63. हर हार में तुम

हार जाते हैं हम तुम्हें पाने में,
     दिल के सपनों को सजाने में।

हर धड़कन पर नाम तुम्हारा,
     फिर खुद को समझाने में।

हार जाते हैं तुमको भूलने में,
     यादों के दीपक बुझाने में।

तेरी हँसी का साया चलता,
     अश्कों को भी छुपाने में।

तेरी बातें गूंजें हवाओं में,
     नगमे बनें इन फ़िज़ाओं में।

दिल की धड़कन कहती चुपके,
     तुम बसते हो इन दुआओं में।

हर बार सोचा आगे बढ़ेंगे,
     रास्ते नए खुद ही गढ़ेंगे।

पर कदम ठिठक जाते फिर से,
     तेरे ख्यालों में ही अड़ेंगे।

जज़्बातों से बंधे हुए हैं,
     तेरे सपनों में ढले हुए हैं।

शायद प्यार का यही फलसफा,
     हर हार में जीत छुपे हुए है।

62. तुम बिन अधूरी ज़िंदगी

गुज़ार ही लोगे तुम अपनी ज़िंदगी,
मुझसे तो ये हुनर भी नहीं होता।
तुम बिन जीने का जो सलीका है,
वो मुझको कभी नहीं आता।

हर साँस में बस नाम तुम्हारा,
दिल ने सदा तुम्हें ही पुकारा।
तुम बिन कोई लम्हा ऐसा नहीं,
जो तन्हा दिल ने खुद से सँवारा।

तुम दूर गए पर ख्वाब वही हैं,
यादों के सिलसिले सभी हैं।
दिल से रिश्ता अब भी गहरा,
धड़कनों में बस तुम ही तुम हो ठहरा।

तुमने हँसकर जीना सीख लिया,
दर्द को भी जैसे पीना सीख लिया।
मुझको तो आँसू छुपाना भी,
अब तक ठीक से नहीं आता।

कहते हैं वक्त मरहम रखता,
हर जख्म को धीरे भरता।
पर इस दिल की सच्ची पीड़ा,
कोई समझ नहीं पाता।

भूलने की कोशिश करता हूँ,
खुद से ही रोज़ लड़ता हूँ।
तेरी झलक से जो उजाला था,
वो अब अँधेरों में जलता नहीं जाता।

61. अनमोल रिश्तों का खजाना

कुछ रिश्ते अनमोल रत्न से,
कुछ जीवन के मधुर धन से।
ये भावों के सच्चे मोती,
मन की थाली में जैसे ज्योति।

     हर धड़कन में एहसास बसे,
     सपनों के मीठे सुवास बसे।
     जो दिल के बेहद पास रहें,
     वो जीवन भर खास रहें।

कुछ रिश्ते नाम बिना खिलते,
सूखे वन में जैसे फूल मिलते।
कभी दोस्ती की छाँव बनें,
कभी प्रेम की नाव बनें।

     इनसे जीवन अर्थ पाता,
     सूना मन भी हर्षित गाता।
     संग इनके दुःख हल्का होता,
     बंजर में जैसे सावन होता।

रंग खुशी के ये भरते हैं,
सूने पल भी ये सजते हैं।
कुछ रिश्ते वरदान लगें,
जन्नत के समान लगें।

     सच्चे भावों की गोद में पलते,
     विश्वास के दीप सदा जलते।
     इनसे ही जीवन गूंजता है,
    अनमोल रिश्ता ही पूजता है।

60. जागृति का आह्वान

हम भी चलें अब रौशनी की ओर,
अंधेरों से कर लें नया सा शोर।

सपनों के दीप जलें गगन में,
आशा के रंग भरें जीवन में।

हर ख्वाब को सच करना है,
अपने भीतर दीप धरना है।

कोई तो है जो जाग रहा,
सोई चेतना को जगा रहा।

राहें भले अंधेरी हों,
मन में डर की फेरी हों।

साहस का दीप जलाना है,
हर भय को दूर भगाना है।

कोई तो हाथ बढ़ाएगा,
गिरकर भी हमें उठाएगा।

हर मुश्किल में राह दिखाए,
मंज़िल का संकेत बताए।

वक्त की धारा तीव्र सही,
पर हौसला हमारा कम नहीं।

जज़्बा है सबसे निराला,
जीवन का बने उजाला।

उम्मीद की राह पर बढ़ जाएं,
स्वप्नों को सच कर दिखलाएं।

कोई तो है जो जाग गया,
अब हम भी जागें — यही प्रण लिया।

59. आईनों का शहर

अब किसी आईने पे भरोसा नहीं,
हर अक्स में सच्चाई का किस्सा नहीं।
जो नहीं होता, वही दिखा देते हैं लोग,
ख्वाबों को भी सच बता देते हैं लोग।

