116. अपना सा सुकून


मैं उस भीड़ से दूर रहता हूँ
जहाँ लोग अपना होने का नाटक करते हैं

मैं खामोश गलियों को चुन लेता हूँ
जहाँ सच के दीपक अक्सर जलते हैं

झूठी मुस्कानों का शोर मुझे अच्छा नहीं लगता
दिल के सौदागरों का दौर मुझे अच्छा नहीं लगता

मैं सादगी के पंखों पर उड़ना चाहता हूँ
अपने सपनों का आकाश खुद गढ़ना चाहता हूँ

जहाँ अपनापन सिर्फ शब्दों में नहीं हो
जहाँ रिश्ते केवल स्वार्थ की गर्द में नहीं हो

मैं उन चेहरों को पढ़ना सीख गया हूँ
जो हँसकर भी दर्द छुपाना सीख गया हूँ

भीड़ में भी अपनी पहचान रखता हूँ
अकेलेपन में भी मुस्कान रखता हूँ

सच्चे दिलों का साथ ही मेरी दुनिया है
सादगी भरा एहसास ही मेरी बुनियाद है

मैं उस भीड़ से दूर, अपने मन के पास हूँ
सच्चाई के साथ हूँ, और खुशियों का एहसास हूँ

115. तेरे सामने

तुझसे शिकायत भी क्यूँ, तेरे सामने ही मेरा ये हाल है
तेरी खामोशी भी जैसे दिल के हर सवाल का जवाब है

तेरी नज़रें पढ़ लेती हैं मेरे अनकहे एहसासों को
तू ही तो है जो समझता है मेरे टूटे हुए ख़्वाबों को

मैंने चाहा नहीं कभी कोई और तेरे सिवा
मेरी हर दुआ में बस तेरा ही नाम लिखा

तेरी हँसी से रोशन मेरे मन का हर कोना है
तेरे बिना ये दिल जैसे अधूरा सा सपना है

हवा भी छूकर तुझे मेरे पास चली आती है
तेरी खुशबू मेरी साँसों में घर कर जाती है

चाँद भी जैसे तेरी सूरत का दीवाना है
तेरे संग ही मेरा जीवन का अफ़साना है

दूर होकर भी तू मेरे दिल के सबसे पास है
मेरी हर धड़कन में तेरा ही एहसास है

मैं तुझसे प्यार करूँ या खुद को समेटूँ अब
तेरे सामने ही मेरा सारा जहां बसा है रब

तुझसे शिकायत भी क्यूँ, तुझमें ही मेरा प्यार है
तेरे ही नाम से मेरा हर इंतज़ार है

114. असली खुशी

दिखावा करना एक बीमारी है
     जो इंसान की मौलिकता को खत्म कर देती है

सादा जीवन ही सबसे सुंदर कहानी है
     सच्चे मन की अपनी ही पहचान पुरानी है

झूठी चमक में अक्सर दिल घुट जाता है
     अपना सच ही जीवन को आगे बढ़ाता है

मास्क पहनकर खुशियाँ ज्यादा टिकती नहीं
     बनावटी हँसी कभी भी दिल से हँसती नहीं

जो जैसे है उसे वैसे ही अपनाओ
     मन के आँगन में सादगी सजाओ

दौलत से ज्यादा रिश्तों की कीमत जानो
     प्यार के हर मौसम को चुपचाप पहचानो

सूरज भी हर दिन नया उजाला देता है
     सादा जीवन ही सच्चा सहारा देता है

फूलों की खुशबू में अहंकार नहीं होता
     सच्चाई का रास्ता कभी बेकार नहीं होता

खुश रहना है तो मन को हल्का रखना
     सादगी के दीपक को हर पल जलता रखना

असली खुशी भीतर के उजाले में बसती है
     सादगी की दुनिया ही सबसे अच्छी लगती है

113. रंगीन सफ़र

मंज़िल मिट्टी है, पर रास्ता रंगों से भरा है
हर एक पल में जैसे खुशियों का पहरा खड़ा है

     धूप भी हँसती है जब मन में उजाला हो
     आशाओं का हर दीपक सपनों से न्यारा हो

फूलों की खुशबू से दिन अपना सज जाता है
छोटी सी मुस्कान से सारा ग़म उड़ जाता है

     हवा भी गीत गाती है पत्तों की भाषा में
     जीवन झूम उठता है मन की अभिलाषा में

बूँदें जब गिरती हैं धरती का गान बने
बच्चों की हँसी जैसे जीवन की पहचान बने

     उड़ते हुए पंछी भी आकाश लिख जाते हैं
     मेहनत की कहानी हर दिल को समझाते हैं

चलते रहो चुपचाप, कदमों में विश्वास रहे
सूरज की तरह अपना हर सपना पास रहे

     रातें भी कहती हैं सुबह जरूर आएगी
     उम्मीद की चादर हर अंधेरे पर छाएगी

खुशियों का संगीत दिल के अंदर बजता रहे
हर इंसान अपने भीतर उत्सव सा रचता रहे

     मंज़िल मिट्टी है, पर सफ़र सुहाना है
     जीवन तो खुश होकर बस आगे बढ़ जाना है

1. सच्ची धन-संपदा

धनवान वही नहीं जिसके पास खजाने हों
जो दिलों में बस जाएँ वही असली ठिकाने हों
नोटों की गड्डियाँ अक्सर शोर मचाती हैं
लेकिन रिश्तों की खुशबू चुपके से मुस्काती है
    

    तिजोरी भले खाली हो, पर दिल अमीर होना चाहिए
     हर इंसान से प्यार का जज़्बा ज़रूर होना चाहिए
     शनि का भारी साया जब मन पर छा जाए
     मेहनत भी डरकर कहीं पीछे रह जा

दिमाग में मनी का लालच घर ना बनाए
वरना शांति का दीपक धीरे-धीरे बुझ जाए
जीवन में दुश्मनी का बीज जो बोता है
वही इंसान हर पल अंदर से रोता है
    

     रिश्तों की डोर को कभी कमजोर ना करना
     सच्चे साथियों से खुद को दूर ना करना
     अहंकार के रास्ते अक्सर वीरान होते हैं
     जहाँ प्रेम हो, वहीं जीवन आसान होते है

धन आता है और चला भी जाता है
पर अपनापन हमेशा साथ निभाता है
खुशियों का असली घर दिल के अंदर है
प्रेम ही जीवन का सबसे सुंदर मंदिर है
    

     वही धनवान है जो दिल से धनी कहलाए
     जिसके आँगन में रिश्तों का उजाला मुस्काए

112. छोड़ने की कला

यात्रा ने एक बात सिखाई है।
छोड़ना भी एक कला बताई है।

जो साथ नहीं चलता, छोड़ देना।
मन का बोझ थोड़ा मोड़ देना।

रास्ते बदलते रहते हर पल।
समय भी चलता अपने ही कल।

कुछ चीज़ें पीछे रह जाती हैं।
नई राहें आगे बुलाती हैं।

हर मंज़िल सबकी नहीं होती।
हर चाहत पूरी नहीं होती।

जो अपना है, वही साथ रहेगा।
बाकी समय खुद तय करेगा।

छोड़ना भी सीखना पड़ता है।
दिल को थोड़ा रखना पड़ता है।

अनावश्यक भार हटाना है।
आगे बढ़ते जाना है।

यात्रा का यही संदेश है।
जीवन का यही विशेष है।

जो छूटे, उसे जाने दो।
नई खुशियों को आने दो।

62. यमराज का नीति ज्ञान

जब भगवान जीवन बांट रहे थे उस समय वह अच्छे मूड में नहीं थे। अभी तक जो उसने जीवन बांटे थे उन आत्माओं में से एक भी उसे ऐसा व्यक्ति नहीं मिला था जिससे अपने में अच्छे कर्म किये हों। खैर, बड़ी देर के इन्तजार के बाद मेरा नंबर आया। यमराज मुझे उनके सुपुर्द कर खुद दूसरे शिकार के लिए चले गये।

भगवान ने मेरे जीवन का लेखा जोखा सुना तो उनकी भंवे तन गई। उन्होंने बड़ी गंभीरता से मेरी ओर देखा, फिर एक लंबी गहरी सांस ली, बोले,”सच्चरित्र पुत्र, पतिव्रता स्त्री, प्रसन्नमुखी स्वामी, स्नेही मित्र, क्लेश रहित मन, रुचिर आकृति, स्थिर वैभव, विद्या से सुशोभित मुख, यह सब परमात्मा की प्रसन्नता से ही शरीर धारियों को प्राप्त होते हैं। तुमने जो दु:खों और कष्टों का भोग इस जीवन में किया है वह पिछले जीवन के कर्म थे। अभी उस जीवन के कुछ शेष कर्मों का फल और भोगना है। अब हम तुम्हारी इच्छा पूछते हैं कि तुम्हें कहां और किस प्रकार का जीवन चाहिए।”

