रामलाल जी के घर में हमेशा रिश्तेदारों का आना-जाना लगा रहता था। लेकिन इस बार मामला थोड़ा अलग था। रामलाल जी की भतीजी की शादी तय हो गई थी और मोहल्ले में चर्चा थी कि शादी में मिठाई का खास इंतजाम होगा।
रामलाल जी ने बाजार से एक बड़ा सा अनार खरीदा और सोचने लगे कि इसे घर के बच्चों के लिए काट देंगे। जैसे ही वे अनार लेकर घर पहुँचे, पड़ोस की चाची ने देख लिया और तुरंत खबर फैल गई—“रामलाल जी एक अनार लेकर आए हैं।”
बस फिर क्या था… रिश्तेदारों का आना शुरू हो गया।
पहले ताऊ जी आए और बोले, “भाई, डॉक्टर ने कहा है कि मुझे फल खाने चाहिए।”
रामलाल जी ने मुस्कुराकर कहा, “जरूर, अनार स्वास्थ्य के लिए अच्छा है।”
फिर मामी जी आईं और बोलीं, “मेरे घुटनों में दर्द है, कहते हैं अनार खाने से कमजोरी दूर होती है।”
धीरे-धीरे रिश्तेदारों की लाइन लग गई। किसी को खून की कमी थी, किसी को याददाश्त की, किसी को त्वचा की चमक चाहिए थी, और सबको अचानक अनार की जरूरत महसूस होने लगी।
रामलाल जी परेशान होकर सोचने लगे कि एक अनार और सौ बीमार रिश्तेदार कैसे संभालेंगे।
आखिर उन्होंने अनार काटने का फैसला किया। लेकिन जैसे ही चाकू उठाया, पीछे से आवाज आई, “पहले मुझे दो!”
रामलाल जी चौंके, “क्यों?”
रिश्तेदार बोले, “मैं सबसे ज्यादा बीमार हूँ।”
अनार के टुकड़े इतने छोटे-छोटे बाँटे गए कि हर रिश्तेदार के हिस्से में बस एक-एक दाना आया।
बच्चे यह देखकर हँसने लगे और बोले, “यह तो वैज्ञानिक वितरण है।”
शाम को जब सभी रिश्तेदार चले गए तो रामलाल जी ने राहत की साँस ली और पत्नी से कहा, “अब समझ आया—एक अनार और सौ बीमार रिश्तेदार वाली कहावत यूँ ही नहीं बनी।”
मोहल्ले वाले कहते हैं कि उस दिन अनार तो खत्म हो गया, लेकिन रिश्तेदारों की सेहत की चर्चा अभी भी चल रही है।