9. कान खड़े हुए मोहल्ले में

हमारे मोहल्ले में वैसे तो शांति रहती थी, लेकिन जैसे ही कोई असामान्य आवाज़ सुनाई देती, सबके कान अपने-आप खड़े हो जाते थे। एक रविवार की सुबह अचानक गली में बड़ी सी चमचमाती गाड़ी आकर रुकी। गाड़ी ऐसी थी जैसी लोगों ने अब तक सिर्फ़ टीवी में देखी थी। बस फिर क्या था, परदे हिले, खिड़कियाँ खुलीं और कान खड़े हुए पूरे मोहल्ले में।

सबसे पहले वर्मा आंटी ने बालकनी से झाँका। उन्होंने तुरंत निष्कर्ष निकाला कि जरूर कोई बड़ा अधिकारी आया है। पाँच मिनट में यह सूचना गुप्ता आंटी तक पहुँची, लेकिन वहाँ पहुँचते-पहुँचते अधिकारी की जगह “फिल्म का हीरो” बन चुका था। बच्चों ने तो तय कर लिया कि आज ऑटोग्राफ लेकर ही मानेंगे।

उधर शर्मा जी ने चश्मा ठीक करते हुए घोषणा की, “लगता है आयकर विभाग की रेड है।” यह सुनते ही जिन-जिन के घरों में नकद रखा था, सबको अपने-अपने ड्रॉअर याद आने लगे। माहौल में हल्की घबराहट तैर गई।

तभी गाड़ी से एक साधारण सा युवक उतरा। उसने आसपास देखा और मोबाइल पर किसी से पूछा, “भैया, मकान नंबर 78 किधर है?” अब तक मोहल्ले के दस लोग अलग-अलग दिशाएँ बताने के लिए तैयार खड़े थे। हर किसी को लगता था कि असली जानकारी उसी के पास है।
कुछ ही देर में पता चला कि वह युवक तो ऑनलाइन फूड डिलीवरी वाला है, जो गलती से गलत गली में आ गया। गाड़ी उसकी नहीं, ग्राहक की थी, जो खुद ड्राइव करके उसे लेने आया था।

सच सामने आते ही सबके चेहरे बदल गए। वर्मा आंटी ने तुरंत कहा, “हमें तो पहले से पता था।” शर्मा जी ने खाँसते हुए अख़बार खोल लिया, जैसे उन्होंने कुछ सुना ही न हो। बच्चे थोड़े निराश हुए कि न कोई हीरो निकला, न कोई रेड पड़ी।

गाड़ी चली गई, गली फिर शांत हो गई। लेकिन उस दिन सबको समझ आ गया कि हमारे मोहल्ले में खबर से पहले कान खड़े हो जाते हैं। और जब तक सच्चाई सामने आती है, कल्पनाएँ अपना पूरा शो कर चुकी होती हैं।

7. खून पसीना एक करने की कहानी

रामभरोसे जी ने एक दिन अचानक घोषणा कर दी कि अब वे भी अमीर बनकर दिखाएँगे। वर्षों तक सरकारी दफ्तर में कुर्सी गरमाने के बाद उन्हें लगा कि दुनिया मेहनत से चलती है, इसलिए उन्होंने ठान लिया कि वे “खून पसीना एक” कर देंगे। परिवार को समझ नहीं आया कि यह जोश चाय का असर है या किसी प्रेरणादायक वीडियो का।

सबसे पहले उन्होंने सुबह पाँच बजे उठना शुरू किया। अलार्म बजते ही वे ऐसे कूदते जैसे ओलंपिक की तैयारी हो। आधे घंटे योग, फिर दौड़। दौड़ते-दौड़ते पाँच मिनट में ही उन्हें याद आ जाता कि उम्र और उत्साह का तालमेल भी ज़रूरी होता है। घर लौटते तो पसीना बह रहा होता और वे गर्व से कहते, “देखो, मेहनत शुरू!” पत्नी मुस्कुराकर तौलिया पकड़ा देतीं।

इसके बाद उन्होंने छत पर सब्ज़ी उगाने की योजना बनाई। बीज खरीदे, गमले सजाए, यूट्यूब देखकर खेती का ज्ञान लिया। पहले हफ्ते पौधों को इतना पानी दिया कि वे तैरने लगे। दूसरे हफ्ते भूल गए, तो पौधे सूखने लगे। फिर बोले, “किसान होना आसान नहीं, सच में खून पसीना एक करना पड़ता है।”

हार न मानते हुए उन्होंने ऑनलाइन व्यापार शुरू किया। रात भर वेबसाइट बनाते रहे। सुबह पता चला कि पासवर्ड खुद ही भूल गए हैं। बैंक से फोन आया कि तीन बार गलत लॉगिन हुआ है। रामभरोसे जी ने गंभीर स्वर में कहा, “सफलता इतनी आसानी से नहीं मिलती।”