इतनी नम्र वाणी सुन मैं भावविभोर हो गया और बोला,”हे ईश्वर, जो अपने श्रेष्ठ आचरण से पिता को प्रसन्न रखता है, जो अपने पति का हित चिन्तन करती है, वही पत्नी है और सुख दुःख दोनों अवस्थाओं में समान रहे, वही सच्चा मित्र है, इन तीनों की प्राप्ति पुण्यात्मा पुरुषों को ही होती है।”

यह सुन भगवान मुस्कराये और बोले,”मैं तुम्हे पृथ्वी पर पुरुष योनि में जन्म दे रहा हूं, लेकिन याद रहे कष्ट में रहते हुए भी तुम अपना विवेक मत खोना। तृष्णा का त्याग करो, क्षमा को अपनाओं, अहंकार को छोड़ दो, पाप से चित्त हटाओ, सत्य बोलो, सज्जनों के पदानुयायी बनों, विद्वानों की सेवा करो, मान्य पुरुषों का मान करो, विद्वेषी को भी प्रसन्न रखो, अपने गुणों को व्यक्त करो, यह सभी लक्षण सत्पुरुषों के हैं। अगर तुम इन्हें भूलोगे तो मैं तुम्हें समय समय पर कष्ट देकर तुम्हें याद दिलाता रहूंगा परन्तु सांसारिक भोग विलास में मेरी शिक्षा भूल मत जाना। जाओ तुम्हारी मां पृथ्वी पर तुम्हारा इंतज़ार कर रही है।” मैं भगवान को नमस्कार कर यमराज के साथ पृथ्वी पर आने के लिए साथ चल पड़ा।

तब यमराज ने कहा,”मैं जनकल्याण के लिए तुम्हें नीति ज्ञान दे रहा हूं। पृथ्वी पर जाकर इस ज्ञान का प्रचार करो, अपना और मानव जाति का कल्याण करो।”

“संसार में जो चरित्र दिखाई देते हैं, वे कल्याणकारी नहीं है। पुण्य कर्मों का फल जो स्वर्गादि हैं, वे भी भयरुप प्रतीत होते हैं। मनुष्य जीवन का एक ही सत्य है, वह है मृत्यु। मनुष्य क्या जानता है? वह यह जानता है कि शरीर, कुटुम्ब, संसार, सब के सब पहले नहीं थे और फिर बाद में भी नहीं रहेंगे। परन्तु मैं (आत्मा) पहले भी था और शरीर के बाद भी रहूंगा। परन्तु इस बात को हम मानते कहां हैं ! हम शरीर और संसार को रखना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि शरीर निरोगी रहे, धन संपत्ति आ जाये, आदर सत्कार हो। ईश्वर की निकटता में रहने वाले के पांव कभी नहीं भटकते। वह सच्ची सुख शांति पाता है। ईश्वर के प्रकाश में आते ही सारी की सारी कमजोरियां, पाप, सब नष्ट हो जाते हैं।

जीवों की हिंसा न करना, पराये धन को न हरना, सत्य बोलना, पूर्वकाल में यथाशक्ति दान करना, युवतियों की कथा में मौन रहना, तृष्णा को तोड़ना, गुरुजनों के प्रति विनय भाव रखना, सब जीवों पर दया करना, आदि सर्वशास्त्रों द्वारा बताया गया कल्याण मार्ग है। विधाता ने भाग्य में, अल्प या अधिक, जितना भी धन लिखा है, वह तो उसे मरुस्थल में भी प्राप्त होता ही है और उससे अधिक उसे मिल भी नहीं सकता। इसलिए जो है , उसी पर धैर्यपूर्वक सन्तोष करो और किसी धनवान के समक्ष दीनता व्यक्त न करो। देखो ! घड़े को कूप में डालो या समुद्र में, जल तो एकसमान ही भरेगा।

धन की तीन गति हैं : दान, भोग और नाश। धन का दान या भोग न किया जाय तो उसकी तीसरी गति ही हुआ करती है। परन्तु आज कलयुग में मानव सोचता है कि जिसके पास धन है, वही पुरुष कुलीन है, वही पण्डित है, वही विद्वान है, वही वक्ता और दर्शनीय है। यानि कि सभी गुण स्वर्ण रुपी धन के आश्रित हैं।

मृग और मछली क्रमशः घास खाकर और जल पीकर रहते हैं, तो भी शिकारी और मछेरे उनसे द्वेष रखते हैं। वैसे ही सज्जनों से दुर्जन अकारण ही बैर रखते हैं। जैसे दिन के प्रारंभ में घनी छाया रहती है और धीरे-धीरे घटती जाती है, फिर दिन के उत्तरार्द्ध के अन्त में छाया स्वल्प रहती है और बढ़ती जाती है, वैसे ही दुष्ट और सज्जन की मित्रता होती है।

हाथों की प्रशंसा दान करने में है, सिर की शोभा गुरुजन के चरणों में प्रणाम करने में है, मुख की शोभा सत्य बोलने में और भुजाओं की शोभा अपार बल प्रदर्शित करने में है। सज्जनों के लिए यह सब ऐश्वर्य और महान आभूषण हैं।

दान को गोपनीय रखना, घर पर अतिथि का स्वागत सत्कार करना, परोपकार करके चुप रहना, किसी अन्य द्वारा किए हुए उपकार को सभा में कहना, धन प्राप्त होने पर गर्व न करना, दूसरों की चर्चा में निन्दा भाव न लाना, यह तलवार की धार पर चलने के समान कठोर व्रत है। जैसे फल लगने पर वृक्ष झुक जाते हैं, वैसे ही समृद्धि को प्राप्त हुए सत्पुरुष भी झुक जाते हैं।

मनुष्यों की पूर्ण आयु सौ वर्ष की है। उसमें से आधी रात्रि में सोकर ही मनुष्य व्यतीत कर देता है, चौथाई बालकपन और वृद्धत्व में चली गई और शेष चौथाई व्याधि, वियोग दुःख एवं धनवानों की सेवा आदि में व्यतीत हुई। फिर जल की तरंगों के समान अत्यन्त चंचल इस जीवन में प्राणियों को सुख की प्राप्ति कहां हो सकती है ?

अरे मनुष्यों ! इस संसार में अनेक प्रकार के क्षणभंगुर सुखों को देने वाले जो भोग है, उन्हें जन्म मरण के कारण जानकर भी तुम यहां किस कारण घूमते हो ? ऐसे क्षणिक भोग के लिए प्रयत्न व्यर्थ है। मनुष्य नर्क, स्वर्ग और चौरासी लाख योनियों में जा सकता है, ज्ञान वैराग्य, भक्ति प्राप्त कर सकता है। मनुष्य ने उस स्वतन्त्रता का दुरुपयोग किया, इस कारण फंस गया और यदि अब यह स्वतंत्रता का सदुपयोग करे, आवश्यकता की पूर्ति करे और इच्छाओं का त्याग करे, तो बिलकुल ठीक काम हो जाय, इसमें किंचित मात्र भी संदेह नहीं है। मनुष्य केवल अपने अनुभव का आदर करे तो उसका काम बन जाये।

“इदं शरीरम !”

यह कहकर यमराज मुझे गर्भ में प्रवेश कराकर अदृश्य हो गए। मैं फिर से पृथ्वी पर आ गया। मैं ईश्वर से यही कामना करता हूं कि सब जगह खुशहाली आये और यमराज का नीति ज्ञान सभी के लिए श्रेष्ठ साबित हो।

18. गधे की आत्मव्यथा

मैं गधा हूं। इस कलयुग का गधा। कहते हैं हर जीव अपने कर्मों के अनुसार ही संसार में जन्म लेता है। मैं बहुत दिनों से सोच रहा था कि मैं मनुष्यों से बात करुं परन्तु उचित माध्यम मिलने पर ही मैं आज आपके सामने आत्मव्यथा रखूंगा जिस पर समुचित ध्यान दें।

पहले मैं बता दूं, इस संसार ने मुझे “गधा” नाम देकर इतना प्रसिद्ध कैसे कर दिया क्योंकि जब भी कोई मूर्खता करता है तो उसे “गधा” की संज्ञा दी जाती है, कोई मेहनत करता है परन्तु उसका फल शूनय आता है तो उसे भी “गधा” कहा जाता है, अगर कोई भारी बोझा उठाता है तो उसे “गधे का बोझा” कहा जाता है, आदि आदि।

आखिर “गधे” की परिभाषा क्या हुई ? मेरी समझ से यह संज्ञा तो हो ही नहीं सकती। मैं अपने बारे में सोचता हुआ बड़े दुःखी मन से हरिद्वार में घूम रहा था।

