो दिल से निकली, वही बात फिर जाम में डूब जाएगी।”

✨ कविता ✨ शुक्र है उस प्रभु का

राजीव वर्मा

ये जो न्यामत मिली,

ये जो साँसें चल रही,

ये धड़कनों की लय,

जैसे वीणा बज रही।

हर सवेरा सुनहरा,

हर निशा में नूर है,

मेरे जीवन की गागर में,

उसका ही भरपूर है।

करूं ईश्वर का शुक्र,

हर लम्हा हर बात पर,

उसी की छाया में हूँ,

उसी के प्रभात पर।

वो ही करते दुःख कफ़ूर,

देते सुख-संसार,

हर संकट में वो बन जाते,

मेरा सबसे बड़ा आधार।

न्याय विन्यास भरपूर,

है उसकी ये रचना,

हर रेखा में उसका लिखा,

भाग्य की रचना।

कभी आंसू, कभी मुस्कान,

दोनों का है मेल,

ईश्वर की लीला अनोखी,

अद्भुत उसका खेल।

मैं जब गिरा, उसने थामा;

जब टूटा, जोड़ा मुझे,

हर बार जब खोया खुद को,

फिर से जोड़ा मुझे।

ये जो न्यामत मिली,

सिर्फ़ उसकी ही मेहर है,

मैं हूँ धूल, वो मूरत;

मैं राह, वो रहबर है।

तू ही धरती, तू ही अम्बर,

तू ही मेरा देव,

तेरे बिना सब अधूरा,

जीवन एक सन्देह।

शब्द भी कम पड़ जाते हैं,

गुण गाने के लिए,

तू ही हर प्रेरणा मेरी,

जीने के लिए।

शुक्र है तेरे हर न्याय का,

तेरे विधान का,

तेरी कृपा से ही टिका हूँ,

अपने आत्म-सम्मान का।

वो ही करते दुःख कफूर,

वो ही देते राह,अंधकार में दीप बनें,

जब ना कोई हो साथ।

भटकूं तो पकड़ ले तू,

थकूं तो विश्राम दे,

भूल जाऊं तुझको,

फिर भी अपना नाम दे।

तेरा न्याय अपार,

तेरी कृपा असीम,

तू ना होता साथ तो,

अधूरी होती थी ये ज़िंदगी की टीम।

ये जो न्यामत मिली,

क्या बताऊँ कैसे पाई,

हर मोड़ पर तू दिखा,

जब दुनिया ने परछाई।

शब्दों में ना बंध पाए तू,

भावों का सागर है,

तेरी ही सदा से ही तो,

जीवन मेरा नगर है।

करूं ईश्वर का शुक्र,

अब हर साँस में तेरा नाम,

तेरे चरणों में शांति है,

तेरे दर्शन में आराम।

जो भी हूँ, तुझसे हूँ;

जो भी पाऊँ, तेरा दान,

तेरा न्याय, तेरा विन्यास —

मेरा सबसे बड़ा सम्मान।

वो ही करते दुःख कफ़ूर,

तेरा प्रेम ही संजीवनी,

तू ही मेरा सारथी,

तू ही मेरी जीवनी।

✨ कविता ✨ सिंहासन खाली करो, के जनता आती है

सिंहासन खाली करो,

के जनता आती है,

न्याय की अग्नि सी धधकती,

वेदी सजाती है।

जिसने भूखे पेट भी सपनों को पाला है,

अब वो जागा है,

अब वो संभाला है।

कितनी रातें बीतीं बिन चूल्हा जलाए,

कितनी आँखों ने देखे ताज के साए।

अब वो आँसू नहीं,

अंगार बन चुके हैं,

हर सवालों के जबाव तलवार बन चुके हैं।

कह दो उन महलों में बैठे दरबारियों से,

कह दो नकली क्रांति के प्रचारियों से।

अब नकाब नहीं,

चेहरों को पहचाना जाएगा,

हर गद्दार,

हर जालिम को जाना जाएगा।

झूठ की चादर जितनी भी बुन लो,

सच की रोशनी से फट ही जाएगी।

जनता की हुंकार अगर उठती है कहीं,

तो हर सत्ता की नींव हिल जाएगी।

तुमने छीन लिया रोटी से निवाला,

और सोने के बिस्तर पर चैन से डाला।

पर अब नहीं, अब हक़ मांगा नहीं जाएगा,

अब हर कर्ज़ ब्याज समेत वसूला जाएगा।

ये भीड़ नहीं, ये जनसमूह है,

जिसे ना रोक सके कोई बंदूक है।

ना धर्म का बहाना,

ना जात की दीवार,

अब सब पर भारी पड़ेगा जनता का विचार।

गांव से शहर तक,

हर कोना बोलेगा,

अब हर पत्थर से इंकलाब डोलेगा।

कुर्सी से चिपके रहोगे कब तक ?

