गाँव में रमेश काका अपनी जिद के लिए बहुत मशहूर थे। मोहल्ले वाले मजाक में कहते थे कि अगर रमेश काका किसी बात की जिद पकड़ लें तो वह अक्सर “आ बैल मुझे मार” वाली स्थिति बन जाती है। वे अपनी बात पर अड़ जाने वाले स्वभाव के थे, चाहे बाद में उन्हें परेशानी ही क्यों न हो।
एक दिन गाँव के मेले में झूला लगा था जो बहुत ऊँचा और तेज घूमता था। रमेश काका अपने दोस्तों के साथ मेले में पहुँचे और झूले को देखकर बोले कि वह आज जरूर झूले पर बैठेंगे। दोस्तों ने उन्हें समझाया कि उनकी उम्र को देखते हुए यह झूला सुरक्षित नहीं रहेगा क्योंकि वह बहुत तेजी से घूमता है। लेकिन रमेश काका ने जिद पकड़ ली और कहा कि वह जरूर झूलेंगे।
टिकट लेकर रमेश काका झूले पर बैठ गए। जैसे ही झूला शुरू हुआ, उनका उत्साह थोड़ा कम होने लगा। झूला ऊपर-नीचे और तेज घूमने लगा तो उन्हें अपनी जिद पर पछतावा होने लगा। झूला ऊपर जाता तो वे झूला रोकने की बात करते, लेकिन झूला चलाने वाला मुस्कुराकर कहता कि अभी चक्कर बाकी है। नीचे खड़े उनके दोस्त हँस रहे थे और कह रहे थे कि काका ने खुद ही “आ बैल मुझे मार” वाली जिद पकड़ ली है।
झूला खत्म होने के बाद रमेश काका धीरे-धीरे उतरकर जमीन पर खड़े हुए। उनका सिर थोड़ा घूम रहा था, लेकिन वे मुस्कुराते हुए बोले कि झूला तो बहुत अच्छा था। एक बच्चा पास आकर बोला कि काका को कैसा लगा, तो उन्होंने कहा कि अनुभव अच्छा था, लेकिन अगली बार वे जिद नहीं करेंगे।
शाम को गाँव में सब लोग रमेश काका की कहानी सुना रहे थे और काका भी हँसते हुए कह रहे थे कि कभी-कभी जिद करना मजेदार लग सकता है, लेकिन समझदारी भी जरूरी होती है। घर लौटकर उन्होंने तय किया कि आगे से जब भी कोई उन्हें समझाएगा, तो वे पहले सोचेंगे और फिर कोई फैसला करेंगे। मोहल्ले वाले कहते हैं कि रमेश काका की जिद मशहूर थी, लेकिन उसी जिद ने उन्हें एक मजेदार सीख भी दे दी।