43. जंगल की वापसी

कभी था घना, सघन साया,
जहाँ पवन गाए, पंछी आया।

पेड़ों की गोद में जीवन पलता,
हर प्राणी निर्भय होकर चलता।

फिर लोहे ने दस्तक दी एक दिन,
सड़कें उगीं, मशीनों का छिन-छिन।

इंसानी चाहत बढ़ती गई,
हरियाली चुपचाप घटती गई।

ईंटों ने धरती को जकड़ा,
धुएँ ने नभ का गला पकड़ा।

चमकते भवन, शोर बाज़ार,
जंगल का मौन हुआ लाचार।

साल बदले, बदले मौसम,
कभी सूखा, कभी भीषण आलम।

बाढ़ की लहरें सब बहा ले गईं,
प्रगति की नींव भी ढहा ले गईं।

दरकती मिट्टी से अंकुर फूटा,
धरती ने फिर से स्वर को छूटा।

जड़ों की सरसराहट आई,
सोई हरियाली फिर मुस्काई।

जो जंगल चुपचाप गया था,
अब अपना अधिकार कह गया था।

“ये मिट्टी मेरी थी, मेरी रहेगी,
मैं जीवन हूँ—फिर से उगूंगी।”

42. नदी की यादें

सदियों पुरानी बातें हैं,
बुजुर्गों की आवाज़ें हैं।
आज भी कानों में गूंजती,
वक़्त की सीढ़ियाँ चढ़ती-उतरती।

     अक्सर दादा कहते थे,
     धीरे-धीरे समझाते थे—
     “नदी के पास घर मत बसाना बेटा,
     ये अपना रास्ता कभी नहीं भूलता।”

हम हँसकर टाल दिया करते,
उन शब्दों को हल्का समझते।
कहते—वो पुरानी बात थी,
अब तो दुनिया नई सौगात थी।

     अब रिवर-व्यू बिकते हैं,
     सपनों जैसे दिखते हैं।
     लॉन में झूले, सजी बालकनी,
     सेल्फी कॉर्नर, चमकती रवानी।

रेत को सीमेंट से ढक डाला,
पत्थरों को गहना बना डाला।
गूगल मैप से मोड़ मिटाए,
नदी के पथ भी भूल बताए।

     नाम रख दिए व्यास-व्यू,
     हर दृश्य लगा मानो न्यू।
     पर नदी चुपचाप बहती रही,
     अपनी स्मृतियों संग रहती रही।

ना वो भूली, ना थकी,
ना कभी अपनी जिद से हटी।
धीरे से कहती घाटी में—
“मैं मालकिन हूँ इस बस्ती की।”

     फिर एक दिन बादल गरजे,
     आसमान जैसे फटकर बरसे।
     घनघोर बारिश ने फाइलें खोलीं,
     प्रकृति ने अपनी बातें बोलीं।

नदी आई शांत स्वभाव,
ना क्रोध, ना कोई दाव।
बस धीरे से कहती गई—
“मैं यहीं थी, तुम ही भूले भाई।”

     दीवारें टूटीं, छतें बहीं,
     आँखों में बस चीखें रहीं।
     लोग बोले—सब लुट गया,
     किस्मत ने जैसे साथ छोड़ दिया।

सरकार को सबने कोसा,
राजनीति ने मुद्दा रोपा।
पर नदी बस मुस्कराई,
सच की लौ फिर से जगाई।

     “मैं तो वही कर रही हूँ,
     जो बुजुर्ग कहते रहे सुनो।
     मैं मेहमान नहीं इस घाटी की,
     मालकिन हूँ हर थाती की।”

अब भी वक़्त है, समझ जाओ,
मुझको दुश्मन मत बनाओ।
मैं जीवन हूँ, मैं धारा हूँ,
हर खेत की मैं सहारा हूँ।

     बस इतना सा मान रखो,
     मेरा अपना स्थान रखो।
     मुझे मत रोको, मत बाँधो,
     मेरे प्रवाह को मत आँधो।

अगर सच में सुख पाना हो,
प्रकृति से नाता निभाना हो—
तो याद रखो हर जन-जन,
मैं हूँ धरती की स्पंदन।

     मुझे बहने दो, मुझे बहने दो,
     मेरे संग जीवन गहने दो।

41. हम वहीं हैं

बहुत समय बाद जब हम यहाँ न होंगे,
हमारी स्मृतियाँ फिर भी हवाओं में होंगी।

     हमारा प्रेम, अमिट रंग बनकर,
     दिलों पर अपनी छाप रखेगा ठहरकर।

समय हमें इस देह से ले गया सही,
पर सच में हम कहीं खोए नहीं।

     हम ठहरे हैं उस संध्या की लहर में,
     जहाँ सूरज घुलता है रात के शहर में।

जहाँ भोर की किरण जन्म लेने को है,
पर अंधेरे का आलिंगन भी ढीला न हो।

     हम वहीं हैं—
     जहाँ न पूरी रोशनी, न पूरा अंधकार।

जहाँ यादें धुंध-सी फैल जाती हैं,
और हर सांस में बीते कल की महक आती है।

     तुम यदि चुपचाप आँखें मूंद सको,
     तो हमें अपनी धड़कनों में छू सको।

तुम्हारी हथेलियों की गर्माहट में,
तुम्हारी पलकों की नमी की आहट में।

     हमारी हँसी अब भी हवा में बहती है,
     जैसे कोई पुरानी धुन कहती है।

समय हमें ले गया, पर मिटा न सका,
प्रेम का दीप कभी बुझा न सका।

     जब सांझ और भोर के बीच ठहरो,
     बैंगनी-सुनहरे आकाश को निहारो।

याद रखना उस शांत क्षण में,
हम वहीं हैं—तुम्हारे हर श्वास-तन में।

40. जली हुई रोटी का सच

रोटी जली तो रसोइए ने कहा — “तवा बदल दो।”
बीवी बोली — “ये दहेज का है, इसे बदलना मत बोलो।”

रोटी फिर जली तो आवाज़ आई — “आटा बदल डालो।”
ससुरजी बोले — “ऑर्गेनिक है हमारा, नसीब को ही टालो।”

रोटी तीसरी बार भी काली हो गई,
रसोइए ने कहा — “पानी बदलो, बात सरल हो गई।”

बच्चे बोले — “हम मिनरल वाटर ही पिएँगे,
हमारा पेट VIP है, रिस्क क्यों लिएँगे?”

