गाँव में किशनलाल जी अपनी समझदारी पर बहुत गर्व करते थे। वे हर बात में बहस करने की कोशिश करते, चाहे उन्हें विषय की समझ हो या न हो। मोहल्ले वाले मजाक में कहते थे कि किशनलाल जी का सिद्धांत था—“गलती मेरी नहीं, हालात की है।”
एक दिन गाँव में शादी का समारोह था। वहाँ नाच-गाने का कार्यक्रम रखा गया था। किशनलाल जी भी बड़े जोश में पहुँच गए और बोले, “आज मैं भी नाचूँगा।”
सभी लोग हैरान रह गए क्योंकि किसी ने किशनलाल जी को पहले नाचते नहीं देखा था।
ढोल बजने लगा और किशनलाल जी मंच के बीचोंबीच खड़े हो गए। उन्होंने पैर हिलाने की कोशिश की, लेकिन उनका पहला कदम ही उल्टा पड़ गया। दूसरे कदम में उनका संतुलन बिगड़ गया और वे थोड़ा टेढ़े होकर खड़े हो गए।
पास खड़ा बच्चा बोला, “अंकल, लगता है नाच अभी सीखना बाकी है।”
किशनलाल जी घबराकर बोले, “नाच तो मैं जानता हूँ, बस आज आँगन थोड़ा टेढ़ा लग रहा है।”
लोग हँसने लगे।
फिर किशनलाल जी ने हाथ हिलाकर डांस करने की कोशिश की, लेकिन पैर और हाथ का तालमेल ऐसा बिगड़ा कि वे लगभग गिरने वाले थे। किसी तरह खुद को संभाला और बोले, “यह आँगन सच में टेढ़ा है।”
शादी में मौजूद एक बुजुर्ग ने कहा, “बेटा, नाचने के लिए आँगन नहीं, ताल चाहिए।”
किशनलाल जी ने तुरंत जवाब दिया, “ताल भी थोड़ा टेढ़ा है।”
कार्यक्रम खत्म होने के बाद किशनलाल जी बाहर आकर खड़े हो गए और बोले, “मैं नाचना जानता हूँ, लेकिन आज हालात साथ नहीं दे रहे थे।”
मोहल्ले वाले जानते थे कि किशनलाल जी कभी अपनी गलती नहीं मानते, इसलिए उन्होंने भी मुस्कुराकर कह दिया, “हाँ, आज आँगन ही टेढ़ा था।”
घर लौटकर किशनलाल जी ने सोचा कि नाचना सीखना चाहिए, लेकिन साथ में यह भी तय किया कि अगली बार अगर डांस करना हुआ तो पहले आँगन की जाँच करेंगे।
और मोहल्ले वाले कहते हैं कि कभी-कभी नाच न आने पर भी आँगन को दोष देना ही सबसे आसान बहाना होता है।