34. हाथ मलते रह गए बाबूजी

बाबूजी गाँव के सबसे समझदार और दूरदर्शी इंसान माने जाते थे। लोग अक्सर कहते थे कि अगर बाबूजी किसी काम की सलाह दे दें तो आधी समस्या खुद ही हल हो जाती है। लेकिन अपने बेटे राकेश के मामले में बाबूजी की समझदारी भी कभी-कभी फेल हो जाती थी।

राकेश पढ़ाई में अच्छा था, लेकिन उसे जल्दी अमीर बनने का सपना बहुत पसंद था। कॉलेज के बाद उसने अपने दोस्त के साथ मिलकर एक नया स्टार्टअप शुरू करने का फैसला किया। बाबूजी ने समझाया कि बिना योजना के बड़ा कदम नहीं उठाना चाहिए, पर राकेश ने कहा, “आज के जमाने में रिस्क ही सफलता की कुंजी है।”

शुरुआत में कारोबार थोड़ा चला, फिर अचानक बाजार में नई कंपनी आ गई। उनके ग्राहकों की संख्या कम होने लगी। खर्च बढ़ता गया, लेकिन आय घटने लगी। राकेश ने सोचा कि थोड़ा और पैसा लगा देने से सब ठीक हो जाएगा। उसने घर की बचत भी उसी कारोबार में लगा दी।

बाबूजी बार-बार कहते, “धीरे चलो बेटा, जल्दबाजी में कदम मत उठाओ।” लेकिन राकेश को अपनी समझ पर ज्यादा भरोसा था। कुछ महीनों बाद हालात ऐसे हो गए कि कंपनी बंद करने की नौबत आ गई। बैंक का कर्ज सिर पर आ गया और बचत का पैसा भी खत्म हो गया।

एक दिन राकेश घर बैठा चुपचाप सोच रहा था। बाबूजी उसके पास आए और बोले, “मैंने तुम्हें रोका था, लेकिन अब पछतावा करने का समय नहीं है।” उनकी आवाज में गुस्सा नहीं, बल्कि दर्द था। राकेश की आँखें भर आईं।

उस दिन राकेश को समझ आया कि सपने देखना गलत नहीं है, लेकिन बिना योजना के दौड़ना खतरनाक हो सकता है। उसने फिर से नौकरी ढूंढनी शुरू की और धीरे-धीरे अपने जीवन को संभालने लगा।

बाबूजी उसे काम करते देखकर चुपचाप मुस्कुराते थे, लेकिन एक बात अक्सर कहते, “पैसा आना-जाना है, पर अनुभव हमेशा साथ रहता है।”

आज जब भी राकेश किसी युवा को जल्दी अमीर बनने की सलाह देते देखता है, वह मुस्कुराकर सोचता है कि उस दिन बाबूजी सही थे। वरना वह भी हाथ मलते रह जाता।

33. आँख का काँटा

शर्मा जी ने बड़े गर्व से घोषणा की थी कि इस बार वे “सभ्य और संस्कारी” किरायेदार ही रखेंगे। पिछले अनुभवों ने उन्हें बहुत कुछ सिखा दिया था। लेकिन जैसे ही वर्मा जी अपना सूटकेस और तीन गमले लेकर घर में दाखिल हुए, शर्मा जी को लगा कि किस्मत फिर से मज़ाक करने वाली है।

शुरुआत तो बड़ी अच्छी हुई। वर्मा जी ने कहा, “मैं बहुत शांत स्वभाव का हूँ, बस किताबें पढ़ता हूँ।” तीसरे ही दिन पता चला कि उनकी “किताबें” दरअसल मोटिवेशनल वीडियो हैं, जो स्पीकर पर पूरी कॉलोनी को प्रेरित करते हैं। सुबह पाँच बजे “उठो, जागो!” की आवाज़ से शर्मा जी की नींद खुलती और वे सोचते कि किराया कम है या धैर्य?

फिर आया किचन का अध्याय। वर्मा जी खुद को प्रयोगधर्मी शेफ मानते थे। एक दिन उन्होंने यूट्यूब देखकर इटालियन पास्ता बनाया, जिसकी खुशबू इतनी प्रबल थी कि शर्मा जी की बिल्ली तक घर छोड़कर भाग गई। पूछने पर बोले, “नई डिश है, आदत पड़ जाएगी।” शर्मा जी ने मन ही मन सोचा कि पहले खुद को आदत डालो।

बिजली का बिल आते ही असली झटका लगा। एसी, कूलर, हीटर सब एक साथ चलाने की उनकी अनोखी आदत थी। तर्क यह था कि “संतुलन बना रहता है।” शर्मा जी ने समझाया कि यह घर है, पावर प्लांट नहीं। वर्मा जी मुस्कुराकर बोले, “मैं वैज्ञानिक सोच रखता हूँ।”

मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। हर महीने किराया देते समय वे नई कहानी सुनाते। कभी बैंक का सर्वर डाउन, कभी यूपीआई की आत्मा दुखी। अंत में पैसे मिल ही जाते, पर शर्मा जी का ब्लड प्रेशर बढ़ाकर।

एक दिन हद तब हो गई जब वर्मा जी ने छत पर कबूतरों के लिए दाना डालना शुरू कर दिया। देखते-देखते छत कबूतर सम्मेलन का स्थल बन गई। शर्मा जी ने सख्ती दिखाई। वर्मा जी ने तर्क दिया, “पक्षियों का भी तो हक है।” शर्मा जी बोले, “पर छत मेरी है!”

आखिरकार एक सुबह वर्मा जी ने खुद ही कहा कि उन्हें “प्रेरणा के नए अवसर” मिल गए हैं और वे जा रहे हैं। उनके जाते ही घर में सन्नाटा था, पर सुकून भी। शर्मा जी ने राहत की सांस ली और बुदबुदाए, “अबकी बार किरायेदार नहीं, भगवान का प्रसाद ही

32. हवा में उड़ता नया अमीर

विकास पहले गली के कोने पर मोबाइल रिपेयर की छोटी-सी दुकान चलाता था। मेहनती था, लेकिन कमाई बस गुज़ारे लायक होती थी। एक दिन उसने अपने दोस्त के साथ मिलकर एक छोटा-सा ऑनलाइन गैजेट स्टोर शुरू किया।

किस्मत ने ऐसा पलटा खाया कि छह महीने में उसका कारोबार तेजी से बढ़ गया। अचानक उसके खाते में इतने पैसे आ गए, जितने उसने सपने में भी नहीं सोचे थे।
पैसा आते ही विकास की चाल बदल गई। पहले जो लड़का साइकिल से दुकान जाता था, अब चमचमाती कार में घूमने लगा। पुराने दोस्तों के साथ चाय पीने की जगह उसने महंगे कैफे चुन लिए। बात-बात पर अंग्रेज़ी के शब्द डालने लगा।

मोहल्ले के लोग कहते, “विकास को पैसे नहीं, पंख लग गए हैं।” सच भी यही था—वह जमीन पर कम, हवा में ज्यादा उड़ने लगा था।