फिर भी रोटी जली तो बोला — “चूल्हा बदल दो।”
पड़ोसी दौड़े आए — “गैस हमारे नाम है, ये मत छेड़ो।”

धुआँ उठता रहा छत तक काला,
कुत्ता भी सोच में पड़ा — “ये खाना है या ज्वाला?”

दादी ने आखिर समझाया हँसकर,
“या तो शादी बदलो, या रसोइया बदलो खुलकर।”

पर हिम्मत किसी में भी न आई,
हर किसी ने अपनी दलील सुनाई।

रोटी जलती रही, बहाने पकते रहे,
सब अपने-अपने तर्क में सिमटते रहे।

घर में सबको बदलाव चाहिए था,
पर बदलने का साहस किसी में नहीं था।

रसोइया मुस्कुराया और धीरे से बोला,
“यहाँ हर कोई बदलना चाहता है — पर खुद को नहीं तोला।”

39. मर्द को भी चाहिए प्यार

मंदिर की घंटी-सी खनकती आवाज़,
पर दिल की तन्हाई में अनकहा सा राज़।

     बीवी की हँसी, बच्चों की बात,
     फिर भी अधूरा-सा हर दिन की सौगात।

          माँ की ममता, पिता की छाया,
          बहन-भाई ने हर दर्द सहलाया।

                    फिर भी मन में उठता है सवाल,
                    क्या मर्द को भी मिलता है निस्वार्थ ख्याल?

प्यार की राह में नहीं कोई फ्री पास,
हर मुस्कान के पीछे छुपी होती है आस।

      बीवी कहे—“प्यार है तो साबित करो,”
      बच्चे कहें—“सपनों का घर लाकर भरो।”

          बहन पुकारे—“थोड़ा साथ निभाओ,”
          पिता कहें—“और आगे बढ़ जाओ।”

               माँ की ममता भी चिंता में ढली,
               हर दुआ में जिम्मेदारी पली।

मर्द की दुनिया जद्दोजहद की बात,
जहाँ चुप्पी में छिपे रहते हैं जज़्बात।

     हर रिश्ता जैसे लेन-देन का हिसाब,
     हर अपनापन पूछे कोई जवाब।

          दोस्तों की महफिल भी फीकी लगे,
          हर मुलाक़ात में मतलब जगे।

               सिर पर सपने, हाथ में बही-खाता,
               भावनाओं का भी बन गया नाता।

कभी सोचा था प्यार बेमोल होगा,
बिना शर्त, बिना तौल होगा।

     पर अब हर एहसास का रेट है तय,
     हर मुस्कान के पीछे कोई शर्त नई।

          क्यों हर रिश्ते की कीमत आँकी जाती है?
          क्यों मोहब्बत भी तोली जाती है?

               मर्द भी चाहता है स्नेह का स्पर्श,
               बिना कारण कोई दे दिल का हर्ष।

वो भी चाहे कोई यूँ ही मुस्कुराए,
बिना हिसाब उसे गले लगाए।

     वो भी थकता है इस दौड़ में रोज़,
     चुपके से पोंछे अपने ही ओझल आँसू रोज़।

          उसकी खामोशी को कौन पढ़ेगा?
          उसके भीतर का दर्द कौन गढ़ेगा?

               हर दिन सवालों की बौछार,
               “क्यों नहीं बना पाया बड़ा संसार?”

प्यार यहाँ मुफ्त नहीं मिलता,
हर भावना का मूल्य यहाँ सिलता।

     पर सच ये भी है गहराई में कहीं,
     अब भी बचा है स्नेह सच्चा यहीं।

          प्यार कमाया जाता है विश्वास से,
          सींचा जाता है धैर्य और एहसास से।

               मर्द को भी चाहिए अपनापन,
               बस सच्चाई से भरा एक आलिंगन।

ना हो लेन-देन का कोई खेल,
ना हो हर रिश्ते में सौदे का मेल।

     मर्द भी चाहता है वही प्यार,
     जो मिले दिल से—बिना हिसाब, हर

38. थोड़ा ठहर जा ऐ ज़िंदगी

थोड़ा ठहर जा ऐ ज़िंदगी, ज़रा साँस तो लेने दे,
तेरी भागती दौड़ से निकल, मुझे खुद से मिलने दे।

     हर सुबह नई उम्मीदों का दीप जला जाती है,
     हर शाम अधूरी-सी थकान थमा जाती है।

तेरे सफ़र में बहुत कुछ पाया है मैंने,
पर दिल अब भी सुकून को तरसता है सपने।

     तेरे इम्तिहान रोज़ नए रंग दिखाते हैं,
     कभी आँसू, कभी मुस्कान बनकर आते हैं।

इस भीड़ में कहीं खुद को खो दिया है,
अपनी ही तलाश में भटकता-सा हो लिया है।

     ऐ ज़िंदगी, ज़रा रुककर तो देख,
     मेरे सपनों का कुछ तो बोझ कम कर दे एक।

हर सवाल का कोई जवाब तो मिले,
दिल की उलझनें भी आज साफ़ हो चलें।

     कभी तो सन्नाटा भी सुनने दे मुझे,
     कभी तो खुदा से जुड़ने दे मुझे।

कभी आईने में सच मेरा दिख जाए,
कभी अपना ही चेहरा अपना लग जाए।

     तेरे संघर्षों ने हिम्मत सिखाई है,
     हर ठोकर ने नई राह दिखाई है।

पर अब एक लम्हा चैन का भी चाहिए,
जहाँ दर्द नहीं, बस सुकून का साया हो।

     थोड़ा ठहर जा ऐ ज़िंदगी, तेरी रफ़्तार बहुत तेज़ है,
     मेरे अरमान अभी अधूरे हैं, सफ़र के कुछ राज़ अभी शेष हैं।

