मोहल्ले में मिश्रा जी का परिवार बहुत मशहूर था। उनकी सबसे बड़ी समस्या थी कि घर की बातें बाहर कैसे निकल जाती थीं, क्योंकि घर में एक ऐसे सदस्य थे जिन्हें मोहल्ले वाले मजाक में “घर का भेदी” कहते थे।
यह भेदी कोई और नहीं, बल्कि मिश्रा जी का छोटा बेटा पप्पू था। पप्पू का स्वभाव था कि जो बात उसे बताई जाए, वह अगले पाँच मिनट में पूरे मोहल्ले को बता देता था।
एक दिन मिश्रा जी ने घर में योजना बनाई कि इस बार गर्मियों की छुट्टियों में सब लोग घूमने जाएंगे। उन्होंने कहा, “इस बात को किसी को मत बताना।”
पप्पू ने सिर हिलाया और कहा, “बिल्कुल नहीं बताऊँगा।”
लेकिन जैसे ही पप्पू बाहर गया, पड़ोसी के बच्चों से बोला, “हम लोग इस बार ‘लंका’ घूमने जा रहे हैं।”
यह सुनकर मोहल्ले में चर्चा शुरू हो गई। किसी ने कहा, “मिश्रा जी इतने अमीर कब हो गए कि विदेश घूमने जा रहे हैं?”
अगले दिन मिश्रा जी को पता चला कि उनकी छुट्टी की योजना मोहल्ले में फैल चुकी है। उन्होंने पप्पू को बुलाकर पूछा, “तूने बताया?”
पप्पू ने मासूम चेहरा बनाकर कहा, “मैंने सिर्फ लंका का नाम बताया, बाकी उन्होंने खुद अनुमान लगा लिया।”
मिश्रा जी ने सिर पकड़ लिया और बोले, “तू सच में घर का भेदी है।”
छुट्टी वाले दिन जब मिश्रा परिवार स्टेशन पहुँचा तो पप्पू ने पूछा, “पापा, लंका किस दिशा में है?”
मिश्रा जी बोले, “हम लंका नहीं, लखनऊ जा रहे हैं।”
पप्पू चौंक गया और बोला, “तो मोहल्ले वालों को क्या बताऊँ?”
मिश्रा जी मुस्कुराकर बोले, “अब किसी को कुछ मत बताना, वरना इस बार सच में घर की छुट्टी हो जाएगी।”
यात्रा के बाद मिश्रा जी ने फैसला किया कि घर की योजनाएँ अब सिर्फ कानों-कान ही रहेंगी।
मोहल्ले वाले कहते हैं कि घर का भेदी बड़ा खतरनाक होता है, क्योंकि वह जानबूझकर नहीं, बल्कि प्यार से राज खोल देता है। और पप्पू आज भी सोचता है कि लंका और लखनऊ में बस एक अक्षर का फर्क क्यों है।