तीन महीने बाद न वे करोड़पति बने, न किसान, न उद्योगपति। लेकिन एक बदलाव ज़रूर आया। अब वे सच में मेहनत की कदर करने लगे थे। दफ्तर के चपरासी से लेकर सब्ज़ी वाले तक सबको नए सम्मान से देखते।

एक शाम थके हुए सोफे पर बैठे बोले, “अमीर बनूँ या न बनूँ, मेहनत की इज़्ज़त समझ आ गई।” पत्नी हँसकर बोलीं, “अच्छा है, कम से कम पसीना तो असली बहा।”

रामभरोसे जी आज भी कोशिश में लगे हैं। फर्क बस इतना है कि अब वे खून-पसीना एक करने से पहले डॉक्टर से सलाह ले लेते हैं।

6. टांग अड़ाने वाले चाचा जी

हमारे मोहल्ले में एक अनोखी शख्सियत रहते थे—चाचा त्रिलोकीनाथ। उनकी सबसे बड़ी प्रतिभा थी हर काम में टांग अड़ाना। चाहे मामला घर का हो, गली का हो या देश-दुनिया का, चाचा जी की राय बिना बुलाए हाज़िर हो जाती थी। लोग कहते थे कि अगर किसी काम में रुकावट न आ रही हो, तो चाचा जी को बुला लो, वे व्यवस्था कर देंगे।

एक बार शर्मा जी ने अपने घर की पेंटिंग शुरू करवाई। रंग अभी आधा ही हुआ था कि चाचा जी प्रकट हो गए। दीवार को ध्यान से देखते हुए बोले, “यह नीला ठीक नहीं है, इसमें हल्का तोता-हरा मिलाओ, घर चमक उठेगा।” बेचारे शर्मा जी दुविधा में पड़ गए। पेंटर ने रंग बदला, लेकिन नतीजा ऐसा निकला कि घर तोता कम और तोता-चश्म ज्यादा लगने लगा।

कुछ दिनों बाद गुप्ता जी ने नई स्कूटर खरीदी। चाचा जी ने तुरंत सलाह दी, “पहले दिन लंबी दूरी मत चलाना, इंजन थक जाएगा।” गुप्ता जी ने उनकी बात मान ली। हफ्ते भर स्कूटर खड़ी रही और बैटरी बैठ गई। तब चाचा जी ने गंभीर स्वर में कहा, “देखा, मैंने कहा था न, मशीन को समझना चाहिए।”

चाचा जी की आदत इतनी प्रसिद्ध थी कि मोहल्ले के बच्चे भी खेल शुरू करने से पहले चौकीदारी रखते—“देखो, चाचा जी आ तो नहीं रहे?” एक दिन क्रिकेट मैच चल रहा था। जैसे ही बल्लेबाज़ ने छक्का मारा, चाचा जी बोले, “अरे, पैर आगे रखो, टेक्निक गलत है।” अगली गेंद पर खिलाड़ी बोल्ड हो गया। चाचा जी ने संतोष से सिर हिलाया, मानो उनकी भविष्यवाणी सच हो गई हो।

सबसे मज़ेदार घटना तब हुई जब चाचा जी खुद घर की छत ठीक करवा रहे थे। पड़ोसी ने मज़ाक में कहा, “चाचा जी, किसी की टांग मत अड़ाने देना।” चाचा जी मुस्कुरा दिए, लेकिन उसी समय उनका पैर सचमुच फिसल गया और वे बाल-बाल बचे।

उस दिन के बाद थोड़ी सावधानी आई, पर आदत पूरी तरह नहीं गई। अब भी वे हर चर्चा में मौजूद रहते हैं। फर्क बस इतना है कि लोग मुस्कुराकर कहते हैं—“चाचा जी, आपकी टांग सुरक्षित दूरी से अड़ाइए।”

5. सिर पर भूत सवार परीक्षा का

मार्च का महीना था और पूरे घर में अजीब सा तनाव तैर रहा था। वजह थी—राहुल की बोर्ड परीक्षा। राहुल सामान्य दिनों में बेहद शांत प्राणी था, लेकिन परीक्षा का नाम सुनते ही उसके सिर पर मानो भूत सवार हो जाता था।

सुबह पाँच बजे अलार्म बजता, तो वह ऐसे उछलकर उठता जैसे देश की अर्थव्यवस्था उसी के रिज़ल्ट पर निर्भर हो। माँ चाय देतीं तो वह पूछता, “माँ, अगर तीन चैप्टर छूट गए तो क्या मैं साधु बन जाऊँ?” पिताजी समझाते, “पहले परीक्षा दे लो, फिर सन्यास लेना।”

राहुल ने पढ़ाई का ऐसा टाइम-टेबल बनाया कि खुद देखकर घबरा गया। हर घंटे के लिए अलग विषय, हर विषय के लिए अलग रंग का पेन। दीवार पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा—“अब नहीं पढ़ा तो कभी नहीं!” लेकिन पाँच मिनट बाद ही मोबाइल की तरफ हाथ बढ़ जाता। फिर खुद को डाँटता, “यह मोह-माया है!”