एक दिन उसने अपने माता-पिता के लिए नया फ्लैट खरीदा, लेकिन पुराने घर को बेचते समय उसने पड़ोसियों को बुलाना जरूरी नहीं समझा। उसे लगा कि अब वह एक अलग स्तर का इंसान है। पिता ने धीरे से कहा, “बेटा, ऊँचाई अच्छी है, पर जड़ें मत काटना।” विकास ने मुस्कुराकर बात टाल दी।

समय ने फिर करवट ली। बाजार में नई कंपनियाँ आ गईं। प्रतियोगिता बढ़ी और बिक्री गिरने लगी। कुछ गलत निवेश भी हो गए। छह महीनों में मुनाफा आधा रह गया। विकास को पहली बार समझ आया कि पैसा जितनी जल्दी आता है, उतनी ही जल्दी जा भी सकता है। जिन दोस्तों से उसने दूरी बना ली थी, वही अब उसे हिम्मत दे रहे थे। मोहल्ले की चाय की दुकान पर बैठकर उसे फिर सुकून मिला।

विकास ने धीरे-धीरे अपने व्यवहार में बदलाव किया। उसने पुराने ग्राहकों से दोबारा संपर्क किया, व्यवसाय को स्थिर करने पर ध्यान दिया और दिखावे की बजाय समझदारी को चुना। उसे अहसास हुआ कि असली अमीरी बैंक बैलेंस में नहीं, रिश्तों और विनम्रता में होती है।

अब जब भी कोई उसे सफलता की बधाई देता है, वह मुस्कुराकर कहता है, “हवा में उड़ना अच्छा है, पर पैर जमीन पर ही टिके रहने चाहिए।”

31. दिमाग का दही हुआ रिजल्ट डे पर

रिजल्ट डे का नाम सुनते ही रोहन के पेट में तितलियाँ नहीं, सीधे बकरियाँ दौड़ने लगती थीं। इस बार मामला बोर्ड परीक्षा का था, इसलिए घर का माहौल भी किसी युद्ध-पूर्व बैठक जैसा गंभीर था। मम्मी सुबह से ही मंदिर के चक्कर लगा रही थीं और पापा बार-बार कह रहे थे, “जो होगा, देखा जाएगा,” लेकिन उनकी आवाज़ में भी हल्की कंपन साफ़ थी।

रिजल्ट ऑनलाइन आना था। सुबह दस बजे वेबसाइट खुलनी थी। नौ बजकर पचपन मिनट पर ही रोहन लैपटॉप लेकर बैठ गया। जैसे ही घड़ी ने दस बजाए, वेबसाइट ने जवाब दे दिया—“Server Busy।” रोहन का दिमाग उसी समय से दही बनना शुरू हो गया। उसने पाँच बार रिफ्रेश किया, फिर मोबाइल से कोशिश की, फिर दोस्त को फोन लगाया। उधर से भी वही जवाब—“भाई, खुल ही नहीं रही!”

दस बजकर बीस मिनट पर वेबसाइट खुली, लेकिन रोल नंबर डालते ही फिर एरर। रोहन को लगने लगा कि शायद ब्रह्मांड उसे संकेत दे रहा है कि रिजल्ट अच्छा नहीं है। उसने मन ही मन अपनी संभावित फेल होने की कहानी भी बना ली—कैसे वह रिश्तेदारों के सवालों से बचेगा, कैसे अगले साल फिर पढ़ेगा, और कैसे दोस्तों के सामने मुस्कुराएगा।

आखिरकार दस बजकर चालीस मिनट पर स्क्रीन पर मार्कशीट आ गई। रोहन ने एक आँख बंद करके दूसरी से नंबर देखने की कोशिश की। पहले विषय में अच्छे अंक थे। दूसरे में उम्मीद से बेहतर। तीसरे में तो क्लास से भी ज्यादा। धीरे-धीरे पूरी मार्कशीट सामने थी, और कुल प्रतिशत देखकर वह कुछ सेकंड तक स्क्रीन को घूरता रहा। यह वही रिजल्ट था, जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी—उसे शानदार अंक मिले थे।

पीछे खड़ी मम्मी ने घबराकर पूछा, “क्या हुआ?” रोहन ने पलटकर सिर्फ इतना कहा, “दही मीठा निकला।” पापा ने चश्मा लगाकर नंबर देखे और पहली बार खुलकर हँसे।

उस दिन रोहन ने समझा कि असली डर रिजल्ट से नहीं, इंतज़ार से होता है। दिमाग का दही ज्यादा सोचने से बनता है, नतीजों से नहीं। रिजल्ट डे खत्म होते-होते घर में जश्न था, और रोहन के चेहरे पर

30. चार चाँद लगाने वाली बुआ

हमारे परिवार की हर खुशी में एक खास मेहमान ज़रूर शामिल होती हैं—बुआ शारदा। उन्हें हम प्यार से “चार चाँद लगाने वाली बुआ” कहते हैं, क्योंकि वे जिस भी कार्यक्रम में पहुँचती हैं, वहाँ सचमुच चार नहीं, चालीस चाँद लगा देती हैं। फर्क बस इतना है कि ये चाँद कभी-कभी पटाखों की तरह फूटते भी हैं।

पिछले महीने चचेरी बहन की शादी थी। घर में सादगी से रस्में निभाने की योजना बनी थी, लेकिन बुआ के आते ही सादगी ने कोने में बैठकर रोना शुरू कर दिया। बुआ ने सूटकेस खोला तो उसमें कपड़ों से ज्यादा सुझाव निकले। “ये परदे हल्के हैं, दूल्हे के मामा पर भारी नहीं पड़ेंगे,” उन्होंने पहली ही शाम ऐलान कर दिया। अगले ही दिन नए परदे लग गए।

मेहंदी की रात बुआ ने डीजे वाले को अलग बुलाकर प्लेलिस्ट बदलवा दी। “शादी है या शोकसभा?” कहकर उन्होंने पुराने गानों की जगह ठुमके वाले गाने लगवा दिए। खुद स्टेज पर चढ़कर ऐसा नाचीं कि दुल्हन भी शर्माकर किनारे हो गई। लोग मोबाइल निकाल-निकालकर वीडियो बनाने लगे। बुआ गर्व से बोलीं, “देखा, अब आई न रौनक!”

