एक गहन और सुंदर जीवन संदेश

राजीव वर्मा

“अंत में केवल तीन बातें मायने रखती हैं: आपने कितना प्रेम किया, कितनी कोमलता से जीवन जिया, और कितनी सहजता से उन चीज़ों को छोड़ दिया जो आपके लिए नहीं थीं।” यह पंक्तियाँ हमें जीवन के वास्तविक सार की याद दिलाती हैं।

आज के व्यस्त और प्रतिस्पर्धी युग में हम सफलता, नाम और धन के पीछे इतने दौड़ते हैं कि यह भूल जाते हैं कि जीवन का असली उद्देश्य क्या है —

  1. प्रेम,

2. सरलता और

3. त्याग

1. आपने कितना प्रेम किया, जीवन की सबसे बड़ी शक्ति प्रेम है। प्रेम केवल किसी व्यक्ति के प्रति नहीं, बल्कि हर जीव, हर परिस्थिति और खुद के प्रति भी होना चाहिए। जब हम प्रेमपूर्वक सोचते हैं, बोलते हैं और कार्य करते हैं, तो हमारा जीवन स्वाभाविक रूप से सुंदर बन जाता है।प्रेम हमें दूसरों की भावनाओं को समझना सिखाता है, सहानुभूति जगाता है और रिश्तों में गहराई लाता है। अंत में लोग हमारे शब्दों या उपलब्धियों को नहीं, बल्कि यह याद रखते हैं कि हमने उन्हें कैसा महसूस कराया।

2. आपने कितनी कोमलता से जीवन जियाकोमलता का अर्थ कमजोरी नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और समझदारी से जीना है। कोमल व्यक्ति वह है जो परिस्थितियों के तूफान में भी अपनी शांति बनाए रखता है। जब हम अपने आस-पास के लोगों से नम्रता, संयम और दया से व्यवहार करते हैं, तो हमारा जीवन हल्का और मधुर हो जाता है।यह कोमलता ही हमें सिखाती है कि हर स्थिति में शांति संभव है — बस दृष्टिकोण बदलने की आवश्यकता है।

3. आपने कितनी सहजता से छोड़ा जो आपके लिए नहीं थाजीवन में हर चीज़ हमारे नियंत्रण में नहीं होती। कुछ रिश्ते, कुछ अवसर, या कुछ इच्छाएँ हमारी नहीं बन पातीं। परंतु, यही जीवन की सुंदरता है — हर चीज़ हमारे लिए बनी नहीं होती।जब हम “छोड़ना” सीखते हैं, तो “जीना” सीखते हैं। जो चीज़ें हमारे लिए नहीं हैं, उन्हें पकड़कर रखना केवल दर्द बढ़ाता है।सहजता से छोड़ देना आत्मिक स्वतंत्रता का सबसे सुंदर रूप है। यह वही क्षण है जब हम जीवन के प्रवाह में विश्वास करना सीखते हैं।

जीवन के अंत में न कोई पदवी याद रहती है, न संपत्ति, न प्रसिद्धि।बस याद रहती हैं कुछ मुस्कानें, कुछ निस्वार्थ प्रेम के पल, और कुछ ऐसे क्षण जब हमने किसी का दिल जीता। इसलिए हर सुबह अपने दिन की शुरुआत इस सोच से करें —

“आज मैं थोड़ा और प्रेम दूँगा, थोड़ा और विनम्र रहूँगा, और थोड़ा और छोड़ दूँगा जो मेरे लिए नहीं।”

यही है सच्चा जीवन — प्रेम, कोमलता और सहजता का संगम।

एक निःस्वार्थ प्रेम को समर्पित भावपूर्ण श्रद्धांजलि

राजीव वर्मा

चिट्ठियाँ जो काश मेरा कुत्ता पढ़ पाता, अगर सिर्फ़ प्यार के दम पर कोई ज़िंदा रह सकता, तो मेरे दोस्त, तुम आज भी यहाँ होते। तुम कभी सिर्फ़ एक जानवर नहीं थे — तुम मेरे जीवन का वो हिस्सा थे जिसकी कमी मुझे तब तक महसूस नहीं हुई जब तक तुम चले नहीं गए। तुमने मुझे सिखाया कि सच्ची निष्ठा कैसी होती है, बिना किसी उम्मीद के देना क्या होता है, और किसी के लिए पूरी तरह मौजूद रहना क्या मायने रखता है — ऐसे तरीक़े से जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। तुम एक पालतू जानवर नहीं, बल्कि मेरा परिवार थे — एक ऐसे साथी जो मुझे बिना बोले भी समझ लेते थे।

मैं अक्सर उन शांत पलों के बारे में सोचता हूँ जब तुम बिना किसी सवाल के बस मेरे साथ थे। तुम्हारी आँखें मेरी आँखों से मिलतीं तो ऐसा लगता जैसे तुम सब कुछ समझ जाते — अच्छा, बुरा, और वह भी जो मैं कभी कह नहीं पाया। तुम्हारी मौजूदगी में एक अजीब सी शांति थी, एक नरमी जो कठिन से कठिन दिनों को भी आसान बना देती थी। तुमने कभी शब्दों से नहीं, बस अपनी मौजूदगी से सुकून दिया। तुमने सिखाया कि प्यार बड़े कामों में नहीं, बल्कि छोटी-छोटी बातों में छिपा होता है — एक हिलती हुई पूँछ में, मेरी गोद पर रखे तुम्हारे सिर में, या उस नज़र में जो कहती थी, “मैं यहीं हूँ।”

तुम्हारे साथ बिताया हर दिन एक सबक़ था — प्यार का, धैर्य का, और सच्ची मौजूदगी का। तुमने मुझे दिखाया कि वफ़ादारी कभी नहीं डगमगाती, और सच्चा साथ परिपूर्णता नहीं, बल्कि निरंतर उपस्थिति है। भले ही तुम्हारा समय यहाँ जल्दी समाप्त हो गया, लेकिन तुम्हारा प्यार मेरे दिल में सदा रहेगा।

अगर केवल प्यार ही तुम्हें रोक सकता, तो तुम आज भी मेरे पास होते। लेकिन अब भी, जब तुम नहीं हो, मैं तुम्हें हर जगह महसूस करता हूँ। उन छोटी-छोटी आदतों में जो अब भी तुम्हारी मौजूदगी का एहसास दिलाती हैं — दरवाज़े के पास वह जगह जहाँ तुम बैठते थे, घर की ख़ामोशी में तुम्हारे पंजों की आवाज़ जैसे अब भी गूँजती है, वह हँसी जो तुमने मेरे जीवन में लाई थी और अब भी मेरे दिल में बसती है। तुमने मुझे बदल दिया, ऐसे तरीक़े से जो मैं आज भी समझ रहा हूँ।तुमने मुझे दुनिया को नए नज़रिए से देखना सिखाया — मासूम ख़ुशी और निःस्वार्थ प्रेम की नज़रों से। तुमने एक ऐसी विरासत छोड़ी है जो सच्चे प्रेम की है — उतनी ही वास्तविक जितने हमारे साथ बिताए पल। भले ही अब तुम यहाँ नहीं हो, तुम्हारी मौजूदगी मेरे साथ है — हर सुबह की शांति में, हर धूप की किरण में, हर उस याद में जो अचानक दिल को छू जाती है।

कुछ रिश्ते समय या दूरी से कभी नहीं टूटते। हमारा रिश्ता भी ऐसा ही है। तुम बस कुछ कदम आगे चले गए हो उस राह पर जहाँ मैं अभी नहीं पहुँच सकता, लेकिन मुझे यक़ीन है कि एक दिन हम फिर मिलेंगे। तब तक, मैं तुम्हें अपने दिल में, अपनी यादों में, और हर उस पल में संजोकर रखूँगा जो मुझे सिखाता है कि असली प्यार क्या होता है।

जिमी, तुम अब यहाँ नहीं हो, मेरे दोस्त — लेकिन तुम्हारा प्यार अब भी है, और यह वो चीज़ है जिसे समय कभी मिटा नहीं सकता।

Letter I Wish My Dog Could Have Read

Rajeev Verma

A Heartfelt Tribute to Unconditional Love.

If love alone could keep someone alive, my friend, you’d still be here. You were never just an animal by my side—you were a piece of my life I didn’t know I needed until you were gone. You showed me what loyalty really looks like, how to give without expecting anything in return, and how to be there fully, in a way words can never describe. You weren’t just a pet; you were family, a silent companion who understood me better than most people ever could.

I often think about all those quiet moments when you were simply there, no questions asked, no expectations attached. Your eyes would meet mine as if you understood everything—the good, the bad, and the in-between—without me having to say a single word. You had this beautiful way of bringing peace into chaos, a softness that melted even the hardest of days. You didn’t need words to comfort me; your presence alone was enough. You taught me that love doesn’t always need grand gestures. It’s found in simple acts—the wag of a tail, a head resting on my lap, or a patient look that said, “I’m here.”Every day with you was a lesson in love, patience, and presence. You reminded me that loyalty doesn’t fade, that true companionship isn’t about perfection but about showing up, again and again, with unwavering trust. And though your time here ended too soon, your love left a mark that will never fade.

If love alone could have kept you here, you’d still be next to me now. But even though you’re gone, I find pieces of you everywhere. I see you in the small routines that still echo your presence—the sound of your paws that I can almost hear when the house is quiet, the empty space by the door where you used to wait for me, the laughter you brought into my life that still lingers in my heart. You changed me in ways I’m still discovering.

You made me see the world differently—through eyes of pure joy and wonder, through a heart that learned how to love selflessly. You left behind a legacy of love that’s as real as any moment we ever shared. And even though you’re no longer here physically, I feel you with me every day. In the stillness of early mornings, in the sunlight that filters through the window, in the gentle memories that catch me off guard—you’re there.Some bonds don’t break with time or distance. Yours is one of them. You may have walked a few steps ahead on a path I can’t yet follow, but I know that someday, somewhere, we’ll meet again. Until then, I’ll carry you with me—in my heart, in my memories, and in every quiet moment that reminds me what love truly means.

Jimmy, You’re no longer here, my friend, but your love remains—and that’s something time will never take away.