कई सज्जनों/दुर्जनों से पत्थर डंडे खाता हुआ भागता भागता मैं हर की पौड़ी के सामने वाले इलाके में पहुंचा। वहां देखा, एक जगह बहुत भीड़ लगी थी। एक महात्मा गेरुआ वस्त्र धारण किए एक मंच पर बैठे हुए थे। उनके सामने बहुत बड़ी संख्या में लोग बड़े चाव से महात्मा जी के प्रवचन सुन रहे थे। मैं भी वहीं मंच के पास एक पेड़ की ओट में खड़ा हो गया।

प्रवचन के दौरान महात्मा जी का ध्यान अचानक मेरी ओर गया। वे बोले,”आज कलयुग में जो व्यक्ति सरल स्वभाव का होता है उसे चालाक व्यक्ति ‘गधा’ कहते हैं। जैसे ही उन्होंने गधा शब्द बोला, मेरे कान खड़े हो गए। महात्मा जी का प्रवचन चलता रहा  जो व्यक्ति अति नम्र, अति परिश्रमी, अति सरल एवं सीधे स्वभाव वाला, कठोर वाणी सुनकर भी शान्त रहता हो, जिसमें बिलकुल भी चतुराई न हो, किसी भी कार्य के लिए कभी मना न करे, जो धूप में, वर्षा में, ठंड में, परिश्रम करता रहे, उसे आज कलयुग में चालाक एवं चतुर दुर्जन लोग “गधा” कहते हैं।

बहुत देर तक प्रवचन चलता रहा। प्रश्न आया कि मेरे मन की खट-पट ( हलचल, अशांति) कैसे मिटे ? बहुत सीधी सरल बात है कि मन की व्यथा, मन में जो खट पट है, वह अपने जानने में आती है। यह जो मन का एक संकल्प है कि यह आत्मव्यथा न रहे, यही खट पट का कारण है क्योंकि इस संकल्प से ही खट पट से संबंध बना रहता है।

जब सब चले गए तो महात्मा जी भी जाने के लिए सामान बांधने लगे। मैं जिज्ञासा से महात्मा जी की ओर बढ़ा। मुझे अपनी ओर बढ़ते हुए देख कर वह सहम गये। मैंने उनके पास पहुंच कर नम्र अभिवादन किया और खड़ा रहा। मुझे शांति पूर्वक खड़ा देख उनमें हिम्मत आई और फिर शांत स्वर में पूछा,”क्या बात है? अपने मन की व्यथा बताओ, मैं तुम्हारे अशांत मन को शांत करने का प्रयास करुंगा।”

मैं, गधा, बोला,”महाराज मैं अज्ञानी हूं। कृपया मेरा मार्गदर्शन करें। अब मैं आपको, अपना व महात्मा जी का वार्तालाप सुनाता हूं, जो कि इस प्रकार है:-

महात्मा,”बिलकुल अनजान का नाम अज्ञान नहीं है और केवल जानकारी भी ज्ञान नहीं है। हम कुछ जानते हैं और बहुत कुछ नहीं जानते, उसी का नाम अज्ञान है। अथार्त अधूरे ज्ञान को अज्ञान कहते हैं। दूसरा, अज्ञानी वह है जो जानता है, पर मानता नहीं।”

गधा: मनुष्य क्या जानता है ?

महात्मा: वह जानता है कि शरीर, कुटुम्ब, संसार, सब के सब पहले नहीं थे और फिर बाद में भी नहीं रहेंगे। परन्तु मैं (आत्मा) पहले भी था और शरीर के बाद भी रहूंगा।

गधा: परन्तु इस बात को वह मानता कहां है ?

महात्मा: हम शरीर और संसार को रखना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि शरीर निरोगी रहे, धन संपत्ति आ जाये, आदर सत्कार हो। परन्तु कौन नहीं जानता कि जिस शरीर और नाम को लेकर हम यह सब चाहते हैं, वह शरीर और नाम पहले भी था, पर वह आज याद ही नहीं है, ऐसे ही यह शरीर और नाम भी याद नहीं रहेगा जिसके लिए रात दिन परिश्रम कर रहे हैं, इसका नाम ही अज्ञान है।

गधा: परिवार में प्रेम और सुख शांति कैसे रहे ?

महात्मा: जब मनुष्य अपने उद्देश्यों को भूल जाता है, तभी सब बाधाएं आती हैं। प्रेम होता है, अपने स्वार्थ और अभिमान के त्याग से। दूसरों का भला कैसे हो ? दूसरों का कल्याण कैसे हो ? दूसरों को आदर सम्मान कैसे दें ? दूसरों को सुख आराम कैसे मिले ? यह सब जब आचरण में आ जाते हैं तब सब कुटुम्बी प्रसन्न रहते हैं।

गधा: परिवार में झगड़ा, कलह, अशांति, आदि होने का क्या कारण है ?

महात्मा: हर प्राणी अपनी इच्छा के अनुसार संबंध चाहता है, अपनी अनुकूलता चाहता है, अपना सुख आराम चाहता है, अपनी महिमा चाहता है, अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है – ऐसे व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण ही परिवार में झगड़ा, कलह, अशांति, आदि होने लगते हैं।

गधा: माता-पिता के आचरण, भाव आदि तो बड़े अच्छे हैं परन्तु उनकी संतानें अच्छी नहीं निकलती। इसका क्या कारण है ?

महात्मा: इसका खास कारण संग दोष अर्थात बालक को अच्छा संग न मिलना ही है। ऋणानुबंध से पूर्व जन्म का बदला लेने के लिए भी ऐसी संतान पैदा होती है। जो पुत्र कुसंग से बिगड़ता है, वह सत्संग से सुधर जाता है। परन्तु जो पूर्व जन्म का बदला लेने के लिए आता है, वह तो दुःख ही देने वाला होता है।

गधा: माता-पिता के आचरण तो अच्छे नहीं हैं पर उनकी संतान अच्छी निकलती है, इसका क्या कारण है ?

महात्मा: प्रायः मां बाप का स्वभाव ही संतान में आता है। पर ऋणानुबंध अथवा गर्भाधान के समय कोई अच्छा संस्कार पड़ने से अथवा गर्भावस्था में किसी संत महात्मा का संग मिलने से श्रेष्ठ संतान पैदा होती है।

गधा: माता-पिता की सेवा से क्या लाभ है ?

महात्मा: माता-पिता की सेवा से लोक परलोक दोनों सुधरते हैं। भगवान प्रसन्न होते हैं। जो पुत्र धन, जमीन, मकान आदि पाने की आशा से मां बाप की सेवा करता है, वह वास्तव में धन आदि की ही सेवा करता है। मां बाप की नहीं।

रामचरितमानस में तो हरेक के लिए कहा गया है:

” मंद करत जो करइ भलाई”(५/४९/७)”

अथार्त, अगर माता-पिता पुत्र का आदर करते हैं, तो आदर में पुत्र की सेवा खर्च हो जाती है। परन्तु वे आदर न करके पुत्र का निरादर करते हैं, तो पुत्र की सेवा पूरी रह जाती है। वे कष्ट देते हैं तो उस से पुत्र की शुद्धि होती है, सहनशीलता बढ़ती है, तप बढ़ता है, महत्व बढ़ता है।

माता-पिता की सेवा में माता-पिता के दिये हुए कष्ट को परम तप समझकर प्रसन्नता से सहना चाहिए और यह समझना चाहिए कि मेरे पर मां बाप की बड़ी कृपा है, जिससे मेरी सेवा जरा भी व्यय न होकर मेरे को शुद्ध सेवा, शुद्ध तपश्ररया का लाभ मिल रहा है। ऐसा अवसर तो किसी भाग्यशाली को ही मिलता है और मेरा यह अहोभाग्य ही है जो माता-पिता मेरी सेवा स्वीकार कर रहे हैं।

गधा: बच्चों को शिक्षा कैसे दी जाय, जिससे वे श्रेष्ठ बन जायें ?

महात्मा: बच्चे प्रायः देखकर ही सीखते हैं। इसीलिए माता-पिता को चाहिए कि वे उनके सामने आचरण अच्छे रखें, अपना जीवन संयमित और पवित्र रखें। ऐसा करने से बच्चे अच्छी बातें सीखेंगे और श्रेष्ठ बनेंगे। अच्छी शिक्षा वह होती है जिससे बालक व्यवहार में परमार्थ की कला सीख जाये।

गधा: महात्मा जी समय अधिक हो गया है, कृपया मोटी मोटी बात बतायें, मैं क्या करूं जिससे मेरा जीवन सफल हो जाये ?

महात्मा: मनुष्य आप ही अपना मित्र होता है और आप ही अपना शत्रु है और कोई दूसरा न तो शत्रु है और न ही मित्र। परिस्थिति का यदि सदुपयोग करें, तो वही परिस्थिति उद्धार करने वाली हो जाती है। मनुष्य में चार तरह की चाहत होती है – एक धन की, दूसरी धर्म की, तीसरी भोग की और चौथी मुक्ति की।

गधा: संसार में एक मनुष्य पुण्यात्मा है, सदाचारी है और वह दुःख पा रहा है तथा दूसरी ओर एक मनुष्य पापात्मा है, दुराचारी है और सुख भोग रहा है। इस बात को लेकर अच्छे-अच्छे मनुष्यों के भीतर भी यह शंका हो जाया करती है कि इसमें ईश्वर का न्याय कहां है ?

