रवि अपनी कक्षा का सबसे मशहूर विद्यार्थी था—पढ़ाई में नहीं, बल्कि बहानों में। शिक्षक कहते थे कि रवि के लिए किताब खोलना उतना ही मुश्किल है जितना काले अक्षर को भैंस समझना।
एक दिन गणित की कक्षा में शिक्षक ने पूछा, “रवि, 25 में से 7 घटाओ तो क्या बचेगा?” रवि ने बड़ी गंभीरता से कहा, “सर, 7 घटाना है या 25 जोड़ना है?” पूरा वर्ग हँसने लगा।
रवि की कॉपी हमेशा साफ रहती थी, क्योंकि उसमें सवाल कम और चित्र ज्यादा बने होते थे। कभी वह कॉपी के किनारे घर बनाता, कभी पहाड़, और कभी भैंस का चित्र बनाकर लिख देता—“काला अक्षर भैंस बराबर।”
घर पर भी रवि की हालत अलग नहीं थी। उसकी माँ कहती थीं, “बेटा, थोड़ा पढ़ लो।” रवि जवाब देता, “माँ, ज्ञान तो दिल से आता है, किताब से नहीं।”
परीक्षा से एक दिन पहले रवि ने फैसला किया कि अब वह पढ़ाई करेगा। उसने किताब खोली और पहला पेज पढ़ने लगा। पाँच मिनट बाद ही उसे जम्हाई आने लगी। उसने सोचा, “आज तो शुरुआत है।” लेकिन शुरुआत इतनी लंबी चली कि वह सोफे पर ही सो गया।
परीक्षा वाले दिन रवि भगवान से प्रार्थना करने लगा, “हे भगवान, सवाल आसान आना।” परीक्षा हॉल में जब प्रश्न पत्र मिला तो रवि ने देखा कि आधे सवाल उसे समझ ही नहीं आए। उसने उत्तर लिखना शुरू किया—जहाँ कुछ नहीं समझ आया, वहाँ कहानी लिख दी।
रिजल्ट आने पर रवि का नंबर पास तो हो गया, लेकिन बहुत कम अंक आए। शिक्षक ने मुस्कुराकर कहा, “रवि, अगर तुम थोड़ी मेहनत कर लेते तो अच्छे अंक ला सकते थे।”
रवि ने सिर खुजलाते हुए कहा, “सर, मुझे पढ़ाई से ज्यादा सपने देखने की आदत है।”
घर आकर रवि ने फैसला किया कि अगली बार वह पढ़ाई पर ध्यान देगा। लेकिन मन ही मन वह जानता था कि काला अक्षर भैंस बराबर वाला विद्यार्थी बनना उसकी पुरानी आदत है, जिसे बदलना आसान नहीं होगा।