खाने की व्यवस्था में भी उनका योगदान ऐतिहासिक रहा। हलवाई बेचारा पसीना पोंछता रहा और बुआ चख-चखकर राय देती रहीं। “जलेबी में जोश कम है,” उन्होंने गंभीर चेहरे से कहा। हलवाई ने तुरंत दो करछी घी और डाल दिया। नतीजा यह हुआ कि मेहमानों ने जलेबी की तारीफ की, और बुआ ने उसे अपनी जीत घोषित कर दिया।

विदाई के समय जब सब भावुक थे, बुआ ने माहौल हल्का कर दिया। दूल्हे से बोलीं, “बेटा, हमारी बिटिया को परेशान किया तो मैं खुद आकर तुम्हें नचाऊँगी।” सब हँस पड़े, दुल्हन भी आँसू पोंछते-पोंछते मुस्कुरा दी।

शादी खत्म होने के बाद घर थोड़ा खाली-खाली लगा। शोर कम था, पर मज़ा भी कम था। तब समझ आया कि बुआ सचमुच चार चाँद लगाती हैं। थोड़ी अफरा-तफरी, थोड़ा हंगामा, और ढेर सारी हँसी—यही तो उनकी खासियत है। अब अगली शादी का इंतज़ार है, क्योंकि बुआ के बिना समारोह अधूरा ही लगता

29. खोया हुआ बटुआ

अमित एक साधारण नौकरीपेशा युवक था, जो रोज़ की तरह उस दिन भी मेट्रो से ऑफिस जा रहा था। महीने का आखिरी हफ्ता चल रहा था और जेब में बस उतने ही पैसे बचे थे, जितने से घर और दफ्तर का काम चल सके। भीड़ काफी थी, इसलिए वह दरवाज़े के पास खड़ा रहा। स्टेशन आने पर जैसे ही वह जल्दी-जल्दी बाहर निकला, उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि उसकी जेब से बटुआ गिर चुका है।

ऑफिस पहुंचकर जब उसने चाय के पैसे देने के लिए जेब में हाथ डाला, तो उसका चेहरा उतर गया। बटुआ गायब था। उसमें पैसे तो थे ही, साथ में आधार कार्ड, एटीएम कार्ड और कुछ जरूरी रसीदें भी थीं। उसके माथे पर पसीना आ गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि पहले क्या करे। उसने तुरंत अपने बैंक को फोन कर कार्ड ब्लॉक करवाया और फिर मेट्रो स्टेशन के कस्टमर केयर पर कॉल किया, लेकिन कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही थी।

उदास मन से वह काम में लग गया, पर ध्यान बार-बार उसी बात पर जा रहा था। लंच के समय उसके फोन पर एक अनजान नंबर से कॉल आया। दूसरी तरफ एक शांत आवाज़ थी। उस व्यक्ति ने बताया कि उसे मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियों के पास एक बटुआ मिला है, जिसमें अमित का पहचान पत्र था। उसने मिलने के लिए पास के पुलिस बूथ का स्थान बताया।

अमित तुरंत वहां पहुंचा। सामने एक साधारण कपड़े पहने मध्यम आयु का व्यक्ति खड़ा था। उसने मुस्कुराकर बटुआ आगे बढ़ा दिया। अमित ने घबराहट में बटुआ खोला—सारे पैसे और कार्ड सुरक्षित थे। उसकी आंखों में राहत झलक आई। उसने धन्यवाद देते हुए कुछ पैसे इनाम के रूप में देने चाहे, लेकिन उस व्यक्ति ने विनम्रता से मना कर दिया। उसने सिर्फ इतना कहा, “आज आपका था, कल मेरा भी हो सकता है।”

अमित घर लौटते समय हल्का महसूस कर रहा था। उसे लगा कि इस भागदौड़ भरी दुनिया में ईमानदारी अब भी जिंदा है। खोया हुआ बटुआ सिर्फ सामान नहीं था, वह भरोसे की वापसी भी था। उस दिन के बाद अमित ने तय किया कि अगर कभी उसे भी किसी की खोई हुई चीज़ मिलेगी, तो वह बिना हिचक उसे लौटाएगा।

28. पुरानी घड़ी का राज़

संदीप को अपने दादाजी की पुरानी दीवार घड़ी कभी खास पसंद नहीं थी। वह घड़ी हर घंटे इतनी तेज़ आवाज में घंटा बजाती थी कि पूरा घर गूंज उठता था। दादाजी उसे बड़े गर्व से कहते थे कि यह घड़ी सिर्फ समय नहीं बताती, कहानी भी सुनाती है। संदीप को यह बात हमेशा मजाक लगती थी।

दादाजी के निधन के बाद घर की सफाई करते समय वह घड़ी उतारकर स्टोर रूम में रख दी गई। कई सालों तक किसी ने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। एक दिन अचानक घर की मरम्मत के दौरान संदीप को वही घड़ी फिर मिल गई। जिज्ञासा में उसने उसे साफ किया और दीवार पर टांग दिया। जैसे ही उसने पेंडुलम को हल्का-सा धक्का दिया, घड़ी फिर से चल पड़ी।

उस रात ठीक बारह बजे घड़ी ने बारह बार घंटा बजाया। आवाज कुछ अलग थी, जैसे भीतर कुछ ढीला हो। संदीप ने सोचा शायद पुरानी मशीनरी का असर है। अगले दिन उसने घड़ी खोलकर देखने का निश्चय किया। पीछे का ढक्कन हटाते ही उसे एक छोटा-सा कागज मुड़ा हुआ मिला।

कागज पर दादाजी की लिखावट थी। उसमें लिखा था कि इस घड़ी को उन्होंने अपनी पहली तनख्वाह से खरीदा था। जब-जब घर में मुश्किल आई, उन्होंने इसी घड़ी की तरफ देखकर खुद को संभाला, क्योंकि यह उन्हें याद दिलाती थी कि समय कभी एक-सा नहीं रहता। नीचे एक पंक्ति और लिखी थी—“जब भी लगे कि हालात रुक गए हैं, इस पेंडुलम को देखना, यह हमेशा आगे-पीछे होकर भी आगे ही बढ़ता है।”

संदीप देर तक उस पंक्ति को पढ़ता रहा। उसे एहसास हुआ कि दादाजी की ‘कहानी’ दरअसल यही संदेश था। घड़ी की आवाज अब उसे शोर नहीं लग रही थी, बल्कि एक भरोसा लग रही थी। उसने तय किया कि वह घड़ी फिर कभी स्टोर में नहीं जाएगी।

धीरे-धीरे घर के बाकी लोग भी उस घड़ी की आदत डालने लगे। हर घंटे बजने वाली आवाज अब सबको याद दिलाती थी कि वक्त बदलता है, बस हिम्मत बनाए रखनी चाहिए। पुरानी घड़ी अब सिर्फ एक वस्तु नहीं रही, वह परिवार की हिम्मत का प्रतीक बन गई।

27. पसीने छूटे पहली डेट पर

आरव ने जिंदगी में कई प्रेज़ेंटेशन दिए थे, सैकड़ों लोगों के सामने आत्मविश्वास से बोला था, लेकिन पहली डेट का नाम सुनते ही उसके हाथ-पैर ढीले पड़ गए। अनन्या से उसकी मुलाकात एक दोस्त की बर्थडे पार्टी में हुई थी। दो-तीन बार चैट के बाद आखिरकार मिलने का दिन तय हुआ। जगह चुनी गई एक शांत-सा कैफे, जहां हल्का संगीत और कॉफी की खुशबू माहौल को खास बना रही थी।

डेट वाले दिन आरव ने कम से कम चार शर्ट ट्राई कीं। हर बार उसे लगता, “यह बहुत फॉर्मल है… यह बहुत कैज़ुअल है…”। आखिरकार उसने एक हल्की नीली शर्ट पहनी, जो उसे खुद पर ठीक लगी। फिर भी दिल की धड़कनें काबू में नहीं आ रही थीं। कैफे पहुंचते-पहुंचते उसके माथे पर पसीने की बूंदें चमकने लगीं, जबकि अंदर ठंडी हवा चल रही थी।