महात्मा: इसका समाधान यह है कि अभी पुण्यात्मा जो दुःख पा रहा है, यह पूर्व के किसी जन्म में किए हुए पाप का फल है, अभी किये हुए पुण्य का नहीं। ऐसे ही पापात्मा जो सुख भोग रहा है, यह भी पूरव के किसी जन्म में किए गए पुण्य का फल है, अभी किये गये पाप का नहीं। पुण्य और पाप का फल भोगने का कोई एक नियम नहीं है। पुण्य तो निष्काम भाव से भगवान को अर्पण करने से समाप्त हो जाता है परन्तु पाप भगवान के अर्पण करने से समाप्त नहीं होता

संसार की किसी भी वस्तु से मनुष्य का संबंध नहीं है। जब जायेंगे, तब साथ कुछ लेकर नहीं जायेंगे। बिलकुल कार्यालय के समान संसार में सेवा करने के लिए आए हैं। भजन उसी को कहते हैं, जिसमें भगवान का सेवन हो तथा सेवन भी वही श्रेष्ठ है, जो प्रेम पूर्वक मन से किया जाय। गृहस्थ को चाहिए कि वह धन कमाने की अपेक्षा बच्चों के चरित्र का ज्यादा ख्याल रखे, क्योंकि कमाये हुए धन को बच्चे ही काम में लेंगे। अगर बच्चे बिगड़ जायेंगे तो धन उनको और ज्यादा बिगाड़ेगा।

शोक, चिन्ता, भय, मोह और क्रोध, इनसे जो मुक्त है वह सदा मुक्त है। पैदाइश, पड़ोस, पवन, पानी , प्रकाश, पगताश, पवित्रता, और परमार्थ – ये आठ जहां सुलभ हों वहां रहना चाहिए। हो सके तो किसी का अन्न से, वस्त्र से, धन से, वचन से, विचार से और बुद्धी से भला कर देना, पर बुरा कभी भी नहीं करना।

किसी का भी  अहित उसके अपने कुकर्मों से ही होता है। दूसरों को सुखी देखकर प्रसन्न होना, दुखी देखकर सहायता करना। तुम जैसा करोगे, वैसा ही तुम्हारे प्रति सारा जग करेगा। तुम यथाशक्ति दूसरे को सुखी करना चाहोगे तो सारा जगत तुम्हें सुखी करना चाहेगा। जब जब मन में अशांति हो तब तब समझना चाहिए कि हम भगवान को भूल गये हैं।

जब तुमको अपने गुरुजन, बड़े और पूज्य लोगों में दोष दिखाई देने लगे, सगे संबंधी अप्रिय लगने लगें और पराये लोग प्रिय लगें, पराये गुण दिखाई दें और स्वजनों में अवगुण सूझें, तब जान लो कि तुम्हारी दिशा उल्टी आ गयी और अल्पकाल में ही तुम दुःख में पड़ने वाले हो।

यह कहकर महात्मा जी वहां से प्रस्थान कर गये। मैं गधा वहीं खड़ा रह गया। मेरे दिमाग में महात्मा जी के विचारों का विश्लेषण होने लगा जो मेरे मन की व्यथा बन गयी।

मैंने जमाने को देखा है और जमाने ने मुझे। मैं गधा का गधा ही रह गया और जमाना बहुत तेजी से आगे बढ़ गया। बहुत महात्मा आये, बहुत चले गए। वे सब कहते रहे कि व्यक्ति को मुंह अंधेरे उठना चाहिए। महात्मा कह गये कि व्यक्ति को परिश्रमी होना चाहिए, पर मेरा गधा दिमाग पूछता है कि किस व्यक्ति को कब, कहां, कितना परिश्रम करना चाहिए, इस पर किसी ज्ञानी महात्मा ने प्रकाश नहीं डाला।

हमने तो बस महात्माओं की एक बात पर कान दिया कि परोपकार इंसान का धर्म है। तो जब भी कोई हम पर उपकार करता है, अपने राम यह सोचते हैं कि ये तो उसका धर्म था, कोई एहसान नहीं कर रहा हम पर।

जो बातें महात्मा जी ने बताईं वे मुझे, आपको और सम्पूर्ण सभ्य समाज को पहले से ही भली-भांति पता हैं, परन्तु उन्हें याद रखने का समय किसी गधे के पास नहीं है।

यही मेरे गधे मन की व्यथा है।

35. दी करेक्टर इज़ बंडल आफ़ गुड हैबिट्स

संसार का प्रत्येक व्यक्ति सदैव यही कामना करता रहता है कि उसे मनवांछित फल मिले। उसे उसकी इच्छित वस्तु की प्राप्ति हो। जो वह सोचता है या कल्पना करता है, वह उसे मिल जाए।

अपने पास जो कुछ भी है, वह क्यों है ?
मन में जिन वस्तुओं के प्रति आकर्षण होता है, उन्हें मनुष्य प्राप्त कर लेता है किन्तु शर्त यह भी है कि वह मनुष्य उसी विषय पर सोचता हो, उसके लिए प्रयास करता हो और आत्मविश्वास भी हो। इसी भांति यदि आप आशा, सफलता और सुख-समृद्धि चाहेंगे, उन्हीं के विषय में सोचेंगे और पाने के प्रयत्न करेंगे तो आप पा जाओगे।

आप वही सोचते हैं जो आप हैं।
आप क्या हैं ? यह जानने का तनिक प्रयास तो करें।

मनुष्य का व्यक्तित्व दो चीज़ों से मिलकर बना है। वह हैं: वंशानुगत एवं वातावरण। वंशानुगत में तो माता-पिता, दादा दादी और नाना-नानी के व्यक्तित्व की झलक होती है, कद, रूप, रंग होता है। किन्तु महत्वपूर्ण भूमिका व्यक्तित्व के बनाने में वातावरण का है। आप जो कुछ भी हैं, अपने वातावरण की देन हैं। आप जो सोचते हैं, जैसे वातावरण में रहते हैं, जैसे लोगों के बीच में रहते हैं, जैसी कल्पनाएं करते हैं, वैसे ही आप बन जाते हैं।

आप जो सोचते हैं, विचार करते हैं, विश्वास करते हैं, उसी में आपका जीवन ढलता चला जाता है। आप जैसे हैं, वैसे ही विचार आप दूसरों के लिए भी बनाने लगते हैं। जैसे आप स्वार्थी व्यक्ति हैं तो आप सामने वाले को भी स्वार्थी बतायेंगे। कुछ लोग जब सफल नहीं होते तो वे अपनी असफलताओं का दोष दूसरों पर डालकर कोसने लगते हैं। अपनी असफलता का दोष वे भाग्य, अपने माता-पिता, समाज और व्यवस्था पर डाल देते हैं। अपनी ग़लती को दूसरों के सिर मढ़ देते हैं।

कुछ लोग दूसरों से केवल ईर्ष्या तो करते हैं परन्तु प्रतिद्वंद्वी की भांति उनसे दोगुनी मेहनत करके उनसे आगे बढ़ने का प्रयास नहीं करते। दूसरों को धनवान देखकर भाग्य की बात करते हैं या फिर उन्हें भ्रष्ट कहकर चुप हो जाते हैं। परन्तु उनकी सफलता के पीछे जो लगन, जो पक्का संकल्प और इच्छा शक्ति रही है, उसे मूर्ख लोग नहीं देखते हैं।

जैसा आपका मन होगा, जैसा आप सोचेंगे, वैसा आपका स्वभाव बन जायेगा। जैसा आपका स्वभाव बन जायेगा, वैसा आप सोचेंगे और फिर आप अपने विचार शक्तियों के अनुसार बदले में फल पायेंगे। जैसे आप ईर्ष्या, द्वेष और क्रोध के विचारों से घिर जायेंगे, तो बदले में आपको ईर्ष्या, द्वेष और क्रोध ही मिलेगा। कुछ लोग जीवन की महानता को भूल जाते हैं। वे अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए किसी को भी हानि पहुंचा सकते हैं। ऐसे लोग अपनी इच्छाओं के लिए दूसरों का गला काटने का प्रयास करते हैं। आगे बढ़ने का यह तरीका गलत है।

आगे तो बढ़िये, खूब बढ़िये, दौड़िए किन्तु अपने विश्वास से, अपनी शक्ति से, अपने पांवों पर विश्वास करके। दूसरों को धक्का देकर या चोट पहुंचा कर या गिरा कर उनसे आगे निकलने का प्रयास यत कीजिए।