विधाता का ठेका

राजीव वर्मा

JE ने एस्टीमेट बनाया — बड़ी मेहनत से, मानो सड़क नहीं, कविता लिखी हो ‘सीमेंट और सिफारिश’ पर।

टेंडर पास हुआ — “योग्यता” देखकर नहीं, जेब की गहराई देखकर। ठेकेदार ने टेंडर लिया — और लिया आशीर्वाद भी, नोटों की माला पहनाकर। ऑफिसर को मिली रिश्वत — और नीति-नियमों ने वहीं दम तोड़ दिया।

फिर क्या था…ठेकेदार ने सड़क बनाई — जैसे बच्चे मिट्टी में लकीर खींचते हैं। तारकोल कम डाला, पर कमाई ज़्यादा निकाली। सड़क टूटी, गड्ढे बने — मानो धरती मां भी “खुलकर हँसी” हो उनके कारनामों पर।

अब एंट्री हुई ऑफिसर के बेटे की — नई बाईक, नया जोश, और सड़क पर पुराना धोखा।

पहिया गड्ढे में गिरा, सिर ज़मीन पर… और खेल खत्म। सड़क ने उसी को निगल लिया, जिसकी जेब से वो बनी थी।

हवन हुआ, मोमबत्तियाँ जलीं, लोग आए — कुछ रोने, कुछ दिखाने। पंडित जी बोले, “विधाता को यही मंजूर था।”

और ऑफिसर सोचने लगा —“अगर विधाता को मंजूर था, तो रिश्वत क्यों मंजूर थी मुझसे ?” पंडित जी को दक्षिणा मिली, ठेकेदार नए टेंडर की तैयारी में जुट गया, और विधाता फिर से बदनाम हुआ —क्योंकि इंसान को दोष देना अब आउटडेटेड हो गया है।

“सड़क फिर से बनेगी, बस ईमानदारी का गड्ढा अब कभी नहीं भरेगा।”

मन ही आपकी शक्ति है

राजीव वर्मा

मन ही आपकी शक्ति है – इसे साधें सफलता के लिए

आज की तेज़ रफ्तार दुनिया में आपका मन ही आपकी सबसे बड़ी शक्ति है। आप इसे कैसे साधते हैं, यही आपके जीवन की गुणवत्ता, सफलता और खुशी तय करता है। अक्सर लोग मानव मन की शक्ति को कम आंकते हैं, लेकिन सच यह है कि सधा हुआ मन विचलन पर विजय पाता है, चुनौतियों को पार करता है और असाधारण परिणाम देता है।

कर्म चिंतन पर भारी है – अभी शुरू करेंअत्यधिक सोचना विकास का सबसे बड़ा दुश्मन है। आप “सही समय” का इंतज़ार करते रहते हैं और इसी दौरान कीमती समय गंवा देते हैं। याद रखिए: कर्म चिंतन पर भारी है। अभी शुरू करें। आज उठाया गया छोटा सा कदम भी भविष्य में बड़ा परिवर्तन ला सकता है।

प्रेरणा का इंतज़ार मत कीजिए, कर्म ही गति पैदा करता है।

आदतें सफलता बनाती हैं – इन्हें गढ़िए

सफलता कभी अचानक नहीं मिलती, यह नियमित आदतों से बनती है। चाहे वह रोज़ पढ़ना हो, व्यायाम करना हो या लक्ष्य पर ध्यान देना – आदतें ही भाग्य तय करती हैं।

• अच्छी आदतें = विकास।

• बुरी आदतें = पतन।

इसलिए रोज़ छोटी लेकिन मजबूत आदतें बनाइए। समय के साथ ये आदतें मिलकर आपको दीर्घकालिक सफलता की ओर ले जाती हैं।

ध्यान ही जीतता है – इसकी रक्षा करें

हम विचलनों के युग में जी रहे हैं। नोटिफिकेशन, सोशल मीडिया और शोरगुल आपका ध्यान चुरा लेते हैं। लेकिन सच्चाई यही है: ध्यान ही जीतता है – इसकी रक्षा करें।

• ध्यान को सबसे कीमती खजाने की तरह सुरक्षित रखिए।

• उन विचलनों को हटाइए जो उद्देश्य की पूर्ति नहीं करते।

• अपनी ऊर्जा केवल उस पर लगाइए जो वास्तव में मायने रखता है।

  • महान मस्तिष्क सबसे व्यस्त नहीं होते, बल्कि सबसे एकाग्रचित्त होते हैं।

लोग आपको गढ़ते हैं – सोच-समझकर चुनिए

आपका परिवेश और आपके आसपास के लोग आपके मन पर गहरा असर डालते हैं। कहा गया है: “आप उन्हीं पाँच लोगों का औसत हैं जिनके साथ आप सबसे अधिक समय बिताते हैं।”

इसका मतलब है कि आपको अपना संगत बुद्धिमानी से चुनना चाहिए। अपने आप को सकारात्मक, प्रेरित और प्रगति चाहने वाले लोगों से घेरिए। यही लोग आपको आगे बढ़ाएंगे, प्रेरित करेंगे और आपके भीतर की क्षमता को जगाएंगे।परिवर्तन कभी दर्दनाक नहीं होता – प्रतिरोध ही दर्दनाक हैज्यादातर लोग परिवर्तन से डरते हैं।

लेकिन सच्चाई यही है: परिवर्तन कभी दर्दनाक नहीं होता। केवल परिवर्तन का प्रतिरोध ही दर्दनाक होता है। विकास के लिए परिवर्तन आवश्यक है। अगर आप वही करते रहेंगे जो हमेशा से करते आए हैं, तो नतीजे भी वही मिलेंगे।

प्रतिरोध करने की बजाय, परिवर्तन को अपनाइए। हर चुनौती आपके लिए बेहतर बनने का अवसर है।

जीनियस की तरह सोचिए

अंत में, असाधारण सफलता का राज़ यही है: जीनियस की तरह सोचिए। इसका मतलब है:

• बेहतर सवाल पूछना।

• समस्याओं को अवसर की तरह देखना।

• यह विश्वास रखना कि हर समस्या का हल है।

हर जीनियस जन्म से असाधारण नहीं होता; उन्होंने अपना मन साधा, आदतें गढ़ीं, ध्यान की रक्षा की, सही लोगों का चुनाव किया और परिवर्तन को अपनाया।

अंतिम विचार

आपका जीवन आपकी रोज़ की पसंद से बनता है।

मन ही आपकी शक्ति है – इसे साधें।

कर्म चिंतन पर भारी है – अभी शुरू करें।

आदतें सफलता बनाती हैं – इन्हें गढ़िए।

ध्यान ही जीतता है – इसकी रक्षा करें।

लोग आपको गढ़ते हैं – सोच-समझकर चुनिए।

और हमेशा याद रखिए:

परिवर्तन आपका शत्रु नहीं, बल्कि मित्र है।

जब आप इन सिद्धांतों के अनुसार जीते हैं, तो आप केवल जीते नहीं – आप खिलते हैं।

आप केवल सोचते नहीं – आप जीनियस की तरह सोचते हैं।

Motivational Appeal : Mind is Your Power- Train It For Success

Rajeev Verma

Mind is Your Power – Train It For Success. In today’s fast-paced world, your mind is your greatest power. How you train it determines the quality of your life, your success, and your happiness.

Most people underestimate the ability of the human mind, but in reality, a trained mind can conquer distractions, overcome challenges, and build extraordinary results.

Action Beats Overthinking – Start Now. Overthinking is one of the biggest obstacles to growth. You keep waiting for the “perfect moment” to begin, and in the process, you lose valuable time. Remember this powerful truth: Action beats overthinking. Start now. Even small steps taken today can create massive transformation in your future.

Instead of waiting for motivation, let action create momentum.

Habits Create Success – Build Them. Success is never the result of one big event; it is built through consistent habits. Whether it’s reading daily, exercising, or focusing on your goals, habits define your destiny.

Good habits = growth.

Bad habits = downfall.

So, focus on building small but strong habits every day. Over time, these habits compound and lead you toward long-term success.

Focus Wins – Protect It

We live in the era of distractions. Notifications, social media, and constant noise steal your attention. But here’s the truth: Focus wins – protect it.

# Guard your focus as if it is your most valuable treasure.

# Eliminate distractions that don’t serve your purpose.

# Use your energy on what truly matters.

# Great minds are not the busiest minds; they are the most focused minds.

People Shape You – Choose Wisely. Your environment and the people around you.

# Influence your mindset more than you realize.

# The saying goes: “You are the average of the five people you spend the most time with.” That means you must choose your circle wisely.

# Surround yourself with positive, driven, and growth-oriented individuals. They will push you forward, inspire you, and help you reach your true potential.

Change is Never Painful – Resistance to Change Is

Most people fear change. But here’s the reality: Change is never painful. Only the resistance to change is painful. Growth demands change. If you keep doing the same things, you’ll keep getting the same results.

Instead of resisting, embrace change. Every challenge is an opportunity to evolve into a better version of yourself.

Think Like a Genius

Finally, the secret to extraordinary success is simple: Think like a genius. That means: Asking better questions.

# Looking at problems as opportunities.

# Believing that there is always a way forward.

# Every genius wasn’t born extraordinary; they trained their mind, built habits, protected their focus, chose the right people, and embraced change.

Final Thoughts

Your life is shaped by the choices you make daily.

  • Mind is your power – train it.
  • Action beats overthinking – start now.
  • Habits create success – build them.
  • Focus wins – protect it.
  • People shape you – choose wisely.

And always remember: change is your friend, not your enemy.

When you live by these principles, you don’t just survive—you thrive.

You don’t just think—you Think Like a Genius.

मन ही राम, मन ही रावण : एक विचारात्मक निबंध

राजीव वर्मा

आज २-अक्तूबर-२०२५ दशहरा पर्व पर विशेष लेख।

मानव जीवन में सबसे बड़ी शक्ति यदि किसी की है, तो वह है “मन”। मन ही वह साधन है जिसके सहारे मनुष्य देवत्व को प्राप्त कर सकता है और वही मन यदि विकारों में डूब जाए, तो राक्षस भी बन सकता है।

इसी सत्य को अभिव्यक्त करती पंक्तियाँ हैं –“मन हारा तो रावण है, मन जीता तो राम।”मन का द्वंद्वहमारे भीतर निरंतर देवासुर संग्राम चलता रहता है। यह संग्राम बाहर के शस्त्रों से नहीं, बल्कि विचारों और भावनाओं से होता है। जब मन में लोभ, मोह, क्रोध और अहंकार का उदय होता है, तब वही मन “रावण” बन जाता है। और जब मन संयम, त्याग, करुणा और धर्म की ओर अग्रसर होता है, तब वही “राम” के रूप में प्रकट होता है। इसीलिए संतों और ऋषियों ने कहा है कि सबसे बड़ा शत्रु बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर है।

मन ही कैकई, मन ही मंथरारामायण का उदाहरण देखें तो कैकई रानी और मंथरा दासी, दोनों का मूल कारण भी मन ही था।

मंथरा की कुंठा और कैकई का मोह, दोनों ने मिलकर राम को वनवास दिलाया। वास्तव में यह प्रसंग इस तथ्य को रेखांकित करता है कि यदि मन स्वार्थ और ईर्ष्या से भर जाए तो वह रिश्तों को भी कलुषित कर सकता है। यही कारण है कि मन को मैला होने से रोकना आवश्यक है, अन्यथा वही सत्यानाशी बन जाता है।

मन की अपार शक्तिमन का सकारात्मक रूप हमें अंगद और बजरंगबली की याद दिलाता है। अंगद ने अपने आत्मविश्वास के बल पर रावण की सभा में पाँव गाड़ दिए और कोई हिला न सका।

हनुमानजी ने अपने अडिग मनोबल से समुद्र लाँघा और लंका तक पहुँच गए। यह सब मन की शक्ति का परिचायक है। जब मन में श्रीराम का आश्रय हो, तो असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।अहंकार का अंतरावण जैसा ज्ञानी, शक्तिशाली और वीर भी अपने दंभी मन के कारण विनाश को प्राप्त हुआ। उसका अहंकार ही उसका सबसे बड़ा शत्रु था।

इसलिए कहा गया –“दंभी मन के रावण का जिस दिन होगा संहार,उस दिन जीवन में अवतरित होंगे श्रीराम।” आत्मनियंत्रण का महत्वमनुष्य के जीवन का वास्तविक लक्ष्य बाहरी शत्रुओं को जीतना नहीं, बल्कि अपने मन पर विजय प्राप्त करना है।

यदि मन को वश में कर लिया जाए तो जीवन सरल, शांत और सफल हो जाता है। योग और ध्यान इसी आत्मविजय की साधनाएँ हैं। मन जितना स्थिर और शुद्ध होगा, व्यक्ति का जीवन उतना ही उज्ज्वल होगा।

निष्कर्ष

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि मन ही मित्र है और मन ही शत्रु। यह राम भी बन सकता है और रावण भी। आवश्यकता केवल इसे साधने की है। यदि हम अपने मन को सकारात्मक दिशा दें, तो यह हमें उच्चतम शिखरों तक पहुँचा सकता है। परंतु यदि मन विकारों में डूब जाए, तो यही पतन का कारण बनता है। अतः जीवन का सबसे बड़ा साधना-पथ है – “मन जीतना”। क्योंकि सच है – मन जीता तो राम, मन हारा तो रावण।

Embracing Gratitude and the Colors of Life

Rajeev Verma

Happiness is something every human heart longs for, yet so often we search for it in places where it does not reside. We complain about the troubles we face, we compare ourselves with others, and we measure joy in terms of what we lack rather than what we have. But true happiness comes easier when we stop focusing on our problems and start being grateful for all the problems we don’t have.This simple shift in perspective has the power to transform our lives.

