मोहल्ले में काली नाम की बिल्ली बहुत मशहूर थी। उसकी सबसे बड़ी पहचान थी कि वह हमेशा खिसियाई हुई सी रहती थी। मोहल्ले के बच्चे उसे देखकर हँसते और कहते, “देखो, खिसियानी बिल्ली फिर से आ गई।”
काली बिल्ली को यह बिल्कुल पसंद नहीं था। वह सोचती थी कि आखिर लोग उसे देखकर मजाक क्यों करते हैं। एक दिन उसने मन ही मन तय किया कि अब वह अपना बदला लेकर रहेगी।
पहले उसने सोचा कि बच्चों को डराएगी। शाम के समय जब बच्चे पार्क में खेल रहे थे, काली बिल्ली चुपके से झाड़ी के पीछे छिप गई और अचानक “म्याऊँ” की तेज आवाज निकाली। बच्चे डरकर भागे, लेकिन अगले ही पल उन्हें समझ आ गया कि यह काली बिल्ली की शरारत है। बच्चे बोले, “खिसियानी बिल्ली डराने आई थी।”
यह सुनकर काली बिल्ली और ज्यादा खिसिया गई।
अगले दिन उसने फैसला किया कि वह मोहल्ले की मुर्गियों को परेशान करेगी। वह धीरे-धीरे मुर्गीखाने के पास गई, लेकिन जैसे ही मुर्गियों ने उसे देखा, उन्होंने शोर मचाना शुरू कर दिया। काली बिल्ली को कुछ समझ नहीं आया और वह बिना कुछ किए ही भाग गई।
अब काली बिल्ली ने नया प्लान बनाया। उसने सोचा कि वह मोहल्ले के कुत्ते को सबक सिखाएगी क्योंकि वही सबसे ज्यादा भौंकता था। वह कुत्ते के पास जाकर ऐसे बैठ गई जैसे बहुत बड़ी नेता हो। कुत्ता पहले तो हैरान हुआ, फिर बोला, “आज तुम्हें क्या हो गया?”
काली बिल्ली बोली, “मैं बदला लेने आई हूँ।”
कुत्ता हँसने लगा और बोला, “बदला लेना है तो पहले मुस्कुराना सीखो।”
यह सुनकर काली बिल्ली का गुस्सा धीरे-धीरे कम होने लगा। उसे समझ आया कि मजाक का जवाब गुस्से से नहीं, समझदारी से देना चाहिए।
अगले दिन काली बिल्ली फिर पार्क में गई, लेकिन इस बार बच्चों के सामने खिसियाने की बजाय चुपचाप बैठ गई।
मोहल्ले वाले कहते हैं कि उस दिन खिसियानी बिल्ली ने बदला नहीं लिया, बल्कि दोस्ती का नया रास्ता चुन लिया।
और बच्चे भी समझ गए कि हर खिसियाई हुई बिल्ली बदला लेने नहीं आती।