गाँव में श्यामू काका बड़े मशहूर थे, लेकिन किसी अच्छे काम के लिए नहीं, बल्कि अचानक गायब होने की अपनी अद्भुत कला के लिए। मोहल्ले वाले मजाक में कहते थे कि श्यामू काका ने “नौ दो ग्यारह होने की पीएचडी” कर रखी है।
जब भी किसी काम का नाम आता, श्यामू काका सबसे पहले कहते, “मैं अभी आता हूँ।” और फिर ऐसा आते कि किसी को पता ही नहीं चलता कि वे गए कहाँ।
एक दिन गाँव में सफाई अभियान चल रहा था। सरपंच जी ने कहा, “आज सब लोग झाड़ू लगाएंगे।” जैसे ही श्यामू काका ने झाड़ू उठाई, उन्होंने धीरे से कहा, “मुझे याद आया, घर में जरूरी काम है।” और देखते ही देखते हवा हो गए।
पड़ोसी ने पूछा, “काका कहाँ गए?”
सरपंच बोले, “नौ दो ग्यारह हो गए।”
अगले दिन गाँव में बैठक थी। श्यामू काका पहले ही कुर्सी पर बैठे थे। लेकिन जैसे ही सरपंच ने कहा, “आज चंदा देना होगा”, काका बोले, “मुझे जरूरी फोन करना है।” और कुर्सी खाली छोड़कर गायब।
लोग समझ गए कि काका का फोन हमेशा उस समय जरूरी होता है जब पैसे देने की बात आती है।
एक बार गाँव में मेले का आयोजन हुआ। सब लोग झूला झूल रहे थे। श्यामू काका भी झूले पर बैठे थे। अचानक झूला रुका और टिकट वाला पैसे माँगने लगा।
श्यामू काका बोले, “भाई, अभी लौटकर आता हूँ।”
और झूले से उतरकर ऐसे गायब हुए जैसे हवा में घुल गए हों।
मेला खत्म होने के बाद लोगों ने पूछा, “काका कहाँ थे?”
किसी ने कहा, “काका तो नौ दो ग्यारह होने की ट्रेनिंग ले रहे होंगे।”
लेकिन सच यह था कि श्यामू काका बुरे नहीं थे, बस उन्हें जिम्मेदारी से थोड़ा डर लगता था।
मोहल्ले वाले कहते हैं कि नौ दो ग्यारह होने की कला हर किसी के पास नहीं होती। इसके लिए तेज कदम, हल्की मुस्कान और सही समय पर गायब होने की समझ जरूरी होती है।
और श्यामू काका गर्व से कहते थे, “जहाँ काम भारी हो, वहाँ नौ दो ग्यारह होना ही सबसे बड़ी समझदारी है।”