परीक्षा से एक दिन पहले तो हालत और भी मज़ेदार थी। उसे लगने लगा कि जो पढ़ा है वह सब भूल गया है। उसने छोटी बहन से पूछा, “तुम्हें पायथागोरस का प्रमेय याद है?” बहन बोली, “मुझे तो मेरा होमवर्क भी याद नहीं।” राहुल का आत्मविश्वास और डगमगा गया।

रात को उसने पाँच बार बैग चेक किया—एडमिट कार्ड, पेन, पेंसिल, स्केल। फिर भी सोते-सोते अचानक उठकर पूछता, “माँ, एडमिट कार्ड उड़ तो नहीं गया?”

परीक्षा के दिन स्कूल पहुँचा तो देखा, बाकी दोस्त हँस-बोल रहे थे। किसी के सिर पर कोई भूत नहीं था। पेपर मिला तो आधे सवाल वही थे जो उसने पढ़े थे। धीरे-धीरे उसका डर उतरने लगा।

तीन घंटे बाद जब वह बाहर निकला तो चेहरे पर मुस्कान थी। बोला, “इतना भी कठिन नहीं था!” पिताजी हँसकर बोले, “भूत गया?” राहुल मुस्कुराया, “हाँ, अब रिज़ल्ट का नया भूत आने वाला है।”

घर लौटते ही उसने घोषणा की, “अब एक हफ्ता आराम!” लेकिन शाम तक अगली परीक्षा का सिलेबस देखकर फिर वही हाल—सिर पर भूत सवार परीक्षा का!

4. नमक मिर्च लगी मोहल्ले की खबर

हमारे मोहल्ले में खबरें कभी सीधी नहीं चलती थीं; वे हमेशा रास्ते में नमक-मिर्च लगाकर ही आगे बढ़ती थीं। एक दिन सुबह-सुबह बस इतना हुआ कि शर्मा जी ने अपने घर के बाहर एक नई प्लास्टिक की कुर्सी रख दी। उनका इरादा बहुत साधारण था—धूप सेंकते हुए अख़बार पढ़ना और कमर दर्द से थोड़ी राहत पाना।

सबसे पहले यह दृश्य वर्मा आंटी की नजर में आया। उन्होंने खिड़की से झाँकते ही अनुमान लगा लिया कि जरूर कोई खास मेहमान आने वाला है। पाँच मिनट के भीतर यह सूचना गुप्ता आंटी तक पहुँची, लेकिन वहाँ पहुँचते-पहुँचते खबर का रंग बदल चुका था। अब बात मेहमान से आगे बढ़कर “रिश्ता देखने आने वालों” तक पहुँच गई थी।

दोपहर होते-होते आधे मोहल्ले को विश्वास हो गया कि शर्मा जी की बेटी की सगाई पक्की हो चुकी है। किसी ने जोड़ा कि लड़का विदेश में नौकरी करता है। किसी ने कहा कि दहेज में कार भी तय हो गई है। खबर इतनी सज-धजकर फैल चुकी थी कि सच्चाई खुद पहचान में न आए।

शाम को अचानक शर्मा जी के दरवाजे पर भीड़ लग गई। कोई मिठाई लेकर आया, कोई बधाई देने। शर्मा जी हैरान रह गए। उन्होंने पूछा, “भाई, बात क्या है?” जब उन्हें बताया गया कि बेटी की सगाई की खुशी मनाई जा रही है, तो वे कुछ पल के लिए चुप रह गए। फिर हँसते हुए बोले, “अरे भई, यह कुर्सी तो मैंने अपनी कमर सीधी करने के लिए रखी है, सगाई के लिए नहीं!”

कुछ क्षणों का सन्नाटा छाया, फिर सबने बात को हल्के में लेने की कोशिश की। पर कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। अगले दिन नई चर्चा शुरू हो गई कि “कल वाली बात से शर्मा जी नाराज़ हो गए हैं।”

इस तरह एक साधारण कुर्सी ने पूरे मोहल्ले में उत्सव और फिर अफवाह का माहौल बना दिया। सच छोटा था, लेकिन नमक-मिर्च लगी खबर ने उसे इतना बड़ा बना दिया कि वह खुद ही कहानी बन गया।

3. कान काटे चतुर नौकर ने

हमारे शहर में लाला बद्रीप्रसाद अपनी कंजूसी और सख्ती के लिए मशहूर थे। उनकी किराने की दुकान पर तौल से लेकर तोलने वाले तक सब पर नजर रहती थी। वे हर समय यही कहते रहते, “दुकान में एक दाना भी कम नहीं होना चाहिए।” एक दिन उन्होंने नया नौकर रखा—नाम था भोला। नाम से भले भोला लगे, लेकिन उसकी आँखों में तेज साफ झलकता था।

