ललित के घर का सबसे बड़ा डर था—महीने का बिजली बिल। वह हमेशा कहता था कि बिजली का उपयोग आराम से करो, लेकिन बिल आने पर ऐसा लगता था जैसे आसमान से तारे जमीन पर उतर आए हों।
एक दिन सुबह-सुबह डाकिया आया और ललित को एक लिफाफा देकर चला गया। ललित ने खुशी-खुशी सोचा, “शायद कोई शुभ समाचार होगा।” उसने लिफाफा खोला तो अंदर बिजली का बिल देखकर उसकी हालत खराब हो गई। उसे ऐसा लगा जैसे दिन में ही तारे दिखने लगे हों।
ललित ने धीरे से बिल पढ़ना शुरू किया। पहले पेज पर लिखा था—“कुल देय राशि: 9500 रुपये।” यह देखकर ललित की आँखें फैल गईं। उसने सोचा, “इतनी बिजली तो हमने जलाई भी नहीं!” फिर उसने पीछे जाकर खपत का विवरण देखा।
रात में एयर कंडीशनर चलाने का हिसाब था, जबकि ललित को याद आया कि उस दिन बिजली चली गई थी। फिर पंखा चलाने का चार्ज था, लेकिन उस दिन तो वह पंखा बंद करके सोया था। टीवी देखने का चार्ज भी जुड़ा था, जबकि टीवी तो सिर्फ विज्ञापन देखने के लिए ही चालू किया गया था।
ललित गुस्से में बिजली विभाग के दफ्तर पहुँचा और बोला, “भाई साहब, यह बिल गलत है। हमने इतनी बिजली नहीं जलाई।” अधिकारी मुस्कुराकर बोले, “आपके घर में फ्रिज तो है न?” ललित ने कहा, “हाँ।” अधिकारी बोले, “फ्रिज भी तो आराम से काम करता है, इसलिए बिल आ गया।”
घर आकर ललित ने पत्नी से कहा, “अब से बिजली की बचत करनी पड़ेगी।” पत्नी बोली, “पहले तुम मोबाइल चार्जर निकालना सीखो।”
अगले दिन ललित ने घर में घोषणा कर दी कि अब लाइट बेवजह नहीं जलेगी। वह खुद कमरे से बाहर जाते समय स्विच बंद करने लगा। लेकिन मन ही मन वह सोच रहा था कि अगला बिल आने पर फिर दिन में तारे दिखेंगे या नहीं।
महीने के अंत में ललित ने बिजली बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन उसे पता था कि बिल चाहे कम आए या ज्यादा, डर हमेशा बना रहेगा।