रवि को ट्यूशन जाना बिल्कुल पसंद नहीं था। उसे लगता था कि ट्यूशन का मतलब सिर्फ दिमाग पर अतिरिक्त बोझ डालना और खेल-कूद के समय को कम करना है। लेकिन उसके माता-पिता का मानना था कि ट्यूशन से पढ़ाई मजबूत होती है और भविष्य अच्छा बनता है। रोज शाम को जब ट्यूशन जाने का समय होता, रवि का मन उदास हो जाता और वह सोचता कि काश ट्यूशन भी कभी छुट्टी ले ले। ट्यूशन वाले मास्टर जी बहुत सख्त थे। अगर कोई बच्चा होमवर्क नहीं करता तो वे अगले दिन दोगुना काम दे देते थे, जिससे बच्चों की परेशानी और बढ़ जाती थी।
रवि ने ट्यूशन से छुटकारा पाने के लिए एक योजना बनाई। उसने घर आकर अपनी माँ से कहा कि उसे ट्यूशन में कुछ ठीक से समझ नहीं आता और वह घर पर ही पढ़ाई करना चाहता है। माँ ने मुस्कुराकर पूछा कि असली समस्या समझ न आना है या ट्यूशन जाना पसंद नहीं है। रवि ने मासूम चेहरा बनाकर कहा कि दोनों ही बातें सही हैं। बाद में उसने पापा से भी बात की और कहा कि अगर उसे ट्यूशन छोड़ना है तो वह अपनी पढ़ाई खुद संभाल लेगा। पापा ने शर्त रखी कि ट्यूशन तभी छोड़ा जा सकता है जब पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन हो।
कुछ दिनों बाद ट्यूशन में एक टेस्ट हुआ। रवि ने थोड़ी मेहनत की और पेपर अच्छे से दे दिया। उसे उम्मीद से बेहतर अंक मिले। मास्टर जी ने भी कहा कि लगता है रवि पढ़ाई पर ध्यान दे रहा है। रवि अंदर ही अंदर बहुत खुश था क्योंकि उसे लगने लगा था कि शायद अब ट्यूशन से छुटकारा मिल सकता है। घर जाकर उसने पापा को अपना रिजल्ट दिखाया और ट्यूशन बंद करने की बात फिर से कही।
आखिरकार पापा मान गए और रवि की ट्यूशन छूट गई। उस दिन रवि को ऐसा लगा जैसे उसे आजादी मिल गई हो। शाम को वह दोस्तों के साथ खेलने गया और मन ही मन सोचा कि पढ़ाई भी जरूरी है और खेल भी। मोहल्ले वाले कहते हैं कि कभी-कभी बच्चों की खुशी सही फैसले और संतुलित पढ़ाई में ही छिपी होती है।