37. आह से अहा तक

अभी रूबरू भी नहीं हुआ हूँ मैं, ऐ ज़िंदगी, तुझसे पूरी तरह,
आपाधापी की आंधी में तेरा चेहरा खोजता रहा हर पहर।

     अंधी दौड़ में तेरे असली लुत्फ़ को टटोलता रहा,
     तू सामने होकर भी जैसे ओझल-सी रही सदा।

लोग कहते थे—तू अनमोल सफ़र है,
जिसमें ठहराव भी गीत है और रफ़्तार भी सुर है।

     मैंने धरती से पाताल तलक तुझे ढूँढा,
     पर सुकून का नखलिस्तान कहीं न मिला।

अब समझ आया, ‘ठहर’ ही वो मंत्र था,
जो जीने का सलीका चुपचाप कहता था।

     पर पैरों को आदत है भागते जाने की,
     दिल को ज़िद है हर पल कुछ पाने की।

रफ़्तार की हवाओं ने महक छीन ली ठहराव की,
थका दिया है इस अंधी चाह ने प्रभाव की।

     चलो अब थोड़ा मद्धिम हो लेते हैं,
     तेज़ कदमों से कुछ पल को मुक्त हो लेते हैं।

ढूँढते हैं वो कोना जहाँ रूह को आराम मिले,
जहाँ हर साँस में अपनापन खिले।

     वहीं के गिर्द अपना आशियाना बना लें,
     खामोशियों संग जीने का बहाना बना लें।

आह से अहा तक का ये सफ़र,
अब तेरे संग मुस्कुराकर तय कर लें।

     जो भी लम्हा बाकी है जीवन में,
     तेरी बाहों में सुकून ढूँढते हुए जी

36. मेरे घर आना, ओ ज़िंदगी

सन्नाटे में धड़कनों की धुन बना लेते हैं,
टूटे सपनों की राख से उजाला सजा लेते हैं।
बुझी उम्मीदों की चिंगारी समेटकर,
हम फिर से परचम हवा में लहरा लेते हैं।

आना ज़िंदगी, ओ मेरी ज़िंदगी,
सूखी साँसों में थोड़ी नमी भर दो।
बिखरे रास्तों की वीरान धूल पर,
किसी चिराग़ की हल्की-सी लौ धर दो।

मेरे घर आना…
वो घर जो ईंट-पत्थर से नहीं बना,
मोहब्बत की मिट्टी से रचा गया है।
जहाँ हर कोना दुआओं से सजा गया है।

जहाँ दीवारें इंतज़ार में खड़ी रहती हैं,
और खामोशियाँ भी बातें कहती हैं।
उस घर का छोटा-सा बस इतना पता है,
नक्शे में दर्ज नहीं, दिलों में बसा है।

दिल की गलियों से होकर गुजरना,
तन्हाई की चौखट पर ज़रा ठहरना।
मेरे घर के आगे “मोहब्बत” लिखा है,
वो शब्द जो कभी नहीं मिटा है।

न बारिश उसे धुंधला कर पाती है,
न आँधी उसे गिरा पाती है।
वक़्त की धूल भी हार मान जाती है,
उसकी इबारत अमर हो जाती है।

मेरे घर की दीवारें गुम-सी हैं,
और छत भी कहीं धुंधली-सी है।
खुला है आसमान का हर टुकड़ा यहाँ,
सितारों की चादर ओढ़ लेता हूँ जहाँ।

चाँद को दिया बनाकर रख देता हूँ,
रात की पेशानी पर सजा देता हूँ।
मेरे घर का कोई दरवाज़ा नहीं,
न ताले हैं, न कोई चौखट कहीं।

तुम्हारी चाहत ही मेरी दस्तक बने,
तुम्हारा नाम ही मेरी चाबी बने।
तुम्हारा होना ही मेरी हिफाज़त हो,
तुम्हारी आहट ही मेरी राहत हो।

आना ज़िंदगी, ओ मेरी ज़िंदगी,
क्योंकि बिन तेरे ये ठिकाना अधूरा है।
तेरे बिना हर सुर बेसुरा है,
हर रंग फीका, हर मौसम सूना है।

तू आएगी तो हवाओं में गुनगुनाहट होगी,
सन्नाटे में भी सरगम की आहट होगी।
अभी तो हम गीत यूँ ही गा लेते हैं,
टूटे तारों से स्वर मिला लेते हैं।

पर सच ये है कि तेरे बिन सब अधूरा है,
हर उजाला थोड़ा-सा धुँधला है।
तू आएगी तो रौशनी मुकम्मल होगी,
हर धड़कन में नई हलचल होगी।

मेरे घर की साँसें तेरा इंतज़ार करती हैं,
हर आहट पर तेरी पुकार करती हैं।
आ जा कि ये वीराना घर बन जाए,
तेरे संग हर दर्द सफर बन जाए।

मेरे घर आना, ओ ज़िंदगी,
तेरे कदमों से ही ये आँगन खिलेगा।
तू आएगी तो ये सन्नाटा भी,
एक मधुर राग में ढलकर जी लेगा।

35. वो घर अब भी इंतज़ार में है

निमंत्रण की ज़रूरत नहीं वहाँ जाने को,
न बताने की कि कब लौटकर आने को।
कपड़े कैसे हैं, चेहरा कैसा है, कोई मायने नहीं,
वो घर तो बस आपके आने के लिए ही सही।

     दरवाज़ा सदा खुला रहता है वहाँ,
     बचपन की महक तैरती है जहाँ।
     दो आँखें चौखट पर टिकी रहती हैं,
     बस ये सुनने को—कदमों की आहटें सही।

वो घर, जहाँ आप लौटते हैं बिना बताए,
जहाँ थाली बिना माँगे सामने आ जाए।
जहाँ मना करने पर भी प्यार भरी डाँट मिलती है,
हर छोटी ज़िद पर भी हँसी खिलती है।

     जहाँ आपकी चुप्पी भी पढ़ ली जाती है,
     और हर बात दिल में सहेज ली जाती है।
     माँ की नज़र अब भी उतनी ही कोमल है,
     उसकी दुआओं में आज भी वही संबल है।