     चुप रहो तो तन्हाई का इल्ज़ाम मिले,
     बोल दो तो चर्चाओं के नाम मिले।
     सच कहो तो दुश्मन ठहरा देते हैं,
     झूठ को सौ बार सजा देते हैं।

रिश्तों को भी बाजार बना देते हैं,
अपनापन यूँ ही गँवा देते हैं।
उम्मीदों का बोझ लाद देते हैं,
साथ चलकर भी फासले बढ़ा देते हैं।

     आईनों को सच बोलने की सज़ा मिली,
     धूल की चादर उन पर चढ़ा दी गई।
     चेहरों पर नक़ाब सजा देते हैं,
     हर अक्स को नया रंग दे देते हैं।

हमने चाहा था सुकून की छाँव,
मिला बस सवालों का गाँव।
दिल की बात समझे बिना,
दूरी की दीवार उठा देते हैं लोग।

     जो हक़ीक़त थी, अफसाना बना दी,
     सच की हर लौ बुझा दी।
     खामोशी को भी शोर बना देते हैं,
     आँसुओं को मौसम बता देते हैं।

डूबते को किनारा दिखाते हैं,
फिर वही किनारा हटा जाते हैं।
दोस्ती का चोला पहनाते हैं,
दिल का सौदा कर जाते हैं।

     रौशनी माँगो तो घर जला दें,
     चिरागों को भी आंधी बना दें।
     छोटे लम्हों को बड़ा बना दें,
     हर बात का तमाशा रचा दें।

इक चेहरे पर कई चेहरे लगा लेते हैं,
सच की राहों को धुंधला कर देते हैं।
अपनों के बीच भी तन्हा कर दें,
ज़ख्मों को फिर से हरा कर दें।

     मोहब्बत की बातें महफिलों में हों,
     दिलों में फिर भी दीवारें हों।
     हर अपने को अजनबी बना दें,
     प्यार को भी सौदा बना दें।

अब किसी आईने पे भरोसा नहीं,
इस शहर में कोई वैसा नहीं।
हर अक्स बदलता रहता है यहाँ,
सच भी बिकता रहता है यहाँ।

58. शून्यता के संबंध


संबंध की डोरी नाज़ुक सही,
     पर विश्वास में अडिग रहती है।
शब्दों से परे एक दुनिया,
     जहाँ मौन भी बातें कहती है।
रिक्तता में जो साथ निभाए,
     वही सच्चा अपना कहलाए।
शून्य क्षणों की गहराई में,
     जो हाथ थामे, वही सहारा बन जाए।
न दिखावे की चकाचौंध हो,
     न स्वार्थ का कोई व्यापार।
सादगी में भी जो महके,
     वही स्नेह का सच्चा संसार।
जो बिना कहे सब समझे,
     आँखों से पढ़ ले दिल की बात।
जिसके होने से सज जाए,
.     जीवन की हर एक सौगात।
सुख में तो मिलते हैं सब,
     दुख में जो खड़ा वही अपना।
आँधियों में जो दीप बने,
     वही रिश्ता सबसे सपना।
अपेक्षा का न हो कोई बोझ,
     न मोल-भाव की दीवार।
समर्पण की हो बस धड़कन,
     लगाव का पावन विस्तार।
जो टूटे मन को जोड़ सके,
     थके कदमों को दे उड़ान।
अंधेरों में जो राह दिखाए,
     वही संबंध सच्चा वरदान।
शून्यता में जो फूल खिलाए,
     उम्मीदों की कोमल डोर।
विश्वास का दीप जला दे,
     जब जीवन लगे चौराहे पर ठौर।
हर मोड़ पर साथ चले जो,
     चाहे राहें हों दुश्वार।
डगमग कदमों को थाम ले,
     बन जाए साहस का आधार।
न शर्तों में बँधा हो रिश्ता,
     न स्वार्थों की हो जंजीर।
मन से मन का हो संवाद,
     स्नेह रहे बस गंभीर।
जब सब कुछ पीछे छूट जाए,
     और समय भी मुड़ जाए।
जो रिक्तता में भी साथ दे,
     वही संबंध अमर कहलाए।
जीवन का असली सार वही,
     जो हर दौर में साथ निभाए।
शून्य क्षणों की नीरवता में,
    अर्थ नया हर बार रच जाए।