अनन्या पहले से वहां बैठी थी। उसे देखते ही आरव की घबराहट दोगुनी हो गई। वह मुस्कुराई तो लगा जैसे सारी टेंशन खत्म हो जाएगी, लेकिन जैसे ही वह कुर्सी खींचकर बैठा, उसका हाथ टेबल पर रखे पानी के गिलास से टकरा गया। गिलास तो बच गया, पर उसकी हालत और खराब हो गई। उसने तुरंत माफी मांगी। अनन्या हंस पड़ी और बोली, “आराम से, मैं इंटरव्यू लेने नहीं आई हूं।”

उसकी इस बात ने माहौल हल्का कर दिया। धीरे-धीरे बातचीत शुरू हुई—ऑफिस की मजेदार बातें, स्कूल की शरारतें, और पसंदीदा फिल्मों की चर्चा। आरव ने महसूस किया कि वह अब सहज हो रहा है। पसीना भी जैसे साथ छोड़ने लगा था। अनन्या उसकी सादगी पर मुस्कुरा रही थी, और उसे अच्छा लग रहा था कि वह बनावटी बनने की कोशिश नहीं कर रहा।

कॉफी खत्म होते-होते दोनों के बीच एक सहज दोस्ती पनप चुकी थी। बाहर हल्की बारिश शुरू हो गई थी। कैफे से निकलते समय अनन्या ने मजाक में कहा, “अगली बार टिश्यू ज्यादा लाना।” आरव ने हंसते हुए जवाब दिया, “अगली बार पसीना कम होगा।”

घर लौटते हुए आरव के चेहरे पर सुकून था। पहली डेट पर पसीने जरूर छूटे थे, लेकिन उसी घबराहट में एक सच्ची शुरुआत छिपी थी। उसे समझ आ गया था कि प्यार में परफेक्ट होना जरूरी नहीं, सच्चा होना जरूरी है।

26. कान भरने वाली सहेली

हमारी कॉलोनी में रचना नाम की एक सहेली रहती थी, जो अपने मीठे स्वभाव से ज्यादा अपनी आदतों के लिए मशहूर थी। वह देखने में भोली और बोलने में शहद घोलने वाली थी, लेकिन उसकी बातों में अक्सर मिर्च-मसाला मिला होता था। उसे किसी से सीधे झगड़ा करना पसंद नहीं था; उसे तो बस लोगों के कानों में हल्की-सी फूंक मारनी आती थी।

रचना की खासियत थी कि वह हर घर की खबर रखती थी। सुबह टहलते हुए किसी से पूछती, “सब ठीक तो है?” और जवाब सुनने से पहले ही एक वाक्य छोड़ देती—“वैसे मैंने कुछ सुना है, पर रहने दो।” बस, सामने वाला वहीं से कहानी बुनना शुरू कर देता। वह कभी पूरी बात नहीं बताती थी, ताकि बाकी काम कल्पना कर ले।

एक दिन उसने सीमा से यूँ ही कहा कि शालू उसकी साड़ी पर हंस रही थी। सीमा ने बात को हल्के में लिया, पर मन में एक शंका बैठ गई। दिनभर वह शालू के व्यवहार में संकेत ढूंढती रही। शाम तक दोनों के बीच ठंडी तकरार शुरू हो गई। रचना दूर से सब देखती रही, मानो कोई मनोरंजन कार्यक्रम चल रहा हो।

लेकिन हर बार किस्मत उसका साथ नहीं देती। एक बार उसने दो सहेलियों को अलग-अलग बातें बताकर भड़काने की कोशिश की। संयोग से दोनों आमने-सामने बैठ गईं और सच्चाई सामने आ गई। रचना की मुस्कान फीकी पड़ गई।

पहली बार लोगों ने उसकी आदत पर खुलकर बात की।
कॉलोनी की बैठक में तय हुआ कि बिना पुष्टि किसी बात पर विश्वास नहीं किया जाएगा। रचना को सीधे कुछ नहीं कहा गया, पर सबने इशारों में समझा दिया कि अब कान भरना आसान नहीं रहेगा। धीरे-धीरे उसने भी अपनी आदत पर थोड़ा नियंत्रण करना सीख लिया।

आज भी वह मीठा बोलती है, पर लोग समझदार हो गए हैं। सबने सीख लिया है कि दोस्ती में हंसी-मजाक चलेगा, पर भरोसे में जहर घोलने की इजाजत किसी को नहीं।

25. सिर मुंडाते ही ओले पड़े

राहुल की शादी पूरे मोहल्ले की सबसे चर्चित घटना थी। महीनों से तैयारियाँ चल रही थीं। हल्दी, संगीत और मेहंदी के बाद शादी वाले दिन सुबह एक खास रस्म के तहत उसका सिर मुंडवाया गया। पंडित जी ने कहा था कि यह परंपरा सौभाग्य लाती है। राहुल आईने में खुद को देखकर मुस्कुरा रहा था, तभी आसमान का रंग बदलने लगा।

बारात निकलने ही वाली थी कि अचानक तेज़ हवाएं चलने लगीं। देखते ही देखते बादल गरजे और ओले गिरने लगे। छतों पर टप-टप की आवाज़ गूंज उठी। रिश्तेदार जो अभी तक नाच रहे थे, कुर्सियों के नीचे शरण लेने लगे। राहुल अपने नए-नवेले साफे को बचाने की कोशिश कर रहा था, पर सिर तो पहले ही मुंडा हुआ था। दोस्त चुटकी लेने लगे, “देखो, सिर मुंडाते ही ओले पड़े!”

दुल्हन पक्ष में भी खलबली मच गई। टेंट वाले प्लास्टिक ढकने लगे, डीजे ने मशीन बचाई और घोड़ी बेचैन होकर हिनहिनाने लगी। राहुल ने सोचा कहीं यह कोई अपशकुन तो नहीं। तभी उसकी दादी हंसते हुए बोलीं, “अरे पगले, प्रकृति भी तेरी शादी में कंफेटी बरसा रही है।” सबके चेहरे पर मुस्कान लौट आई।

ओले धीरे-धीरे रुक गए और मौसम साफ होने लगा। ठंडी हवा चलने लगी, जिससे गर्मी में भी राहत मिली। बारात थोड़ी देर से सही, पर पूरे जोश से निकली। लोग हंसी-मजाक करते हुए रास्ते भर इस घटना को यादगार बताते रहे। शादी स्थल पर पहुंचते ही इंद्रधनुष दिखा, जिसे सबने शुभ संकेत माना।

फेरे शांत माहौल में संपन्न हुए। दुल्हन ने मुस्कुराकर राहुल से कहा, “देखो, हमारी शादी को आसमान भी याद रखेगा।” राहुल ने भी हंसकर जवाब दिया, “कम से कम सिर पर ओलों का असर नहीं पड़ा।”