जनता के सैलाब में टिकोगे अब तक ?

हर नारे में आग है,

हर नजर में सवाल,

हर कदम चल रहा है एक नई मिसाल।

ये समय की मांग है,

ये क्रांति की घड़ी है,

हर दिशा से गूंज रही जनता की चिट्ठी है।

तो सुन लो ऐ शासकों,

अब नहीं चलेगी चालें फरेब की,

अब चलेगी कलम की,

अब चलेगी क्रांति की।

अब सिंहासन खाली करो,

कि जनता आती है —

हक़ लेकर, इज़्ज़त लेकर,

क्रांति की बाती है।

– राजीव वर्मा

✨ कविता ✨ सब्र की तौहीन -2

Rajeev verma

पलकों की हद लांघ कर,
दामन पे आ गिरा,
एक अश्क मेरे सब्र की
तौहीन कर गया।

बरसों से दिल में जो तूफ़ान छुपाए बैठा था,
हर दर्द को हँसी की चादर से ढाँपे बैठा था।
टूटी थी साँसे, बिखरी थी नींदें,
फिर भी हर रोज़ खुद को समेटे बैठा था।

हर बात पे मुस्कुराया,
हर घाव छुपा लिया,
किसी को खबर न हो
ऐसा चेहरा बना लिया।

मगर उस दिन…
जब वो नाम लिया किसी और का,
और नज़रें चुरा लीं मेरे सवालों से,
तो दिल की उस मीनार से
एक ईंट सरक गई…

सालों से जो अश्क पलकों की कैद में था,
वो आज़ाद हो गया,
दामन पे गिर कर
मेरे सब्र की तौहीन कर गया।

वो सिर्फ़ एक आँसू नहीं था,
वो मेरी ख़ामोशी की चिट्ठी थी,
जिसमें लिखा था —
“मैं भी थक चुका हूँ, अब और नहीं…”

वो पल…
जब दिल चीख़ना चाहता था,
मगर आवाज़ भी दग़ा दे गई,
बस एक कतरा बोल गया,
और सब्र मेरी नज़रें छोड़ गया।

अब क्या फर्क पड़ता है
किसे खबर है, क्या बीता है?
लोग तो बस यही पूछते हैं –
“क्यों उदास हो आजकल?”
और मैं मुस्कुरा कर कहता हूँ –
“कुछ नहीं… बस नींद पूरी नहीं हो रही…”

लेकिन सच्चाई ये है कि
नींद अब आती ही नहीं,
और अगर आती है तो
तेरे ख्वाब में खो जाती है।

वो एक अश्क…
अब हर रोज़ पलकों पे दस्तक देता है,
हर रोज़ बताता है —
कि सब्र का भी एक आख़िरी किनारा होता है।


✨ कविता ✨ “सब्र की तौहीन”