पापा अब भी मजबूत बनने का अभिनय करते हैं,
अपने जज़्बातों को भीतर ही भीतर धरते हैं।
पर उनकी आँखें सब राज़ खोल देती हैं,
जब आपको चौखट पर खड़ा देख लेती हैं।

     वो घर सिर्फ दीवारों का नाम नहीं होता,
     वो दो धड़कनों का संगम होता।
     एक दिन ये दरवाज़े यूँ ही खुले न मिलेंगे,
     ये इंतज़ार करते चेहरे भी शायद न दिखेंगे।

तब समझोगे घर का असली अर्थ क्या है,
अपनों के बिना हर कोना कितना सूना सा है।
सारी दौलत, सारे महल फीके लगेंगे,
उनकी एक झलक को तरसते रहेंगे।

     एक और आलिंगन की चाह जागेगी,
     एक और डाँट दिल को भागेगी।
     वो मुस्कान, वो आशीष भरा हाथ,
     सब याद आएगा हर एक साथ।

इसलिए अगर आज भी वो घर बुला रहा है,
तो समय को यूँ ही मत गँवा रहा है।
जाइए, गले लगाइए, कुछ पल बिताइए,
पुरानी कहानियाँ फिर से दोहराइए।

     माँ की आँखों में चमक भर दीजिए,
     पापा के कंधे पर सिर रख दीजिए।
     उनके संग हँसिए, कुछ आँसू भी बहाइए,
     हर अधूरी बात आज ही कह आइए।

क्योंकि माँ-पापा का घर शाश्वत नहीं होता,
समय का पहिया कभी रुकता नहीं होता।
पर उनका दिया हुआ प्रेम अमर रहता है,
हर सांस में उनका आशीष बसता है।

     जब-जब जीवन की राह कठिन हो जाएगी,
     उनकी सीख ही राह दिखाएगी।
     वो घर भले एक दिन खाली हो जाए,
     पर उसका स्नेह सदा मन में समाए।

आज जो इंतज़ार में दरवाज़ा खुला है,
वो प्रेम ही जीवन का असली किला है।
इससे पहले कि समय आगे निकल जाए,
अपने घर की ओर कदम

34. कागज़ की कश्ती

कागज़ की कश्ती थी, पानी का किनारा था,
न कोई डर था तब, न कोई इशारा था।
     हवा की लहरों संग सपने बह जाते थे,
     हर बूँद में अपने ही रंग नजर आते थे।

बचपन का दिल कितना आवारा था,
हर कोना जैसे अपना ही सहारा था।
     मिट्टी में सजते थे सपनों के महल,
     ना कोई चिंता थी, ना कोई पहल।

पेड़ों पे झूलना, बादलों से बातें,
धूप में छुपना, बारिश की सौगातें।
     हँसी की गूंज से महकता था आँगन,
     सादा था जीवन, और मीठा था स्पंदन।

ना मोबाइल था, ना कोई स्क्रीन,
बस अपनों के संग था हर दिन रंगीन।
     छोटी-छोटी बातों में जादू बसता था,
     हर दिन नया-सा कोई किस्सा सजता था।

गिरकर भी हँसना हमें आता था,
हर हार में जीत का मज़ा पाता था।
     आँसू भी तब मोती बन जाते थे,
     दोस्तों के संग सब ग़म भूल जाते थे।

अब आ गए हैं समझदारी के दलदल में,
जहाँ मुस्कान भी तौली जाती है हलचल में।
     अब खेल नहीं, बस मंजिल की दौड़ है,
     हर चेहरा जैसे जिम्मेदारियों का बोझ है।

ख़ुशी भी भीड़ में कहीं गुम-सी लगती है,
बचपन की मासूमियत अब कम-सी लगती है।
     वो नादान पल कितने सुहाने थे,
     हर दिन जैसे अपने ही तराने थे।

कागज़ की कश्ती अब नहीं बनती,
वो छोटी-सी नदी पास नहीं बहती।
     पर यादों में अब भी लहरें उठती हैं,
     मासूम दिनों की तस्वीरें सिमटती हैं।

जब-जब मन थककर बैठ जाता है,
वो बचपन चुपके से पास आ जाता है।
     यादों की धूप अब भी चमकती है,
     मन की खिड़की से झांकती है।

काश फिर वही दिन लौट आते,
जहाँ दिल से हम दुनिया सजाते।
     जहाँ रिश्तों में सच्चाई का नाता था,
     हर चेहरा बस अपनापन जताता था।

जहाँ नफरत का कोई किनारा न था,
बस प्यार ही सबसे बड़ा सहारा था।
     जहाँ हर सुबह नई कहानी लाती थी,
     और हर शाम सुकून सुलाती थी।

अब जीवन की राहें भले बदल गईं,
पर यादों की कश्ती वहीं अटल खड़ी रही।
     मन के सागर में अब भी उतारता हूँ,
     उन पलों को फिर से जीने का प्रयास करता हूँ।

क्योंकि सच तो वही सुनहरा था,
जब हर सपना अपना और गहरा था।
     वो बचपन ही सबसे न्यारा था,
     कागज़ की कश्ती थी, पानी का किनारा था।

