मोहल्ले में राकेश चाचा बहुत मशहूर थे क्योंकि वे हर बात में शक करने की आदत रखते थे। अगर किसी चीज में जरा भी गड़बड़ लगे तो कहते, “दाल में कुछ काला जरूर है।”
एक दिन राकेश चाचा ने पत्नी से कहा, “आज खाने में दाल बनेगी?”
पत्नी बोलीं, “हाँ, लेकिन दाल में काला नहीं होगा।”
राकेश चाचा मुस्कुराए और बोले, “यही तो शक की बात है।”
दोपहर में दाल टेबल पर आई। राकेश चाचा ने चम्मच से दाल को ध्यान से देखा, जैसे कोई जासूस सबूत ढूँढ रहा हो। फिर धीरे से बोले, “लगता है दाल में काला है।”
पत्नी ने पूछा, “कहाँ?”
चाचा बोले, “पता नहीं, लेकिन शक जरूर है।”
उन्होंने दाल का एक चम्मच चखा और कहा, “दाल अच्छी है, लेकिन मुझे लगता है कुछ रहस्य छिपा है।”
पत्नी हँसकर बोलीं, “रहस्य यह है कि मैंने आज दाल में ज्यादा मसाले नहीं डाले।”
शाम को चाचा मोहल्ले में बैठे थे। पड़ोसी ने पूछा, “चाचा, क्या चल रहा है?”
चाचा बोले, “दाल में काला का रहस्य खोज रहा हूँ।”
पड़ोसी ने मजाक में कहा, “चाचा, कभी अपनी शक करने की आदत में भी काला ढूँढिए।”
चाचा गंभीर होकर बोले, “शक करना भी एक कला है।”
रात को खाना खाते समय चाचा फिर दाल देखकर बोले, “मुझे लगता है आज दाल में कोई राज छिपा है।”
पत्नी ने प्लेट लेकर कहा, “अगर राज जानना है तो दाल खत्म करो।”
चाचा ने दाल खत्म की और बोले, “अब समझ आया—दाल में काला नहीं, बल्कि मेरे दिमाग में ज्यादा सवाल हैं।”
मोहल्ले वाले कहते हैं कि राकेश चाचा हर चीज में रहस्य खोजते हैं, चाहे दाल हो या जिंदगी।
और चाचा खुद कहते हैं, “दाल में काला हो या न हो, लेकिन शक करने वाले का दिमाग हमेशा चालू रहता है।”