गाँव के रमेश जी की भतीजी की शादी थी। शादी का माहौल बड़ा खुशनुमा था और रिश्तेदारों की भीड़ ऐसे जमा थी जैसे कोई उत्सव चल रहा हो। सबसे ज्यादा चर्चा शादी में होने वाले मनोरंजन की थी क्योंकि परिवार में कुछ ऐसे लोग भी थे जो बिना मजाक के नहीं रह सकते थे।
शादी में सबसे पहले चाचा जी ने भाषण देना शुरू किया। उन्होंने कहा, “शादी का मतलब सिर्फ दो लोगों का मिलना नहीं, बल्कि दो परिवारों का हँसी-खुशी से जुड़ना है।” लेकिन जैसे ही उन्होंने बोलना शुरू किया, उनके भाषण का रुख ऐसा बदलता गया कि बीच-बीच में मजेदार किस्से भी आने लगे। लोग उनकी बातों पर हँसते-हँसते पेट पकड़कर झुक गए।
फिर फूफा जी का नंबर आया। उन्होंने दूल्हे से पूछा, “बेटा, शादी का फैसला सोच-समझकर लिया या बिना सोचे?” यह सुनकर दूल्हा थोड़ा घबरा गया। फूफा जी ने आगे कहा, “घबराओ मत, शादी जिंदगी का सबसे अच्छा एक्सपेरिमेंट है।” यह सुनकर वहाँ मौजूद लोग जोर-जोर से हँसने लगे।
जयमाला के समय छोटा बच्चा अचानक मंच पर चढ़ गया और बोला, “मुझे भी माला चाहिए।” दुल्हन ने मुस्कुराकर उसे एक छोटा सा फूल दे दिया। बच्चा इतना खुश हुआ कि उसने मंच पर ही नाचना शुरू कर दिया। उसकी शरारत देखकर पूरा पंडाल हँसते-हँसते पेट में बल पड़ने लगा।
खाने के पंडाल में भी मजेदार घटनाएँ हुईं। एक बुजुर्ग ने प्लेट देखकर कहा, “शादी का असली ज्ञान यहाँ मिलता है।” बच्चों ने पूछा, “कैसे?” बुजुर्ग बोले, “घर में खाना बर्बाद होता है, लेकिन शादी में हर दाना कीमती लगता है।”
शादी के अंत में दूल्हे के दोस्त ने कहा, “आज शादी में इतना हँसे हैं कि पेट में सच में बल पड़ गए हैं।” दूल्हा भी मुस्कुराकर बोला, “शादी का असली मजा गंभीरता में नहीं, हँसी-खुशी में है।”
घर लौटते समय लोग कह रहे थे कि यह शादी सिर्फ रिश्तों का मिलन नहीं थी, बल्कि हँसी का भी उत्सव थी। और मोहल्ले वाले कहते हैं कि ऐसी शादी में हँसते-हँसते पेट में बल पड़ना भी खुशी की निशानी होती है।