The Power of Gratitude

Gratitude is not just a polite “thank you.” It is a deeper sense of awareness, an acknowledgment that even in the midst of challenges, life has given us countless blessings. For example:If you are able to walk, be thankful you are not confined to a bed.If you have food to eat, be grateful that you are not hungry like millions of others.If you have people who love you, cherish them, for many are battling loneliness.When we begin counting the blessings we often take for granted, we realize how fortunate we are. Gratitude shifts our focus away from scarcity and directs it toward abundance. It nurtures peace in the present moment instead of fear about the future.

Life Is a Mixture of Colors

Life is not painted in one single shade. It is a canvas filled with multiple colors—each representing a different emotion, experience, or phase of our journey.

Bright colors like yellow and orange reflect joy, friendship, and positivity.

Soft shades like pastel blue or pink remind us of calmness, compassion, and tenderness.

Dark hues like grey or black often signify sorrow, loss, or uncertainty, but even they add depth and contrast to our life’s canvas.

Imagine a painting with only one color—it would be dull and lifeless. Similarly, if life were only about happiness and success, without struggles or challenges, it would lack meaning. Pain teaches us resilience, failure builds character, and hardships highlight the value of good times.

Appreciating the Vibrant Shades of Life

Each day offers us new shades to experience. Some days are filled with laughter and sunshine, while others bring storms and shadows. Instead of resisting the darker moments, we should learn to appreciate them, for they too are part of the grand design.

Celebrate success, but also honor the lessons that come from failure.Enjoy love and companionship, but also grow stronger through moments of solitude.

Cherish health and energy, but allow illness or fatigue to remind you of the fragility and preciousness of life.

When we appreciate all shades—whether bright or dark—we begin to see the bigger picture. Life becomes not a series of disappointments, but a masterpiece created from countless experiences.

The Art of Choosing What to Keep

Not every color will resonate with you, and that’s perfectly natural. Life gives us choices—to experience many things, but to carry forward only what nourishes us.

Keep the lessons, let go of the bitterness.Keep the love, release the hatred.

Keep the memories that inspire, let go of the ones that weigh you down.Like an artist carefully selecting the final touches on a painting, we too can choose what stays in our heart. By doing this, we create a personal masterpiece filled with hope, joy, strength, and wisdom.

Conclusion

Happiness is not about having a life free from problems—it is about seeing beyond them. By practicing gratitude for what we already have and appreciating the many shades of life, we learn to live more fully, more deeply, and more joyously.

Life is a canvas, and we are the artists. Complaints and negativity will blur its beauty, while gratitude and appreciation will bring out its vibrant colors. So the next time you feel overwhelmed, pause and look around—acknowledge the problems you don’t have, appreciate the blessings you do have, and embrace every shade life offers.

That is where true happiness lives.

History of Red Light Area in India

Rajeev Verma

When British arrived in India, India was sexually more liberal than Europe. Heterosexual and homosexual relations were common, open and celebrated in poetry and paintings. Concubines were a common phenomenon practiced by all religious and ethnic groups. In contrast, there was quite strict sexual repression in Victorian England. There are two aspects of sexual relations; one relating to British soldiers and second British officers. In 18th & 19th century India, prostitution was legal and well-regulated in British controlled India. In 1850s, there were 75 military districts and in every district prostitution was supervised by authorities. Doctors of Indian Medical Service (IMS) were responsible for regulating brothels. All prostitutes were registered, minimum age for prostitutes was fifteen and women were provided with their own living quarters or tents that were regularly inspected.

Some establishments were quite large and a brothel in Lucknow had fifty five rooms. Prostitutes infected with sexually transmitted diseases were removed and not allowed to practice their trade until recovered. Both native and European soldiers used these bazaars; however sepoys were discouraged to visit those prostitutes preferred by European soldiers. Most British soldiers were from lower strata of the society and were not held to the standard of a British officer. British soldiers visited prostitutes more often than sepoys. One reason was that British soldiers were not married while sepoys were usually married men. These bazaars were called ‘lal bazaars’ (red streets, like Calcutta’s Lalbazar). Both heterosexual and homosexual relations were common. British regiments spent several years in India and many a times children were born of such relationships. Special houses and schools were assigned as early as eighteenth century for these children (e.g. Orphangunge Market Khidderpore.

As far British officers were concerned, the phenomenon was common in 18th and early 19th century. However, nature of sexual relations was different. Officers married among the elite of India. Most Company employees both civil and military joined the service at the age of sixteen. Several factors such as very young age, prolonged stay of decades in India with very limited home leave, posting to a far off stations with very little contact with Europeans and influence of native consorts and wives resulted in complete ‘nativization’ of some of these Englishmen. In late seventeenth and eighteenth century, many Europeans kept native concubines as well as legally married local women both Muslim and Hindu. These women were kept in a separate house named Bibi Ghar. The practice was common enough that surviving wills from Bengal in the years 1780-85 show that one in three record bequest to Indian wives and companions. Some Englishmen retained their own religion and culture while others converted to Hinduism or Islam and became completely ‘native’. Some children of such unions roamed in two worlds comfortably while others drifted to one side. Some were educated in England and finally settled there while others grew up as natives in India. Few of the off springs of these unions even became celebrated poets and scholars of Urdu and Persian (Farasu, Shaiq, Sufi etc.).

William Darlymple has documented these liasions in detail in his excellent works. British Resident in Delhi Sir David Ochterlony lived like an oriental nawaband, had thirteen native consorts; the most famous one being Mubarak Begum. British Resident to the court of Marhattas in Pune General William Palmer married Begum Fayze Bakhsh of a prominent Delhi family. British Resident at Hyderabad Lieutenant Colonel James Achilles Kirkpatrick married Khair un Nissa; great niece of the Prime Minister of Hyderabad. James’s half- brother William lived with his consort named Dhoolaury Bibi.

Major General Charles Stuart had practically became a Hindu and lived with his Hindu wife. He was nicknamed ‘Hindu Stuart’ and ‘General Pandit’. He was buried in Christian cemetery in Calcutta but with his Hindu gods. The commander of British troops in Hyderabad Lieutenant Colonel James Darlymple married the daughter of Nawab of Masulipatam; Mooti Begum. William Linnaeus Gardner married the daughter of Nawab of Cambay Begum Mah Manzel un Nissa. After freelance service with Marhattas and Nizam of Hyderabad, he raised irregular cavalry regiment named Gardner’s Horse for East Company. This regiment still survives as 2ndLancers of Indian army. Gardner lived happily on his wife’s estate near Agra (Mah Manzal was adopted daughter of Mughal Emperor Akbar Shah II). His son James married Begum Malka Humanee; a niece of Mughal Emperor (she was also sister in law of Nawab of Lucknow). William’s granddaughter was married to a Mughal prince Mirza Anjum Shikoh Bahadar. Another soldier of fortune Hercules Skinner married a Hindu Rajput lady and several children were born from this union (she committed suicide when Skinner tried to take their daughters out of purdah to be educated and married to Englishmen). Their son James Skinner raised the famous irregular cavalry regiment Skinners Horse nick named ‘Yellow Boys’. This is now the senior most cavalry regiment of Indian army; Ist Lancers. James had fourteen Hindu and Muslim wives and consorts. He lived like a Muslim but later in life regularly read Bible and buried in St. James Church in Delhi.

Near the end of 18th century and early 19th century, Company laws, rise of Evangelical Christian activity and steady flow of European ladies in India severely restricted such encounters and by the middle of nineteenth century, it was a rare phenomenon. By the middle of nineteenth century, this trend had almost died down.

One of the last story of such love affair is Colonel Robert Warburton of Bengal Artillery and Shah Jahan Begum; a niece of Amir Dost Muhammad Khan of Afghanistan. Warburton fought in First Anglo-Afghan war (1839-42) and was captured by Afghans. He fell in love with Shah Jahan Begum and married her. The offspring of this union was Robert Warburton; born in a fort near Gandamak in 1842 when his mother was on the run. He was fluent in English, Persian and Pushtu and served as Political Agent of Khyber Agency for eighteen years. In a strange irony, Warburton senior was born in Ireland and buried in Christian Cemetery of Peshawar while Warburton Junior was born in Afghanistan and buried in Brompton cemetery near London.

British were apprehensive about Indians interacting with English women. In late 1800 and early 1900s when qualified Indian doctors were admitted to Indian Medical Service (IMS), British were uncomfortable posting them to positions where they had to examine English women.

The issue of relationship of Indians with English women rose during Great War. In Great War, Indian soldiers came in contact with European society when they fought on Western front. Some Indians especially Sikhs and Pathans had sexual relations with local French women; including formal marriage. British were alarmed and they were not allowed to bring these women back to India. My sister-in-law’s grandfather Khan Zaman Khan Babar IDSM; a Pathan married a French lady when he was in France. Family joke is that there may be some lost cousins roaming around in France. Some Pathans (mainly trans-frontier Afridis) who deserted to Germans married German women and a handful brought back these women to tribal areas. Khyber political Agent files kept track of these folks. One Afridi stayed back in Germany after the war and was running a tobacco shop in a German town.

Nomadic Suleman Khel Powindas took their camels to Australia for laying telegraph, railway and roads. Some came back with Australian women. One such indomitable Australian lady became the head of_Tthemiri_ (large roaming settlements that traveled between Central Asia and India) after the death of her husband. She would be sitting on the camel in front of the caravan and greeting British scout officers in heavy Australian accent on entering the tribal territory.

Some Indian princes had married English women in 20thcentury. Indianization of officer corps increased social contact with English society. In mid 1930s when English women started to use swimming pools, presence of Indian officers in clubs watching scantily clad Englishwomen was not welcome. Second issue was related to dancing. Formal dancing was part of officialdom. Very few Indian officers were Anglicized as well as good at ballroom dancing to ask Englishwomen for a dance. General ‘Timmy’ Thimayya (4/19 Hyderabad Regt) was probably an exception in this regard.