57. पापों के साए

जब भी ठोकर खाकर गिरता हूँ,
     अपने ही पापों से डरता हूँ।
बीते लम्हे साए बन जाते,
     रातों में चुपचाप बुलाते।

खामोशी चीख-सी लगती है,
     हर सांस में टीस-सी जगती है।
भूत पापों के घेरे रहते,
     मन के आँगन डेरा रखते।

ख्वाबों में डर आकार लेते,
     जख्म पुराने फिर से चेतें।
दस्तक देती यादों की आहट,
     दिल में उठती टीस की सरगम।

क्यों गलती की ऐसी सजा है,
     रूह तक काँपे हर सदा है।
अंधियारे में साए चलते,
     मन के दीपक धीरे जलते।

रात गहराए, भय बढ़ जाता,
     सन्नाटा भी शोर मचाता।
काश मुझे क्षमा कर दे खुदा,
     धो दे मन का सारा गिला।

दिल के आईने से धुंध हटे,
     पछतावे के बादल सब छँटें।
सवेरा आए नई किरण संग,
     जीवन भर दे उजला रंग।

56. समाज की तीन गुत्थियाँ

तीन समस्याएँ बढ़ती जाएँ,
समाज की राहें उलझती जाएँ।

पहली पीड़ा बेरोज़गारी,
     सपनों पर छाई लाचारी।
हाथों में श्रम, मगर काम नहीं,
     आशा का सूरज तमाम नहीं।
रोज़ी की राह में भटके इंसान,
     धीरे-धीरे टूटे अरमान।

दूजी विडंबना अजीब कहानी,
     काम पड़े हैं, पर नहीं है प्राणी।
खेत-खलिहान सूने पड़े,
     कारखानों के पहिए जड़े।
कौशल की कसौटी कौन चढ़े,
     योग्यता की ज्योति कहाँ जले?
श्रम का सूरज धुंध में खोए,
     अवसर के दीपक कम ही संजोए।

तीसरी चिंता सबसे भारी,
     कर्तव्य भूले नौकरीधारी।
दफ़्तर में सपनों के जाल,
     समय हुआ जैसे कंगाल।
मेहनत का मान कहाँ दिखे,
    ईमान की लौ क्यों न बहे?

इन तीनों गाँठों का हल यही,
हुनर-सम्मान की राह सही।
जब हर हाथ को श्रम का मान,
तभी बनेगा सशक्त राष्ट्र महान।

55. नारी शक्ति वंदन

माँ की ममता सबसे न्यारी,
     हर दुख में बनती वह सहारा।
प्यार लुटाए, दीप जलाए,
     जीवन कर दे उजियारा।
बहन-बेटी बन दे दुलार,
     घर-आँगन में घोले बहार।
प्यार का सागर, ममता गंगा,
     हर रिश्ते में अनुपम प्यार।
जय हो नारी, शक्ति तुम्हारी,
     तुमसे है संसार सारा।
सरस्वती बन विद्या देती,
     लक्ष्मी बन भरती भंडारा।
दुर्गा बन साहस जगाती,
     अन्याय से लड़े निरंतर।
जब-जब संकट घिर आए,
     बन जाए रण की रणचंडी प्रखर।
सहनशीलता की मूर्ति तुम,
     करुणा का पावन विस्तार।
त्याग-तपस्या की ज्योति जलाए,
     हर पथ कर दे साकार।
माँ बन जीवन को संवारो,
     संगिनी बन दो आधार।
बेटी बन आशा जगाओ,
     बहन बनो सुख का संसार।
हर रूप में तुम पूजनीय,
     स्नेह-प्रेम की सूरत।
विश्व नारी दिवस की बेला,
     स्वीकारो शत-शत वंदन-स्मृत।