पहले ही दिन लाला जी ने उसे डरा दिया, “अगर हिसाब में एक पैसा भी कम हुआ तो तेरे कान काट लूँगा।” भोला ने सिर झुकाकर “जी मालिक” कहा, पर मन ही मन मुस्कुराया। उसने जल्दी ही समझ लिया कि मालिक डर दिखाकर काम करवाना चाहते हैं।

कुछ दिनों बाद भोला ने एक योजना बनाई। उसने दुकान के बाहर एक बोर्ड टाँग दिया—“आज विशेष छूट, सीमित समय के लिए।” यह देखकर ग्राहक टूट पड़े। जो सामान महीनों से धूल खा रहा था, वह भी तेजी से बिकने लगा। शाम तक दुकान में अच्छी-खासी कमाई हो चुकी थी।

जब लाला जी लौटे तो दुकान पर भीड़ देखकर चौंक गए। उन्होंने घबराकर पूछा, “ये क्या हो रहा है?” भोला ने बड़े आत्मविश्वास से जवाब दिया, “मालिक, बिक्री बढ़ा रहा हूँ।” रात को जब हिसाब-किताब हुआ तो मुनाफा उम्मीद से ज्यादा निकला। लाला जी खुश तो हुए, लेकिन बोर्ड की बात याद आते ही उनका माथा गर्म हो गया।

उन्होंने सख्त आवाज में पूछा, “छूट देने को किसने कहा?”
भोला ने शांत भाव से कहा, “मालिक, आपने ही तो कहा था कि एक पैसा भी कम हुआ तो कान काट लेंगे। मैंने सोचा, ज्यादा बिक्री होगी तो कमी का सवाल ही नहीं उठेगा।”

लाला जी कुछ पल के लिए निरुत्तर रह गए। पहली बार उन्हें एहसास हुआ कि डर से ज्यादा असर समझदारी का होता है। मोहल्ले में यह बात फैल गई कि भोला ने बिना छुए ही मालिक के कान काट लिए—अक्ल से।

उस दिन के बाद लाला जी का रवैया थोड़ा नरम हो गया, और भोला की तनख्वाह भी बढ़ गई।

2. छाती ठोककर बोले पंडित जी

हमारे मोहल्ले में पंडित कैलाशनाथ जी बड़ी प्रसिद्ध हस्ती थे। प्रसिद्धि का कारण उनका ज्ञान कम और आत्मविश्वास ज़्यादा था। वे हर बात पर ऐसे छाती ठोककर बोलते थे मानो ब्रह्मांड की गोपनीय फाइलें उनके पास ही सुरक्षित हों। उनकी आवाज़ में ऐसा दम था कि साधारण वाक्य भी भविष्यवाणी लगने लगता था।

एक दिन गुप्ता जी ने यूँ ही पूछ लिया, “पंडित जी, बारिश कब होगी?” पंडित जी ने तुरंत आसमान की ओर देखा, आँखें बंद कीं, माथे पर तीन रेखाएँ उभारीं और बोले, “परसों वर्षा निश्चित है!” पूरा मोहल्ला छाते निकालकर तैयार बैठ गया। परसों ऐसी तेज धूप निकली कि लोग आम सुखाने लगे। शिकायत करने पर पंडित जी ने गंभीरता से कहा, “प्रकृति ने अंतिम क्षण में अपना निर्णय बदल दिया।”

कुछ दिनों बाद शर्मा जी की बिल्ली गायब हो गई। पंडित जी को बुलाया गया। उन्होंने हाथ देखकर घोषणा की, “बिल्ली उत्तर दिशा में है।” आधा मोहल्ला उत्तर की ओर दौड़ा। बिल्ली दक्षिण में दूध की दुकान के पास मिली। पंडित जी मुस्कुराए और बोले, “बिल्ली अत्यंत चंचल जीव है, दिशा बदलती रहती है।”

चुनाव के समय तो उनका आत्मविश्वास चरम पर था। उन्होंने छाती ठोककर एक उम्मीदवार की जीत की घोषणा कर दी। परिणाम आया तो वह उम्मीदवार तीसरे स्थान पर था। पंडित जी ने बिना पलक झपकाए कहा, “मेरी आध्यात्मिक दृष्टि में वही विजेता है।”

कहानी का असली मोड़ तब आया जब उनकी खुद की साइकिल चोरी हो गई। मोहल्ले वालों ने घेर लिया—“अब बताइए, चोर कहाँ है?” पंडित जी ने गला साफ किया, छाती ठोकी और बोले, “चोर पास ही है।” तभी पीछे से आवाज आई, “पंडित जी, आपकी साइकिल नाली में गिरी पड़ी है।”
सब हँस पड़े। पंडित जी क्षणभर झेंपे, फिर बोले, “मैंने कहा था न, पास ही है।”

