बाबूजी का नाम मोहल्ले में बड़े सम्मान से लिया जाता था, लेकिन उनकी जिंदगी अक्सर ऐसे चक्कर में फँस जाती थी जैसे “आसमान से गिरा और खजूर में अटका” वाली कहावत हो।
एक दिन बाबूजी ने सोचा कि अब थोड़ा घूमना चाहिए। उन्होंने लंबी यात्रा की योजना बनाई और ट्रेन में टिकट लेकर बैठ गए। यात्रा अच्छी चल रही थी, तभी अचानक पता चला कि जिस शहर में जाना था, उससे एक स्टेशन पहले ही उतरना पड़ गया।
बाबूजी ने सोचा, “चलो, टैक्सी ले लेते हैं।” लेकिन टैक्सी वाले ने इतना ज्यादा किराया बताया कि बाबूजी को लगा जैसे खजूर के पेड़ पर चढ़ने का शुल्क माँगा जा रहा हो।
अंत में उन्होंने बस पकड़ ली। बस में सीट नहीं मिली तो बाबूजी खड़े-खड़े यात्रा करने लगे। तभी बस अचानक ब्रेक लगाकर रुकी और बाबूजी आगे की तरफ ऐसे झुके जैसे आसमान से गिर रहे हों। किसी तरह संतुलन बनाकर खड़े रहे और मन ही मन बोले, “आज बच गए।”
शहर पहुँचकर बाबूजी होटल ढूँढने लगे। एक सस्ता होटल देखकर अंदर गए। लेकिन वहाँ कमरे की हालत देखकर उन्हें लगा कि यह खजूर का पेड़ ही है, जिस पर वे अटक सकते हैं।
रात को सोते समय मच्छरों ने बाबूजी पर ऐसा हमला किया कि वे सोचने लगे कि यात्रा करना सही फैसला था या नहीं।
सुबह उठकर बाबूजी बाहर घूमने गए। रास्ते में एक दोस्त मिला और बोला, “बाबूजी, आप तो आसमान से गिरकर खजूर में अटके लग रहे हैं।”
बाबूजी मुस्कुराकर बोले, “जिंदगी भी कुछ ऐसी ही है—कभी ऊपर से गिराती है और कभी कहीं अटका देती है।”
घर लौटकर बाबूजी ने फैसला किया कि अगली बार यात्रा सोच-समझकर करेंगे, ताकि आसमान से गिरने और खजूर में अटकने दोनों से बच सकें।
मोहल्ले वाले कहते हैं कि बाबूजी की कहानी जीवन का मजेदार सबक है—जल्दी में लिया फैसला कभी-कभी खजूर के पेड़ तक पहुँचा देता है।