शर्मा जी बहुत ही शांत स्वभाव के आदमी थे, लेकिन उनकी सबसे बड़ी समस्या थी एक ऐसा मेहमान जो बिना बुलाए आ जाता था और जाने का नाम नहीं लेता था। मोहल्ले वाले मजाक में उसे “गले पड़ा मुफ्तखोर मेहमान” कहते थे।
उस मेहमान का नाम था बबलू काका। बबलू काका की खासियत थी कि अगर वह किसी के घर आ जाएँ तो चाय-पानी के साथ-साथ खाने-पीने का पूरा हिसाब भी खुद ही बनवा लेते थे।
एक दिन बबलू काका अचानक शर्मा जी के घर आ पहुँचे और बोले, “भाई साहब, रास्ते से गुजर रहा था तो सोचा चाय पीते जाऊँ।”
शर्मा जी मुस्कुराए और बोले, “आइए, बैठिए।”
चाय आई तो बबलू काका बोले, “चाय अच्छी है, लेकिन थोड़ा बिस्किट होता तो मजा आ जाता।”
पत्नी ने मुस्कुराकर बिस्किट भी दे दिया।
थोड़ी देर बाद बबलू काका बोले, “आज मौसम बहुत अच्छा है, लगता है यहीं खाना भी खा लूँ।”
शर्मा जी ने मन ही मन सोचा कि यह तो सच में गले पड़ने लगे हैं, लेकिन उन्होंने शिष्टाचार नहीं छोड़ा।
दोपहर हो गई तो बबलू काका बोले, “भाई साहब, अगर बुरा न मानें तो आज खाना भी साथ खा लें।”
शर्मा जी की पत्नी ने हँसते हुए खाना परोस दिया। बबलू काका बड़े आराम से खाना खाने लगे और बीच-बीच में कहते, “घर का खाना सबसे अच्छा होता है।”
खाना खत्म होने के बाद भी बबलू काका उठने का नाम नहीं ले रहे थे। उन्होंने कहा, “थोड़ा आराम कर लूँ, बाहर धूप ज्यादा है।”
शाम तक शर्मा जी समझ गए कि बबलू काका सच में गले पड़ गए हैं, लेकिन गुस्सा करने के बजाय उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “काका, अगली बार आना तो अपनी चाय और बिस्किट साथ लेकर आना।”
बबलू काका भी हँसकर बोले, “भाई साहब, दोस्ती में हिसाब नहीं चलता।”
उस दिन शर्मा जी खुश थे क्योंकि बबलू काका मुफ्तखोरी के बावजूद सबको हँसाकर चले गए थे।
मोहल्ले वाले कहते हैं कि कभी-कभी मुफ्तखोर मेहमान भी जिंदगी में खुशी का स्वाद छोड़ जाते हैं।