33. मैं अभी ज़िंदा हूँ

लड़के अक्सर बाप को गले नहीं लगाते,
न उसकी गोद में सिर रखकर सो पाते।
बचपन में जो उंगली पकड़कर चलते थे,
बड़े होकर वही फोन पर कम ही मिलते थे।
कभी बाप हीरो था, सबसे बड़ा सहारा,
हर गिरती चाल में उसने थामा था तुम्हारा किनारा।
स्कूल की फीस, नए जूते, बैग और किताबें,
अपनी जरूरतें भूल, पूरी की तुम्हारी ख्वाहिशें बेहिसाब।
वक्त बदला, बेटा जवान हुआ,
सपनों और दुनिया की दौड़ में गुम हुआ।
अब बाप उतना जरूरी नहीं लगता,
क्योंकि “वो तो है ही”—यही भ्रम मन में बसता।
दूर शहर में जब बेटा घर फोन लगाता है,
मां से हंसकर हाल-चाल पूछ जाता है।
उधर कोने में बैठा बाप धीमे से कहता है,
“कह देना उससे, टेंशन ना ले… मैं अभी ज़िंदा हूँ।”
आवाज़ उसकी हल्की है, मगर दिल भारी,
हर शब्द में छिपी है ममता सारी।
वो खुलकर कुछ भी कह नहीं पाता,
पर हर शाम आंगन में तेरा इंतज़ार सजाता।
जब तू साइकिल से गिरता था कभी,
वो दौड़ता था घबराकर तभी।
अब वही बाप छत पर खड़ा राह निहारे,
कि शायद बेटा अचानक सामने आ उतरे।
आंखें कमज़ोर हुईं, पर नजर तुझ पर रहती है,
झुकी कमर में भी उम्मीद सी बहती है।
वो अब भी मानता है तू उसका अभिमान है,
तेरी हर जीत में उसका सम्मान है।
उसे याद हैं तेरी पहली हंसी की रातें,
पहली साइकिल और बचपन की बातें।
मोबाइल पर जब तेरी आवाज़ सुनाई देती है,
वो अपना हर दर्द उसी पल में छुपा लेता है।
“कह देना उससे, मैं बिल्कुल ठीक हूँ,
बस थोड़ी-सी थकान है, और क्या कहूँ।
सीने में दर्द है तो क्या हुआ,
दिल अब भी उसके लिए धड़कता है पूरा।”
कभी लौटकर देख उस बूढ़े चेहरे को,
जिसकी मुस्कान जुड़ी है बस तेरे नाम से।
तू शायद उलझ गया जीवन की राहों में,
पर वो अब भी जुड़ा है तेरे हर कदम की चाहों में।
जब अगली बार घर की देहरी पर आना,
तो केवल मां को ही गले न लगाना।
उस बाप के कंधे पर भी सिर रख देना,
और धीरे से इतना भर कह देना—
“अब तुम टेंशन मत लेना, मैं साथ खड़ा हूँ,
आपके सपनों का आज भी मैं ही बड़ा हूँ।
आप ही से सीखा है हिम्मत का हुनर,
आप ही से पाया है जीवन का सफर।”
क्योंकि वो जो चुपचाप सब सह जाता है,
वही पिता प्रेम का सागर कहलाता है।
उसकी खामोशी को यूँ अनसुना मत करना,
उसके जीते-जी उसे अपना कहना।
कहीं देर न हो जाए इस एहसास में,
कहीं शब्द रह न जाएँ बस इतिहास में।
आज ही गले लगाकर कह देना उसे,
“आप मेरे दिल में हमेशा ज़िंदा हैं।”

32. क्या मैं अब भी प्रेम में हूँ ?

एक दिन यूँ ही मैंने माँ से पूछा था,
“माँ, क्या तुम अब भी पापा से प्रेम करती हो?”
साठ वर्षों की संगिनी चुपचाप मुस्कुरा उठी,
जैसे जीवन का कोई गहरा सत्य समझा रही हो।

उसकी मुस्कान में शब्दों से अधिक अनुभव था,
मानो प्रेम अब एक शांत और स्थिर स्वर था।
मैं घर लौटकर माँ के शब्दों को सोचने लगा,
प्रेम का अर्थ मन ही मन टटोलने लगा।

उन्होंने लिखा था—
“तुम पूछते हो क्या मैं अब भी उन्हें चाहती हूँ?”
मैं केवल मुस्कुरा देती हूँ, तुम्हारी मूर्खता पर नहीं,
बल्कि इसलिए कि प्रेम अब वैसा नहीं रहा जैसा तुम सोचते हो।

अब प्रेम तितलियों की उड़ान जैसा नहीं है,
न आतिशबाज़ी के शोर और जुनून जैसा है।
अब प्रेम एक जड़ की तरह गहरा और शांत है,
जो तूफानों में भी अडिग विश्वास सा है।

अब दिल तेज़-तेज़ नहीं धड़कता है हर पल,
पर आत्मा को देता है एक गहरा सुकून सरल।
हाथ काँपते नहीं हैं जीवन की थकान से,
पर शक्ति मिलती है हर नए दिन की पहचान से।

अब कोई चौंकाने वाला रोमांच नहीं होता,
बस छोटे-छोटे प्यारे अनुष्ठान साथ होते हैं।
एक ही समय की कॉफी का इंतज़ार रहता है,
तौलिया टाँगने पर बहस का सिलसिला चलता है।

जब छींक आती है तो वह चुपचाप पास आता है,
रजाई खींचकर मेरे ऊपर प्यार से डाल जाता है।
फूलों की प्रतीक्षा अब उतनी जरूरी नहीं लगती,
न ही पत्रों की आस मन को उतनी खलती।

जब पीठ दर्द करे तो उसका सहारा चाहिए होता है,
जब मन भीतर से थककर बिखरने लगता है।
वह बिना शोर के बस मौजूद रहता है सदा,
बिना किसी फ़िल्मी वादे के निभाता है वफ़ा।

उसकी एक दृष्टि ही मेरी भाषा समझ जाती है,
साथ बिताया जीवन गुप्त कहानी बन जाती है।
हँसना, थकना और फिर भी साथ चलते जाना,
यही प्रेम का असली अर्थ धीरे-धीरे जाना।

तो क्या मैं अब भी प्रेम में हूँ?
हाँ, पर उस हलचल वाले प्रेम में नहीं।
मैं उस शांति में हूँ जिसे हमने साथ गढ़ा है,
उस विश्वास में हूँ जिसने हमें जोड़ रखा है।

तूफानों में भी वह मेरा सुरक्षित ठिकाना है,
मेरे जीवन का सबसे सुंदर आश्रय पुराना है।
प्रेम अब शब्द नहीं, एक मौन सहमति है,
साथ रहने की एक गहरी आत्मीय प्रतिबद्धता है।

आरंभ की आग अब धीमी रोशनी बन गई है,
जीवन की सच्ची कहानी वहीं कहीं रुक गई है।
मैं अब भी प्रेम में हूँ,
पर उस प्रेम में जो समय के साथ मजबूत हुआ है।

31. धीरे-धीरे छोड़ दीजिए

बढ़ती उम्र की पगडंडी पर जब धूप कुछ नरम पड़ जाए,
और मन थोड़ा थककर जीवन की धुन गुनगुनाने लग जाए।

