रमेश के घर का सबसे बड़ा डर था—अचानक आने वाले रिश्तेदार। खासकर ऐसे रिश्तेदार जो बिना बताए आते और आराम से मेहमान बनकर जम जाते थे। रमेश की पत्नी हमेशा कहती थी, “हमारे घर में दाल-भात भी बनाओ तो मूसलचंद रिश्तेदार जरूर आ जाएगा।”
एक दिन रमेश ऑफिस से थका-हारा घर पहुँचा। उसने जैसे ही दरवाजा खोला, अंदर से खुशबू आ रही थी। वह खुश होकर बोला, “आज तो दाल-भात बना है!” लेकिन तभी उसकी पत्नी ने धीरे से कहा, “हाँ, और साथ में मूसलचंद रिश्तेदार भी आ गए हैं।”
रमेश चौंक गया। उसने पूछा, “कौन आया है?” पत्नी ने इशारे से ड्राइंग रूम की तरफ दिखाया। वहाँ रमेश के दूर के चाचा के बेटे के दोस्त के मामा बैठे थे, जो पहली बार घर आए थे लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे यहीं रहने का पूरा प्लान बनाकर आए हों।
मूसलचंद रिश्तेदार साहब बड़े आराम से सोफे पर पाँव पसारकर बैठे थे और बोले, “भाई साहब, आपका घर तो बहुत अच्छा है। यहाँ तो रुकने का मन करता है।” रमेश मन ही मन सोचने लगा, “बस यही तो खतरे की घंटी है।”
खाना तैयार हुआ तो मूसलचंद रिश्तेदार जी ने तीन बार रोटी और चार बार दाल माँगी। उन्होंने बड़ी खुशी से कहा, “घर का खाना सबसे अच्छा होता है।” रमेश की पत्नी धीरे-धीरे रसोई में और दाल बनाने चली गई।
खाने के बाद रिश्तेदार जी ने कहा, “आज तो बहुत थक गया हूँ, अगर बुरा न मानें तो रात भी यहीं रुक जाऊँ?” यह सुनकर रमेश का कलेजा मुँह को आ गया। लेकिन वह मुस्कुराते हुए बोला, “जी, बिल्कुल… घर आपका ही है।”
रात को रमेश ने पत्नी से कहा, “अब क्या करें?” पत्नी बोली, “मुस्कुराओ और भगवान का नाम लो।”
अगली सुबह मूसलचंद रिश्तेदार जी ने कहा, “मैं तो बस दो दिन के लिए आया था, अब चलता हूँ।” यह सुनकर रमेश और उसकी पत्नी दोनों खुशी से ऐसे मुस्कुराए जैसे घर से भारी बोझ उतर गया हो। रमेश ने मन ही मन कहा, “दाल-भात बनाओ, लेकिन रिश्तेदारों को खबर नहीं लगने देना चाहिए!”