The problem with Indian officers was that they wanted equal treatment including right to attend exclusive clubs and swim and dance with Englishwomen if they agreed but not willing to bring their own women. A number of Indian officers kept their women in ‘purdah’. This applied to both Muslim and non-Muslim officers especially high caste Rajput officers. Even the most liberal Indian officers with educated wives were not comfortable with dancing as the couple may not be good at it or aware of getting chastised by their own communities for allowing their women to dance with English officers. Around Second World War, both societies have seen significant changes where many Indian officers married Englishwomen.

Lovers of boys got themselves posted to PIFFERs and scouts to share Pathan passion of homosexual liaison. Officers posted to regiments with significant Pathan element or scouts faced unique headaches. There may be a case where a young recruit would put a bullet in the head of a randy old Subedar for unwanted advances. Discipline problem when Subedar giving special favors to his ‘young lad’ by keeping him at headquarters rather than sending him to remote posts and giving him easy duties and giving him excuse from fatigue duties. At other time, two young sepoys would insist that they should be posted together for night sentry duty or to an outpost where they would be together for days.

लाल बाजार

राजीव वर्मा

जब ब्रिटिश भारत आए, तब भारत यौन दृष्टि से यूरोप से कहीं अधिक उदार था। विषमलैंगिक और समलैंगिक संबंध सामान्य थे, खुले रूप से स्वीकारे जाते थे और कविताओं व चित्रों में मनाए जाते थे। रखैलें (कंक्यूबाइन्स) सभी धार्मिक और जातीय समूहों में आम प्रथा थीं। इसके विपरीत, विक्टोरियन इंग्लैंड में यौन दमन काफी कठोर था। यौन संबंधों के दो पहलू थे – एक ब्रिटिश सैनिकों से जुड़ा और दूसरा ब्रिटिश अधिकारियों से।

18वीं और 19वीं शताब्दी के भारत में वेश्यावृत्ति कानूनी और सुव्यवस्थित थी। 1850 के दशक में 75 सैन्य ज़िले थे और प्रत्येक ज़िले में वेश्यावृत्ति पर अधिकारियों का नियंत्रण था। इंडियन मेडिकल सर्विस (IMS) के डॉक्टर वेश्यालयों के निरीक्षण के ज़िम्मेदार थे। सभी वेश्याओं का पंजीकरण होता था, न्यूनतम आयु 15 वर्ष तय थी और उन्हें अपने रहने के लिए अलग घर या तंबू दिए जाते थे जिनका नियमित निरीक्षण किया जाता था।

कुछ संस्थान बहुत बड़े थे – जैसे लखनऊ का एक वेश्यालय जिसमें 55 कमरे थे। यौन रोग से ग्रस्त वेश्याओं को हटा दिया जाता था और स्वस्थ होने तक उन्हें काम करने की अनुमति नहीं थी। इन ‘बाज़ारों’ का उपयोग भारतीय और यूरोपीय दोनों सैनिक करते थे; हालांकि, सिपाहियों को उन वेश्याओं के पास जाने से हतोत्साहित किया जाता था जिन्हें यूरोपीय सैनिक पसंद करते थे। अधिकांश ब्रिटिश सैनिक समाज के निम्न वर्ग से थे और उन्हें ब्रिटिश अधिकारियों के मानकों से नहीं आँका जाता था। ब्रिटिश सैनिक सिपाहियों की तुलना में वेश्याओं के पास अधिक जाते थे। इसका कारण यह था कि अधिकांश ब्रिटिश सैनिक अविवाहित थे जबकि सिपाही प्रायः विवाहित होते थे। इन बाज़ारों को ‘लाल बाज़ार’ कहा जाता था (जैसे कलकत्ता का लालबाज़ार)। यहाँ विषमलैंगिक और समलैंगिक दोनों प्रकार के संबंध आम थे। ब्रिटिश रेजीमेंटें भारत में कई वर्षों तक रहती थीं और इन संबंधों से कई बार बच्चे भी जन्म लेते थे। इन बच्चों के लिए विशेष घर और स्कूल भी 18वीं सदी से ही बनाए गए थे (जैसे ऑर्फ़नगंज मार्केट, खिड़डरपोर)।”

ब्रिटिश अधिकारियों की स्थिति कुछ अलग थी। 18वीं और शुरुआती 19वीं शताब्दी में यह प्रथा आम थी। लेकिन संबंधों का स्वरूप अलग था। अधिकारी भारतीय उच्चवर्ग में विवाह करते थे। अधिकांश कंपनी के कर्मचारी – नागरिक और सैन्य – 16 वर्ष की आयु में सेवा में शामिल होते थे। बहुत कम उम्र, दशकों तक भारत में रहना, यूरोपियों से कम संपर्क, दूरदराज़ तैनाती और देशी पत्नियों व रखैलों के प्रभाव के कारण कई अंग्रेज पूरी तरह ‘देशी’ हो जाते थे।

17वीं सदी के अंत और 18वीं सदी में कई यूरोपीय पुरुषों ने देशी स्त्रियों को रखैल बनाया और कई ने विधिवत विवाह भी किया – मुस्लिम और हिन्दू दोनों से। इन महिलाओं को अलग मकान ‘बीबी घर’ में रखा जाता था। यह प्रथा इतनी आम थी कि 1780-85 के बंगाल के वसीयतनामों में हर तीन में से एक में भारतीय पत्नी या साथी का ज़िक्र मिलता है। कुछ अंग्रेज अपनी धर्म-संस्कृति पर अड़े रहे जबकि कुछ हिन्दू या मुस्लिम बन गए। इनके बच्चे कभी दो दुनियाओं में सहजता से रहते तो कभी एक ओर बहक जाते। कुछ की शिक्षा इंग्लैंड में हुई और वे वहीं बस गए, जबकि कुछ भारत में देशी माहौल में पले-बढ़े। कुछ तो उर्दू-फ़ारसी के प्रसिद्ध कवि और विद्वान भी बने (फ़रसु, शाईक, सूफ़ी आदि)।

विलियम डैलरिम्पल ने इन संबंधों का विस्तार से वर्णन किया है। दिल्ली के ब्रिटिश रेज़िडेंट सर डेविड ऑक्टरलोनी 13 देशी रखैलों के साथ नवाबों जैसी ज़िंदगी जीते थे; इनमें सबसे प्रसिद्ध मुबारक बेगम थीं। पुणे दरबार में ब्रिटिश रेज़िडेंट जनरल विलियम पामर ने दिल्ली के नामी घराने की फ़ायज़े बख़्श बेगम से विवाह किया। हैदराबाद के ब्रिटिश रेज़िडेंट लेफ्टिनेंट कर्नल जेम्स अकीलिस किर्कपैट्रिक ने प्रधानमंत्री की भतीजी ख़ैरुन-निस्सा से शादी की। जेम्स का सौतेला भाई विलियम अपनी संगिनी धूलौरी बीबी के साथ रहता था।

मेजर जनरल चार्ल्स स्टुअर्ट ने तो पूरी तरह हिन्दू जीवन अपना लिया था और अपनी हिन्दू पत्नी के साथ रहते थे। उन्हें ‘हिन्दू स्टुअर्ट’ और ‘जनरल पंडित’ कहा जाता था। उनकी कब्र कोलकाता के ईसाई कब्रिस्तान में है लेकिन साथ में हिन्दू देवी-देवता भी रखे गए। हैदराबाद की सेना के कमांडर लेफ्टिनेंट कर्नल जेम्स डैलरिम्पल ने मसूलिपट्टनम के नवाब की बेटी मूटी बेगम से विवाह किया। विलियम लिनियस गार्डनर ने कंबे के नवाब की बेटी मह मंज़लुन्निसा बेगम से शादी की। उन्होंने ‘गार्डनर हॉर्स’ नामक घुड़सवार दस्ता खड़ा किया जो आज भी भारतीय सेना की 2nd लैंसर्स रेजीमेंट है। गार्डनर अपनी पत्नी की जागीर पर आगरा के पास रहते थे। उनके बेटे जेम्स ने मुग़ल सम्राट की भतीजी मलका हुमानी बेगम से विवाह किया। गार्डनर की पोती की शादी मुग़ल राजकुमार मिर्ज़ा अंजुम शिकोह बहादुर से हुई।

हर्क्युलिस स्किनर ने राजपूत महिला से विवाह किया। जब स्किनर ने बेटियों को परदे से निकालकर अंग्रेजों से शादी करवाने और पढ़ाने की कोशिश की तो उनकी पत्नी ने आत्महत्या कर ली। उनके बेटे जेम्स स्किनर ने प्रसिद्ध ‘स्किनर्स हॉर्स’ (येलो बॉयज़) खड़ा किया। यह आज भारतीय सेना की सबसे वरिष्ठ घुड़सवार रेजीमेंट है – 1st लैंसर्स। जेम्स की 14 हिन्दू और मुस्लिम पत्नियाँ व रखैलें थीं। वे मुस्लिम ढंग से रहते थे पर जीवन के अंत में बाइबिल पढ़ते थे और दिल्ली के सेंट जेम्स चर्च में दफ़न हुए।

18वीं सदी के अंत और 19वीं सदी की शुरुआत में कंपनी कानून, ईसाई मिशनरियों की बढ़ती सक्रियता और यूरोपीय महिलाओं के भारत आगमन ने इस प्रथा को लगभग समाप्त कर दिया। 19वीं सदी के मध्य तक यह परंपरा लगभग खत्म हो चुकी थी।

इस तरह के संबंधों की अंतिम कहानियों में से एक थी कर्नल रॉबर्ट वॉर्बर्टन और शाहजहाँ बेगम की। रॉबर्ट बंगाल आर्टिलरी में थे और पहले अफ़ग़ान युद्ध (1839-42) में अफ़ग़ानों के क़ैदी बने। उन्होंने शाहजहाँ बेगम से विवाह किया। उनके बेटे रॉबर्ट वॉर्बर्टन का जन्म 1842 में गंडामक के क़िले में हुआ जब उनकी माँ भागती फिर रही थीं। वे अंग्रेज़ी, फ़ारसी और पश्तो में निपुण थे और 18 वर्ष तक ख़ैबर एजेंसी के राजनीतिक एजेंट रहे। विडंबना यह रही कि वॉर्बर्टन सीनियर का जन्म आयरलैंड में हुआ और वे पेशावर में दफ़न हुए जबकि वॉर्बर्टन जूनियर का जन्म अफ़ग़ानिस्तान में हुआ और वे लंदन के ब्रॉम्पटन कब्रिस्तान में दफ़न हुए।

ब्रिटिश भारतीयों और अंग्रेज़ औरतों के संबंधों से चिंतित रहते थे। 1800 के दशक के अंत और 1900 की शुरुआत में जब भारतीय डॉक्टरों को IMS में लिया गया तो उन्हें अंग्रेज़ औरतों की जाँच-पड़ताल के काम पर लगाने में ब्रिटिश असहज थे।