तब समझ लेना कुछ बातें दिल पर बोझ बन जाती हैं,
कुछ बातों को मुस्कान के साथ छोड़ देना ही भली बात होती है।

यदि कोई आपकी बात को बार-बार भी न समझ पाए,
तो उसे समझाने में अपना मन क्यों दुखी कर जाए।

दुनिया की सोच का ताला आपकी चाबी से खुले,
यह जरूरी नहीं, इसलिए खुद को तनाव से दूर रखें।

दिल की गर्माहट को थोड़ा-सा कम करते जाना,
दूसरों को समझाने का प्रयास भी धीरे से छोड़ देना।

बच्चे जब बड़े होकर अपने निर्णय खुद लेने लगें,
तो उनकी छाया बनकर पीछे-पीछे चलना छोड़ दें।

वे अपनी दुनिया के राजा हैं, उन्हें जीने देना,
अपने अनुभवों के समंदर में स्वयं को रहने देना।

उनकी हर बात को दिल में उलझाकर मत रखना,
धीरे-धीरे चिंता के भार को मन से हटाना।

दुनिया में हर कोई आपकी धुन पर नहीं चल पाएगा,
हर इंसान अपने ही सुर और ताल में जीवन गाएगा।

यदि कुछ लोग आपके विचारों से सहमत न हों,
तो इसे अपने दिल पर भारी मत होने देना।

विचारों का अंतर जीवन का सुंदर संगीत होता है,
इसलिए रंज और शिकायत को धीरे से छोड़ देना।

अगर उम्र के किसी पड़ाव पर लोग आपको न पूछें,
या पीछे से कुछ गलत शब्द भी कहने लगें।

उनकी आवाज़ को अपनी आत्मा तक आने मत देना,
कौन क्या कह रहा है—इस सोच को भी छोड़ देना।

30. अब हम किसे चाहें

चाहने वालों की भीड़ में आज होड़ मची हुई है,
हर कोई दिल में जगह बनाने की जिद लिए खड़ा है।

किसे अपना समझें और किसे सुकून दे पाएं हम,
हर चेहरा मुस्कुराहट का मुखौटा पहने खड़ा है।

अब हम किसे चाहें, यह सवाल दिल को सताने लगा है,
कौन सच्चा है, यह सोच मन को उलझाने लगा है।

किसी की महफ़िल दिखावे की चकाचौंध से भरी लगती है,
और समय भी सच को पहचानने में देर लगाता है।

कभी कोई अपनी बातों से दिल चुरा ले जाता है,
कभी कोई चुप रहकर भी अपना बना जाता है।

कभी किसी की नजरें प्रेम का एहसास जगाती हैं,
कभी खामोशी भी बहुत कुछ कह जाती है।

चाहने वालों की भीड़ में खुद को खोना नहीं है,
दिल की धड़कनों को अब समझदार बनाना है।

प्यार किसी से भी होना संभव बात है,
पर सच्चाई ही रिश्तों की सबसे बड़ी सौगात है।

दिल वहीँ झुकता है जहाँ गर्माहट का बसेरा है,
जहाँ नियत साफ हो और विश्वास का सवेरा है।

चाहत बिना शोर के ही निभाई जाती है,
सच्चे रिश्तों की पहचान समय से हो पाती है।

इसलिए चाहने वालों की भीड़ चाहे जितनी बढ़ जाए,
दिल वही चुने जहाँ सच्चाई मुस्कुराए।

अब हमारा दिल ही बताएगा किसे चाहना है,
क्योंकि दिल का फैसला ही सबसे सच्चा ठिकाना है।

29. हे केशव, मेरे सारथी

जीवन-रण में जब मैं अकेला-सा खड़ा रह जाता हूँ,
हे केशव, तुम ही मेरा कवच बनकर आ जाते हो।
अर्जुन-सा जब मन युद्ध की थकान से भर जाता है,
तब तुम्हारा नाम ही भीतर साहस जगा जाता है।


जब राहें धुंधली-सी लगने लगती हैं जीवन में,
और भीतर का दीपक भी बुझने लगता है मन में,
तब तुम कहीं से एक किरण बनकर आ जाते हो,
हाथों में साहस रखकर आगे बढ़ना सिखलाते हो।


कठिन संकट हो या पीड़ा का भारी अंधकार,
मेरी डगमगाती दृष्टि को तुम देते हो आधार।
तुम रथ के सारथी बन मार्ग दिखाते जाते हो,
मुझे हर मुश्किल से लड़ना भी सिखाते जाते हो।


क्या महंगा क्या सस्ता, अब कोई चिंता नहीं रहती,
मेरा भाग्य और विश्वास तुम्हीं तो बनाते रहते।
दुनिया के हिसाब में हार और जीत बदलती रहती है,
पर तुम कर्म को ही सच्ची साधना कहते रहते।


जब मन अपने ही बुने जालों में उलझ जाता है,
तब तुम्हारा धैर्य मन को फिर राह दिखाता है।
तुम धैर्य का मधुर संगीत मन में बजा देते हो,
जीवन को फिर से सही लय में बाँध देते हो।


गोपियों के प्रिय और अर्जुन के सच्चे सारथी तुम,
द्वारका के राजा और वृंदावन के कान्हा तुम।
कहीं भी रहो, मेरे हृदय में मित्र रूप बसे हो,
मेरे विश्वास और प्रेम के सबसे सुंदर अंश हो।


जैसा हूँ, वैसे ही मुझे स्वीकार तुम्हीं करते हो,
बिना किसी शर्त के सदा प्रेम तुम्हीं करते हो।
न कोई माँग, न कोई सौदा, न कोई हिसाब यहाँ,
सहज निर्मल अपनापन ही तुम्हारा स्वर यहाँ।


तुम्हारे चरणों में रखी मेरी थकान और व्यथा,
अहंकार और पीड़ा सब हो जाती है लुप्त सदा।
मेरे मन की हर गाँठ को तुम खोल दिया करते हो,
मुझको गंधर्व-शक्ति का रूप दिया करते हो।