उस दिन के बाद भी उनका आत्मविश्वास जस का तस रहा। बस उन्होंने एक नई पंक्ति जोड़ ली—“फलित ज्योतिष परिस्थितियों पर निर्भर है।” और मोहल्ला आज भी उनकी भविष्यवाणियों का आनंद लेता है।

1. नाकों चने चबवाने वाला बॉस

हमारे ऑफिस में एक महान विभूति विराजमान थे — श्री तिवारी जी। पद उनका “सीनियर मैनेजर” था, लेकिन व्यवहार ऐसा मानो समय के स्वयं नियुक्त ब्रांड एंबेसडर हों। घड़ी की टिक-टिक उनके दिल की धड़कन से सिंक्रोनाइज़ थी। कोई कर्मचारी एक मिनट भी लेट हो जाए तो वे ऐसे देखते जैसे देश की अर्थव्यवस्था उसी पर टिकी हो।

तिवारी जी का सिद्धांत साफ था — “काम पहले, सांस बाद में।” वे “गुड मॉर्निंग” का जवाब भी इस अंदाज़ में देते, “मॉर्निंग तभी गुड होगी जब रिपोर्ट टाइम पर होगी।” उनकी मीटिंग्स इतनी अनुशासित होतीं कि कुर्सियाँ भी सीधी कमर करके बैठतीं और पंखा भी धीरे-धीरे घूमता, कहीं तेज़ चलकर अनुशासन न तोड़ दे।

एक दिन मैंने हिम्मत जुटाई और पूछा, “सर, चाय लेंगे?”
उन्होंने चश्मा ठीक किया और बोले, “पहले टारगेट पूरा करो, फिर चाय में शक्कर डालना।”

उस दिन मुझे समझ आया कि हमारे ऑफिस में चाय भी परफॉर्मेंस बेस्ड होती है।

पूरी टीम उनसे इतनी डरती थी कि व्हाट्सऐप पर भी ‘हाहा’ लिखने से पहले सोचती थी कहीं वह भी टाइम वेस्ट में न गिना जाए। एक बार हम सब पाँच मिनट लेट पहुँचे। तिवारी जी ने कुछ नहीं कहा। बस मुस्कुराए। वही मुस्कान इतनी खतरनाक थी कि हमें लगा सैलरी स्लिप खुद कांप रही होगी।

लेकिन कहानी में मोड़ तब आया जब एक दिन उनका लैपटॉप अचानक हैंग हो गया। वे बार-बार माउस हिलाते रहे, जैसे उससे कंप्यूटर डरकर चल पड़ेगा। पहली बार हमने उनके चेहरे पर घबराहट देखी। आईटी विभाग आया। लड़के ने कहा, “सर, रीस्टार्ट कर दीजिए।”

तिवारी जी चुप हो गए। दो मिनट बाद सिस्टम चालू हुआ — और उनके चेहरे पर भी नई समझ का सॉफ्टवेयर इंस्टॉल हो गया।

उस दिन के बाद वे थोड़े नरम पड़ गए। अब वे कभी-कभी खुद चाय पूछ लेते हैं। और हम? हम भी समय पर आने लगे — डर से नहीं, आदत से।

मोहल्ले में आज भी लोग कहते हैं —
“अरे, वही तिवारी जी? जो पहले नाकों चने चबवाते थे… और अब रीस्टार्ट में विश्वास रखते हैं!”

150. वो सख़्त वाला बचपन

हम उस ज़माने के हैं भाई,
जब प्यार में भी मिलती थी धुनाई।

रोते हुए को चुप कराने के लिए,
दोबारा पीटा जाता था जी भर के लिए।

मम्मी कहती, “रोना बंद करो वरना…”,
और “वरना” में छिपा होता था सारा तजुर्बा।

पापा की एक खाँसी ही काफी थी,
पूरी शरारत वहीं माफ़ी थी।

होमवर्क भूलो तो क्लास में मार,
घर आओ तो फिर से सत्कार।

टीवी पर कार्टून देखना सपना था,
रिमोट पर पापा का ही कब्जा अपना था।

गलती से गिलास अगर टूट जाता,
सारा खानदान जज बन जाता।

बाहर खेलते-खेलते देर जो हो जाए,
दरवाज़े पर प्रवचन तैयार मिल जाए।

फिर भी वो बचपन बड़ा निराला था,
मार में भी छिपा प्यार वाला था।

ना टेंशन, ना कोई बहाना था,
बस डर ही हमारा खज़ाना था।

आज के बच्चे समझ नहीं पाएंगे,
उस सख़्ती में भी मज़े थे—ये जान न पाएंगे।

हम उस जमाने के हैं जनाब,
जहाँ थप्पड़ भी थे—पर प्यार भी।

149. साथ खड़े हैं, पर अपने नहीं!