अगले दिन जब लोग विदाई के बाद बातें कर रहे थे, तो यही किस्सा सबसे ज्यादा दोहराया जा रहा था। जो पल पहले चिंता का कारण था, वही अब हंसी और खुशियों की याद बन चुका था। राहुल और उसकी दुल्हन ने समझ लिया कि जिंदगी में अचानक आने वाले ओले भी कभी-कभी कहानी को खास बना देते हैं, और अंत में खुशियां ही जीतती हैं।

24. आँखें दिखाने वाली मौसी

हमारी मौसी का नाम सुशीला था, पर मोहल्ले में उन्हें “आँखें दिखाने वाली मौसी” कहा जाता था। वजह साफ थी—उनकी बड़ी-बड़ी आंखें किसी भी शरारती बच्चे को मिनटों में सीधा कर देती थीं। कहते हैं कि एक बार दूधवाला पानी मिलाकर आया, मौसी ने सिर्फ आंखें तरेरीं और अगले दिन से दूध में मलाई तैरने लगी।

मौसी का एंट्री स्टाइल पूरी तरह फिल्मी था। दरवाज़ा हल्का सा धक्का, साड़ी का पल्लू हवा में लहराता और बैकग्राउंड में मानो खुद-ब-खुद कोई ड्रामेटिक म्यूज़िक बज उठता। जैसे ही वे ड्राइंग रूम में बैठतीं, पूरा घर सावधान की मुद्रा में आ जाता। पापा अखबार सीधा पकड़ लेते, मम्मी चाय में चीनी नापकर डालतीं और हम बच्चे होमवर्क की किताबें खोलकर ऐसे बैठते जैसे सिविल सर्विस की तैयारी कर रहे हों।

एक बार मैंने और मेरे भाई ने फ्रिज से आइसक्रीम चुपके से निकाल ली। किस्मत खराब थी, मौसी उसी वक्त किचन में आ गईं। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस धीरे से चश्मा उतारा और आंखें दिखाई। हमें लगा कैमरा ज़ूम इन हो रहा है, पसीना बैकग्राउंड इफेक्ट की तरह टपकने लगा। हम दोनों ने तुरंत स्वीकार कर लिया, “मौसी, गलती हो गई!” मौसी ने डायलॉग मारा, “सच बोलने वाले को माफी मिलती है, पर दोबारा गलती की तो इंटरवल नहीं, सीधे क्लाइमेक्स होगा।”

मोहल्ले में भी उनका रौब था। पड़ोसी शर्मा अंकल ने एक दिन गाड़ी हमारे गेट के सामने खड़ी कर दी। मौसी बाहर आईं, सिर्फ एक नजर डाली और बोलीं, “गाड़ी हटाइए, वरना कहानी लंबी हो जाएगी।” पाँच सेकंड में गाड़ी गायब।

लेकिन सच कहें तो मौसी दिल की बहुत नरम थीं। परीक्षा में अच्छे नंबर लाओ तो सबसे पहले मिठाई वही खिलातीं। बीमार पड़ो तो पूरी रात सिरहाने बैठतीं। उनकी आंखों में डांट कम, चिंता ज्यादा छिपी रहती थी।

आज भी जब मौसी घर आती हैं, हम सब मुस्कुरा देते हैं। डर तो अब भी लगता है, पर भीतर से सुकून भी आता है। क्योंकि हर फिल्मी कहानी में एक सख्त किरदार जरूरी होता है, और हमारी जिंदगी की सुपरहिट फिल्म में वो रोल मौसी ने ही निभाया है।

23. उल्टा चोर कोतवाल को डांटे

सोमवार की सुबह ऑफिस में अचानक हड़कंप मच गया। अकाउंट्स विभाग से खबर आई कि कैश बॉक्स से पचास हजार रुपये गायब हैं। बात आग की तरह फैल गई। बॉस ने तुरंत इमरजेंसी मीटिंग बुला ली। उनका चेहरा इतना गंभीर था कि लग रहा था मानो किसी क्राइम थ्रिलर फिल्म की शूटिंग चल रही हो। सीसीटीवी भी उसी रात से बंद था, जिससे मामला और संदिग्ध हो गया।

मीटिंग रूम में सभी कर्मचारियों को बैठा दिया गया। बैग चेक होने लगे, दराजें खुलवाई गईं और आईटी टीम से रिकॉर्ड खंगालने को कहा गया। माहौल में सन्नाटा और डर दोनों तैर रहे थे। तभी अचानक रमेश खड़ा हो गया। वह ऑफिस में अपनी लापरवाही और बहानों के लिए मशहूर था। पर उस दिन उसका आत्मविश्वास देखते ही बनता था।

रमेश ने ऊंची आवाज़ में कहा, “यह सब मैनेजमेंट की लापरवाही है! सुरक्षा ढीली है, सिस्टम कमजोर है, और अब बेवजह कर्मचारियों पर शक किया जा रहा है।” कमरे में सन्नाटा छा गया। जो खुद अक्सर काम से बचता था, वही सबसे ज्यादा ईमानदारी का भाषण दे रहा था। कुछ लोग दबी हंसी रोक रहे थे, तो कुछ हैरानी से उसे देख रहे थे।

उसी समय आईटी टीम ने बताया कि सीसीटीवी रात दो बजे बंद हुआ था और उसे बंद करने के लिए पासवर्ड डाला गया था। जब पासवर्ड की जांच हुई तो वह रमेश की जन्मतिथि निकली। सबकी नजरें एक साथ उसकी ओर घूम गईं। रमेश का चेहरा सफेद पड़ गया। वह हकलाने लगा और बोला कि यह महज संयोग है।

तभी अकाउंटेंट भागते हुए कमरे में आया और बोला, “सर, पैसे मिल गए! वे गलती से फाइलों के नीचे दब गए थे।” एक पल को सबने राहत की सांस ली। लेकिन माहौल में अजीब सी चुप्पी थी।

बॉस ने हल्की मुस्कान के साथ रमेश की ओर देखा और कहा, “देखा, उल्टा चोर कोतवाल को डांटे।”
कमरे में ठहाका गूंज उठा। रमेश चुपचाप अपनी कुर्सी पर बैठ गया। उस दिन के बाद उसने भाषण देने से पहले दो बार सोचना जरूर सीख लिया।

22. नाकों चने चबवाने वाला बॉस

हमारे ऑफिस के बॉस सचमुच “नाकों चने चबवाने” में विशेषज्ञ थे। उनका सिद्धांत सीधा था—अगर कर्मचारी आराम से बैठे दिख जाएं, तो समझो कंपनी खतरे में है। हर सुबह वे इतनी तेज़ चाल से केबिन में प्रवेश करते कि लगता जैसे किसी परेड का निरीक्षण चल रहा हो। जूते चमकते, टाई कसी रहती और चेहरे पर ऐसा भाव जैसे दुनिया की सारी डेडलाइन उन्हीं के भरोसे हो।