हे वंशीवट के वासुदेव मेरी आँखें खोल देना,
हर परिस्थिति में तुम्हारा संकेत मुझे देना।
मेरे मन को वह शांति देना गीता के ज्ञान जैसी,
अडिग रहे मेरी आत्मा पर्वत के मान जैसी।


मेरे कर्मों में पवित्रता का दीप जला देना,
संसार में अपनी गंध का प्रकाश फैला देना।
हे माधव, हे श्यामसुंदर, बस इतना वर देना,
मुझे सदा अपने चरणों का आश्रय देना।

28. वक़्त बताएगा

दुनिया अगर तुम्हें कहे—”तुम काबिल नहीं हो,”
तो मुस्कुराकर बस इतना कहना—”वक़्त बताएगा।”

लोग आज भी चाँद में दाग खोज लेते हैं,
फिर तुम्हारी मेहनत की चमक कैसे समझ पाएगा।

जो रास्ता तुमने अपने लिए चुना है,
वही एक दिन तुम्हें मंज़िल तक पहुँचाएगा।

कल तक जो कहते थे—”तुमसे नहीं हो पाएगा,”
वही लोग तालियाँ बजाकर सम्मान दिखाएगा।

समय जब अपनी दिशा बदलने लगता है,
हर झूठ धीरे-धीरे पीछे छूटने लगता है।

सपनों की लौ अगर मन में जलती रहती है,
तो रास्तों की कठिनाई भी आसान दिखती है।

हिम्मत की मिट्टी पर ही सफलता उगती है,
संकल्प की धरती पर ही जीत पनपती है।

अगर तुम गिर भी जाओ तो दुनिया हँसेगी जरूर,
पर तुम्हारी जीत पर वही दुनिया रुकेगी दूर।

किसी के कहने से अपना विश्वास मत तोड़ना,
अपने हुनर और शक्ति को कभी मत छोड़ना।

दिल जो कहे उसी राह पर चलते जाना,
सच्चे सपनों का साथ कभी मत छोड़ना।

सफर चाहे कितना भी लंबा क्यों न हो जाए,
सच्चा प्रयास ही जीवन में रंग लाए।

दुनिया अक्सर वही देखती है जो चमकता हुआ होता है,
अंदर का संघर्ष कम ही किसी को दिखता होता है।

तुम अंधेरों में चमकने वाला सितारा बन जाना,
हर मुश्किल में भी अपनी पहचान बनाना।

कठिनाइयाँ ही तुम्हें मजबूत बनाएँगी,
संघर्ष की आग ही जीवन सजाएँगी।

जिस दिन तुम अपनी पहचान बना लोगे,
दुनिया खुद तुम्हारी कहानी गुनगुनाएगी।

तुम्हारी सफलता का गीत चारों ओर बजेगा,
हर दिल तुम्हारी मेहनत का सम्मान करेगा।

इसलिए जब कोई कहे—”तुम काबिल नहीं हो,”
तो हल्की मुस्कान देकर बस इतना कहना—

“अभी नहीं… लेकिन वक़्त जरूर बताएगा,”
मेहनत का फल एक दिन सबको दिख जाएगा।

चलते रहो अपनी सच्चाई की राह पर सदा,
सपनों की दुनिया तुम्हें जरूर देगी वफ़ा।

हार मानना नहीं, बस आगे बढ़ते जाना,
अपने संघर्ष को ही जीवन का गीत बनाना।

सूरज भी अंधेरे के बाद ही चमकता है,
हर अंधकार एक नया सवेरा रचता है।

खुद पर विश्वास रखो, साहस को साथ रखना,
क्योंकि वक़्त ही सच्चाई का फैसला करता है।

27. बदलाव का मौन संगीत

बदलाव धीरे-धीरे आता है, ठंडी हवा के झोंके जैसा,
रात की खामोशी में बहती किसी अनसुनी दुआ के जैसा।

यह किसी तूफान का शोर नहीं, न अचानक टूटता सपना है,
यह भीतर जन्मी समझ का धीरे-धीरे बना हुआ पहरा है।

शुरुआत में हम पहचान भी नहीं पाते बदलाव की आहट,
कुछ हल्का-सा हिलता है मन के भीतर, जैसे कोई चुपचाप।

पुरानी आदतें धीरे-धीरे टूटने लग जाती हैं,
सोच के जंग लगे ताले खुद ही खुलने लग जाते हैं।

दिल की धरती पर नई उम्मीदों की हरियाली उगने लगती है,
अंदर ही अंदर जीवन की कहानी बदलने लगती है।

कदम भी अनजाने में अपना रास्ता बदल लेते हैं,
नज़रें भी नई दिशा की ओर चलना सीख लेती हैं।

चलने का अंदाज़ भी धीरे-धीरे नया हो जाता है,
बिना बताए जीवन का रंग भी बदल जाता है।

लोग कहते हैं—”तुम अब पहले जैसे नहीं रहे,”
पर परिवर्तन का अर्थ वे कभी समझ नहीं पाए।

परिवर्तन कोई तूफान से जन्मा हुआ परिणाम नहीं होता,
यह भीतर पनपी हजारों छोटी समझों का पहाड़ होता।

समय अपना काम चुपचाप करता रहता है,
जैसे धीमी आँच पर कोई सपना पकता रहता है।

अधूरी इच्छाओं के आँसू हिम्मत में बदल जाते हैं,
टूटे हुए विश्वास फिर से जीवन में ढल जाते हैं।

एक दिन अचानक बदलाव शेर की दहाड़ बन जाता है,
जो कभी महसूस नहीं हुआ, वही सत्य बन जाता है।

उस पल जीवन अपनी पूरी सच्चाई में दिखाई देता है,
पुराना अंधकार पीछे कहीं दूर छूट जाता है।

इंसान खुद को पहले से अधिक मजबूत पाता है,
अपनी आत्मा के उजाले को फिर से पहचान जाता है।