बहुत से लोग श्रम करने में शरमाते हैं। वे कोई शारीरिक परिश्रम करते हुए झिझकते हैं और उन्हें ऐसा लगता है जैसे वे कोई छोटा काम कर रहे हैं। जबकि कोई काम छोटा नही होता है। परन्तु बास को प्रसन्न करने के लिए उसके सामने हलका फुलका सामान इधर से उधर रखते हैं। उन मूर्खों को यह नहीं पता कि कर्म का फल मिलता है। वे यह भूल जाते हैं कि ईश्वर भी उन्हीं की सहायता करता है जो स्वयं अपनी सहायता करता है।

बहुत से लोग कहते हैं कि जरा जरा सी बात पर ध्यान नहीं देते। वे बहुत बड़ी ग़लती करते हैं। बात चाहे छोटी हो या बहुत बड़ी, वह एक बात तो है, वह एक घटना या दुर्घटना तो है। वह जीवन से सम्बन्ध रखने वाला कोई क्षण तो है। उसका प्रभाव जीवन पर पड़ सकता है या फिर पड़ता ही है। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में छोटी छोटी बातें आती रहती हैं। बहुत से लोग उनकी उपेक्षा करते हैं, उन पर ध्यान नहीं देते। “मामूली बात” कहकर टाल जाते हैं। परन्तु बात तो बात ही है जो दिमाग में अमिट रहती है। यही मामूली बात कभी कमाल कर दिखाती है या फिर किसी बड़े नश्वर एटम बम का असर छोड़ जाती है।

कभी कभी आप किसी की निन्दा कर अपना परिचय खुद दे देते हैं। आप किसी का कुछ नहीं बिगाड़ रहे फिर भी लोग आपके शत्रु बन रहे हैं, आपकी निन्दा कर रहे हैं। समाज में आप बुरे कहे जाते हैं, जबकि आप बुरे काम नहीं करते। आप ईमानदार आदमी है, परिश्रमी हैं, बस छोटा सा अवगुण है कि साधारण सी गलती करते हैं आप। अत: किसी भी छोटी सी गलती या भूल की उपेक्षा न करें। उसे मामूली बात समझकर अनदेखा न करें। यह सोचें कि वह भूल क्यों हुई ? कैसे हो गयी और उसका आपके जीवन, आपके मित्रों पर क्या प्रभाव पड़ेगा ? किस किस मित्र को खोया ।

कभी कभी हम अपने मित्रों को मजाक मजाक में बहुत सी ऐसी बातें कह देते हैं जिसका वे बुरा या बहुत बुरा मान जाते हैं परन्तु वे अपनी अप्रसन्नता को प्रकट नहीं करते हैं। आप ध्यान भी नहीं देते हैं। आप छोटी बातें या साधारण बातें समझकर टालते हैं, परन्तु उन मित्रों की नजर में आप गिर जाते हैं। वे आपको बुरा व्यक्ति समझने लगते हैं।

जो व्यक्ति खुद को ही नहीं जान सकता वह सृष्टि को कैसे जान सकेगा ? सबसे पहले स्वयं को पहचानना होगा। जब तक मनुष्य स्वयं को नहीं पहचानता है तब तक सृष्टि के रहस्यों को भी नहीं जान सकेगा। मनुष्य के जीवन का वह क्षण महत्वपूर्ण और महान होता है जब वह अपने अन्दर की शक्ति को पहचान लेता है। अपनी विशेषताओं को देख लेता है। मनुष्य में छुपा ईश्वरीय गुण प्रकट होता है। अपने सपनों को केवल सपना मत समझिए। आप जो ह्रदय में गहराई से इच्छा रखते हैं, वह सपना ही सच्चाई बन सकता है। जिसके ह्रदय में सन्देह है, आशंका है, अविश्वास है, वह जीवन में सफलताओं के शिखर तक नहीं पहुंच सकता।

जीवन में सफलता पाने के लिए यह परम आवश्यक है कि आप आत्मनिरिक्षण करके यह ज्ञात करते रहें कि लोगों में आपके प्रति क्या धारणाएं हैं। लोग आपको कितना पसन्द करते हैं और कितना नापसंद, यह व्यवहार और आचरण से पता चल जाता है। अपनी भूलों पर कुढिये नहीं। न ही पश्चाताप के आंसू बहाइये, बल्कि यह सोचिए कि अब भविष्य में ऐसी भूल से कैसे बचा जा सकता है।

आत्मनिरिक्षण से आपको यह जानकारी मिलेगी कि आप कितने लोकप्रिय हैं या कितने बदनाम ? आप कितने सफल हैं या कितने असफल ? आपमें कितने गुण हैं और कितने अवगुण ? बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो मन ही मन यह समझे रहते हैं कि वे जो भी कहते हैं सभी सराह जा रहा है। उनकी बातों को पसंद किया जाता है। कभी वे गलत नहीं कहते। त्रुटियां नहीं करते जबकि वास्तविकता यह होती है कि उनकी हर बात समाज में बुरी कही जा रही है, सब उनकी निन्दा करते हैं, उनकी हर बात और कार्य त्रुटिपूर्ण होता है। उनके मुंह पर लोग उनकी आलोचना नहीं करते, इसलिए उन्हें वास्तविकता का पता नहीं चलता और वे गलतफहमी के शिकार रहते हैं।

जिसका ह्रदय घृणा, क्रोध, स्वार्थ और ईर्ष्या से भरा होता है, वह कभी भी प्रसन्नता नहीं पा सकता है। प्रायः हम लोग दूसरों के विषय में जो सोचते हैं, वे व्यवहार में जब आते हैं, उनसे जब वास्ता पड़ता है, तो कुछ और ही निकलते हैं। हम किसी को एक नेक, ईमानदार और शरीफ व्यक्ति समझकर उससे दोस्ती कर लेते हैं। घर आना जाना शुरू हो जाता है। मनुष्य के चरित्र का सबसे अच्छा पता उसकी छोटी छोटी बातों से लग सकता है जब वह सावधान नहीं होता है। जो मनुष्य बातें करते समय , कुछ बोलते समय लगातार सामने वाले व्यक्ति को स्पर्श करते हैं, कमीज़, कोट या टाई छूते या खींचते हैं, बांह पकड़ कर अपनी बात कहते हैं तो आप बुरा मत मानिये। वह व्यक्ति आत्मनिर्भर नहीं है और उसमें आत्मविश्वास की भी बहुत कमी है।

आप जानते ही हैं कि मिलनसार व्यक्ति मृदभाषी, व्यवहारकुशल और नम्र होता है इसलिए वह लोकप्रिय भी होता है। सभी उसकी प्रशंसा करते हैं। अधिकांश लोगों का स्वभाव होता है कि वे दूसरों को आगे बढ़ता हुआ नहीं देखना चाहते। ईर्ष्या का भाव उनके ह्रदय में होता है। वे दूसरों के कामों में रुकावटें डालते हैं। बाधाएं खड़ी करते हैं। ऐसे प्रवृत्ति के लोगों में कोई नेक, उत्साही, ईमानदार और महत्वकांक्षी व्यक्ति फिट नहीं बैठता है।

पूर्ण मनुष्य वही है, सच्चा मानव वही है जो दूसरों से प्रसन्न होता है, जिससे दूसरे प्रसन्न होते हैं। याद रहे संबंध कोई तोड़ता नहीं, खुद ब खुद टूटते चले जाते हैं। आप जितना मेल जोल समाज में बढ़ाते चले जायेंगे, उतना ही समाज से बदले में आपको प्रेम मिलता चला जायेगा। जो आप बांटेंगे, वही आपको प्राप्त होगा। आप प्यार बांटिये, बदले में आपको प्यार ही मिलेगा।

एक विद्वान ने कहा है :

चरित्र कभी भी श्रेष्ठ नहीं बन सकता, यदि आदतें अच्छी न हों।

“दी करेक्टर इज़ बंडल आफ़ गुड हैबिट्स अर्थात चरित्र आदतों का संग्रह है।”

60. मंदिर में दर्शन के बाद बाहर सीढ़ी पर थोड़ी देर क्यों बैठा जाता है

परम्परा हैं कि किसी भी मंदिर में दर्शन के बाद बाहर आकर मंदिर की पैड़ी या ऑटले पर थोड़ी देर बैठना। क्या आप जानते हैं इस परंपरा का क्या कारण है ?
आजकल तो लोग मंदिर की पैड़ी पर बैठकर अपने घर/व्यापार/राजनीति इत्यादि की चर्चा करते हैं, परंतु यह प्राचीन परंपरा एक विशेष उद्देश्य के लिए बनाई गई है। वास्तव में मंदिर की पैड़ी पर बैठ कर एक श्लोक बोलना चाहिए। यह श्लोक आजकल के लोग भूल गए हैं। इस लोक को मनन करें और आने वाली पीढ़ी को भी बताएं। श्लोक इस प्रकार है ~
अनायासेन मरणम् , बिना देन्येन जीवनम्।
देहान्त तव सानिध्यम् , देहि मे परमेश्वरम्॥