उनकी नजरें पूरे ऑफिस में ऐसे घूमतीं जैसे दीवारों पर लगे कैमरे भी उनसे दिशा-निर्देश लेते हों। कोई जंभाई ले ले तो तुरंत मीटिंग तय। कोई मोबाइल देख ले तो “इमरजेंसी टास्क” हाथ में। एक दिन मैं हल्का सा छींक गया, तो बोले, “लगता है ऊर्जा ज्यादा है, ये दो अतिरिक्त प्रोजेक्ट भी संभाल लो।” उस दिन से हमने छींकने से पहले भी अनुमति लेना सीख लिया।

उन्हें प्रेरक वाक्यों का बड़ा शौक था। रोज़ नया संवाद सुनाते—“आज मेहनत करो, कल सफलता खुद दरवाज़ा खटखटाएगी।” फर्क बस इतना था कि दरवाज़ा हमेशा हमारा ही खटखटाया जाता था। लंच ब्रेक हमारे लिए किसी मिशन से कम नहीं था। हम घड़ी की सुइयों को ऐसे देखते जैसे परीक्षा का समय खत्म होने वाला हो। एक बार तो उन्होंने कुर्सियां हटवाकर कहा, “खड़े रहोगे तो सक्रिय रहोगे।”

फिर भी, सच्चाई यह है कि हम उन्हें दिल से बुरा नहीं मानते थे। वे खुद सबसे देर तक ऑफिस में रुकते, हमारी छोटी-छोटी गलतियां सुधारते और क्लाइंट के सामने हमेशा टीम का बचाव करते। शुक्रवार को चुपके से समोसे मंगवाकर माहौल हल्का कर देते। साल के अंत में वही सख्त चेहरे वाले बॉस चुपचाप बोनस थमाते हुए मुस्कुरा भी देते।

आज जब हम उन दिनों को याद करते हैं, तो हंसी जरूर आती है। हां, उन्होंने नाकों चने चबवाए, लेकिन उसी बहाने हमें मजबूत, अनुशासित और थोड़ा समझदार भी बना दिया।

18. सांप भी मरा, लाठी भी न टूटी

हमारे गाँव के चौधरी जी अपनी अक्ल पर बड़ा गर्व करते थे। हर छोटी-बड़ी समस्या का समाधान उनके पास तैयार रहता था। लोग कहते थे कि वे ताकत से ज्यादा दिमाग से काम लेते हैं, और इस बात पर वे मूँछों पर ताव देकर मुस्कुरा देते थे।

एक दिन खबर फैली कि उनके खेत में एक बड़ा साँप निकल आया है। मजदूरों ने काम छोड़ दिया और दूर खड़े होकर तमाशा देखने लगे। साँप मेड़ पर कुंडली मारकर बैठा था और कोई भी उसके पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। मामला इज्जत का था, इसलिए चौधरी जी को बुलाया गया।

चौधरी जी लाठी लेकर पहुँचे, लेकिन पास जाने के बजाय दूर खड़े होकर हालात का जायजा लेने लगे। साँप सचमुच लंबा और मोटा था। सीधे भिड़ना जोखिम भरा था। तभी उनके दिमाग में एक उपाय आया। उन्होंने एक मजदूर से केरोसिन मंगवाया और दूसरे से सूखी घास इकट्ठी करने को कहा। भीड़ समझ नहीं पा रही थी कि वे क्या करने वाले हैं।

चौधरी जी ने सुरक्षित दूरी बनाकर घास में आग लगवाई। धुआँ उठने लगा और धीरे-धीरे साँप बेचैन होकर सरकने लगा। फुफकारता हुआ वह पास के एक गड्ढे में जा घुसा। बस यही मौका था। चौधरी जी ने तुरंत मजदूरों से गड्ढे में मिट्टी डलवानी शुरू कर दी। ऊपर से पानी भी डाल दिया गया ताकि साँप बाहर न निकल सके।

कुछ देर सन्नाटा रहा। जब कोई हलचल नहीं हुई तो सबने राहत की साँस ली। मजदूरों ने तालियाँ बजाईं और चौधरी जी की तारीफ करने लगे। किसी ने हँसते हुए पूछा, “लाठी तो चली ही नहीं?” चौधरी जी मुस्कुराकर बोले, “अक्ल हो तो लाठी बच जाती है।”

उस दिन गाँव में यही चर्चा थी—“साँप भी मरा, लाठी भी न टूटी।” और चौधरी जी की शान पहले से ज्यादा बढ़ गई।

16. बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद बाबू

हमारे मोहल्ले में बाबू श्यामसुंदर खुद को बहुत बड़ा रसिक मानते थे। उन्हें लगता था कि खाने-पीने की समझ पूरे शहर में सिर्फ़ उन्हीं के पास है। चाय पीते हुए वे सुड़ककर कहते, “इसमें इलायची कम है,” और समोसा खाते हुए घोषणा करते, “आलू का टेक्सचर सही नहीं।”

एक दिन उन्होंने तय किया कि वे अपने दोस्तों को “खास अदरक वाली हर्बल चाय” पिलाएँगे। बड़े गर्व से बोले, “आज तुम्हें असली स्वाद चखाऊँगा, जो हर किसी के बस की बात नहीं।” मोहल्ले के चार मित्र कुर्सियाँ खींचकर बैठ गए।

रसोई में बाबू ने अदरक इतना कूटा कि आवाज़ बाहर तक आ रही थी। उन्हें विश्वास था कि जितनी ज्यादा अदरक, उतना ज्यादा स्वाद। उधर उनकी पत्नी बार-बार चेतावनी देती रहीं, “इतनी तीखी मत बनाइए।” लेकिन बाबू ने सुनना उचित नहीं समझा।

चाय तैयार हुई। रंग गाढ़ा, खुशबू तेज़। बाबू ने कप थमाते हुए कहा, “सावधान, यह साधारण चाय नहीं है।” सबने पहला घूंट लिया और चेहरों के भाव बदल गए। किसी की आँखों में पानी, किसी की नाक लाल।

मित्र गुप्ता जी ने खाँसते हुए कहा, “वाह… बहुत अलग स्वाद है।” शर्मा जी ने धीरे से फुसफुसाया, “अलग तो है ही।”

बाबू गर्व से बोले, “देखा, समझदार लोग ही असली स्वाद पहचानते हैं।” तभी उनका छोटा बेटा आ गया। उसने जिद की, “मुझे भी चाय चाहिए।” सबने मना किया, लेकिन उसने एक घूंट ले ही लिया। तुरंत मुँह बनाकर बोला, “पापा, ये चाय है या दवाई?”

पूरे कमरे में हँसी फूट पड़ी। पत्नी मुस्कुराकर बोलीं, “ज्यादा अदरक से स्वाद नहीं बढ़ता।”

बाबू थोड़े झेंपे, लेकिन तुरंत बोले, “अरे, तुम्हें क्या पता, बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद!”

गुप्ता जी हँसते हुए बोले, “बाबू, यहाँ बंदर कौन है?”