सच यही है कि बदलाव धीरे-धीरे आता है,
पर जब आता है, सब कुछ नया बना जाता है।

नई आँखें, नए सपने, नई सोच साथ लाता है,
जीवन को एक नया अध्याय दे जाता है।

हर रात के बाद सुबह की किरण अवश्य आती है,
अँधियारे को दूर भगाकर रोशनी फैलाती है।

इंसान समझ जाता है जीवन का यह नियम पुराना,
धैर्य ही है बदलाव का सबसे सुंदर बहाना।

बदलाव भीतर ही भीतर मौन होकर बढ़ता जाता है,
मन की गहराइयों में नया संसार रचता जाता है।

एक छोटी सी समझ भी जीवन बदल सकती है,
एक किरण भी रात को सुबह बना सकती है।

इसलिए समय के साथ खुद को बदलते रहना,
सत्य और साहस की राह पर चलते रहना।

जब बदलाव मन के भीतर घर बना लेता है,
तब जीवन नया जन्म लेकर फिर से खिल उठता है।

26. जब तुम आगे बढ़ते हो

जब तुम जीवन में आगे बढ़ने लगते हो,
कुछ लोग भीतर ही भीतर डरने लगते हैं।


तुम्हारी उड़ान उन्हें असुरक्षित-सी लगती है,
क्योंकि सच्चाई उनकी छिपी हुई परतें खोल देती है।


तुम्हारी ईमानदारी किसी के भ्रम को तोड़ देती है,
तुम्हारी सीमाएँ उनकी आदतों से जा टकराती हैं।


तुम्हारा साहस उनके भीतर के डर को जगा देता है,
और तुम्हारी रोशनी अंधेरों को सामने ला देता है।


वे तुमसे नहीं, अपने ही दर्द से लड़ते रहते हैं,
पर तुम्हें देखकर अपने सच से डरते रहते हैं।


तुम केवल एक ऐसा आईना बन जाते हो,
जिसमें उन्हें अपना ही अक्स नजर आता हो।


कभी-कभी नफरत असली नफरत नहीं हुआ करती,
वह अधूरी कहानियों का दर्द बनकर छुपी रहती।


शब्दों में जो कहा नहीं जा सका, वही दर्द होता है,
जो भीतर ही भीतर चुपचाप रोता रहता है।


इसलिए जब लोग दूर होने लगते हैं या बदल जाते हैं,
और अपने व्यवहार से धीरे-धीरे ठंडे पड़ जाते हैं।


खुद से कभी यह सवाल मत करते रहना,
“मैंने क्या गलत किया?” सोचकर मत घबराना।


धीरे से मन को समझाना और यह जान लेना,
“मैंने शायद उन्हें अपना असली रूप दिखा दिया।”


याद रखना—सच की रोशनी कभी अपराध नहीं होती,
और सच्चाई से बढ़कर कोई पहचान नहीं होती।

25. साहस की आवाज़

चुप रहकर जीना भी कोई सच्चा जीवन नहीं होता,
मन की आवाज़ दबाकर इंसान कभी खुश नहीं होता।
जो कहना था अगर दिल की बात कह न सके,
तो शब्दों का पूरा संसार धीरे-धीरे मिटने लगे।


जब सोचने की शक्ति भी मन के भीतर रुक जाती है,
तो इंसान की आत्मा जैसे अंदर ही अंदर झुक जाती है।
जीवन केवल धड़कनों का हिसाब नहीं हुआ करता,
यह जज़्बातों और सपनों का सफर हुआ करता।


जीवन एक सवालों से भरी नदी की तरह बहता है,
हर सपना आकाश की ऊँचाइयों में रहना चाहता है।
जो अपने सपनों से दूर भागते चले जाते हैं,
वे जीवन के असली उजाले को खो जाते हैं।


कहते हैं शरीर एक बार ही अंत को प्राप्त करता है,
पर खामोशी में इंसान बार-बार भीतर ही मरता है।
जो सोचता है, वह अपने जीवन को बदल सकता है,
जो बोलता है सच को, वह खुद को संभाल सकता है।


जो अपने सच्चे स्वर में जीवन जीना जानता है,
वही वास्तव में खुद को जिंदा कहलवाता है।
जब दिल चाहे तो अपनी बात जरूर कहना,
मन उलझे तो अपने विचारों को साफ रखना।


डर और संकोच को कभी मन में जगह न देना,
साहस को ही अपने जीवन का साथी बना लेना।
जिंदगी वहीं है जहाँ हिम्मत साँस लेती है,
सपनों को भी उड़ने की ताकत देती है।


जिंदा वही है जो खुद को खोने नहीं देता है,
जो हिम्मत की भाषा को अपनाकर चलता रहता है।

24. अस्तित्व की पुकार

अस्तित्व चुपके से तुम्हें जगाने की बात करता है,
“उठो, जीवन तुम्हें अपने साथ बुलाता है।”
यदि खुशियों की बरसात जीवन में लानी है,
तो पहले मन के आकाश को साफ़ करना कहानी है।


ब्रह्मांड तुम्हें मुस्कुराते हुए देखना चाहता है,
पर तुम खुद ही दीवारें खड़ी कर लेते हो यहाँ।
जहाँ प्रेम के फूलों को खिलना चाहिए था,
वहाँ डर और शंका का बीज बो देते हो सदा।


जीवन कभी भी इतना कठोर नहीं हुआ करता है,
बस मनुष्य ही अपनी जड़ता में उलझा रहता है।
जो मिला है उसे कम समझकर दुखी होते रहते हैं,
और खोए हुए अतीत में ही अटके रहते हैं।


अपने ही बनाए हुए पिंजरों से बाहर निकल जाओ,
सपनों की नई उड़ान की दिशा में कदम बढ़ाओ।
अस्तित्व कभी थककर रुकने वाला नहीं होता है,
वह तुम्हें हर पल पुकारता ही रहता है।


निस्वार्थ और सरल राहों को अपना साथी बनाओ,
सत्य और प्रेम के पथ पर आगे बढ़ते जाओ।
डर और संशय को मन से धीरे-धीरे हटाओ,
आशा और विश्वास का दीप हृदय में जलाओ।


जीवन का संगीत तभी सुंदर बन पाता है,
जब मन खुशी और शांति से भर जाता है।
इसलिए स्वयं को पहचानो और आगे बढ़ते जाओ,
अस्तित्व की पुकार को जीवन में साकार बनाओ।