शहर के सांस्कृतिक भवन में कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ था। पोस्टर पर लिखा था – “अपनी ढपली अपना राग – विशेष हास्य कवि सम्मेलन।” कार्यक्रम का नाम पढ़कर ही लोग समझ गए थे कि आज कविता से ज्यादा मनोरंजन होने वाला है। मंच पर अलग-अलग कवि अपनी तैयारियाँ कर रहे थे और हर कोई अपनी शैली में कुछ अलग दिखाना चाहता था।
सबसे पहले मंच पर शर्मा जी आए। उन्होंने माइक संभाला और कहा, “आज मैं समाज की सच्चाई सुनाने आया हूँ।” फिर उन्होंने अपनी ही धुन में कविता शुरू की, जिसमें कहीं प्यार था, कहीं राजनीति की चर्चा थी और कहीं खाने-पीने का जिक्र था। उनकी कविता सुनकर दर्शक मुस्कुराने लगे क्योंकि हर लाइन अचानक दिशा बदल लेती थी। कुछ लोग फुसफुसाकर बोले, “यह तो सच में अपनी ढपली अपना राग है।”
इसके बाद गुप्ता जी आए। उन्होंने मंच पर आते ही कहा, “मैं किसी की नकल नहीं करता, मैं अपनी मौलिकता में विश्वास रखता हूँ।” फिर उन्होंने ऐसी कविता सुनाई जिसमें मौसम, चाय, पड़ोसी और जीवन दर्शन सब एक साथ मिल गए। उनकी कविता का असली मजा यह था कि शुरुआत कुछ और होती थी और अंत कुछ और निकलता था।
तीसरे कवि मंच पर आए तो उन्होंने कहा, “मैं सिर्फ अपने मन की सुनाता हूँ।” उन्होंने हास्य और व्यंग्य का ऐसा मिश्रण पेश किया कि दर्शक हँसते-हँसते लोटपोट हो गए। उनकी कविता में कहीं ऑफिस की समस्या थी, कहीं बच्चों की शरारत और कहीं जिंदगी का मजेदार ताना-बाना।
कार्यक्रम के अंत में संचालक ने कहा कि आज के कवि सम्मेलन की सबसे खास बात यही रही कि हर कवि ने अपनी शैली में कविता पढ़ी। किसी ने किसी की नकल नहीं की, बल्कि सभी ने अपने-अपने अंदाज में मनोरंजन किया। दर्शक खुश होकर घर लौटे और कहते रहे कि आज सच में “अपनी ढपली अपना राग” का असली मतलब समझ आया।
मोहल्ले वाले भी इस कवि सम्मेलन की चर्चा करते हुए बोले कि कभी-कभी अलग-अलग राग भी मिलकर जिंदगी को खुशियों का संगीत बना देते हैं।