उस दिन से मोहल्ले में जब भी बाबू कोई नई रेसिपी बनाते, लोग पहले ही कह देते—“भाई, अदरक नापकर डालना।”
और बाबू ने भी समझ लिया कि स्वाद दिखावे से नहीं, संतुलन से आता है।

15. मुंह में पानी लाने वाली जलेबी

हमारे मोहल्ले में हलवाई रामलाल की दुकान दूर-दूर तक मशहूर थी, खासकर उसकी गरमा-गरम जलेबियों के लिए। सुबह जैसे ही कड़ाही में तेल खौलता और घोल की पतली धार गोल-गोल घूमती, हवा में ऐसी खुशबू फैलती कि लोगों के मुंह में अपने-आप पानी आ जाता।

एक दिन डॉक्टर ने मोहनलाल जी को सख्त हिदायत दी—“मीठा बंद!” कारण था बढ़ी हुई शुगर। मोहनलाल जी ने घर आकर ऐलान कर दिया कि अब वे स्वास्थ्य को प्राथमिकता देंगे। परिवार ने तालियाँ बजाईं, लेकिन मोहल्ले वालों को भरोसा नहीं था।

अगली सुबह जब वे टहलने निकले तो सीधा रास्ता पार्क की ओर था, पर जलेबी की खुशबू ने दिशा बदल दी। कदम अपने-आप रामलाल की दुकान की ओर मुड़ गए। उन्होंने खुद को समझाया, “बस देखूंगा, खाऊंगा नहीं।”

दुकान के सामने खड़े होकर वे जलेबियों को ऐसे निहार रहे थे जैसे कोई पुराना प्रेमी वर्षों बाद मिला हो। रामलाल ने मुस्कुराकर पूछा, “आज कितनी दूँ?” मोहनलाल जी घबरा गए, “न-नहीं, मैं तो बस यूँ ही…”

तभी उनके पीछे से शर्मा जी आ गए। बोले, “अरे, डाइट पर हो न?” यह सुनते ही मोहनलाल जी ने तुरंत जवाब दिया, “हाँ, इसलिए तो जलेबी की गुणवत्ता जांच रहा हूँ, ताकि दूसरों को सावधान कर सकूँ।”

रामलाल ने गरम-गरम जलेबी निकालकर चाशनी में डुबोई। दृश्य इतना मोहक था कि मोहनलाल जी की आत्मा तक पिघल गई। आखिरकार उन्होंने धीमे से कहा, “बस आधा किलो… मतलब, घर वालों के लिए।”

घर पहुँचे तो पत्नी ने पैकेट देखा। पूछा, “ये क्या है?” वे बोले, “पड़ोसी के लिए ले जा रहा था, गलती से यहाँ आ गया।”

इतने में छोटा बेटा बोला, “पापा, रास्ते में ही दो खा चुके हो।”
सारी पोल खुल गई। घर में हँसी गूंज उठी।

उस दिन के बाद मोहनलाल जी ने डाइट का नया नियम बनाया—“जलेबी सप्ताह में एक दिन, वो भी डॉक्टर से छुपाकर।”

और रामलाल की दुकान आज भी सुबह-सुबह लोगों के मुंह में पानी लाने का पवित्र कार्य कर रही है।

14. पेट में चूहे दौड़े आधी रात

रात के ठीक बारह बजे थे जब रोहन की नींद अचानक खुली। कारण कोई डरावना सपना नहीं, बल्कि उसके पेट से आती अजीब सी गुर्राहट थी। उसे तुरंत एहसास हुआ कि पेट में चूहे दौड़ रहे हैं, और वह भी मैराथन की तैयारी के साथ।

शाम को उसने बड़े गर्व से घोषणा की थी कि आज से डाइट शुरू। सिर्फ़ सलाद खाया था और दोस्तों के सामने फिटनेस का भाषण भी दे डाला था। अब वही सलाद पेट में कहीं गुम हो चुका था और उसकी जगह खाली मैदान में चूहे क्रिकेट खेल रहे थे।

रोहन चुपके से रसोई की ओर बढ़ा। घर में सन्नाटा था, लेकिन उसे लग रहा था कि हर कदम की आवाज़ लाउडस्पीकर पर जा रही है। फ्रिज खोला तो ठंडी हवा के साथ उम्मीद की किरण भी निकली। अंदर कल की बची हुई पिज़्ज़ा स्लाइस चमक रही थी।

जैसे ही उसने प्लेट उठाई, पीछे से आवाज़ आई, “क्या कर रहे हो?” वह ऐसे उछला जैसे सचमुच चूहे बाहर निकल आए हों। मम्मी दरवाज़े पर खड़ी थीं, हाथ बाँधे हुए।

रोहन ने तुरंत बहाना बनाया, “मैं तो पानी पीने आया था।” मम्मी ने फ्रिज की ओर इशारा किया, “पानी पिज़्ज़ा के डिब्बे में रखा है क्या?”

स्थिति गंभीर थी। रोहन ने आख़िरी कोशिश की, “डाइट में थोड़ा चीट डे चलता है।” मम्मी मुस्कुराईं, “डाइट शुरू हुए छह घंटे भी नहीं हुए।”

आख़िरकार समझौता हुआ। उसे गरम दूध और दो बिस्कुट दिए गए। रोहन ने मन मसोस कर स्वीकार किया, लेकिन पेट के चूहे शायद इससे संतुष्ट नहीं थे।

कमरे में लौटकर उसने सोचा कि अगली बार डाइट की घोषणा दिन में करेगा, रात में नहीं। पिज़्ज़ा की खुशबू अभी भी दिमाग में घूम रही थी।

सुबह दोस्तों के सामने फिर वही जोश था। बोला, “डाइट शानदार चल रही है!”

पेट ने हल्की सी आवाज़ की, जैसे चूहे हँस रहे हों। और रोहन ने तय किया कि फिटनेस ठीक है, लेकिन आधी रात की भूख से बड़ा कोई दुश्मन नहीं।

13. दाँत खट्टे करने वाला मैच

हमारे मोहल्ले की गली नंबर पाँच में हर रविवार क्रिकेट मैच होना तय था। खिलाड़ी सब अपने-आप को अंतरराष्ट्रीय स्तर का समझते थे, बस मैदान की जगह गली और स्टेडियम की जगह छतों पर बैठे दर्शक थे। इस बार मुकाबला था “यंग स्टार इलेवन” और “अनुभवी टाइगर्स” के बीच। नाम से ही तनाव साफ था।

यंग स्टार इलेवन के कप्तान पप्पू ने मैच से पहले घोषणा कर दी, “आज तो हम इनके दाँत खट्टे कर देंगे।” उधर अनुभवी टाइगर्स के कप्तान, जिन्हें सब चाचा कहकर बुलाते थे, मुस्कुराए और बोले, “बेटा, पहले गेंद देख लो।”

टॉस हुआ, पप्पू की टीम ने पहले बल्लेबाज़ी चुनी। शुरुआत जोश से हुई, लेकिन पहली ही गेंद पर पप्पू बोल्ड। पूरी गली में “ओहो!” की आवाज़ गूँज उठी। पप्पू ने तुरंत बहाना बनाया, “गेंद नीची रही।” अगला बल्लेबाज़ आया, उसने छक्का मारने की कोशिश की और गेंद सीधे शर्मा आंटी की बालकनी में। खेल रुका, गेंद वापस लाने के लिए माफी भी माँगनी पड़ी।

