मोहल्ले के ठाकुर साहब बड़े शौकीन आदमी थे। जब भी कोई दावत रखते, कहते, “मेहमानों का स्वागत ऐसा होना चाहिए कि वे याद रखें।” लेकिन इस बार जो हुआ, उसे देखकर लोग कहने लगे कि यह तो “ऊँट के मुँह में जीरा” वाली दावत थी।
ठाकुर साहब ने अपने दोस्त की खुशी में छोटी सी दावत रखी थी। उन्होंने घर के आँगन में दो टेबल लगवाईं और खाने का इंतजाम किया। मेहमान भी धीरे-धीरे आने लगे।
सबसे पहले पूड़ी और सब्जी परोसी गई। प्लेट में पूड़ी देखकर एक मेहमान बोला, “भाई साहब, पूड़ी तो बड़ी अच्छी है, लेकिन मात्रा थोड़ी कम लग रही है।”
ठाकुर साहब मुस्कुराकर बोले, “गुणवत्ता पर ध्यान दीजिए, मात्रा पर नहीं।”
फिर हलवाई ने दाल परोसी। दाल का कटोरा इतना छोटा था कि उसे देखकर बच्चों ने कहा, “यह तो खिलौने वाला बर्तन है।”
दावत में मिठाई आई तो मामला और मजेदार हो गया। हर मेहमान के हिस्से में मिठाई का बस एक छोटा सा टुकड़ा आया।
एक बुजुर्ग बोले, “ठाकुर साहब, यह दावत है या स्वाद की झलक?”
ठाकुर साहब बोले, “आजकल स्वास्थ्य भी जरूरी है, ज्यादा खाने से डॉक्टर खुश होते हैं।”
कुछ मेहमान आपस में फुसफुसाने लगे कि दावत में खाने से ज्यादा बातों का स्वाद है।
बच्चों ने पूछा, “चाचा, आइसक्रीम कहाँ है?”
हलवाई ने कहा, “आइसक्रीम बाद में, अगर बची तो।”
दावत खत्म होने पर मेहमानों को लगा कि पेट नहीं, बल्कि भूख का ज्ञान लेकर जा रहे हैं।
एक दोस्त ने ठाकुर साहब से कहा, “भाई, यह दावत ऊँट के मुँह में जीरा जैसी थी।”
ठाकुर साहब हँसकर बोले, “जीरा भी जरूरी है, क्योंकि स्वाद जीरे से ही आता है।”
मोहल्ले वाले कहते हैं कि उस दिन दावत कम, लेकिन चर्चा ज्यादा हुई।
और ठाकुर साहब आज भी कहते हैं, “दावत बड़ी नहीं, बल्कि प्यार से दी गई छोटी दावत भी याद रहती है।”