पलकों की हद लांघ करदामन पे आ गिरा,

एक अश्क मेरे सब्र कीतौहीन कर गया।

मैंने तो सीना ज़ख़्मों सेसदियों तक ढांपा था,

हर दर्द को मुस्कान मेंधीरे-धीरे बाँधा था।

लब खामोश थे, पर दिलहर रात तड़पता रहा,

हर सुबह उम्मीद काइक दिया जलता रहा।

न शिकवा किया, न फ़रियाद,

बस खुद से ही जंग लड़ी,

हर आँधी में खुद कोएक चट्टान सा खड़ा रखा।

मगर आज ये क्या हुआ,वो एक लम्हा,

वो एक बात,जिसने दिल के तहख़ानों से

बोल उठाया हर जज़्बात।

वो अश्क जो कभीजज़्ब था पलकों की क़ैद में,

किसी बेबसी की साजिश मेंबग़ावत कर गया।

वो गिरा दामन पे ऐसेजैसे सौ बातें कह गया,

हर चुप्पी की कहानी कोइक लफ्ज़ में पढ़ गया।

सब्र की जो मीनार थी,वो इक कतरे से ढह गई,

वो अश्क नहीं बस,मेरे सब्र की तौहीन कर गया।

अब दिल की ज़मीन परखामोशी की बारिश है,

हर याद एक बिजली बनकरसन्नाटों में गूंजती है।

मैं फिर भी मुस्कुराता हूँ,टूट कर भी निभाता हूँ,

मगर अब वो भरोसाकहीं गुम हो गया है शायद।

अब जब कोई पूछता है —”कैसे हो?”

तो बस मुस्कुरा कर कह देता हूँ —”ठीक हूँ,

जैसे पहले था…”

– राजीव वर्मा

✨ कविता ✨ कल की फिक्र छोड़, मुस्काया कर !

राजीव वर्मा

ख़ुद को इतना भी मत बचाया कर,
बारिशें हों तो भीग जाया कर।
चाँद लाकर कोई नहीं देगा,
अपने चेहरे से जगमगाया कर।

दर्द हीरा है, दर्द मोती है,
दर्द आँखों से मत बहाया कर।
काम ले कुछ हसीन होंठों से,
बातों-बातों में मुस्कुराया कर।

धूप मायूस लौट जाती है,
छत पे किसी बहाने आया कर।
कौन कहता है दिल मिलाने को,
कम से कम हाथ तो मिलाया कर।

तन्हाइयों से यूँ ना घबराया कर,
कभी खुद से भी गुफ्तगू किया कर।
आईने में झाँक कर देख जरा,
कभी खुद को भी सराहा कर।

हर सवाल का जवाब ज़रूरी नहीं,
कभी चुप रह कर भी समझाया कर।
हर मोड़ पर कहानी बदलेगी,
जिंदगी को यूँ ही अपनाया कर।

कभी पगडंडियों से दोस्ती कर,
शहर की दौड़ से छुट्टी लिया कर।
जहाँ दिल सुकून पाता हो,
ऐसी जगहों पर भी जाया कर।

ख्वाब सिर्फ़ सोने के लिए नहीं,
उन्हें हकीकत में आज़माया कर।
जो गिर गए तो शिकवा नहीं,
हर बार खुद को उठाया कर।

जो अपना ना बन सका, कोई बात नहीं,
पर तू खुद से न पराया कर।
ये दिल बहुत कुछ कहता है,
कभी इसकी भी सुन लिया कर।

सपनों का क्या है, हर कोई देखता है,
तू बस हौसलों को जगाया कर।
हर सुबह एक नई शुरुआत है,
कल की फिक्र छोड़, मुस्काया कर।

इज़्ज़त या ज़िल्लत: जीवन में सम्मान और आत्मसम्मान का महत्व

राजीव वर्मा, 28 – जून- 2025

“इज़्ज़त से अगर धूल भी मिले, तो उसे माथे से लगाओ,ज़िल्लत से अगर सिंहासन भी मिले, तो उसे ठुकराओ।”

यह दो पंक्तियाँ केवल शायरी नहीं, बल्कि जीवन का गूढ़ सत्य हैं। ये हमें यह सिखाती हैं कि सम्मान (इज़्ज़त) और स्वाभिमान (आत्मसम्मान) का मूल्य किसी भी भौतिक वस्तु या पद से अधिक होता है।

इज़्ज़त की धूल भी क्यों होती है अनमोल ?

जब कोई व्यक्ति सम्मान के साथ छोटा सा कार्य करता है या सीमित संसाधनों में भी गरिमा बनाए रखता है, तो वह सचमुच सराहनीय होता है।धूल यहाँ एक प्रतीक है – छोटी चीज़ों का, संघर्ष का, या सीमित संसाधनों का। लेकिन जब वही संघर्ष इज़्ज़त के साथ किया जाता है, तो उसका मोल अमूल्य हो जाता है।

उदाहरण: एक मेहनतकश किसान जो दिन-रात खेतों में काम करता है, भले ही उसके पास महंगे कपड़े या बंगले न हों, लेकिन वह सम्मान के योग्य है। उसके हाथों की मिट्टी इज़्ज़त की धूल है – जिसे माथे से लगाना चाहिए।

ज़िल्लत से मिला सिंहासन क्यों त्याग देना चाहिए ?