पहला विश्व युद्ध इस मामले में महत्वपूर्ण रहा। जब भारतीय सैनिक पश्चिमी मोर्चे पर लड़े तो यूरोपीय समाज से उनका संपर्क हुआ। कुछ सिख और पठान सैनिकों ने फ्रांसीसी औरतों से यौन संबंध बनाए और कुछ ने औपचारिक विवाह भी किया। ब्रिटिश चिंतित हुए और इन महिलाओं को भारत लाने की अनुमति नहीं दी। मेरे साले के दादा खान ज़मान खान बाबर IDSM, एक पठान, ने फ्रांस में एक फ़्रेंच महिला से शादी की थी। मज़ाक यह है कि शायद आज भी फ्रांस में कुछ खोए रिश्तेदार घूम रहे हों। कुछ पठानों (विशेषकर सरहदी अफ़रीदियों) ने जर्मनों के साथ जाकर जर्मन औरतों से विवाह किया और कुछ उन्हें लेकर भारत लौटे। एक अफ़रीदी जर्मनी में ही बस गया और तंबाकू की दुकान चलाने लगा।

सुलेमान खे़ल पोविंदे अपने ऊँट ऑस्ट्रेलिया ले गए – टेलीग्राफ, रेलवे और सड़क बिछाने के लिए। कुछ ऑस्ट्रेलियाई औरतों को वापस लाए। एक साहसी ऑस्ट्रेलियाई महिला तो पति की मौत के बाद पूरे थमिरी (भ्रमणशील क़बीलाई कारवाँ) की मुखिया बन गई। वह ऊँट पर आगे बैठती और ब्रिटिश स्काउट अधिकारियों को भारी ऑस्ट्रेलियाई लहजे में नमस्ते करती।

20वीं सदी में कुछ भारतीय राजकुमारों ने अंग्रेज़ औरतों से विवाह किए। भारतीय अधिकारियों की संख्या बढ़ने से अंग्रेज़ समाज से संपर्क बढ़ा। 1930 के दशक में जब अंग्रेज़ महिलाएँ स्विमिंग पूल में आने लगीं, तो क्लबों में भारतीय अधिकारियों की उपस्थिति ब्रिटिशों को असहज लगती थी। दूसरा मुद्दा नृत्य का था। औपचारिक नृत्य ब्रिटिश समाज का हिस्सा था। बहुत कम भारतीय अधिकारी इतने आंग्लीकृत और नृत्य में दक्ष थे कि अंग्रेज़ औरतों को नृत्य के लिए आमंत्रित कर सकें। जनरल ‘टिम्मी’ थिम्मैया (4/19 हैदराबाद रेजीमेंट) अपवाद कहे जा सकते हैं।

भारतीय अधिकारियों की समस्या यह थी कि वे समान व्यवहार चाहते थे – क्लबों में प्रवेश, अंग्रेज़ औरतों से नृत्य और तैराकी करने का अधिकार – लेकिन अपनी स्त्रियों को नहीं लाते थे। कई अधिकारी अपनी स्त्रियों को पर्दे में रखते थे। यह मुस्लिम और उच्च जाति के हिन्दू राजपूत अधिकारियों पर अधिक लागू होता था। यहाँ तक कि उदार भारतीय अधिकारी भी, जिनकी पत्नियाँ पढ़ी-लिखी थीं, सहज नहीं थे क्योंकि नृत्य में अनाड़ी होने या समाज द्वारा आलोचना का डर था। द्वितीय विश्व युद्ध तक आते-आते समाज बदल चुका था और कई भारतीय अधिकारियों ने अंग्रेज़ महिलाओं से विवाह किए।

लड़कों के प्रेमी खुद को पिफ़र्स और स्काउट्स में तैनात करवाते ताकि पठानों की समलैंगिक प्रवृत्ति का आनंद ले सकें। इन रेजीमेंटों में अफसरों को खास समस्याएँ झेलनी पड़ती थीं। कभी कोई जवान unwanted advances पर अपने सूबेदार को गोली मार देता। कभी सूबेदार अपने ‘नौजवान प्रिय’ को कठिन ड्यूटी से बचाकर मुख्यालय में रखता। कभी दो जवान ज़िद करते कि उन्हें साथ ही रात की चौकी पर या किसी दूर पोस्ट पर लगाया जाए ताकि वे अकेले रह सकें।

सारांश

ब्रिटिश के आगमन से पहले भारत यौन दृष्टि से बहुत उदार था। विषमलैंगिक व समलैंगिक संबंध आम थे और वेश्यावृत्ति कानूनी व संगठित रूप से चलती थी। ब्रिटिश सेना के लिए “लाल बाज़ार” बने थे, जिनकी निगरानी इंडियन मेडिकल सर्विस करती थी।18वीं और शुरुआती 19वीं सदी में कई ब्रिटिश अधिकारी भारतीय महिलाओं से विवाह या सहजीवन करते थे। इनके लिए “बीबी घर” बनाए जाते थे और वसीयतनामों में भारतीय पत्नियों का उल्लेख मिलता है। कई अंग्रेज अधिकारी भारतीय संस्कृति, धर्म और रीति-रिवाजों में पूरी तरह रच-बस गए। इनके संतानों में कुछ प्रसिद्ध कवि और विद्वान बने।विलियम डैलरिम्पल जैसे इतिहासकारों ने डेविड ऑक्टरलोनी, किर्कपैट्रिक, गार्डनर, स्किनर आदि अंग्रेज़ अधिकारियों के भारतीय पत्नियों और रखैलों के साथ जीवन का विस्तृत वर्णन किया है। धीरे-धीरे कंपनी कानूनों, ईसाई मिशनरियों की सक्रियता और यूरोपीय महिलाओं के भारत आने से यह प्रथा घट गई और 19वीं सदी के मध्य तक लगभग समाप्त हो गई।प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय सैनिक यूरोप गए और फ्रांसीसी व जर्मन महिलाओं से विवाह या संबंध बनाए, परंतु ब्रिटिश सरकार ने इन्हें भारत लाने की अनुमति नहीं दी। पठान और ऑस्ट्रेलिया में काम करने वाले भारतीयों ने भी विदेशी महिलाओं से विवाह किए।20वीं सदी में भारतीय अधिकारियों की संख्या बढ़ी तो अंग्रेज समाज से संपर्क भी बढ़ा। क्लब, नृत्य और स्विमिंग पूल जैसे सामाजिक स्थलों पर बराबरी की माँग ने नए तनाव पैदा किए। द्वितीय विश्व युद्ध तक पहुँचते-पहुँचते कई भारतीय अधिकारियों ने अंग्रेज़ महिलाओं से विवाह कर लिए।साथ ही पठान रेजीमेंटों और स्काउट्स में समलैंगिक संबंध भी प्रचलित रहे, जिससे अनुशासन संबंधी समस्याएँ पैदा होती थीं।

👉 सार में, ब्रिटिश काल में भारत में यौन संबंधों की परंपरा शुरू में बेहद खुली और घुली-मिली थी, परंतु 19वीं सदी के मध्य के बाद धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक कारणों से इस पर रोक लगनी शुरू हुई।

✨ कविता ✨ माँ–पापा का घर

राजीव वर्मा

निमंत्रण की ज़रूरत नहीं वहाँ जाने को,

ना ही बताने की कि कब लौट रहे हो।

कपड़े, चेहरा, मन का बोझ – कुछ मायने नहीं,

वो घर तो बस आपके आने को बना है।

दरवाज़ा सदा खुला, महक बचपन की सदा गगन में तैरती,

दो आँखें चौखट पर टिकी रहतीं—

बस ये सुनने को कि कोई आ रहा है।

वो घर… जहाँ आप लौटते हैं बिना लौटे हुए,

जहाँ खाना बिना माँगे परोसा जाता है,

जहाँ मना करने पर भी प्यारी डाँट मिलती है।

जहाँ आपकी चुप्पी समझ ली जाती है,

और आपके शब्द रत्नों की तरह संजोए जाते हैं।

वहाँ माँ की नज़र अब भी उतनी ही कोमल है,

वहाँ पापा अब भी मजबूत बनने का अभिनय करते हैं,

पर उनकी आँखें… सब कह देती हैं,

जब आपको चौखट पर खड़ा देखते हैं।

पर एक दिन—वो घर यूँ ही नहीं रहेगा।

उसके मालिक दरवाज़ा खोलने को नहीं होंगे,

और तब समझोगे कि घर दीवारों का नाम नहीं,

बल्कि दो दिलों की धड़कन का नाम है।

उस दिन, सारी दौलत, सारे महल, कुछ मायने नहीं रखेंगे।

आप बस यही चाहेंगे—एक और झलक,

एक और आलिंगन, एक और बार वो डाँट, वो मुस्कान।

इसलिए अगर आज भी वो घर आपका इंतज़ार कर रहा है,

तो देर मत कीजिए।

जाइए, गले लगिए, हँसिए, सुनिए,

कहानियों को दोहराइए, और माँ-पापा की आँखों में चमक भरिए।

क्योंकि माँ–पापा का घर शाश्वत नहीं है,

पर उनका दिया हुआ प्यार…आपके भीतर हमेशा जियेगा।

Dad and Mom’s House : The Home That Lives Beyond Walls

– Rajeev Verma

You don’t need an invitation. You don’t have to call in advance. It doesn’t matter how you look, what you wear, or what storm is raging in your heart. Because that house is always there…Its door is forever ready to open, its walls soaked with memories, and its air filled with that comforting aroma that carries you back to the safest place on earth—your childhood.

It is the only house you walk into as if you had never left. Where the food finds you before you ask for it, and if you refuse to eat, you are lovingly scolded. Where silence is never questioned, and every word you do speak is treasured like a blessing. In that home, time doesn’t move the way it does outside.

Mom still sees the little child in you, no matter your age. Dad still acts strong and stoic—but his eyes betray the tenderness he hides when he sees you at the door. And yet, one day… without warning, that home will vanish. Not because the house is sold, but because its heartbeat—your parents—will no longer be there to open the door.

When that happens, no mansion, no luxury, no success will ever feel the same. You’ll realize that home was not built of bricks and walls, but of two people who gave you unconditional love. So if you still have that blessing… cherish it. Go back while you can.Hug tighter.

Listen longer. Sit at the dinner table, not in a rush, but with gratitude. Laugh at their little stories, even if you’ve heard them a hundred times. Because those stories will echo in your heart long after their voices fade.

One day, like me, you may stand in front of a door that no longer opens, and you’ll wish for just one more moment, one more glance, one more embrace. But wishes cannot unlock the silence of absence.

So today… not tomorrow, not someday—Today. Go home. Because dad and mom’s house is not eternal. But the love you carry from it will be—if you choose to live it now.

