हमारे मोहल्ले में वैसे तो शांति रहती थी, लेकिन जैसे ही कोई असामान्य आवाज़ सुनाई देती, सबके कान अपने-आप खड़े हो जाते थे। एक रविवार की सुबह अचानक गली में बड़ी सी चमचमाती गाड़ी आकर रुकी। गाड़ी ऐसी थी जैसी लोगों ने अब तक सिर्फ़ टीवी में देखी थी। बस फिर क्या था, परदे हिले, खिड़कियाँ खुलीं और कान खड़े हुए पूरे मोहल्ले में।
सबसे पहले वर्मा आंटी ने बालकनी से झाँका। उन्होंने तुरंत निष्कर्ष निकाला कि जरूर कोई बड़ा अधिकारी आया है। पाँच मिनट में यह सूचना गुप्ता आंटी तक पहुँची, लेकिन वहाँ पहुँचते-पहुँचते अधिकारी की जगह “फिल्म का हीरो” बन चुका था। बच्चों ने तो तय कर लिया कि आज ऑटोग्राफ लेकर ही मानेंगे।
उधर शर्मा जी ने चश्मा ठीक करते हुए घोषणा की, “लगता है आयकर विभाग की रेड है।” यह सुनते ही जिन-जिन के घरों में नकद रखा था, सबको अपने-अपने ड्रॉअर याद आने लगे। माहौल में हल्की घबराहट तैर गई।
तभी गाड़ी से एक साधारण सा युवक उतरा। उसने आसपास देखा और मोबाइल पर किसी से पूछा, “भैया, मकान नंबर 78 किधर है?” अब तक मोहल्ले के दस लोग अलग-अलग दिशाएँ बताने के लिए तैयार खड़े थे। हर किसी को लगता था कि असली जानकारी उसी के पास है।
कुछ ही देर में पता चला कि वह युवक तो ऑनलाइन फूड डिलीवरी वाला है, जो गलती से गलत गली में आ गया। गाड़ी उसकी नहीं, ग्राहक की थी, जो खुद ड्राइव करके उसे लेने आया था।
सच सामने आते ही सबके चेहरे बदल गए। वर्मा आंटी ने तुरंत कहा, “हमें तो पहले से पता था।” शर्मा जी ने खाँसते हुए अख़बार खोल लिया, जैसे उन्होंने कुछ सुना ही न हो। बच्चे थोड़े निराश हुए कि न कोई हीरो निकला, न कोई रेड पड़ी।
गाड़ी चली गई, गली फिर शांत हो गई। लेकिन उस दिन सबको समझ आ गया कि हमारे मोहल्ले में खबर से पहले कान खड़े हो जाते हैं। और जब तक सच्चाई सामने आती है, कल्पनाएँ अपना पूरा शो कर चुकी होती हैं।