मदनलाल जी बहुत ही सीधे और ईमानदार आदमी थे, लेकिन मोहल्ले वाले मजाक में कहते थे कि उनकी सबसे बड़ी समस्या यह थी कि “सीधी उंगली से घी निकालने” की कोशिश करते रहते थे।
एक दिन मदनलाल जी ने सोचा कि आज घर में बनी खीर में थोड़ा घी डालना चाहिए। उन्होंने पत्नी से कहा, “जरा घी दे दो।” पत्नी ने घी का डिब्बा दे दिया और कहा, “ध्यान से निकालना।”
मदनलाल जी ने डिब्बे में उंगली डाली और सीधे तरीके से घी निकालने की कोशिश करने लगे। लेकिन घी मानो डिब्बे के अंदर चिपककर बैठ गया था।
उन्होंने फिर कोशिश की, लेकिन घी बाहर आने का नाम ही नहीं ले रहा था।
पास खड़ी उनकी बेटी बोली, “पापा, शायद घी आपकी उंगली से डर गया है।”
मदनलाल जी बोले, “मैं बहुत सीधा आदमी हूँ, इसलिए घी भी सीधा ही निकलेगा।”
उन्होंने फिर जोर लगाया, लेकिन घी वहीं का वहीं रहा।
पत्नी हँसकर बोलीं, “अगर सीधी उंगली से घी नहीं निकल रहा तो थोड़ी टेढ़ी कर लो।”
मदनलाल जी बोले, “मैं सिद्धांतों का आदमी हूँ, टेढ़ापन पसंद नहीं करता।”
कुछ देर तक वे कोशिश करते रहे, लेकिन सफलता नहीं मिली। आखिरकार उन्होंने चम्मच उठाया और घी निकाल लिया।
बेटी हँसकर बोली, “पापा, आज साबित हो गया कि कभी-कभी काम करने का तरीका बदलना पड़ता है।”
शाम को मदनलाल जी मोहल्ले में बैठे थे। पड़ोसी ने पूछा, “क्या हुआ, घी निकला?”
मदनलाल जी मुस्कुराकर बोले, “नहीं, आज सीधी उंगली से घी नहीं निकला, लेकिन चम्मच से निकल गया।”
पड़ोसी बोला, “यही जिंदगी का नियम है—कभी सीधे रास्ते काम नहीं बनते।”
मदनलाल जी सोचने लगे कि ईमानदारी अच्छी बात है, लेकिन थोड़ी समझदारी भी जरूरी है।
घर लौटकर उन्होंने फैसला किया कि अगली बार घी निकालना हो तो पहले चम्मच ढूँढेंगे।
मोहल्ले वाले कहते हैं कि मदनलाल जी आज भी कोशिश करते हैं कि जिंदगी के काम सीधी उंगली से ही पूरे हों, लेकिन कभी-कभी चम्मच की जरूरत भी पड़ जाती है।