जो साथ है, वो तुम्हारे हैं—जरूरी नहीं,
          हर तालियाँ बजाने वाला सहारे हैं—जरूरी नहीं।

कुछ लोग बस भीड़ बढ़ाने आते हैं,
          सेल्फी लेकर चुपचाप खिसक जाते हैं।

साथ चलेंगे कहकर हाथ मिलाते हैं,
          मोड़ आते ही दिशा बदल जाते हैं।

मीटिंग में सब “हम-हम” चिल्लाते हैं,
          काम पड़े तो “तुम-तुम” बतलाते हैं।

मुफ्त की सलाह रोज़ दिलाते हैं,
          मदद की बारी में गायब हो जाते हैं।

कंधे से कंधा कहने में तेज़ होते हैं,
          वजन उठाने में बहुत कमज़ोर होते हैं।

पर घबराना नहीं, ये खेल पुराना है,
         जीवन ने हर किसी को आज़माना है।

जो सच में अपने होते हैं,
          वे शोर नहीं, असर में होते हैं।

वे कम बोलते, ज्यादा निभाते हैं,
         भीड़ नहीं, भरोसा बन जाते हैं।

इसलिए पहचान सीखो मुस्कान से,
         नहीं शब्दों की मीठी उड़ान से।

जो अंत तक संग निभा जाए,
        वही अपना कहलाए।

बाकी तो बस राह के यात्री हैं,
        तुम्हारी कहानी के अस्थायी पात्र ही हैं।

148. अपने-पराए का चश्मा

जीवन में खुश रहना है तो पहले ये मानो,
हर मुस्कुराता चेहरा अपना है—ये मत जानो।
कुछ लोग बस वाई-फाई जैसे होते हैं,
पास हों तो सिग्नल, दूर हों तो सोते हैं।

सब “भाई-भाई” कहकर गले लगाते हैं,
जरूरत पड़े तो मोबाइल साइलेंट पाते हैं।
चाय पर बड़े-बड़े वादे हो जाते हैं,
काम के वक्त सब गुम हो जाते हैं।

फैमिली ग्रुप में सब दिल भेजते हैं,
ऑफलाइन में हाल नहीं पूछते हैं।
स्टेटस पर “हम साथ हैं” लिखते हैं,
साथ देने में पसीने से भीगते हैं।

कुछ अपने सिर्फ त्योहारों में खिलते हैं,
बाकी दिन यादों में ही मिलते हैं।
रिश्तों की दुकान बड़ी निराली है,
यहाँ “सेल” में भी भाव-ताव की लाली है।

जो सच में अपने होते हैं,
वे कम बोलते पर संग होते हैं।
बाकी बस भीड़ बढ़ाने आते हैं,
फोटो खिंचवा कर घर को जाते हैं।

इसलिए दिल का दरवाज़ा सोच समझ खोलो,
हर “अपना” कहने वाले पर मत डोलो।
भ्रम का चश्मा जब उतारोगे यार,
तभी सच्ची खुशी देगी दस्तक बार-बार।

147. समय पर खिसकने का वरदान

सही समय पर गलत जगह से निकल जाना,
कभी-कभी भगवान का ही इशारा माना।
जहाँ मुफ्त की सलाहों की बारिश होती है,
वहाँ समझदारी अक्सर फरार होती है।

ऑफिस में जब बॉस का मूड गरम हो जाए,
और फाइलों का पहाड़ सामने आ जाए,
तभी मोबाइल पर नकली कॉल आ जाए,
और इंसान धीरे से बाहर निकल जाए।

शादी में जब रिश्तेदार घेर लें चारों ओर,
और पूछें “कब करोगे?” बार-बार जोर,
तभी अचानक याद आए जरूरी काम,
और जूते पहन भागो श्रीराम!

दोस्तों की बहस जब राजनीति छेड़ दे,
और चाय की टेबल को संसद बना दे,
तभी मुस्कुरा कर पानी पी लेना,
और चुपचाप दरवाज़े से खिसक लेना।

कभी-कभी चुप रहना भी जीत है,
समय पर हट जाना ही प्रीत है।
हर जगह वीर बनना जरूरी नहीं,
कभी-कभी बच जाना भी कमाल सही।

तो याद रखो जीवन का ये ज्ञान,
समय पर खिसकना भी है वरदान।
जहाँ दिमाग कहे “अब बस, निकल लो भाई”,
वहीं समझो ऊपरवाले ने घंटी बजाई।

146. जीते जी वाला समर्थन

अंतिम यात्रा में भीड़ उमड़ आती है,
सबकी आँखों में अचानक नमी छा जाती है।
दूर-दूर से रिश्तेदार दौड़े चले आते हैं,
फूलों से ज्यादा फोटो खिंचवाते हैं।

कंधा देने में सब आगे हो जाते हैं,
जीते जी कंधा मांगो तो बहाने बनाते हैं।
वहाँ सब कहते, “बहुत नेक इंसान था”,
जीते जी बोले, “थोड़ा परेशान था!”

