मोहल्ले में शर्मा जी और वर्मा जी की दोस्ती बड़ी मशहूर थी। लोग मजाक में कहते थे कि इन दोनों पड़ोसियों का साथ “चोली दामन का साथ” जैसा है, क्योंकि चाहे खुशी हो या परेशानी, दोनों हमेशा साथ नजर आते थे—हालाँकि कभी-कभी यह साथ थोड़ा ज्यादा भी हो जाता था।
सुबह-सुबह वर्मा जी शर्मा जी के घर पहुँच जाते और कहते, “भाई साहब, आज चाय आपकी तरफ से।” शर्मा जी मुस्कुराकर चाय बना देते क्योंकि उन्हें पता था कि बहस करने से बेहतर है चाय पीकर शांति बना ली जाए।
एक दिन वर्मा जी अचानक बोले, “शर्मा जी, आज मुझे आपकी सलाह चाहिए।”
शर्मा जी बोले, “बोलिए, क्या समस्या है?”
वर्मा जी बोले, “मैंने नया पौधा लगाया है, लेकिन पता नहीं सही जगह लगाया है या नहीं।”
शर्मा जी उठे और आधा घंटे तक पौधे की स्थिति पर गंभीर चर्चा करने लगे। अंत में बोले, “पौधा ठीक है, लेकिन उसे आप जैसे ज्यादा जिज्ञासु लोगों से बचाकर रखना होगा।”
दोनों पड़ोसी शाम को पार्क में टहलने जाते थे। एक दिन वर्मा जी ने कहा, “आज ज्यादा चलेंगे, सेहत अच्छी रहेगी।”
शर्मा जी बोले, “ठीक है, लेकिन मेरी गति पर चलना होगा।”
पाँच मिनट बाद वर्मा जी बोले, “भाई साहब, मैं थोड़ा आराम करूँगा।”
शर्मा जी मुस्कुराकर बोले, “आपकी सेहत भी मेरे साथ ही चलती है।”
मोहल्ले में जब भी किसी को मदद चाहिए होती, लोग पहले इन दोनों पड़ोसियों को याद करते थे। अगर किसी के घर बिजली चली जाए तो वर्मा जी कहते, “शर्मा जी के घर चलो, वहाँ पूछकर समाधान मिलेगा।” और अगर किसी को चाय पीनी हो तो शर्मा जी कहते, “वर्मा जी के घर चलो, आज चाय वहीँ मिलेगी।”
धीरे-धीरे मोहल्ले वालों को समझ आ गया कि चोली दामन का साथ सिर्फ कपड़ों में नहीं, बल्कि अच्छी दोस्ती में भी होता है।
शर्मा जी और वर्मा जी आज भी कहते हैं कि पड़ोसी सिर्फ पास रहने वाला नहीं, बल्कि जिंदगी का हँसता-खेलता हिस्सा भी होता है।