54. तेरे इश्क़ का रंग

तो करो हमारे इश्क़ में रंगने की आरज़ू,
     हम बहके बादलों से फागुन छीन लाएँगे।

तेरे नाम की खुशबू से साँसें महकेंगी,
     तेरे इशारों पे मौसम भी झुकाएँगे।

चुप थी हवाएँ अब तक, आज गीत गाएँगी,
     तेरी बाहों की छाँव में धूप सो जाएगी।

चाँदनी झूमकर तेरे नग़मे सुनाएगी,
     तेरी हँसी से हर रात महफ़िल सजाएगी।

तेरी नज़रों के जादू में रंग जाएगा जहाँ,
     फूल खिल उठेंगे, महकेगा आसमाँ।

बस तू इक बार कह दे मुझे अपना सनम,
     हम कायनात से तेरा हर रंग ले आएँगे हम।

सावन से माँग लेंगे तेरे लिए बारिशें,
     बहारों से चुरा लाएँगे तेरे वास्ते खुशबुएँ।

जो चाहे तू, वही तक़दीर में लिखवा देंगे,
     तेरे इश्क़ में हम खुदा से भी भिड़ जाएँगे।

धड़कनों में तेरी चाहत का सुर बसाएँगे,
     हर लम्हे को तेरे नाम से सजाएँगे।

तेरे ख्वाबों की राहों पे दीप जलाएँगे,
     हर अँधेरे को मिलकर दूर भगाएँगे।

तू बस आरज़ू कर हमारे रंग में ढलने की,
     हम बादलों से फिर फागुन छीन लाएँगे।

53. पहली बार खुद की क़दर

पहली बार जब बिस्तर पर पड़ी,
तब अपनी कीमत समझ में पड़ी।

झाड़ू-पोछा, बर्तन-कपड़े,
हर काम के भाव थे चढ़े।

खाना चार हज़ार बताया,
चाय-नाश्ते का भी हिसाब लगाया।

ड्रेसिंग, सफ़ाई, सारा काम,
दस हज़ार में भी अधूरा नाम।

घर में कोई बाई टिक न पाई,
और मैं बरसों से यहाँ निभाई।

बिना सैलरी के सेवा की,
चुपचाप हर जिम्मेदारी ली।

बीस बरस यूँ ही गुज़र गए,
सपनों से घर के रंग भर गए।

कहते रहे—“कमाती नहीं”,
पर बचत मेरी गिनी नहीं।

मकान को घर बनाया मैंने,
हर कोना सजाया अपने सपने से।

तुम बाहर दुनिया से लड़े,
मैं भीतर दीवारों से जूझी खड़े।

तन्हाई से भी बात की,
हर आहट में सौगात दी।

काश समझ पाते मेरे काम,
न कहते इसे बस एक नाम।

“घरवाली” से आगे पहचान,
एक इंसान का भी हो सम्मान।

अब जब थकान ने घेरा डाला,
तब खुद का मूल्य नज़र में डाला।

क्योंकि मैं थी तो घर भी था,
मेरे होने से ही सुकून भी था।

52. ज़िंदगी की विडंबना

ज़िंदगी अजीब तमाशा है, हर चेहरा अपना-सा लगता है।
पर भीतर कहीं गणित छुपा, हर रिश्ता लाभ में तौलता है।

वकील की दुआ यही रहे, तू किसी मुकदमे में फँस जाए।
कानून की मोटी किताबें, तेरे ही ख़िलाफ़ खुल जाएँ।

डॉक्टर चाहे तू बीमार पड़े, तेरे दर्द में उसकी कमाई हो।
तेरी दवा और तेरी जाँच से, उसकी क्लिनिक में रौनक छाई हो।

पुलिसवाला देखे शक की नज़र, तेरे जुर्म में उसका मान बढ़े।
तेरी हथकड़ी उसकी शोभा, तेरी गिरफ़्तारी से पद चढ़े।

गुरुजन चाहे तू नासमझ रहे, ताकि पाठशाला चलती जाए।
तेरी कमजोरी की सीढ़ी से, उसकी विद्या फलती जाए।

मकान मालिक मन ही मन कहे, तू कभी अपना घर न बनाए।
तेरे किराए की हर तारीख़, उसकी जेब में सुख भर लाए।

दाँतों का डॉक्टर मुस्काए, जब दर्द तेरे दाँतों में हो।
तेरी सड़न उसके लिए, रोज़ी-रोटी का संयोग हो।