माला, भाषण, श्रद्धांजलि की लाइन लगती है,
पर मदद की बारी आए तो घड़ी रुकती है।
वहाँ चाय-समोसे भी गरम मिल जाते हैं,
जीते जी हाल पूछो तो लोग सिमट जाते हैं।

सब कहते, “हम तो परिवार जैसे थे”,
जीते जी महीनों तक नज़र नहीं आते थे।
वहाँ आँसू भी टाइम से टपकाए जाते हैं,
जीते जी मैसेज का रिप्लाई टलवाए जाते हैं।

अंतिम यात्रा में सब साथ निभाते हैं,
जीते जी साथ देने से घबराते हैं।
वहाँ यादों का पिटारा खुल जाता है,
जीते जी दरवाज़ा बंद ही रह जाता है।

इस दुनिया का अजब है ये व्यवहार,
जीते जी कम, बाद में अपार प्यार।
इसलिए भाई, जीते जी मुस्कुरा लेना,
जो पास हैं, उन्हें गले लगा लेना।

145. अच्छे बनने का साइड इफेक्ट

जरूरी नहीं कि गलती करने से ही दुख मिले,
कभी-कभी ज्यादा अच्छे बनो तो भी बिल मिले।

हमने सोचा भलाई में ही भला है,
दुनिया बोली, ये तो सीधा-सा भला है।

हर किसी को हाँ में हाँ मिलाई,
अपनी ही नींद उधार चढ़ाई।

दोस्त ने कहा, जरा नोट दिला दो,
हम बोले, ले लो, और क्या दिला दो।

रिश्तेदार बोले, तुम तो बहुत न्यारे,
काम पड़े तो सबसे पहले तुम्हारे।

ऑफिस में भी यही कहानी,
मेहनत हमारी, वाहवाही अनजानी।

ना कहना सीखा ही नहीं,
इसलिए चैन देखा ही नहीं।

जितना झुको उतना झुकाते,
फिर कहते, तुम तो बड़े भाते।

एक दिन हमने थोड़ा सा टाला,
सबने बोला, देखो बदला ये निराला।

तब समझ आया सीधा फंडा,
ज्यादा मिठास भी बनती पंगा।

अब भलाई भी सोच समझकर करते,
दिल रखते, पर दिमाग भी धरते।

अच्छा बनो पर थोड़ा सयाना,
वरना बन जाओगे सबका बहाना।

हँसते-गाते यही सिखाना,
अच्छाई में भी बैलेंस लाना।

144. दादाजी की ज्ञान सभा

बुढ़ापा एक ऐसी अवस्था है निराली,
जहाँ ज्ञान की खुल जाती है तिजोरी खाली।

हर सवाल का उत्तर तैयार रहता है,
पर पूछने वाला कहीं बाहर रहता है।

दादाजी बोले, सुनो मेरी कहानी,
पोते बोले, बाद में दादाजी, अभी है रवानी।

अनुभव की गठरी कंधे पर लटकी,
पर श्रोता सब मोबाइल में अटके।

वो कहें, हमारे ज़माने में ऐसा था,
बच्चे कहें, गूगल पर वैसा था।

चश्मा ढूँढते-ढूँढते सिर पर मिल जाता,
फिर खुद पर ही हँसी का दौर आ जाता।

दाँतों की चर्चा, दवाइयों की बात,
फिर भी दिल से जवान हर रात।

हर विषय पर प्रवचन दे डालें,
चाहे कोई सुने या टालें।

राजनीति से लेकर रसोई तक ज्ञान,
हर मुद्दे पर उनका ही बयान।

कहते हैं, हमसे सीखो अनुभव प्यारे,
बच्चे बोले, पहले WiFi तो सँवारे।

बुढ़ापा सच में कमाल की चीज़,
फ्री सलाह और किस्से अतीत।

उत्तर सारे जेब में रखे होते,
पर प्रश्न पूछने वाले कम ही होते।

फिर भी मुस्कुराकर कहते हैं जनाब,
हम ही हैं चलता-फिरता जवाब।

143. आत्मा की संतुष्टि

इस संसार में आपका समय सीमित है,
हर सांस का हिसाब निर्धारित है।

इसलिए भीड़ को खुश करने में मत खोइए,
अपनी आत्मा की आवाज़ को संजोइए।

समाज हर पल राय बदलता है,
पर मन का सच स्थिर रहता है।

लोगों की तालियाँ क्षणिक होती हैं,
आत्मा की शांति अनंत होती है।

दूसरों की अपेक्षाएँ अंतहीन हैं,
पर आपकी इच्छाएँ ही प्रामाणिक हैं।

जो सबको रास आए,
वह स्वयं को भूल जाए।

स्वीकृति की दौड़ थका देती है,
पर सच्चाई सुकून दे देती है।

अपनी राह खुद चुनिए,
अपने सपनों को गुनिए।

हर निर्णय दिल से कीजिए,
भीतर की आवाज़ ही लीजिए।

क्योंकि समय लौटकर नहीं आता,
और पछतावा साथ रह जाता।

जीवन छोटा है, यह जान लीजिए,
आत्मा को संतुष्ट करना मान लीजिए।