इस श्लोक का अर्थ है ~
अनायासेन मरणम् अर्थात् बिना तकलीफ के हमारी मृत्यु हो और कभी भी बीमार होकर बिस्तर पर न पड़ें, कष्ट उठाकर मृत्यु को प्राप्त ना हों चलते फिरते ही हमारे प्राण निकल जाएं।
बिना देन्येन जीवनम् अर्थात् परवशता का जीवन ना हो। कभी किसी के सहारे ना रहाना पड़े। जैसे कि लकवा हो जाने पर व्यक्ति दूसरे पर आश्रित हो जाता है वैसे परवश या बेबस ना हों। ठाकुर जी की कृपा से बिना भीख के ही जीवन बसर हो सकें।
देहांते तव सानिध्यम अर्थात् जब भी मृत्यु हो तब भगवान के सम्मुख हो। जैसे भीष्म पितामह की मृत्यु के समय स्वयं ठाकुर (कृष्ण जी) उनके सम्मुख जाकर खड़े हो गए। उनके दर्शन करते हुए प्राण निकले।
देहि में परमेशवरम् हे परमेश्वर ऐसा वरदान हमें देना।

भगवान से प्रार्थना करते हुऐ उपरोक्त श्र्लोक का पाठ करें।

गाड़ी, लाडी, लड़का, लड़की, पति, पत्नी, घर, धन इत्यादि (अर्थात् संसार) नहीं मांगना है, यह तो भगवान आप की पात्रता के हिसाब से खुद आपको देते हैं। इसीलिए दर्शन करने के बाद बैठकर यह प्रार्थना अवश्य करनी चाहिए। यह प्रार्थना है, याचना नहीं है। याचना सांसारिक पदार्थों के लिए होती है। जैसे कि घर, व्यापार,नौकरी, पुत्र, पुत्री, सांसारिक सुख, धन या अन्य बातों के लिए जो मांग की जाती है वह याचना है वह भीख है।

*’प्रार्थना’ शब्द के ‘प्र’ का अर्थ होता है ‘विशेष’ अर्थात् विशिष्ट, श्रेष्ठ और ‘अर्थना’ अर्थात् निवेदन। प्रार्थना का अर्थ हुआ विशेष निवेदन।*

मंदिर में भगवान का दर्शन सदैव खुली आंखों से करना चाहिए, निहारना चाहिए। कुछ लोग वहां आंखें बंद करके खड़े रहते हैं। आंखें बंद क्यों करना, हम तो दर्शन करने आए हैं। भगवान के स्वरूप का, श्री चरणों का, मुखारविंद का, श्रृंगार का संपूर्ण आनंद लें, आंखों में भर ले निज-स्वरूप को।

दर्शन के बाद जब बाहर आकर बैठें, तब नेत्र बंद करके जो दर्शन किया हैं उस स्वरूप का ध्यान करें। मंदिर से बाहर आने के बाद, पैड़ी पर बैठ कर स्वयं की आत्मा का ध्यान करें तब नेत्र बंद करें और अगर निज आत्मस्वरूप ध्यान में भगवान नहीं आए तो दोबारा मंदिर में जाएं और पुन: दर्शन करें।

॥ हरि ॐ तत् सत् ॥

59. मेरे लाल

इस समय तुम गहरी नींद में सो रहे हो, तुम्हारा एक हाथ तुम्हारे गाल के नीचे दबा है और माथे पर आ गई पसीने की कुछ बूंदों से तुम्हारे बालों की एक लट चिपक गई है, मैं तुम्हारे कमरे में खड़ा तुम्हें निहार रहा हूं। अभी कुछ ही देर पहले जब मैं अपना अखबार पढ़ रहा था तो विषाद की लहर मेरा दम घोंटने लगीं थीं और मेरे ह्रदय में जगी अपराध भावना मुझे तुम्हारे कमरे में जगी अपराध भावना मुझे तुम्हारे कमरे में खींच लाई।

इस समय मेरे ह्रदय में एक के बाद एक भावों का ज्वर उमड़ रहा है। आज मैंने तुमको काफी डांटा जब तुम स्कूल जाने के लिए कपड़े पहन रहे थे। तुमने अपना मुंह भी ठीक से नहीं साफ किया था। तुम्हारे जूतों में पालिश नहीं थी। मैंने देखा कि तुम्हारी सभी वस्तुएं कमरे में बेतरतीब बिखरी पड़ी थी। नाश्ते की मेज पर भी मैं तुम्हारी गलतियों पकड़ता रहा। ” चम्मच ठीक से पकड़ो, यह न करो, वह न करो, तेजी से न खाओ, नाश्ता कहीं भागा नहीं जा रहा। फिर तुमने मेज पर कोहनियां टेकीं ? तमसे कितनी बार मना किया नहीं मानते तुम ? कब समझ आयेगी तुम्हें ? ” तुम चुपचाप खाते रहे। स्कूल जाते वक्त तुमने मुझे आवाज दी : “टा… टा… पापा” और मेरे भवों पर बल पड़ गए। ” तुम्हारे हाथों में जूठन लगी है, जाओ हाथ धोओ”।

तीसरे पहर यही सिलसिला फिर शुरू हो गया। जब मैं आफिस से आया तो तुम घुटने के बल बैठकर गोलियां खेल रहे थे। तुम्हारी मोजों में छेद थे। मैंने तुम्हारे दोस्तों के सामने ही तुम्हारी भर्त्सना की। रात को खाना खाते समय मैं जानबूझकर तुमसे नहीं बोला। तुम बार बार मेरा मुंह देख रहे थे, शायद मैं कोई बात या उपदेश प्रारंभ करूं। पर मैं चुप्पी मारे रहा। जानबूझकर अनदेखा करता रहा मानो खाने की मेज पर तुम थे ही नहीं।

खाने के बाद मैं एक पत्रीका लेकर पढ़ने जा ही रहा था कि तुम मेरे पास सहमें हुए से आये पर बोले कुछ नहीं। “अब क्या बात है ?” , मैंने पूछा। तुम एक क्षण के लिए रूके फिर दौड़ कर मेरे पास आये और मेरी कमर के चारों ओर अपने हाथ लपेट कर अपना बदन से सटा कर कहा,”पापा ! आप कितने अच्छे हो”! मैं ठगा सा खड़ा रह गया।

एकाएक मुझे एहसास हुआ कि तुम्हारे नन्हे से ह्रदय में स्नेह का जो कुंड है वह अभी सूखा नहीं है। मेरी हर तरह की झिड़की, डांट और फटकार ने तुम्हारे मासूम दिल में मेरे प्रति प्यार में कोई कमी नहीं आने दी है, और यह सच्चाई तुम्हारे निष्कपट व्यवहार से कितनी साफ झलकती है।

मेरे लाल, बस इसके बाद से ग्लानि और पश्चात्ताप की जो भावना मुझे घेरे है, उससे मैं छुटकारा नहीं पा सका हूं। एकाएक मुझे न जाने क्या हुआ कि मैं तुम्हारे कमरे में आने के लिए बेबस हो गया और तुम्हें देख कर मैं सोच रहा हूं कि तुम कितने महान हो। तुमने मेरी किसी बात का कभी भी बुरा नहीं माना।

मेरे प्रति तुम्हारे स्नेह में कभी कमी नहीं हुई। मेरा मन होता है कि तुमको जगाकर प्यार करूं, अपने ह्रदय के भाव तुमको बताऊं, पर मैं जानता हूं कि तुम मेरी बातें अभी समझ न सकोगे। तुम बहुत छोटे हो। पर मैं तुम्हें विश्वास दिलाना चाहता हूं कि कल से मैं अपना व्यवहार बदलूंगा। मैं तुमको एक आदर्श पिता बनकर तुम्हारी परवरिश करूंगा।

89. स्वर शास्त्र

स्वर शास्त्र बड़ा विस्तृत है और उसमें स्वर के साथ ही तत्वों का विचार रखना भी आवश्यक होता है, तभी पूर्ण सफलता मिलती है। मनुष्य के शरीर में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तत्व का अवस्थान माना गया है और इनमें से एक समय में कोई एक तत्व उदय होता रहता है।

स्वर का दूसरा नाम क्या है?
सात स्वरों को ‘सप्तक’ कहा गया है, लेकिन ध्वनि की ऊँचाई और नीचाई के आधार पर संगीत में तीन तरह के सप्तक माने गये। साधारण ध्वनि को ‘मध्य’, मध्य से ऊपर की ध्वनि को ‘तार’ और मध्य से नीचे की ध्वनि को ‘मन्द्र’ सप्तक कहा जाता है।

