शर्मा परिवार में छोटा बेटा चिंटू सबका लाडला था। दादी उसे “आँखों का तारा” कहती थीं, तो पापा प्यार से “मेरी शान” बुलाते थे। लेकिन स्कूल के मास्टर जी उसे एक अलग ही नाम से जानते थे—“शैतानी सितारा”।
घर में चिंटू मासूम बनकर घूमता। मम्मी कहतीं, “मेरा बेटा तो कभी गलत काम कर ही नहीं सकता।” और उसी समय चिंटू चुपके से फ्रिज से चॉकलेट निकालकर गायब हो जाता।
एक दिन स्कूल से शिकायत आई कि चिंटू ने क्लास में कुर्सी के नीचे गुब्बारा रख दिया था। जैसे ही मास्टर जी बैठे, “फटाक!” की आवाज हुई। पूरी क्लास हँस पड़ी। मास्टर जी ने गंभीर होकर पूछा, “यह किसने किया?” चिंटू मासूम चेहरा बनाकर बोला, “सर, शायद कुर्सी खुद खुश हो गई थी।”
घर पर पापा ने डांटते हुए कहा, “तुम हमारी आँखों का तारा हो, ये शरारतें क्यों?” चिंटू बोला, “तारा हूँ तो थोड़ा चमकूंगा भी।”
दादी ने हँसते हुए उसका पक्ष लिया, “बच्चे शरारत नहीं करेंगे तो बूढ़े करेंगे क्या?” पापा चुप हो गए।
अगले हफ्ते मोहल्ले में पतंगबाजी का कार्यक्रम था। चिंटू ने सबको भरोसा दिलाया कि वह कोई शरारत नहीं करेगा।
लेकिन जैसे ही प्रतियोगिता शुरू हुई, उसने अपनी पतंग में छोटी सी घंटी बांध दी। हवा चलती तो “टुन-टुन” की आवाज आती और बाकी बच्चों का ध्यान भटक जाता।
जब उसकी पतंग जीत गई तो सब बोले, “यह तो चीटिंग है!” चिंटू बोला, “नहीं, यह रचनात्मक सोच है।”
धीरे-धीरे सब समझ गए कि चिंटू सच में आँखों का तारा है, लेकिन उसकी चमक थोड़ी शैतानी वाली है।
एक दिन पापा ने उसे समझाया, “शैतानी करना बुरा नहीं, लेकिन किसी को चोट न पहुँचे, यह जरूरी है।” चिंटू ने सिर हिलाया और बोला, “अब से मेरी शरारतें भी लिमिटेड एडिशन होंगी।”
मोहल्ले वाले आज भी कहते हैं कि चिंटू जैसा बच्चा हर घर में होना चाहिए—जो आँखों का तारा भी हो और हल्की-फुल्की शैतानी से जिंदगी में हँसी भी भर दे।