समाज कल भी कुछ कहेगा,
पर आपका मन ही सच सहेगा।

142. सीधी राह

हर भौंकने वाले पर मत रुकना।
हर आवाज़ पर पत्थर मत फेंकना।

रास्ते में शोर बहुत होगा।
हर मोड़ पर कोई रोकेगा।

कुछ लोग यूँ ही बोलेंगे।
कुछ लोग यूँ ही डोलेंगे।

हर बात का जवाब जरूरी नहीं।
हर चुनौती से लड़ना जरूरी नहीं।

जो लक्ष्य पर नज़र रखता है।
वही मंज़िल तक पहुँचता है।

रुक-रुक कर समय गँवाओगे।
तो सफर लंबा बनाओगे।

अपनी ऊर्जा बचाकर रखना।
उसे सपनों में ही लगाना।

दुनिया का काम है कहना।
तुम्हारा काम है बस बढ़ना।

ध्यान अगर भटक जाएगा।
मंज़िल भी छूट जाएगा।

शोर को पीछे छोड़ देना।
सीधे आगे बढ़ते रहना.

141. बुद्धि की असली शक्ति

इतिहास गवाह है इस बात का,
बल से बड़ा होता है मस्तिष्क का।

शक्तिशाली शरीर दिखते महान,
पर दिशा देता है बुद्धिमान।

बाहुबल से युद्ध जीते जाते,
पर रणनीति से साम्राज्य बनते।

तलवारें बस वार कर पाती हैं,
विचार ही विजय दिलाती हैं।

जिसके पास सूझबूझ होती है,
उसी की दुनिया में पूछ होती है।

शरीर पहरा दे सकता है,
पर दिमाग ही नेतृत्व करता है।

मांसपेशियाँ थक भी जाती हैं,
पर सोच नई राह दिखाती है।

बल क्षणिक प्रभाव दिखाता है,
बुद्धि इतिहास रच जाता है।

शक्ति का सही अर्थ यही है,
विचारों में छुपी असली महिमा है।

जो दिमाग से खेल रचाता है,
वही समय को भी झुकाता है।

इसलिए तन से पहले मन गढ़ो,
ज्ञान से अपना पथ गढ़ो।

क्योंकि अंत में वही महान कहलाता,
जो बुद्धि से संसार चलाता।

140. इल्ज़ाम और इंसाफ़

गलत लोग गलती करके भी शर्मिंदा नहीं होते।
          सही लोग इल्ज़ाम सुनकर ही टूट जाते हैं।
झूठे चेहरे अक्सर बेखौफ ही रहते हैं।
          सच्चे दिल बेवजह ही रोते रहते हैं।
दोषी लोग सिर ऊँचा करके चलते हैं।
          निर्दोष लोग नज़रें झुकाकर ही चलते हैं।
छल करने वाले खुलकर हँसते रहते हैं।
          सत्य वाले भीतर ही सिसकते रहते हैं।
अपराधी हर रात चैन से सोते हैं।
          निर्दोष हर रात जागते ही रहते हैं।
झूठ को भीड़ सहारा देती रहती है।
          सच को तन्हाई घेरे रहती है।
धोखा देने वाले आगे बढ़ जाते हैं।
          ईमान वाले पीछे रह जाते हैं।
दुनिया अक्सर उलटी चलती रहती है।
          कसौटी सच्चों पर ही पड़ती है।
फिर भी सच कभी झुकता नहीं।
          उसका उजाला कभी रुकता नहीं।
इल्ज़ाम इंसान को तोड़ भी देता है।
          समय हर सच को जोड़ भी देता है।

138. वक़्त का रंगमंच

वक़्त के नाटक में किरदारों को परखना,
जो तुम्हारे दिखते हैं, अक्सर होते नहीं हैं।

          चेहरे कई मुखौटे पहनते हैं,
          इरादे भीतर कुछ और कहते हैं।

मुस्कानें भी अभिनय होती हैं,
बातें भी योजनाबद्ध होती हैं।

          हर तालियों की गूंज सच्ची नहीं,
          हर साथ निभाने वाला अपना नहीं।

मंच सजा है रोशनी से,
पर अंधेरा छिपा है हँसी में।

          जो पास खड़े दिखाई देते हैं,
          वही दूर कहीं खड़े मिलते हैं।

वक़्त ही असली निर्देशक है,
सच का वही परीक्षक है।

          पर्दा जब धीरे से गिरता है,
          चेहरा असली तभी दिखता है।

ताली और आलोचना बदलती रहती है,
पर नियत हमेशा संभलती रहती है।

          इसलिए किरदार नहीं, चरित्र देखो,
          शब्द नहीं, व्यवहार देखो।

वक़्त की कसौटी कठोर सही,
पर निर्णय उसका कमजोर नहीं।

           नाटक खत्म तो सब छँट जाता है,
           सच अंत में ही जगमगाता है।