रमेश महीने की शुरुआत में बड़े जोश में रहता था। वह सोचता था कि इस बार समझदारी से पैसे खर्च करेगा, बचत करेगा और महीने के अंत में मजे करेगा। लेकिन जैसे-जैसे महीने के दिन बीतते गए, उसकी योजना भी हवा में उड़ती चली गई।
महीने के पहले हफ्ते में ही रमेश ने दोस्तों के साथ बाहर खाने का कार्यक्रम बना लिया। उसने कहा, “एक बार खाने में क्या जाता है!” फिर दूसरे हफ्ते में ऑनलाइन शॉपिंग का एक बड़ा ऑफर आ गया। रमेश ने सोचा, “इतनी अच्छी छूट है, मौका नहीं छोड़ना चाहिए।” उसने दो-तीन चीजें ऑर्डर कर दीं, जो उसे सच में जरूरी भी नहीं थीं।
तीसरे हफ्ते तक आते-आते रमेश के खर्चों का ग्राफ ऊपर और जेब का वजन नीचे आने लगा। उसने खुद से वादा किया कि अब वह कोई गैरजरूरी खर्च नहीं करेगा। लेकिन उसी दिन उसका दोस्त जन्मदिन पार्टी का न्योता लेकर आ गया। रमेश ने सोचा, “दोस्ती भी तो निभानी है।” और पार्टी में जाकर जेब हल्की कर आया।
महीने के आखिरी हफ्ते में रमेश ने जब अपने बटुए को देखा तो उसे ऐसा लगा जैसे बटुआ भी दुखी होकर कह रहा हो, “मुझे आराम चाहिए।” अब रमेश का हाथ सचमुच तंग होने लगा था। उसने दूध वाले से कहा, “भाई, कल पैसे दे दूँगा।” किराने वाले से बोला, “अभी उधार लिख लो।”
घर आकर रमेश ने अपनी पत्नी से कहा, “इस महीने थोड़ा संकट है।” पत्नी मुस्कुराकर बोली, “संकट नहीं, यह तुम्हारी योजना का परिणाम है।” रमेश ने सिर पकड़ लिया।
अगले दिन रमेश ने अपने दोस्तों से कहा, “अब मैं महीने की शुरुआत में ही समझदारी से खर्च करूँगा।” दोस्त हँसते हुए बोले, “यह बात तुम हर महीने कहते हो।”
महीने के अंत में रमेश ने तय किया कि अगली बार वह बजट बनाएगा, अनावश्यक खरीदारी से बचेगा और बचत को प्राथमिकता देगा। लेकिन मन ही मन वह जानता था कि अगला महीना आते ही शायद फिर वही कहानी दोहराई जाएगी।