विशाल का एक दोस्त था—सुरेश, जो प्यार से कम और परेशानी से ज्यादा जाना जाता था। दोस्तों के बीच उसकी पहचान ऐसी थी जैसे खटमल, जो बिना बुलाए आता है और जाने का नाम नहीं लेता।
एक दिन विशाल ऑफिस से थका-हारा घर पहुँचा ही था कि दरवाजे की घंटी बजी। उसने दरवाजा खोला तो सामने सुरेश खड़ा था, मुस्कुराते हुए बोला, “भाई, आज शाम तेरे साथ बितानी है।” विशाल समझ गया कि आज शांति मिलने वाली नहीं है।
सुरेश अंदर आया और सोफे पर ऐसे बैठ गया जैसे उसने वहीं स्थायी डेरा जमा लिया हो। उसने कहा, “भाई, चाय मिलेगी क्या?” विशाल ने मुस्कुराकर कहा, “हाँ, अभी बनती है।”
चाय पीते-पीते सुरेश ने टीवी चालू कर दिया और चैनल बदलने लगा। फिर बोला, “यार, आज तो यहीं खाना खाऊँगा।” विशाल का चेहरा ऐसा हो गया जैसे किसी ने खट्टी दवा दे दी हो।
खाना खाने के बाद सुरेश ने कहा, “आज बहुत थक गया हूँ, अगर बुरा न मानो तो रात भी यहीं रुक जाऊँ?” यह सुनकर विशाल का कलेजा मुँह को आ गया। उसने कहा, “भाई, घर छोटा है।” सुरेश मुस्कुराकर बोला, “कोई बात नहीं, मैं एडजस्ट कर लूँगा।”
रात को विशाल ने धीरे से अपनी पत्नी से कहा, “इस खटमल दोस्त से कैसे छुटकारा पाऊँ?” पत्नी बोली, “मुस्कुराओ और बोलो कि कल सुबह जरूरी काम है।”
अगली सुबह विशाल ने सुरेश से कहा, “भाई, मुझे ऑफिस जल्दी जाना है।” सुरेश बोला, “कोई बात नहीं, मैं भी चलूँगा, रास्ते में चाय पीते चलेंगे।”
अब विशाल समझ गया कि यह दोस्त सचमुच खटमल की तरह चिपका हुआ है। उसने एक योजना बनाई। शाम को वह बोला, “भाई, मुझे शहर से बाहर जाना है।” सुरेश ने कहा, “अरे वाह, मैं भी तैयार हूँ।”
विशाल मन ही मन सोचने लगा, “ऐसा दोस्त भगवान किसी को न दे!” लेकिन वह जानता था कि दोस्ती निभाना भी जरूरी है, इसलिए उसने मुस्कुराकर कहा, “चलो, अगली बार मिलते