किसी तरह बीस ओवर पूरे हुए और स्कोर बना ठीक-ठाक। अब बारी थी अनुभवी टाइगर्स की। चाचा ने धीरे-धीरे खेलना शुरू किया। कोई जल्दबाज़ी नहीं, कोई दिखावा नहीं। पप्पू की टीम लगातार चिल्लाती रही, “दबाव बना दो!” लेकिन दबाव उल्टा उन्हीं पर आने लगा।

एक-एक रन लेते हुए चाचा ने मैच हाथ में ले लिया। आखिरी ओवर में सिर्फ़ पाँच रन चाहिए थे। पप्पू ने खुद गेंद उठाई, शायद इतिहास बदलने के इरादे से। पहली गेंद चौका। दूसरी पर दो रन। मैच खत्म।

गली में सन्नाटा। चाचा ने मुस्कुराकर कहा, “दाँत खट्टे करने निकले थे न?” पूरी टीम हँसी से फूट पड़ी। पप्पू ने सिर खुजलाते हुए स्वीकार किया, “आज तो हमारे ही दाँत खट्टे हो गए।”

उस दिन के बाद पप्पू ने बड़े-बड़े दावे करना थोड़ा कम कर दिया। और मोहल्ले में यह मैच लंबे समय तक याद रखा गया—एक ऐसा मैच, जिसमें अनुभव ने जोश के सचमुच दाँत खट्टे कर दिए।

12. नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली

हमारे मोहल्ले में रत्ना आंटी अपनी सख़्त छवि के लिए जानी जाती थीं। वे हर किसी को नैतिकता का पाठ पढ़ाती थीं, मानो चरित्र प्रमाणपत्र बाँटना उनका जन्मसिद्ध अधिकार हो। सुबह-सुबह छत पर खड़ी होकर वे पूरे इलाके की गतिविधियों पर नज़र रखतीं और फिर दोपहर तक उनका विश्लेषण भी कर डालतीं।

मजेदार बात यह थी कि जिन बातों पर वे दूसरों को टोकतीं, वही काम वे खुद बड़े आराम से करती थीं। अगर किसी के घर से हँसी की आवाज़ ज़्यादा आ जाए तो कहतीं, “आजकल लोग बहुत उछल रहे हैं।” लेकिन शाम को उनके घर की किटी पार्टी का शोर तीन गलियों तक जाता था।

एक बार उन्होंने सबको समझाया कि फिजूलखर्ची बुरी आदत है। उसी हफ्ते उनके घर नया सोफा, नया पर्दा और नया मोबाइल आ गया। पूछने पर बोलीं, “अरे, यह तो ज़रूरत थी।”

मोहल्ले में चरम स्थिति तब आई जब उन्होंने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि अब वे पूरी तरह आध्यात्मिक जीवन जिएँगी। उन्होंने कहा कि वे तीर्थयात्रा पर जा रही हैं और लौटकर सबको संयम और सादगी का मार्ग दिखाएँगी। लोग एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराए, लेकिन कुछ बोले नहीं।

उनकी यात्रा से पहले ही उनकी पुरानी कहानियाँ फिर से चर्चा में आने लगीं—किसी का झगड़ा बढ़ाना, किसी की बात आगे बढ़ाना, और कभी-कभी नमक-मिर्च लगाकर खबर फैलाना। सबको मुहावरा याद आ गया—“नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली।”

तीर्थ से लौटकर रत्ना आंटी और भी गंभीर हो गईं। अब वे हर वाक्य की शुरुआत करतीं, “जब मैं पवित्र स्थान पर थी…” लेकिन एक दिन गलती से उन्होंने वही पुरानी आदत दोहरा दी और पड़ोसी की छोटी-सी बात को बड़ी खबर बना दिया।

तभी सामने से जवाब आया, “आंटी, हज से लौटकर चूहों की गिनती कम हुई या वही है?”

क्षण भर सन्नाटा छाया, फिर हँसी फूट पड़ी। रत्ना आंटी भी मुस्कुरा दीं। शायद उन्हें भी समझ आ गया कि सुधार भाषण से नहीं, व्यवहार से आता है।

10. सिर पर चढ़ाया गया मेहमान

हमारे घर में मेहमान भगवान माने जाते हैं, लेकिन उस साल आए मिश्रा जी को तो हमने भगवान से भी ऊपर का दर्जा दे दिया। वे दूर के रिश्तेदार थे और बोले थे कि बस दो दिन रुकेंगे। मम्मी ने पूरे उत्साह से तैयारी की, पापा ने छुट्टी ले ली, और हम बच्चों को समझा दिया गया कि “मेहमान के सामने शरारत नहीं।”

पहले दिन सब ठीक रहा। मिश्रा जी ने आते ही कहा, “अरे, इतना कष्ट क्यों किया?” और फिर प्लेट में आठ पकौड़े रख लिए। रात को उन्होंने बताया कि उन्हें सादा खाना पसंद है, इसलिए मम्मी ने अगले दिन से अलग सब्ज़ी बनानी शुरू कर दी।

दूसरे दिन उन्होंने सुझाव दिया कि टीवी की आवाज़ कम रखी जाए, क्योंकि उन्हें न्यूज़ ध्यान से सुननी है। तीसरे दिन बोले कि गद्दा थोड़ा सख्त है। चौथे दिन कहा कि चाय में चीनी आधा चम्मच कम होनी चाहिए। धीरे-धीरे घर का रिमोट, रसोई और सोफा—सब उनके नियंत्रण में आ गए।

हम बच्चों ने महसूस किया कि हमारा कमरा अब उनका विश्राम कक्ष बन चुका है। हमारी पढ़ाई डाइनिंग टेबल पर शिफ्ट हो गई। पापा धीरे से मम्मी से पूछते, “दो दिन कब पूरे होंगे?” मम्मी मुस्कुराकर कहतीं, “बस कल पूछ लेंगे।”
एक हफ्ता बीत गया। मिश्रा जी बड़े आराम से बोले, “यहाँ तो अपना ही घर लगता है।” यह सुनकर पापा का चेहरा ऐसा हो गया जैसे बिजली का बिल देख लिया हो।

आख़िरकार पापा ने साहस जुटाया और विनम्रता से पूछा, “आपकी वापसी की टिकट कब की है?” मिश्रा जी चौंके, “अरे, मैंने तो सोचा आप लोग रोकेंगे।”
अगले ही दिन उनकी टिकट बुक कर दी गई। विदा के समय उन्होंने कहा, “बहुत सेवा की आपने।”
दरवाज़ा बंद होते ही घर में सामूहिक राहत की साँस गूँजी।

मम्मी हँसते हुए बोलीं, “मेहमान भगवान होते हैं, पर भगवान को सिर पर नहीं चढ़ाते।”
उस दिन हमें समझ आया कि अतिथि सत्कार अच्छी बात है, पर सीमा के साथ। वरना मेहमान सिर पर चढ़ते देर नहीं लगाते।