मोहन जी बहुत दिनों से लॉटरी टिकट खरीद रहे थे। उनका सपना था कि एक दिन अचानक किस्मत चमके और वह करोड़पति बन जाएँ। मोहल्ले वाले मजाक में कहते थे कि मोहन जी पहले लॉटरी खरीदते हैं, फिर सपने देखते हैं।
एक दिन मोहन जी ने खास उत्साह में आकर एक लॉटरी टिकट खरीदा। उन्होंने टिकट को जेब में ऐसे रखा जैसे कोई अनमोल खजाना हो। घर पहुँचकर उन्होंने टिकट को अलमारी में छिपा दिया और पत्नी से कहा, “यह मेरी जिंदगी की सबसे कीमती चीज है।”
पत्नी ने पूछा, “क्या है इसमें?”
मोहन जी बोले, “किस्मत बंद है, खुलने का इंतजार है।”
रात को मोहन जी बार-बार उठकर अलमारी देखते रहे कि टिकट सुरक्षित है या नहीं। उन्हें डर था कि कहीं सपनों की गाड़ी स्टेशन छोड़कर न चली जाए।
अगले दिन सुबह उन्हें याद आया कि लॉटरी का रिजल्ट आज आना है। उन्होंने टीवी चालू किया और नंबर मिलाने लगे। जैसे-जैसे नंबर मिलते गए, मोहन जी का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
अचानक आखिरी नंबर भी मैच हो गया। मोहन जी खुशी से उछल पड़े, “मैं करोड़पति बन गया!”
उन्होंने पत्नी को आवाज लगाई, “जल्दी आओ, हमारी किस्मत बदल गई!”
पत्नी दौड़कर आईं और पूछा, “क्या हुआ?”
मोहन जी बोले, “लॉटरी लग गई!”
दोनों खुशी से नाचने लगे। मोहन जी ने तुरंत टिकट निकालने के लिए अलमारी खोली, लेकिन वहाँ टिकट नहीं था।
मोहन जी की आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्होंने पूरे घर में खोज शुरू कर दी। सोफे के नीचे, बिस्तर के अंदर, यहाँ तक कि फ्रिज के पीछे भी देखा।
तभी पत्नी ने धीरे से कहा, “कल सफाई करते समय मैंने एक पुराना कागज समझकर उसे फेंक दिया था।”
मोहन जी के पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्हें समझ आ गया कि किस्मत हाथ से निकल गई थी।
शाम को मोहन जी चुपचाप बैठे सोच रहे थे कि कभी-कभी सपने सच होने से पहले ही उड़ जाते हैं।
मोहल्ले वाले कहते हैं कि मोहन जी की लॉटरी हाथ से निकल गई, लेकिन उन्होंने जिंदगी का एक सबक जरूर सीख लिया—किस्मत के साथ-साथ अलमारी भी संभालकर रखनी चाहिए।