मोहल्ले में मेरे पड़ोसी श्रीवास्तव जी बहुत ही अनोखे किस्म के इंसान थे। उनकी सबसे बड़ी खासियत थी कि वे किसी न किसी तरह मेरी नाक में दम करने का तरीका खोज ही लेते थे। मोहल्ले वाले मजाक में कहते थे कि अगर परेशान करने की प्रतियोगिता होती तो श्रीवास्तव जी गोल्ड मेडल जीत लेते।
सुबह-सुबह उनका पहला काम होता था मेरे घर के बाहर खड़े होकर मौसम पर चर्चा करना। वे कहते, “आज गर्मी ज्यादा है।” मैं सोचता, यह बात मैं खिड़की से देखकर भी समझ सकता हूँ।
एक दिन मैं आराम से चाय पी रहा था तभी उन्होंने दरवाजा खटखटाया। मैंने दरवाजा खोला तो बोले, “भाई साहब, आपके घर की घड़ी पाँच मिनट आगे चल रही है।” मैंने कहा, “तो क्या करूँ?” वे बोले, “समय ठीक कर लीजिए, वरना आप जल्दी ऑफिस पहुँच जाएंगे।”
मैंने सिर पकड़ लिया।
उनकी एक और आदत थी—बिना वजह सलाह देना। अगर मैं झाड़ू लगाता तो कहते, “झाड़ू ऐसे नहीं लगाते।” अगर टीवी देखता तो कहते, “इतना टीवी आँखों के लिए अच्छा नहीं।”
एक दिन मैंने फैसला किया कि आज उनसे बचकर रहूँगा। मैं चुपचाप घर के अंदर बैठ गया। लेकिन तभी दरवाजे के बाहर से आवाज आई, “भाई साहब, आज बाहर मत निकलना, धूप तेज है।”
मैं समझ गया कि मेरी नाक में दम करने वाली सेवा आज भी जारी है।
शाम को मैं पार्क में गया तो श्रीवास्तव जी भी वहाँ पहुँच गए। बोले, “आज मैंने 5000 कदम चलने का लक्ष्य रखा है।” फिर बोले, “आप भी चलिए, साथ चलने से सेहत अच्छी रहती है।”
मैंने मन ही मन सोचा कि पड़ोसी से बचने का कोई उपाय नहीं है।
हालाँकि सच यह भी था कि श्रीवास्तव जी दिल के बुरे नहीं थे, बस उनकी मदद करने की आदत थोड़ी ज्यादा थी।
मोहल्ले वाले कहते हैं कि ऐसा पड़ोसी किस्मत वालों को ही मिलता है—जो परेशान भी करे और परवाह भी करे।
और मैं आज भी सोचता हूँ कि मेरी नाक में दम करने वाला पड़ोसी शायद मेरी जिंदगी का अनोखा दोस्त है।