ज़िल्लत यानी अपमान, अपहेलना या चरित्रहीनता के साथ मिली सफलता – चाहे वह सत्ता हो, पैसा हो या प्रसिद्धि – अंदर से खोखली होती है। सिंहासन प्रतीक है शक्ति, पद और ऐश्वर्य का, लेकिन यदि वह किसी का अपमान कर, झूठ बोलकर, धोखा देकर या आत्मसम्मान को गिरवी रखकर मिला हो, तो वह किसी काम का नहीं।

उदाहरण: अगर कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार करके मंत्री बन जाए, तो वह सिंहासन उसे नाम, पद और पैसा तो देगा, पर आत्मसम्मान छीन लेगा। और एक दिन वही सिंहासन उसे बदनाम करके गिरा भी सकता है।सम्मान बनाम सफलता – क्या अधिक ज़रूरी है?आज के प्रतिस्पर्धी युग में लोग सिर्फ सफलता के पीछे भागते हैं, चाहे उसके लिए उन्हें कितनी भी समझौते क्यों न करने पड़ें। लेकिन एक सच्चा और दीर्घकालिक विजेता वही होता है जो सफलता को सम्मान और नैतिकता के साथ प्राप्त करता है।

1. ईमानदारी से जिएं – भले ही राह कठिन हो, लेकिन आत्मसम्मान को न बेचें।

2. छोटे कार्यों को भी गरिमा से करें – इज़्ज़त से किया गया छोटा काम भी बड़ा प्रभाव छोड़ता है।

3. अपमान सहकर लाभ उठाना बंद करें – जो रिश्ता या काम आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाए, उससे दूर हो जाएँ।

4. बच्चों को भी यही सिखाएँ – कि इज़्ज़त पैसों से नहीं, कर्मों और सोच से मिलती है।

निष्कर्ष:इस दोहे का सार यही है कि “इज़्ज़त और आत्मसम्मान सबसे बड़ी दौलत हैं।” अगर कोई चीज़ इन्हें छीनने की कीमत पर मिल रही है, तो वह त्याग देना ही समझदारी है।धूल में भी इज़्ज़त हो, तो वह माथे का तिलक बन जाती है; लेकिन अपमान में मिला सिंहासन भी कांटों से भरा होता है।

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चिकन गन टेस्ट

राजीव वर्मा, 17- जून-2025

प्लेन के उड़ान भरते या उतरते समय पक्षी टकरा सकते हैं। कई लोगों के मन में सवाल होता है कि इतने बड़े प्लेन को एक छोटा सा पक्षी क्या नुकसान पहुंचा सकता है?

लेकिन उड़ान भरते और उतरते समय प्लेन 350 से 500 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से होता है।ऐसे में छोटे से पक्षी के टकराने से भी बड़ी समस्या हो सकती है। पक्षियों के टकराने से प्लेन का विंडशील्ड टूट सकता है। कई बार ऐसा हुआ है कि आगे का शीशा टूटने से पायलट घायल हो गए।अगर पक्षी इंजन में घुस जाए या प्लेट से टकरा जाए तो प्लेन गिर भी सकता है। पक्षी के टकराने से इंजन बंद हो सकता है और आग लग सकती है। इससे प्लेन क्रैश हो सकता है।

इसलिए दुनिया भर की विमानन कंपनियां उड़ान से पहले ‘चिकन गन’ टेस्ट करती हैं। यानी उड़ान से पहले इंजन में एक जिंदा मुर्गे को डाला जाता है। यह टेस्ट क्यों किया जाता है, इसकी जानकारी इस लेख में दी गई है।

क्या है चिकन गन टेस्ट ?