शुद्ध स्वर कितना होता है?
स्वरों के दो प्रकार हैं- शुद्ध स्वर और विकृत स्वर। बारह स्वरों में से सात मुख्य स्वरों को शुद्ध स्वर कहते हैं अर्थात इन स्वरों को एक निश्चित स्थान दिया गया है और वो उस स्थान पर शुद्ध कहलाते हैं।

स्वर का पता कैसे लगाएं?
स्वर को पहचानने की सरल विधियां-
(1) तर्जनी अंगुली छिद्रों के नीचे रखकर श्वास बाहर फेंकिए। ऐसा करने पर आपको किसी एक छिद्र से श्वास का अधिक स्पर्श होगा। जिस तरफ के छिद्र से श्वास निकले, बस वही स्वर चल रहा है।

(2) एक छिद्र से अधिक एवं दूसरे छिद्र से कम वेग का श्वास निकलता प्रतीत हो तो यह सुषुम्ना के साथ मुख्य स्वर कहलाएगा।

किस तिथि को कौन-सा स्वर चलना शुभ होता है
सांस के माध्यम को हम योग की भाषा में स्वर कहते हैं। नाक के जिस छिद्र से सांस ली जाती है उसी छिद्र की दिशा के अनुसार ही दाएं स्वर चलना या बाएं स्वर चलना कहा जाता है। जिस प्रकार दिन में लग्न का परिवर्तन होता है, उसी प्रकार स्वर का परिवर्तन भी उसी समय में होता है।

पानी पीते समय कौन सा स्वर चलना चाहिए?
स्नान, भोजन, शौच आदि के वक्त दाहिना स्वर रखें। पानी, चाय, काफी आदि पेय पदार्थ पीने, पेशाब करने, अच्छे काम करने आदि में बांया स्वर होना चाहिए। जब शरीर अत्यधिक गर्मी महसूस करे तब दाहिनी करवट लेट लें और बांया स्वर शुरू कर दें।

अमावस्या को कौन सा स्वर चलना चाहिए?
कृष्णपक्ष की प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, अमावस्या- इन 9 दिनों में सूर्योदय के समय पहले दाहिनी नासिका से तथा चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, दशमी, एकादशी, द्वादशी- इन 6 दिनों में सूर्य के उदयकाल में पहले बाईं नासिका से श्वास आरंभ होता है और ढाई घड़ी के बाद दूसरी नासिका से चलता है।

उत्तरायण में कौन सा स्वर चलना चाहिए?
दक्षिणायन शुरू होने के दिन प्रातःकाल जगते ही यदि चन्द्र स्वर हो तो पूरे छह माह अच्छे गुजरते हैं। इसी प्रकार उत्तरायण शुरू होने के दिन प्रातः जगते ही सूर्य स्वर हो तो पूरे छह माह बढ़िया गुजरते हैं।

चंद्र स्वर क्या होते हैं?
नाक के दाहिने छिद्र को दाहिना स्वर या सूर्य स्वर अथवा पिंगला नाड़ी कहा जाता है और बायें छिद्र को बायां स्वर या चंद्र स्वर अथवा इडा नाड़ी कहा जाता है। इन्हें कंट्रोल करने से हम अपनी पूरी दिनचर्या, स्वास्थ्य, एनर्जी और दिमाग की क्षमता को बढ़ा सकते हैं। इसे स्वरोदय चिकित्सा से भी जोड़ा गया है।

सोते समय कौन सा नथुना सक्रिय होना चाहिए?
अगर आपकी दाईं नासिका ज़्यादा खुली हुई लगती है, तो आप जिस भी तरफ़ चाहें सो सकते हैं। लेकिन, अगर आपकी बाईं नासिका ज़्यादा खुली हुई लगती है, तो आपको अपनी बाईं तरफ़ सोने की सलाह दी जाती है । उन्होंने कहा कि सुबह उठने पर बिस्तर से बाहर निकलने से पहले अपनी दाईं तरफ़ करवट लें।

दाहिनी नासिका प्रमुख होने पर क्या करना चाहिए?
दूसरे शब्दों में, आप छह की गिनती तक बाएं नथुने से सांस लेंगे, अपनी उंगली से दाएं नथुने को बंद रखेंगे। तीन गिनती तक सांस रोककर रखें। फिर दाएं नथुने को छोड़ें और छह की गिनती तक सांस छोड़ें, अपनी उंगली से बाएं नथुने को बंद करें और छह की गिनती तक दाएं नथुने से सांस लें।

नहाते समय कौन सा स्वर चलना चाहिए?
बाएं नथुने का चलना बायां या चंद्रस्वर, दाएं नथुने का चलना दायां या सूर्य स्वर तथा दोनों के बीच सम स्थिति को संधि स्वर कहा जाता है।

घर से निकलते समय कौन सा स्वर चलना चाहिए?
ज्योतिष के अनुसार यदि किसी यात्रा को शुभ और सफल बनाने के लिए हमेशा घर से निकलते समय स्वर का विशेष ध्यान रखें. यदि आपकी नासिका का दायां स्वर चले तो अपना दायां पैर पहले निकाले और बायां स्वर चल रहा हो तो अपना बायां पैर घर की डेहरी से पहले निकालें.

सुषुम्ना स्वर क्या होते हैं?
स्वर तीन प्रकार के होते हैं -सूर्य, चंद्र और सुषुम्ना स्वर.
स्वरोदय विज्ञान के अनुसार अगर श्वास दाहिने छिद्र से बाहर निकल रही है तो यह सूर्य स्वर होगा। इसके विपरीत यदि श्वास बाएं छिद्र से निकल रही है तो यह चंद्र स्वर होगा एवं यदि जब दोनों छिद्रों से निःश्वास निकलता महसूस करें तो यह सुषुम्ना स्वर कहलाएगा।

पिंगला और इड़ा क्या है?
पिंगला बहिर्मुखी (सक्रिय) सौर नाड़ी है, और शरीर के दाहिने हिस्से और मस्तिष्क के बाएं हिस्से से मेल खाती है। इडा अंतर्मुखी, चंद्र नाड़ी है, और शरीर के बाएं हिस्से और मस्तिष्क के दाहिने हिस्से से मेल खाती है।

नाक का कौन सा स्वर चलना चाहिए?
नाक के दाहिने छिद्र से चलने वाले स्वर को सूर्य स्वर कहते हैं। बाएं छिद्र से चलने वाले स्वर को चंद्र स्वर कहते हैं। योग विद्या के अनुसार इन्हें इडा और पिंगला भी कहते हैं। दोनों छिद्रों से चलने वाले श्वास को सुषुम्ना स्वर कहते हैं।

पिंगला नाड़ी से कौन सा श्वास बाहर आता है?
जिन लोगों की दायीं यानी पिंगला नाड़ी अधिक सक्रिय होती है, वे बहिर्मुखी होते हैं। जैसे ही यह सक्रिय होती है, दायीं नासिका से श्वास-प्रश्वास अधिक होने लगता है।

इड़ा और पिंगला को संतुलित कैसे करें?
नाड़ी शोधन (नाक से सांस लेना) इडा और पिंगला में संतुलन लाने के सबसे शक्तिशाली तरीकों में से एक है। चूंकि आप प्रत्येक नासिका से सांस लेना बदलते हैं, इसलिए यह नाड़ियों में संतुलन की भावना लाता है। और आसन अभ्यास के बाद किया जाने वाला यह आपके द्वारा किए गए किसी भी असंतुलन को बेअसर करने में मदद कर सकता है।

अर्द्ध स्वर क्या होते हैं?
ध्वनिविज्ञान और ध्वनिविज्ञान में, अर्धस्वर , ग्लाइड या अर्धव्यंजन एक ऐसी ध्वनि है जो ध्वन्यात्मक रूप से स्वर ध्वनि के समान होती है लेकिन एक शब्दांश के नाभिक के बजाय शब्दांश सीमा के रूप में कार्य करती है। अंग्रेजी में अर्धस्वरों के उदाहरण क्रमशः yes और west में व्यंजन y और w हैं।

बायीं नासिका श्वास क्या है?
जब प्रेरणा और समाप्ति (एक श्वास चक्र) केवल बाएं नथुने द्वारा पूरा किया जाता है, उस समय के लिए दायां नथुना बंद होता है, इस प्रकार के श्वास अभ्यास को ” चंद्र अनुलोम विलोम ” प्राणायाम कहा जाता है; यह श्वास अभ्यास गर्मी को शीतलन प्रभाव में स्थानांतरित करेगा

दाहिनी नासिका से सांस लेने का क्या मतलब है?
योगिक अभ्यास से पता चलता है, और वैज्ञानिक प्रमाण भी दर्शाते हैं, कि दाएं नथुने से ली गई सांस अपेक्षाकृत उच्चतर सहानुभूति गतिविधि (उत्तेजना की स्थिति) से जुड़ी होती है, जबकि बाएं नथुने से ली गई सांस अपेक्षाकृत अधिक पैरासिम्पेथेटिक गतिविधि (तनाव कम करने वाली स्थिति) से जुड़ी होती है।