मकैनिक चाहे गाड़ी रुके, रास्ते में तेरा पहिया थमे।
तेरी परेशानी के पल से ही, उसके औज़ारों के दिन जमे।

कफ़न बेचने वाला सोचे, मौत से उसका व्यापार सजे।
तेरे अंतिम सफ़र की आहट से, उसका भविष्य आगे बढ़े।

हर कोई अपने हित में डूबा, तेरी हालत से लाभ गिने।
तेरी मुश्किल उसका अवसर, तेरी ठोकर उसकी सीढ़ी बने।

पर एक अजीब सा मोड़ भी है, जो सोच को हिला जाता है।
वो है चोर जो दुआ करे, तू चैन से सोता रह जाता है।
वो चाहता है घर में सुख हो, ताकि खिड़की बंद ही रहे।

तेरा जीवन सुरक्षित बीते, ताकि उसे मौक़ा न मिले।

विडंबना है इस जीवन की, कैसा गहरा ये हिसाब।

जो तुझे लूटने निकला था, वही दे जाए सच्चा ख़्वाब।

51. ज़िंदगी को अपनाया कर

ख़ुद को इतना भी मत बचाया कर,
बारिश आए तो भीग जाया कर।

चाँद कोई थाली में नहीं देगा,
अपने चेहरे से जगमगाया कर।

दर्द हीरा है, दर्द मोती है,
आँखों से इसे न बहाया कर।

इन लम्हों को सहेज कर दिल में,
अपनी ताक़त बनाया कर।

होंठ हसीन हैं मुस्कान के लिए,
बातों में रस घोल जाया कर।

धूप अगर मायूस लौटे,
छत पे बहाना बन आया कर।

दिल मिलाना मुश्किल सही,
हाथ तो आगे बढ़ाया कर।

तन्हाइयों से यूँ न घबराया,
खुद से भी गुफ़्तगू किया कर।

आईने में झाँक के देख कभी,
खुद को भी सराहा कर।

हर सवाल का जवाब न दे,
कभी चुप रह समझाया कर।

हर मोड़ नई कहानी लाए,
ज़िंदगी को यूँ अपनाया कर।

पगडंडियों से दोस्ती कर,
शहर की दौड़ से छुट्टी लिया कर।

जहाँ दिल को सुकून मिले,
उन राहों पर भी जाया कर।

ख़्वाब सिर्फ़ सोने के नहीं,
उन्हें सच में आज़माया कर।

गिर भी जाए तो शिकवा नहीं,
हर बार खुद को उठाया कर।

जो अपना न बन सका कोई,
खुद से न दूर जाया कर।

दिल की धड़कन कुछ कहती है,
उसकी आवाज़ सुन जाया कर।

सपने सब देखा करते हैं,
तू हौसलों को जगाया कर।

हर सुबह नई शुरुआत है,
कल की फिक्र भुलाया कर।

बीते लम्हों की धूल झाड़,
नए रंगों से सजाया कर।

हँसी को आदत बना ले,
आँसू को कम ही बुलाया कर।

छोटी खुशियों को गले लगा,
रंजिश को दूर भगाया कर।

ये जीवन तेरा अपना है,
इसे खुलकर निभाया कर।

ख़ुद को इतना भी मत रोका कर,
ज़िंदगी को जी भर अपनाया कर।

50. सब्र का आख़िरी अश्क

पलकों की हद लाँघ कर, दामन पे आ गिरा।
एक अश्क मेरे सब्र की, तौहीन कर गया।

बरसों से दिल में जो, तूफ़ान छुपाए बैठा था।
हर दर्द को हँसी की, चादर में ढाँपे बैठा था।

टूटी थीं साँसें भीतर, नींदें भी बिखरी थीं।
फिर भी हर सुबह खुद को, सपनों में जकड़े बैठा था।

हर घाव पे मुस्कान रखी, चेहरा नया बना लिया।
दुनिया को कुछ न दिखे, ऐसा नक़ाब सजा लिया।

मगर उस रोज़ जब तुमने, किसी और का नाम लिया।
नज़रें मेरी आँखों से, चुपके से फेर लिया।