✨ कविता ✨ अब तो गीत गुनगुना लेते हैं

राजीव वर्मा

सन्नाटे में धड़कनों की धुन बना लेते हैं,

टूटे सपनों की राख से,

कुछ उम्मीदों के परचम जला लेते हैं।

आना ज़िंदगी, ओ ज़िंदगी…

साँसों के सूखे समंदर में थोड़ी नमी भर दो,

बिखरे रास्तों पर

किसी चिराग़ की लौ रख दो।

मेरे घर आना…

वो घर जो ईंट-पत्थर से नहीं बना,

वो घर जो मोहब्बत की मिट्टी से रचा,

जहाँ हर कोना दुआओं की खुशबू है,

जहाँ हर दीवार इंतज़ार में खड़ी है।

मेरे घर का छोटा सा इतना पता है

कि नक़्शे में दर्ज नहीं मिलेगा कहीं,

बस दिल की गलियों से गुज़रना,

और तन्हाई की चौखट पे ठहरना।

मेरे घर के आगे मोहब्बत लिखा है,

इबारत जो बारिश से भीगती नहीं,

जिसे आँधी मिटा नहीं सकती,

जिसे वक़्त की धूल ढँक नहीं सकती।

हैं दीवारें गुम, और छत भी नहीं है,

खुला है आसमान का हर टुकड़ा,

सितारों की चादर ओढ़ लेता हूँ रात में,

और चाँद को दिया बनाकर रख देता हूँ।

मेरे घर का दरवाज़ा कोई नहीं है…

तुम्हारी चाहत ही मेरी दस्तक बने,

तुम्हारा नाम ही मेरी चाबी हो,

और तुम्हारा होना ही मेरी हिफ़ाज़त।

तो…आना ज़िंदगी… ओ ज़िंदगी…

क्योंकि बिन तेरे ये ठिकाना अधूरा है,

तेरे बिना हर सुर बेसुरा है।

तू आएगी तो हवाओं में गुनगुनाहट होगी,

तू आएगी तो सन्नाटे में सरगम होगी।

अब तो गीत गुनगुना लेते हैं…

पर सच तो ये है कितू आए,

तभी ये गुनगुनाहट मुकम्मल होगी।

✨ कविता ✨ग़ज़ल

राजीव वर्मा

अब तो गीत गुनगुना लेते हैं,
ज़ख़्म दिल के भी मुस्कुरा लेते हैं।

आना ज़िंदगी, ओ ज़िंदगी, आना,
हम तिरे नाम से दुआ लेते हैं।

मेरे घर का छोटा सा इतना पता है,
राह में प्यार का दिया लेते हैं।

मेरे घर के आगे मोहब्बत लिखा है,
रात में चाँद को सदा लेते हैं।

हैं दीवारें गुम और छत भी नहीं है,
पर सितारों से आसरा लेते हैं।

मेरे घर का दरवाज़ा कोई नहीं है,
आहट-ए-यार से हवा लेते हैं।

तू जो आए तो रौशनी साथ लाए,
हम तो अंधेरों में जी लिया लेते हैं।

✨ कविता ✨ ज़िंदगी का सफर – ठहराव और सुकून की तलाश

राजीव वर्मा

अभी रूबरू भी नहीं हुआ मैं,

ए ज़िंदगी, तुझसे पूरी तरह।

आपाधापी और अंधी दौड़ की आंधी में,

तेरे असली लुत्फ़ को ढूंढता रहा,

पर न जाने क्यों तूदृश्य हो कर भी अदृश्य रही हर दफ़ा।

लोग कहते थे—ज़िंदगी एक अनमोल सफर है,

जिसमें ठहराव भी गीत है,

और रफ़्तार भी एक सुर।

मैंने धरती से पाताल तलक खोजा,

पर सुकून का नखलिस्तान कहीं न मिला।

अब समझ आता है,‘ठहर’ ही वो मंत्र था

जो जीने का सलीका सिखाता है।

पर पैरों की आदत है भागने की,

दिल की अदावत है न रुकने की।

रफ़्तार की हवाओं ने ठहराव की खुशबू छीन ली है।

चलो, अब थोड़ा मद्धिम हो लेते हैं,

तेज़ रफ्तार से मुक्ति पा लेते हैं।

ढूंढते हैं सुकून का नखलिस्तान,

जहां रूह को आराम मिले,

जहां हर साँस में अपनापन खिले।

वहीं के गिर्द आशियाना बना लेते हैं,

जहां सिर्फ़ हम और हमारी खामोशियाँ हों।

आह ज़िंदगी से अहा ज़िंदगी तक का सफर,

यूं ही तेरे संग तय करते हैं हम।

अब बाकी बचा हर लम्हा,

तेरी बाहों में सुकून ढूंढते हुए गुज़ारते हैं।

✨ कविता ✨ थोड़ा ठहर जा ऐ ज़िंदगी

  • राजीव वर्मा
    थोड़ा ठहर जा ऐ ज़िंदगी,
    ज़रा सांस तो लेने दे,
    तेरी भागती दौड़ में उलझकर,
    मुझे अपने आप से मिलने दे।

हर सुबह नई उम्मीदें लाती है,
हर शाम अधूरी थकान छोड़ जाती है,
तेरे सफ़र में बहुत कुछ पाया,
पर दिल अब भी सुकून को तरस जाता है।

तेरे इम्तिहान रोज़ नए होते हैं,
कभी आँसू, कभी मुस्कान से रोते हैं,
पर इस भीड़ में कहीं खो गया हूँ,
खुद की तलाश में अब भटक रहा हूँ।

ऐ ज़िंदगी, जरा रुककर तो देख,
मेरे सपनों का बोझ कम कर दे,
हर सवाल का कोई जवाब तो दे,
मेरे दिल की उलझनें साफ़ कर दे।

कभी तो सन्नाटा भी सुनने दे,
कभी तो ख़ुदा से जुड़ने दे,
कभी तो आईने में मैं दिखूँ,
कभी तो अपना सच जीने दे।

तेरे संघर्षों ने बहुत सिखाया है,
हौसले का मतलब समझाया है,
पर अब इक लम्हा चैन का भी चाहिए,
जहां दर्द नहीं, बस सुकून का साया है।

थोड़ा ठहर जा ऐ ज़िंदगी,
तेरी रफ़्तार बहुत तेज़ है,
मेरे अरमान अभी अधूरे हैं,
मेरे सफ़र के कुछ राज़ बाकी हैं।

असम का अनोखा ‘तुलोनिया बिया’ उत्सव, जहाँ लड़की के पहले पीरियड को शादी जैसी धूमधाम से मनाया जाता है। जानें इसकी परंपरा और महत्व।

राजीव वर्मा

भारत की विविध संस्कृति में हर क्षेत्र की अपनी-अपनी परंपराएँ और अनोखी रीति-रिवाज हैं। असम राज्य में भी ऐसी ही एक अनोखी परंपरा देखने को मिलती है, जिसे “तुलोनिया बिया” कहा जाता है। यह उत्सव तब मनाया जाता है जब किसी लड़की को पहली बार माहवारी (पीरियड) आती है।

आमतौर पर भारत में पीरियड को लेकर समाज में चुप्पी और झिझक देखी जाती है, लेकिन असम की यह परंपरा इसे खुशी, सम्मान और उत्सव के रूप में मनाने का सुंदर उदाहरण है।

तुलोनिया बिया क्या है ?

“तुलोनिया बिया” असम का एक पारंपरिक उत्सव है, जिसमें लड़की के पहले पीरियड (Menarche) को शादी जैसा भव्य रूप देकर मनाया जाता है। यहाँ लड़की को दुल्हन की तरह सजाया जाता है, घर में मेहमान बुलाए जाते हैं और पूरा माहौल एक विवाह समारोह जैसा होता है।

यह परंपरा केवल उत्सव मनाने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह एक सामाजिक और शैक्षिक पहल भी है, जहाँ लड़की को महिला बनने की प्रक्रिया, प्रजनन स्वास्थ्य और आने वाली जिम्मेदारियों के बारे में सिखाया जाता है।

उत्सव की रस्में और विधि

तुलोनिया बिया की रस्में अलग-अलग क्षेत्रों में थोड़े बदलाव के साथ मनाई जाती हैं, लेकिन इसकी मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं:

1. लड़की को अलग कमरे में रखा जाता है। जब लड़की को पहली बार पीरियड आता है, तो उसे कुछ दिनों तक अलग रखा जाता है। इस दौरान उसे आराम करने और अपने शरीर में हो रहे बदलाव को समझने का समय दिया जाता है।

2. दुल्हन की तरह सजाना । खास दिन पर लड़की को पारंपरिक असमिया परिधान और गहनों से सजाया जाता है। उसे दुल्हन की तरह तैयार करके उत्सव में प्रस्तुत किया जाता है।

3. शादी जैसे आयोजन । घर में मेहमान, रिश्तेदार और पड़ोसी बुलाए जाते हैं।संगीत, नृत्य और दावत का आयोजन किया जाता है। लोग आशीर्वाद देते हैं और लड़की की नई यात्रा को खुशी से स्वीकार करते हैं।

4. शिक्षा और जागरूकता। इस मौके पर बड़ी महिलाएँ लड़की को पीरियड्स की देखभाल, स्वच्छता और जीवन में आने वाले बदलावों के बारे में सिखाती हैं। उसे एक जिम्मेदार और परिपक्व महिला बनने के लिए तैयार किया जाता है।

सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

तुलोनिया बिया का महत्व केवल एक रस्म तक सीमित नहीं है। इसके पीछे गहरे सामाजिक संदेश छिपे हैं :

पीरियड को सम्मान देना – यह परंपरा बताती है कि माहवारी कोई शर्म की बात नहीं बल्कि गर्व और खुशी का विषय है।

महिला सशक्तिकरण – लड़की को केंद्र में रखकर उत्सव मनाना, उसे समाज में महत्व और सम्मान का अनुभव कराता है।

स्वास्थ्य शिक्षा – यह अवसर लड़कियों को मासिक धर्म और प्रजनन स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने का एक माध्यम बनता है।

परिवार और समाज की स्वीकार्यता – जब पूरा समाज इस बदलाव को खुले तौर पर मनाता है, तो झिझक और संकोच की जगह गर्व और आत्मविश्वास आता है।

आधुनिक संदर्भ में तुलोनिया बिया

आज भले ही शहरी जीवन में यह परंपरा कम देखने को मिलती है, लेकिन ग्रामीण और पारंपरिक असम में इसका महत्व अब भी बरकरार है। आधुनिक समय में इसे महिलाओं की स्वास्थ्य शिक्षा और जागरूकता से जोड़कर देखा जा रहा है।यह परंपरा हमें यह सिखाती है कि पीरियड को छिपाने या taboo मानने की बजाय, उसे जीवन का सामान्य और उत्सवपूर्ण हिस्सा मानना चाहिए।

अत: “तुलोनिया बिया” असम की एक अद्भुत और प्रेरणादायक परंपरा है, जहाँ लड़की के पहले पीरियड को किसी विवाह समारोह जैसी धूमधाम से मनाया जाता है। यह न केवल संस्कृति का हिस्सा है, बल्कि महिला सशक्तिकरण, स्वास्थ्य शिक्षा और सामाजिक जागरूकता का सुंदर प्रतीक भी है।

देहरा की मौत : एक खोया हुआ स्वर्ग।

राजीव वर्मा

‘उत्तराखंड की राजधानी, जो अभी कुछ दिन पहले बाढ़ में डूब गई, कभी एक मोहक, पुराने ज़माने का स्वर्ग थी; लेकिन विकास के राक्षस ने इसे मार डाला।

मेरा देहरादून खबरों में रहा—16 सितंबर, 2025 को शहर की नदियों में भारी बारिश से आई बाढ़ ने दून घाटी को छलनी कर दिया।