सीधे शब्दों में कहें तो यह एक प्लेन इंजन टेस्ट है। प्लेन के इंजन की क्षमता जांचने के लिए जिंदा मुर्गे का इस्तेमाल किया जाता है। पक्षियों के टकराने से होने वाले असर को समझने के लिए इंजीनियर चिकन गन नाम की एक खास मशीन का इस्तेमाल करते हैं। यह एक बड़ी कंप्रेस्ड एयर गन होती है, जिससे प्लेन के विंडशील्ड, पंखों और इंजन पर मुर्गे को फायर किया जाता है। मुर्गे की रफ्तार असली पक्षी के टकराने की रफ्तार के बराबर होती है।यह टेस्ट लैब में किया जाता है। प्लेन का शीशा और इंजन सही स्थिति में है या नहीं, यह जानने के लिए लैब में चिकन गन टेस्ट किया जाता है। लैब में इंजीनियर हाई-स्पीड कैमरों से पूरी घटना को रिकॉर्ड करते हैं। फिर पक्षी के टकराने से हुए नुकसान का विश्लेषण करते हैं।

चिकन गन टेस्ट या बर्ड स्ट्राइक टेस्ट जिंदा मुर्गे से किया जाता है। क्योंकि मुर्गे का वजन, आकार और टिशू हवा में उड़ने वाले पक्षी जैसा ही होता है। आजकल सभी बड़ी विमान निर्माता कंपनियां इस तरीके को अपना रही हैं। इस टेस्ट में पास होने वाले प्लेन को ही उड़ान भरने की अनुमति मिलती है।

कैसा होता है बर्ड स्ट्राइक टेस्ट ?

उड़ान से पहले प्लेन के इंजन, कॉकपिट विंडशील्ड और पंखों को एक मजबूत फ्रेम में रखा जाता है। फिर इन सभी हिस्सों की क्षमता की जांच की जाती है। लैब में प्लेन के उड़ान की गति जैसी व्यवस्था की जाती है।फिर तय किया जाता है कि इंजन पर क्या फेंका जाए। मरा हुआ मुर्गा, नकली पक्षी या जिलेटिन बॉल, ये कुछ विकल्प होते हैं। आमतौर पर जिंदा मुर्गे को फेंक कर टेस्ट किया जाता है। प्लेन की उड़ान की गति से ही जिंदा मुर्गे को फेंका जाता है। प्लेन के मुख्य हिस्सों पर मुर्गा फेंकने पर क्या होता है, इसे रिकॉर्ड किया जाता है। फिर वीडियो में हर पल को ध्यान से देखा जाता है।यह वीडियो दिखाता है कि मुर्गा फेंकने से कितना और कहां नुकसान हुआ। फिर इंजीनियर और तकनीशियन जांच करते हैं कि इंजन ब्लेड टूटा है या नहीं, विंडशील्ड में दरार आई है या नहीं, प्लेन के पंख को नुकसान हुआ है या नहीं। अगर कोई बड़ा नुकसान नहीं होता है, तो प्लेन उड़ान भर सकता है।

✨ कविता ✨ ज़िंदगी की विडंबना

वकील की दुआ : तू मुश्किल में फँसे,

कानून की किताब तेरे खिलाफ चले।

डॉक्टर की चाह : तू बीमार हो जाए,

तेरे दर्द में ही उसकी कमाई आए।

पुलिसवाला देखे तुझमें एक अपराधी,

तेरे जुर्म से ही उसका ओहदा सजी।

गुरुजन चाहे तू मुर्ख जनमे,

ताकि पाठशाला की घंटी यूँ ही बजे।

मकान मालिक कहे : तू कभी न खरीदे घर,

उसके किराए से ही चलता है उसका सफर।

दांतों का डॉक्टर माने तेरा दर्द उपहार,

सड़ते दांतों से ही चलता है उसका व्यापार।

मकैनिक की दुआ : तेरी गाड़ी हो बंद,

तभी तो उसके औज़ार बनें तेरा पसंद।

कफ़न बेचने वाला चाहे तेरा अंत निकट,

तेरी मौत में ही है उसका भविष्य सशक्त।

पर एक है जो तुझसे करता है सच्चा प्यार,

जो चाहता है तेरा जीवन बने खुशहाल संसार।

वो है चोर : जो तेरे सुख की कामना करे,

तेरे चैन की नींद की भी दुआ करे।

विडंबना है ये जीवन का, कितना गहरा मज़ाक,

जो तुझे लूटे : वही देता है सच्चा आशीर्वाद।

— राजीव वर्मा