दिल की ऊँची मीनार से, एक ईंट सरक गई।
सालों की मज़बूत ख़ामोशी, अंदर ही दरक गई।

जो अश्क कैद था बरसों से, पलकों की सलाखों में।
आज आज़ाद हो बह निकला, मेरे ही दामन की राहों में।

वो सिर्फ़ एक आँसू न था, ख़ामोशी की चिट्ठी था।
जिसमें लिखा था थक कर—“अब बस… बहुत हो चुका।”

दिल चीखना चाहता था, पर आवाज़ दगा दे गई।
एक कतरा बोल गया सब, सब्र नज़रें छोड़ गया।

लोगों ने पूछा हँसकर—“क्यों उदास हो आजकल?”
मैंने कहा “कुछ नहीं…”, और छुपा लिया फिर हलचल।

सच ये है कि नींद नहीं आती, और आए तो ख़्वाब तुम्हारे।
हर रात वही कहानी, वही अधूरे इशारे।

वो एक अश्क अब रोज़, पलकों पे दस्तक देता है।
याद दिलाता हर पल— सब्र का भी किनारा होता है।

हर सहने की सीमा होती, हर चुप्पी का स्वर होता है।
जो बाहर आ ही जाता है, जब दिल बहुत बेबस होता है।

अब मैं जान गया हूँ ये, आँसू भी सच कहते हैं।
जब शब्द साथ न दें, तो अश्क बयान करते हैं।

पलकों की हद लाँघ कर जो, दामन पे आ गिरा था।
वो कतरा ही बता गया— सब्र भी कभी थका

49. जनता की हुंकार

सिंहासन खाली करो,
कि जनता अब आती है।

     न्याय-अग्नि सी धधकती,
     नई वेदी सजाती है।

भूखे पेट भी जिसने,
सपनों को था पाला।

     अब जागा है वो जन-मन,
     तोड़ चुका है जाला।

आँसू अब अंगार हुए,
सवाल बने तलवार।

     झूठ की चादर फट जाएगी,
     सच की होगी बौछार।

महलों में बैठे सुन लें,
नक़ाब नहीं बच पाएगा।

     हर गद्दार और जालिम का,
     चेहरा सामने आएगा।

ये भीड़ नहीं जनसागर है,
जिसे न रोके दीवार।

     धर्म-जाति सब हारेंगे,
     जीतेगा जन-विचार।

रोटी का जो हक छीना,
वो अब लौटाया जाएगा।

     हर अन्याय का हिसाब,
     ब्याज समेत चुकाया जाएगा।

हर नारे में आग जगी,
हर कदम नई मिसाल।

     सिंहासन खाली करो,
     आया जनता का काल।

48. तेरी ही मेहर

ये जो न्यामत मिली है मुझे,
ये जो साँसें चल रही हैं।
धड़कनों की मधुर लय में,
मानो वीणा बज रही है।

     हर सवेरा सुनहरा लगता,
     हर निशा में नूर है।
     मेरे जीवन की गागर में,
     तेरा ही भरपूर है।

करूँ ईश्वर तेरा शुक्रिया,
हर लम्हा, हर बात पर।
तेरी ही छाया में खड़ा हूँ,
तेरे ही प्रभात पर।

     दुःख को तू कफूर करे,
     सुख का दे संसार।
     हर संकट में बन जाता,
     तू मेरा आधार।

तेरा न्याय अपार प्रभु,
तेरी रचना महान।
हर रेखा में लिखा हुआ,
तेरा ही विधान।

     कभी आँसू, कभी मुस्कान,
     दोनों तेरा खेल।
     तेरी लीला अद्भुत लगती,
     हर दिन एक नया मेल।

जब-जब गिरा, तूने थामा,
टूटे मन को जोड़ा।
खोया जब खुद को मैंने,
तूने फिर से मोड़ा।

     मैं तो धूल बराबर हूँ,
     तू ही सच्चा रहबर।
     तू ही धरती, तू ही अम्बर,
     तू ही मेरा अंबर।

शब्द सभी छोटे पड़ते,
तेरी महिमा गाने को।
तू ही मेरी हर प्रेरणा,
जीवन सजाने को।

     शुक्र है तेरे न्याय का,
     तेरे पावन विधान का।
     तेरी कृपा से ही टिका हूँ,
     अपने आत्म-सम्मान का।

अंधियारे में दीप बने,
जब कोई न साथ।
भटकूँ तो तू राह दिखाए,
थकूँ तो दे विश्राम।

     भूलूँ तेरा नाम अगर,
     फिर भी दे पहचान।
     जो भी हूँ मैं आज प्रभु,
     सब तेरा ही दान।

तेरी कृपा असीम है,
तेरा प्रेम संजीवनी।
तू ही मेरा सारथी,
तू ही मेरी जीवनी।

47. जाम और ज़मीर

हे रम-प्रेमी ग़ालिब के भाई,
हाथों में तेरे जाम की मलाई।

साक़ी से गिलास भरवाया तूने,
पर दिल का हाल कब समझाया तूने?