मैंने अपना बचपन देहरादून में 1970 से बिताया है, और पूरे यक़ीन के साथ कह सकता हूँ कि यह पहला अवसर है जब शहर की नदियों में भारी वर्षा से आई बाढ़ ने इतनी तबाही मचाई है। लेकिन पुराने लोग देहरादून को इस वजह से याद नहीं करेंगे। सच तो यह है कि आज का देहरादून वह ‘देहरादून’ नहीं है, जो कभी एक छोटा, शांत और प्यारा-सा कस्बा था। वह ‘कस्बा’ (न कि आज का ‘शहर’) एक बिल्कुल अलग ही दुनिया था।

मनमोहक, नाज़ुक ‘देहरादून’ हमेशा से पेड़ों के लिए अच्छी जगह रही है। घाटी की मिट्टी बहुत उपजाऊ है, वर्षा भी काफ़ी होती है; लगभग सबकुछ वहाँ उगता है।मैंने भी इसी घाटी में अपना बचपन बिताया, जिसे ‘दून वैली’ कहा जाता है और जो अपने सुगंधित ‘बासमती’ चावल के लिए जानी जाती थी।

देहरादून की पहचान ‘सफ़ेद बालों और हरी झाड़ियों के शहर’ के रूप में थी, जहाँ हर बंगले के आगे एक बगीचा, पीछे एक बाग़ और चारों ओर झाड़ियाँ होती थीं। ज़्यादा पुरानी बात नहीं है जब यहाँ पक्की दीवारें नहीं, बल्कि केवल हरी झाड़ियाँ होती थीं। जंगली गुलाबों की बेलें, जैसे कोई माला गूंथी हो, घर के प्रवेश द्वार को सजाती थीं। बहुत पहले, दून घाटी में पंछियों का कलरव गूंजता था। शहर में इतनी कम गाड़ियाँ और ट्रैफ़िक होता था कि गाड़ी का हॉर्न दूर से सुनाई देता था। और हम बच्चे कमरे की बत्ती बंद कर सोने चले जाते थे, इससे पहले कि पिता घर लौटें।

पानी से सराबोर घाटी : मुझे यह भी याद है कि किस तरह पानी ‘देहरादून’ की कहानी का हिस्सा हुआ करता था। आज, 16-सितंबर 2025, ने भले ही शहर में पानी की तबाही ला दी हो, लेकिन एक समय था जब पानी और देहरा का रिश्ता कहीं अधिक कोमल और स्नेहपूर्ण था।

शहर से होकर बहने वाली ऋषिपर्णा और बिंदाल नदियाँ अपने प्राकृतिक मार्ग में बिना रुके बहा करती थीं। बचपन की यादों में मुझे याद है कि शाम के समय औरतें नदी से ताज़ा पकड़ी हुई मछलियाँ बेचती थीं और खेतों में उगा भुट्टा, जिन्हें इन नदियों के पानी से सींचा जाता था, बेचा जाता था।

कभी दून घाटी में ब्रिटिश काल में बनी नहरों का एक शाश्वत जाल था। इन नहरों का निर्माण कैप्टन प्रोबी थॉमस कॉटली ने कराया था (जिन्हें गंगा नहर बनाने का श्रेय दिया जाता है)। इन नहरों को ढककर भूमिगत बना दिया गया था और वे दून घाटी की एक पहचान हुआ करती थीं।

सन 1900 में, दून में लगभग 83 मील लंबी नहरें थीं। इन नहरों का पानी मुख्य रूप से पीने और सिंचाई के लिए उपयोग होता था। यही कारण है कि आज भी ईस्ट कैनाल रोड और कैनाल रोड जैसे इलाके अपने नाम से उस इतिहास को संजोए हुए हैं। आज भी, बिंदाल नदी से पानी उठाकर इन्हीं भूमिगत नहरों के माध्यम से देहरादून को सप्लाई किया जाता है।

देहरादून की बारिश का एक अनोखा पैटर्न हुआ करता था। साल भर लगभग दोपहर 3 बजे बारिश होती थी। यह बारिश केवल एक घंटे या एक दिन तक सीमित नहीं रहती थी, बल्कि लगातार होती थी। स्थानीय भाषा में इस लगातार होने वाली बारिश को झड़ी कहा जाता था, जिसे बारिश के दिनों की संख्या से पहचाना जाता था। मुझे याद है, मेरी माँ हमारे स्कूल यूनिफॉर्म को हीटर के सामने सुखाया करती थीं। क्योंकि शहर में ज्यादातर दिन बरसात वाले होते थे, लगभग हर घर में सीलन की शिकायत रहती थी।

ऐतिहासिक रूप से, मसूरी की पहाड़ियों की ओर स्थित राजपुर क्षेत्र में हमेशा अधिक बारिश होती थी। अक्सर ऐसा होता था कि सड़क के एक तरफ बारिश हो रही होती थी और दूसरी तरफ बिल्कुल नहीं। बचपन में मुझे याद है कि मैं मुख्य गेट से कक्षा तक जाते हुए आधे रास्ते में भीग जाता था। हम हमेशा छाता साथ रखते थे या रेनकोट पहनकर स्कूल जाते थे।

सर्दियाँ भी काफ़ी कठोर होती थीं। मुझे याद है कि मैं हाथ से बुना हुआ स्वेटर दो परत गरम कपड़ों के नीचे पहनता था। केवल तेज़ गर्मियों में ही पंखे की ज़रूरत पड़ती थी। मुझे हमेशा ठंड लगती थी, और जब मैं पंखे की स्पीड एक कर देता था या उसे बंद कर देता था, तो मेरे भाई-बहन मुझ पर हँसते थे।

अन्यथा देहरादून का मौसम सुखद रहता था। दिवाली तक (लगभग अक्टूबर में) सर्दियाँ शुरू हो जाती थीं। अप्रैल के मध्य तक सर्दियाँ काफ़ी कठोर बनी रहती थीं। उस समय हम बिना इमारतों या धुंध के रुकावट के साफ़-साफ़ बर्फ़ से ढकी मसूरी को देख सकते थे। बर्फ़ से लदी पहाड़ियों का ऐसा दृश्य आख़िरी बार 2020 के देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान दिखाई दिया था।

अब सर्दियों का समय काफ़ी कम हो गया है। खोया हुआ स्वर्गये सब बहुत पुरानी यादें हैं। मेरे बचपन का देहरादून बदल गया है और लगातार बदल रहा है। लगभग साढ़े पांच दशकों (1970 से 2025 के बीच) में, देहरादून जो कभी एक शांत और छोटा कस्बा था, आज एक व्यस्त शहर बन चुका है।

उत्तराखंड की राजधानी बनने के बाद शहर ने तेज़ी से विस्तार किया। और इस शहरी फैलाव ने शहर के पुराने आकर्षण को फीका कर दिया, जो अब कस्बे से बदलकर एक शहर बन चुका है।

जब 2000 में देहरादून उत्तराखंड की राजधानी बना, तो कुछ ही वर्षों में आसपास के बड़े शहरों के लोग यहाँ बसना चाहते थे — सरकार ने उद्योगों में निवेश को बढ़ावा देने के लिए सेलाकुई और मोहब्बेवाला में औद्योगिक क्षेत्र चिन्हित किए। इस मानसून में दोनों क्षेत्र बुरी तरह बाढ़ग्रस्त हो गए, क्योंकि नदियों और मौसमी धाराओं ने अपनी पुरानी ज़मीन को फिर से हासिल कर लिया।

धीरे-धीरे शहर और उसके आसपास ऊँची-ऊँची इमारतें, रिहायशी और व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स उग आए, जिनकी वजह से शहर के जलस्रोत, जंगल और खेती की ज़मीनें ज़मीन माफ़ियाओं द्वारा हड़प ली गईं। भूमि उपयोग और भूमि आवरण के एक अध्ययन के अनुसार, 2003 से 2017 के बीच निर्मित क्षेत्र में अचानक तेज़ वृद्धि देखी गई, खासकर रिस्पना की जलग्रहण क्षेत्र में। सबसे अधिक परिवर्तन राजीव नगर, डिफेंस कॉलोनी और दीप नगर वार्डों में हुआ। इसके अलावा, सहस्रधारा क्षेत्र के छोटे-छोटे जंगल के हिस्से (जो बुरी तरह से (जो इस साल बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हुआ), शहरी क्षेत्रों में बदल दिए गए। इस क्षेत्र में अनेक रिहायशी कॉलोनियाँ बना दी गईं। इसके नतीजे सबके सामने हैं। चिड़ियों की चहचहाहट की जगह अब कान फोड़ने वाले हॉर्न सुनाई देते हैं। धान के खेतों की जगह धीरे-धीरे रियल एस्टेट ने ले ली है। खेतों के ख़त्म होने के साथ ही अब शहर में मेंढ़कों और झींगुरों की आवाज़ें भी सुनाई नहीं देतीं।

लेकिन देहरादून का पानी से रिश्ता सबसे अधिक बिगड़ गया है। सालों में शहर का बारिश का पैटर्न बदल गया है। अब बारिश तेज़ होती है लेकिन कम समय के लिए। यह वैसी बारिश नहीं होती जैसी 1970 के दशक में या 2000 राजधानी बनने के कुछ साल बाद तक होती थी। आज देहरादून की नदियाँ — बिंदाल और रिस्पना — मर रही हैं या पहले ही मर चुकी हैं।

1990 तक स्थानीय दूधवाले साइकिल पर ताज़ा दूध सप्लाई किया करते थे, और हमें आर्मी कैंटीन से सफ़ेद मक्खन और पनीर मिलता था। अब उत्तराखंड में अमूल, मदर डेयरी, आंचल, मधुसूदन और अन्य दुग्ध सहकारी समितियाँ शुरू हो गईं।आज खाली दूध के पैकेट शहर की नदियों और नालियों को जाम कर रहे हैं। यहाँ तक कि दून की कभी सदानीरा नहरों को भी ढक दिया गया, क्योंकि लोगों ने उनमें कूड़ा और पशुओं का मल-मूत्र डालना शुरू कर दिया।

आज बिंदाल नदी की चौड़ाई सिकुड़ गई है, उसका प्रवाह सीमेंट की संरचनाओं — एक ऊँची ‘सुरक्षा दीवार’ — से बदल दिया गया है। नदी के आसपास की हवा में सड़ी-गली दुर्गंध फैली रहती है क्योंकि यह शहर का सीवेज और जहरीला कचरा ढोती है, और इसके किनारे पर ही कूड़ा फेंकने का मैदान बना दिया गया है।

पुराना देहरादून हमेशा के लिए खो गया है। वह अब इतिहास के पन्नों में सिमटकर रह गया है — एक खोया हुआ स्वर्ग।

ताकतवर बनो, ताकि दुनिया तुम्हारा सम्मान करे

राजीव वर्मा

इस दुनिया का नियम है – ताकतवर हमेशा कमजोरों का शिकार करते हैं। चाहे यह प्राकृतिक नियम हो या समाज का नियम, यह सचाई किसी से छुपी नहीं है। हर समय, हर परिस्थिति में, जो कमजोर होते हैं, उन्हें मुश्किलें और संघर्ष का सामना करना पड़ता है। लेकिन सवाल यह नहीं कि दुनिया कैसी है, बल्कि यह है कि आप उसके सामने कैसे खड़े होते हो। क्या आप खुद को कमजोर बनाकर भागते रहोगे, या इतना शक्तिशाली बनोगे कि कोई तुम्हें कमज़ोर नहीं समझ सके?

