रामू काका को घूमने का बहुत शौक था, लेकिन उनकी सबसे बड़ी समस्या थी—चलने की गति। गाँव वाले मजाक में कहते थे कि रामू काका अगर यात्रा पर निकलें तो मंजिल खुद उनके पास आ जाए, लेकिन रामू काका पहुँचने में समय जरूर लगाएंगे।
एक दिन रामू काका ने फैसला किया कि वह पास के शहर तक पैदल यात्रा करेंगे। गाँव वालों ने पूछा, “काका, शहर कितनी दूर है?”
रामू काका बोले, “बस अढ़ाई कोस।”
सुबह रामू काका बड़े उत्साह से निकल पड़े। उनके हाथ में लाठी थी और चेहरे पर यात्री वाला गंभीर भाव। पहला दिन बीता, लेकिन रामू काका सिर्फ आधा कोस ही चल पाए।
रात को एक पेड़ के नीचे आराम करते हुए उन्होंने सोचा, “जल्दी चलना सेहत के लिए अच्छा नहीं होता।”
दूसरे दिन फिर यात्रा शुरू हुई। रास्ते में एक आदमी मिला और बोला, “काका, शहर तो अभी बहुत दूर है।”
रामू काका बोले, “कोई बात नहीं, यात्रा भी जीवन का आनंद है।”
तीसरे दिन रामू काका एक चाय की दुकान पर रुक गए। उन्होंने सोचा, “थोड़ा आराम कर लूँ, यात्रा तो चलती रहेगी।”
चौथे दिन गाँव का एक बच्चा मिला और बोला, “काका, आप अभी तक शहर नहीं पहुँचे?”
रामू काका मुस्कुराकर बोले, “जल्दी क्या है, नौ दिन चले अढ़ाई कोस वाली यात्रा कर रहा हूँ।”
पाँचवे दिन रामू काका को लगा कि रास्ता थोड़ा लंबा हो गया है। उन्होंने अपनी गति और कम कर दी।
आठवें दिन तक रामू काका आधे रास्ते पर भी नहीं पहुँचे थे। उन्होंने सोचा, “जल्दी चलने से थकान होती है।”
नौवें दिन आखिरकार रामू काका शहर की सीमा तक पहुँच गए। उन्होंने ऊपर देखकर कहा, “देखा, यात्रा पूरी हो गई।”
गाँव वाले कहते हैं कि रामू काका की यात्रा धीमी जरूर थी, लेकिन उन्होंने साबित कर दिया कि अगर धैर्य हो तो नौ दिन में अढ़ाई कोस भी तय हो सकता है—बस रास्ते में ज्यादा चाय की दुकानें नहीं होनी चाहिए।