महफ़िल में शेर सुनाता रहा,
दर्द भी अपना ही पिलाता रहा।

जाम कितना था, ये बात नहीं,
दिल में छुपी थी लाचारी कहीं।

शौक़ में खुद को मत जला,
नशे में अपना घर मत जला।

जिंदगी में भी रंग सजा,
हर खुशी को दिल से रचा।

नदी-नालों की हूरें झूठी,
ख़्वाबों की दुनिया बहुत ही रूठी।

जो शबाब दे, वो शबख़ून करे,
जो जाम दे, ज़हर भी भरे।

साक़ी की बातों में मत आ,
अपनी राहों को मत भुला।

पैमाना बस उतना ही ले,
होश रहे, दुनिया भी दिखे।

जश्न रहे पर ज़मीर भी साथ,
निगाहों में सच्चाई की बात।

धुएँ में सच को मत जलाना,
लफ़्ज़ों से रोशनी जगाना।

ग़ालिब के हमदर्द शायर तू,
कलम भी है तेरे हाथ में यूँ।

कभी जाम रख, कभी कलम उठा,
अपनी पहचान को यूँ न मिटा।

हद में रख जाम की रवानी,
वरना खो जाएगी कहानी।

जो दिल से निकली सच्ची बात,
डूब न जाए नशे की रात।

46. कानों की आत्मकथा

हम हैं कान…
जी हाँ वही, दो अनजान।

चुपचाप सब कुछ सुनते हैं,
पर खुद कभी न सुने जाते हैं।

हम दो हैं जुड़वां भाई,
लेफ्टू-राइटू नाम रखाई।

किस्मत ने ऐसा खेल रचा,
एक-दूजे को न देख सका।

पैदा होते ही श्राप मिला,
उल्टी दिशा में टंगा किला।

Zoom मीटिंग भी न हो पाई,
ज़िंदगी भर दूरी निभाई।

हमें मिला बस सुनने का काम,
ऑडियो रिकॉर्डर सुबह-शाम।

गालियाँ हों या मीठी बात,
सब दर्ज है दिन और रात।

धीरे-धीरे खूंटी समझे गए,
चश्मे-मास्क हम पर टंगे।

एयरफोन ठूसे, बाल कटे,
दर्द हमारे हिस्से पड़े।

अरे चश्मा आँखों के लिए है,
फिर हम पर क्यों लटकाए है?

हम कोई हैंगर थोड़े हैं,
जो बोझ सभी का ढोते हैं।

बचपन में टीचर झिंझोड़े,
“कान खींच दूँगा!” शब्द छोड़े।

जैसे खींचने से बुद्धि जागे,
हम ही हर सज़ा को भोगे।

जवानी आई, छेद हुए,
झुमके-बालियाँ हम पर सजे।

बोरवेल हमने झेला भाई,
तारीफ चेहरे ने पाई।

कानों के लिए न क्रीम कोई,
न कविता में तारीफ होई।

आँखों-होंठों का गुणगान,
हम पर बस कट और तान।

बाल कटाते ब्लेड जो चलती,
हम पर ही वह रेखा जलती।

डिटॉल कहता “शेरू चुप हो”,
दर्द मगर फिर भी न थमो।

अब मास्क युग भी आ गया,
हुक हमारा ही पा गया।

सरकारी खूंटी समझ लिया,
हर बोझ हमें ही दे दिया।

न रो सकते, न कुछ कह पाते,
बस लटके-लटके मुस्काते।

सब सुन लेते, राज छुपाते,
चुप रहकर भी साथ निभाते।

तो अगली बार जो मास्क लगाओ,
या चश्मा हम पर टिकाओ।

झुमका पहनो, गीत सुनो,
बस “थैंक यू” कहना न भूलो।

हम भी थोड़े सेंसिटिव हैं,
दिल से थोड़े पॉज़िटिव हैं।

हँसते रहो और याद रखो,
कान हैं तो कॉन्फिडेंस रखो।

45. कर्म ही सच्ची पहचान

तपोबल से धरती पर होते शूर महान,
‘जाति-जाति’ का शोर मचाएँ कायर और अज्ञान।

     धर्म नहीं जो बाँटे मानव ऊँच-नीच के नाम,
     सच्चा धर्म वही जो दे सबको सम सम्मान।