खुद को मजबूत बनाना क्यों जरूरी है?जब आप कमजोर होते हो, तो लोग आपके साथ मनमानी करने से नहीं चूकते। आपकी कमजोरियाँ आपके खिलाफ हथियार बन जाती हैं। लेकिन जब आप मजबूत बनते हो – शारीरिक रूप से, मानसिक रूप से, और ज्ञान के क्षेत्र में – तो आपकी समस्याएँ भी आपके सामने घुटने टेक देती हैं। जीवन में सफलता पाने का एक बड़ा मंत्र यही है कि आप निरंतर सीखते रहो, अपने स्किल्स को अपडेट करो, और कभी हार न मानो।

पढ़ाई और स्किल्स का महत्वआज की तेज़ रफ्तार दुनिया में सिर्फ अच्छे अंक लाना ही काफी नहीं है। हर दिन नई चीजें सीखना, समय के साथ खुद को अपडेट रखना, और नए स्किल्स को सीखना आपकी ताकत बनता जा रहा है। कंप्यूटर प्रोग्रामिंग हो, डिजिटल मार्केटिंग हो, भाषा सीखना हो या फिर किसी तकनीकी क्षेत्र में महारत हासिल करना – ये सब आपके आत्मविश्वास को बढ़ाते हैं और आपको मजबूत बनाते हैं।

मानसिक मजबूती का भी है बहुत बड़ा योगदानशारीरिक ताकत के साथ-साथ मानसिक मजबूती भी बेहद ज़रूरी है। जीवन में कठिनाइयाँ, असफलताएँ और आलोचनाएँ आती रहती हैं। असली ताकत यह नहीं कि आप उन मुश्किलों से भागो, बल्कि यह है कि आप हर बार उनसे लड़कर आगे बढ़ो। जब आप खुद को मानसिक रूप से मजबूत बनाओगे, तो दुनिया की कोई भी विपत्ति आपकी राह में दीवार नहीं बन पाएगी।

लक्ष्य प्राप्ति का रास्ताआपका लक्ष्य चाहे बड़ा हो या छोटा, उसे पाने के लिए आवश्यक है – निरंतर प्रयास, सही दिशा में मेहनत और धैर्य। केवल ताकत से ही आप अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हो। खुद को मजबूत बनाकर आप अपनी क्षमताओं पर विश्वास करेंगे, और इसी विश्वास से आप उन ऊँचाइयों तक पहुंचोगे, जहाँ दुनिया तुम्हें देख कर प्रेरित होगी।

निष्कर्ष

इसलिए याद रखो –

🔸 पढ़ाई करो

🔸 स्किल्स सीखो

🔸 अपने अनुभवों से सीखो

🔸 कभी हार मत मानो

🔸 हर दिन थोड़ा और बेहतर बनो

क्योंकि जब आप मजबूत बनते हो, तो न केवल आप खुद की जिंदगी बदलते हो, बल्कि आप समाज में एक मिसाल भी बन जाते हो।

ताकतवर बनो, ताकि दुनिया तुम्हारा सम्मान करे।

✨ कविता ✨ मर्द को फ्री में प्यार नहीं मिलता

राजीव वर्मा

मंदिर की घंटी सी खनकती आवाज़,

पर दिल की तन्हाई में नहीं कोई राज़।

बीवी का हँसता चेहरा, बच्चों की चंचल बात,

फिर भी कुछ अधूरा सा हर कदम की सौगात।

माँ की ममता, बाप की थकान भरी छाया,

बहन भाई का साथ, हर दर्द को सहलाया।

पर सवाल ये उठता हर रोज़ तन्हाई में,

क्या मर्द को भी मिलता है बिना मेहनत की सुकून की परछाई में ?

प्यार की डगर में नहीं चलता कोई फ्री पास,

हर मुस्कान की कीमत होती है गहरी आस।

किसी ने नहीं थमाया तोहफा बे-मूल्य यहाँ,

हर प्यार के पीछे छुपा है संघर्ष का यहाँ।

बीवी की नाराजगी, बच्चों की चुप्पी,

बहन भाई की उलझन, माँ-बाप की खामोशी भी।

मर्द की दुनिया भी है जद्दोजहद की बात,

जहाँ बिना तहे दिल के नहीं मिलता कोई साथ।

तो समझो ये सच्चाई बिना किसी बहाने के,

प्यार के हर रिश्ते में छुपा होता है त्याग के गीत।

मर्द को भी चाहिये सम्मान और अपनापन,

कोई फ्री का प्यार नहीं, बस ईमानदारी का अपनापन।

💔 मर्द को फ्री में प्यार नहीं मिलता 💔

बीवी बोले – “प्यार है तो दिखाओ !

“बच्चे पूछें – “पैसा लाओ!”

बहन कहे – “थोड़ा साथ दो!”

बाप बोले – “तू मेहनत कर, बेटा!”

माँ की ममता भी बिकाऊ हो चली,

हर मुस्कान के पीछे छुपी एक डील।

कहते थे जो पहले – “बिना शर्त प्यार होगा,”

अब वही प्यार भी लगता है बस कारोबार होगा।

दोस्तों की बातें भी अब फीकी-सी लगी,

हर मिलने की कीमत, हर बात की डिग्री।

सिर पर सरस्वती, हाथ में अकाउंट बही,

भावनाओं की जगह अब नंबर की रेखा यही।

कभी सोचता था मर्द भी प्यार में अमीर,

अब समझता है, वह भी बस संघर्ष का अधीर।

फ्री में नहीं मिलता यहाँ कुछ भी आसान,

चाहे हो बीवी, बच्चे, बहन, भाई या माता-पिता का जहान।

हर रिश्ता बना एक लेन-देन की बात,

जहाँ भावनाएँ बिकती हैं नीलाम रात।

तो चलो स्वीकार करें ये कठोर सच्चाई,

मर्द को भी चाहिए प्यार, मेहनत की छाँव तले पाई।

💔 मर्द को फ्री में प्यार नहीं मिलता 💔

पहले कहते थे –”प्यार तो है निशुल्क, बिना शर्त, बिना हिसाब।”

पर ये दुनिया बदल गई,

अब हर रिश्ता बन गया व्यापार का हिसाब।

बीवी कहती है –”अगर पैसा नहीं लाओगे, तो मोहब्बत नहीं पाओगे।”

बच्चे पूछते हैं –”पापा, हमें खेल-खिलौने चाहिए, मोहब्बत तो खाना नहीं खिलाती!”

बहन भाई के बीच भी नहीं बची कोई मासूमीयत,

हर एहसान का रसीद माँगते हैं अब सब लोग।

माँ-बाप की ममता भी हो चली कमोडिटी,

जहाँ संवेदना बिकती है नोटों की भरमार में।

मर्द के दिल की पीड़ा अब गहराई में दब गई,

जहाँ चाहत भी लगती है किसी करार की पन्नी।

कभी जो था ताजगी का फूल –अब बन गया है जिम्मेदारी का बोझ।

कितनी बार चुपके से आँसू पोछे,

कितनी बार खुद को समझाया –”ये भी एक हिस्सा है जिंदगी का खेल।”

पर दिल कहता है –”क्यों हर रिश्ते की कीमत तोड़ी जाती है?”

प्यार चाहिए तो देना पड़ेगा पसीना,

समझाना पड़ेगा अपने दर्द को मुस्कान में।

यहाँ फ्री में नहीं मिलता कोई एहसास,

हर संबंध के पीछे छुपा होता है संघर्ष का विश्वास।

तो आइए, स्वीकार करें ये बेरहम सच,

जहाँ मर्द भी चाहता है सच्चा प्यार,

मगर उसे भी बनना पड़ता है इस दुनिया की तरह व्यापार।

💔 मर्द को फ्री में प्यार नहीं मिलता 💔

सुना था पहले –”प्यार बेमोल होता है, बिना कोई लेन-देन।”

पर आज हर घर, हर रिश्ते की दीवार बनी है—

पैसे की दरार, दिखावे की बेड़ियाँ।

बीवी की नज़रें पूछती हैं हर महीने की उधारी,

बच्चों की मुस्कान भी बन गई है टॉफ़ी की खरीदी।

बहन भाई की बातें नहीं भाव की मिठास,

बल्कि फॉर्म भरने की औपचारिकता, हाँ, यही तो बात खास।

माँ-बाप की ममता भी अब सिमट गई है,

“तेरे भले के लिए जीता हूँ, पर बील भरवाओ।”

कभी जो दिया करते थे बिना सोचे, समझे,

अब जवाब मांगते हैं, हर पल, हर शब्द पर।

मर्द की पीड़ा को कौन समझे ?

हर दिन एक नए सवाल की गोलियों से भरा।

“क्यों नहीं बनाता बड़ा घर?”

“क्यों नहीं लाता बड़ी गाड़ी?”

“क्यों नहीं बना दिया सबकुछ पूरी तरह से व्यवस्थित?”

प्यार नहीं बिकता फ्री में इस बाजार में,

यहाँ तो मिलता है हर भावना का रेट कार्ड।

इज्जत, अपनापन, सहारा –सब कुछ बना दिया गया है कागज की टुकड़ों में।

मर्द भी चाहता है स्नेह का स्पर्श,

कोई बिना कारण मुस्कुराए, बिना हिसाब अपनाए।

पर यहाँ चलती है केवल लेन-देन की बातें,

जहाँ हर एहसास को तोला जाता है वजन और कीमत में।

इस बेरहम दुनिया में बस एक सच बचा है

“प्यार भी बिकता है,अगर तुमने उसका मूल्य चुकाया हो।”

🌿 मर्द को फ्री में प्यार नहीं मिलता 🌿

माना कि दुनिया बदल गई है,

रिश्ते अब बनते हैं लेन-देन की कड़ी।

पर फिर भी कहीं गहराई में छुपा है,

एक अनमोल सच, एक पुरानी उम्मीद की बड़ी।

बीवी की खामोशी में छुपा है सवाल,

बच्चों की मासूमियत में भी अब है एक हाल।

बहन भाई के रिश्ते भी बने हैं अनुबंध,

माँ-बाप की ममता भी मांगती हैं साथ।

मर्द का दिल भी धड़कता है प्यार के लिए,

ना कोई रसीद, ना कोई शर्त की ज़रूरत।

बस एक सरल एहसास, एक निःस्वार्थ स्पर्श,

जो बने रिश्तों का असली आधार, सरल और सच्चा।

हर रोज़ की जद्दोजहद में छुपा संघर्ष,

मर्द भी चाहता है अपनापन का आराम।

वो भी चाहता है बिना हिसाब के मोहब्बत,

जिसमें ना हो कोई बाजार का तामझाम।

पर ये सच है –कोई भी सच्चा प्यार मुफ्त नहीं मिलता।

यह चाहिए मेहनत से अर्जित करना,

सहनशीलता से पालना, विश्वास से निभाना।

तो चलो फिर, बनाएं इस दुनिया को बेहतर,

जहाँ हर मर्द को मिले स्नेह का वरदान।

ना हो लेन-देन का खेल, ना बने रिश्तों की कीमत,

बस हो प्रेम, अपनापन, और सच्चाई की प्रीत।

🌱 क्योंकि मर्द को भी चाहिए वही प्यार,

जो दिल से दिया जाए, बिना किसी हिसाब- किताब के। 🌱

राजीव वर्मा