बासी मुंह पानी पीने से कौन सी बीमारी ठीक होती है?
सुबह बासी मुंह पानी पीने से हाई बीपी और ब्‍लड शुगर की समस्या को कंट्रोल किया जा सकता है। इसके लिए सुबह उठकर एक गिलास गुनगुना पानी पिएं। सुबह उठते ही बिना ब्रश पानी का सेवन आपके पाचन तंत्र को मजबूत करता है। यह आदत एसिडिटी, कब्ज, गैस को खत्म करके हेल्दी डाइजेशन बनाए रखने में मदद करती है।

111. रिश्ते

कुछ रिश्ते जीवन के अनमोल खजाने होते हैं।
ये जीवन के सुंदर और सुहाने होते हैं।
हर धड़कन में एहसास छुपा होता है।
दिल के करीब कोई अपना होता है।

कुछ रिश्ते बिना नाम के ही बन जाते हैं।
सूखे पेड़ पर जैसे फूल खिल जाते हैं।
कभी दोस्ती, कभी प्रेम का रूप लेते हैं।
जीवन का अर्थ भी धीरे दे देते हैं।

संग उनके हर दर्द हल्का लगने लगता है।
बंजर मन में भी फूल खिलने लगता है।
खुशियों के रंग जीवन में भर जाते हैं।
कुछ रिश्ते जन्नत सा सुख दे जाते हैं।

सच्चे भावों की खुशबू साथ रहती है।
दिल की धड़कन भी कुछ कहती है।
अपनापन धीरे से घर करता है।
मन भी शांति का वर करता है।

कुछ रिश्ते यादों में बस जाते हैं।
जीवन का संगीत बन जाते हैं।
यही रिश्तों का सच्चा सार है।
रिश्तों में ही जीवन का प्यार है।

110. अंत का सच

क्यों गुरुर चार दिन के ठाठ पर।
मुट्ठी खाली घाट की राह पर।

दुनिया का खेल भी खत्म होगा।
अंत में सब पीछे छूटेगा।

धन भी यहीं रह जाएगा।
मान भी यहीं सो जाएगा।

शोहरत की चमक मिट जाएगी।
सिर्फ यादें संग रह जाएँगी।

घमंड का बोझ कभी मत लेना।
सादगी को दिल में ही रखना।

समय से बड़ा कोई नहीं।
सच से बड़ा कोई नहीं।

आज मुस्कान सबको देना।
दर्द में भी हाथ बढ़ाना।

दिल किसी का मत दुखाना।
इंसानियत को साथ निभाना।

जीवन एक क्षण का मेला है।
हर इंसान यहाँ अकेला है।

अंत में खाली हाथ जाना।
यही जीवन का सच माना।

109. पतझड़ का वादा

हर पतझड़ एक वादा है।
कि बसंत फिर आएगा।
उसी सूखी शाखा पर।
नया फूल खिल जाएगा।

पत्ते झड़ना भी सीखाते हैं।
समय बदलना भी बताते हैं।
जो टूटता है, वही बनता है।
संघर्ष से जीवन सजता है।

धैर्य रखो, मौसम बदलेगा।
अंधेरा भी एक दिन ढलेगा।
हवा नए गीत सुनाएगी।
धरती फिर मुस्कुराएगी।

हर खालीपन भर जाएगा।
हर दर्द भी मिट जाएगा।
उम्मीद का दीप जलाए रखना।
दिल में विश्वास बनाए रखना।

पतझड़ भी एक संदेश देता है।
नया जन्म हमेशा लेता है।
संघर्ष ही पहचान बनाएगा।
बसंत फिर लौटकर आएगा।

108. अपनी क़ीमत पहचानो

जीवन में उसे प्राथमिकता मत दो।
जो तुम्हें सिर्फ विकल्प समझता हो।
जो तुम्हें वक्त मिले तभी याद करे।
और अपने मतलब से ही बात करे।

     दिल की जगह शर्तें रखे जो।
     प्यार में भी गणित करे जो।
     ऐसे रिश्तों से दूरी रखो।
     अपने सम्मान को आगे रखो।

जो सच में अपना होगा।
वो हर हाल में साथ होगा।
मुश्किल में हाथ बढ़ाएगा।
और दिल से रिश्ता निभाएगा।

     खुद को कभी कम मत समझो।
     दूसरों के लिए मत बदलो।
     अपनी पहचान बनाए रखना।
     सच की राह अपनाए रखना।

विकल्प बनना भी अपमान है।
स्वाभिमान ही सबसे महान है।
जो तुम्हें चुनता है दिल से।
वही रहेगा जीवन की मंज़िल से।

107. नेता जी का खेल


एक कामयाब नेता वही कहलाए।
जो अपने बच्चों को विदेश पहुँचाए।
दूसरों के बच्चों को मैदान में लगाए।
धार्मिक जुलूसों में उन्हें घुमाए।

घर के बच्चों को डॉलर कमाने भेजे।
और जनता को देशभक्ति के बीज दे।
बाहर पढ़ाई, अंदर लड़ाई चलती है।
कुर्सी की दुनिया बड़ी रंगीली लगती है।

भाषण में सेवा का राग सुनाए।
पीछे से अपना काम बनाए।
वोट के मौसम में मुस्कान बिखेरे।
बाद में अपने वादे ही घेरे।

सड़क भी बने, पर फोटो भी हो।
घोषणा भी हो, पर नोट भी हो।
समस्याएँ धीरे चलती जाएँ।
फाइलें कुर्सी पर ही सो जाएँ।

जनता हँसे या रोती रहे।
नेताजी की गाड़ी दौड़ती रहे।
यह भी राजनीति का मज़ाक है।
लोकतंत्र में थोड़ा सा नाटक है।

106. समझदारी का रास्ता


होशियार होना अच्छी बात है।
पर घमंड करना गलत बात है।
दूसरों को मूर्ख समझना भूल है।
यही जीवन का असली मूल है।

ज्ञान बढ़े तो विनम्र बनो।
अहंकार को मन से कम करो।
अपनी समझ पर गर्व करो।
पर सबका सम्मान भी करो।

हर इंसान अलग सोच रखता है।
हर दिल अपना सच कहता है।
सबको एक जैसा मत मानो।
समझदारी का अर्थ पहचानो।

जो ज्यादा जानता है, चुप रहता है।
जो सच्चा है, धैर्य से रहता है।
दूसरों को नीचा दिखाना नहीं।
इंसानियत को मिटाना नहीं।

होशियार बनो, मगर सरल रहो।
दिल में सच्चाई लेकर चलो।
यही सबसे बड़ी समझदारी है।
यही जीवन की जिम्मेदारी है।

105. गद्दार की पहचान

जब दुश्मन हर राज़ से बाक़िफ़ हो।
तो समझ लेना दोस्त ग़द्दार है।
     मीठी बातों के पीछे जहर छुपा।
     ऐसा भी कोई किरदार है।
हर मुस्कान सच्ची नहीं होती।
हर चमक सोने जैसी नहीं होती।
     कभी नज़दीकी भी धोखा देती है।
     अंदर ही अंदर चोट देती है।
जो ज्यादा अपना बनने लगे।
वही अक्सर दूर जाने लगे।
     राज़ अपने सब मत खोलो।
     समझदारी की चाबी तोलो।
हर साथी साथ निभाता नहीं।
हर रिश्ता दिल से जाता नहीं।
     समय पर सच खुद दिख जाएगा।
     भेद भी धीरे खुल जाएगा।
विश्वास बहुत अनमोल है।
पर परखना भी बड़ा बोल है।
     जो सच्चा है वही रहेगा।
     झूठ का पर्दा गिर ही जाएगा।
सच की राह कठिन जरूर है।
पर यही जीवन का नूर है।

104. ऊँचाई का सच

हर ऊँचाई को गिरने का डर होता है।
हर सफलता के पीछे संघर्ष खड़ा होता है।

जो ऊपर जाता है, संभलना भी सीखता है।
समय के साथ चलना भी सीखता है।

ऊँचाई पर अहंकार नहीं होना चाहिए।
मन में अंधकार नहीं होना चाहिए।

हौसले को हमेशा साथ रखना है।
सादगी को दिल में बाँध रखना है।

शिखर भी एक दिन थक जाता है।
मजबूत वही जो टिक जाता है।

सपनों को उड़ान देना है।
पर जड़ों को भी पहचानना है।

हर जीत परीक्षा लेकर आती है।
नई चुनौती भी साथ लाती है।

डर को मन से दूर भगाओ।
आगे बढ़ते कदम बढ़ाओ।

ऊँचाई वही जो संतुलन सिखाए।
जीवन को सच्चा अर्थ बताए।

संघर्ष ही पहचान बनाता है।
यही सफलता का गीत गाता है।