वीर वही जो कर्मठ बन तप में लीन रहे,
जनसेवा के पथ पर चलकर जग में दीन सहे।

     वर्ण नहीं है जन्म से तय होने वाला अधिकार,
     कर्मों से ही मिलती जग में गौरव की धार।

जो कहे “मैं ब्राह्मण हूँ” पर न तप, न ज्ञान,
वह केवल एक परछाईं है, न उसमें कोई प्राण।

     क्षत्रिय वही जो रक्षा करे निर्भय होकर सदा,
     न कि केवल नाम का धारी, भीरुता में बँधा।

वैश्य वही जो लोकहित में व्यापार चलाए,
लोभ-मोह से ऊपर उठकर सेवा निभाए।

     शूद्र नहीं जो सेवा करे, वह तो पूज्य महान,
     नीच वही जो बाँट रहा मानव का सम्मान।

कायरता है जाति गिनाना जब कर्म हों खोखले,
बलशाली वह है जग में जिसके तप हों अनोखे।

     उठो युवा! पहचानो खुद को कर्मों की उड़ान,
     जातिवाद की जंजीरें तोड़ो, करो नव

44. दोस्ती का हसीन कर्ज

मुझ पर दोस्तों का प्यार,
यूँ ही उधार रहने दो।
बड़ा हसीन है ये कर्ज,
मुझे कर्जदार रहने दो।

     हर मुलाक़ात में जादू सा है,
     हर हँसी में महकती बात है।
     उनके बिना ये जिंदगी,
     जैसे अधूरी सी किताब है।

इस किताब-ए-ज़िंदगी को,
यूँ ही खुमार रहने दो।
उनकी यादों के पन्नों पर,
रंग हज़ार रहने दो।

     जो आँखें छलकती हैं,
     ग़म में, खुशी में मेरे लिए।
     उन सभी आँखों में सदा,
     प्यार बेशुमार रहने दो।

कभी आँसू बन बहती हैं,
कभी दुआ बन कहती हैं।
हर मोती में छुपा हुआ,
रिश्ता बेमिसाल रहने दो।

     उन निगाहों का जो नूर है,
     जीवन का उजास बनने दो।
     उनके संग हर अंधियारा,
     रोशन सा एहसास रहने दो।

मौसम चाहे बदलते रहें,
बसंत-पतझड़ आते रहें।
मेरे यारों को उम्र भर,
यूँ ही सदाबहार रहने दो।

     बरसातों में भीगती हँसी,
     सर्दी की चाय की गर्मी।
     हर राह पर साथ कदम,
     नाम एक साथ रहने दो।

कभी मनमुटाव, कभी मनुहार,
पर दिलों में न हो दीवार।
दोस्ती का ये मधुर राग,
हर पल त्यौहार रहने दो।

     विश्वास की इस बगिया में,
     स्वार्थ का बीज न पनपे।
     बस अपनापन हर डाली पर,
     झूमता हर बार रहने दो।

वो मस्ती, वो शरारतें,
न तुम भूलो, न हम भूलें।
उम्र भले आगे बढ़ती जाए,
दिल का बचपन रहने दो।

     क्लास की वो धीमी हँसी,
     कैंटीन की अधूरी चाय।
     कॉपी में छिपे राज सभी,
     बिन कहे समझ जाना रहने दो।

कल हम भले बूढ़े हो जाएँ,
पर दिल जवाँ ही रहने दो।
हमारी दोस्ती को हर दिन,
जीवन का त्योहार रहने दो।

     जो रिश्ते दिल से बनते हैं,
     वो वक़्त से टूटते नहीं।
     बस उनमें थोड़ा सा प्यार,
     और यादों का संसार रहने दो।