रामभरोसे जी ने एक दिन अचानक घोषणा कर दी कि अब वे भी अमीर बनकर दिखाएँगे। वर्षों तक सरकारी दफ्तर में कुर्सी गरमाने के बाद उन्हें लगा कि दुनिया मेहनत से चलती है, इसलिए उन्होंने ठान लिया कि वे “खून पसीना एक” कर देंगे। परिवार को समझ नहीं आया कि यह जोश चाय का असर है या किसी प्रेरणादायक वीडियो का।
सबसे पहले उन्होंने सुबह पाँच बजे उठना शुरू किया। अलार्म बजते ही वे ऐसे कूदते जैसे ओलंपिक की तैयारी हो। आधे घंटे योग, फिर दौड़। दौड़ते-दौड़ते पाँच मिनट में ही उन्हें याद आ जाता कि उम्र और उत्साह का तालमेल भी ज़रूरी होता है। घर लौटते तो पसीना बह रहा होता और वे गर्व से कहते, “देखो, मेहनत शुरू!” पत्नी मुस्कुराकर तौलिया पकड़ा देतीं।
इसके बाद उन्होंने छत पर सब्ज़ी उगाने की योजना बनाई। बीज खरीदे, गमले सजाए, यूट्यूब देखकर खेती का ज्ञान लिया। पहले हफ्ते पौधों को इतना पानी दिया कि वे तैरने लगे। दूसरे हफ्ते भूल गए, तो पौधे सूखने लगे। फिर बोले, “किसान होना आसान नहीं, सच में खून पसीना एक करना पड़ता है।”
हार न मानते हुए उन्होंने ऑनलाइन व्यापार शुरू किया। रात भर वेबसाइट बनाते रहे। सुबह पता चला कि पासवर्ड खुद ही भूल गए हैं। बैंक से फोन आया कि तीन बार गलत लॉगिन हुआ है। रामभरोसे जी ने गंभीर स्वर में कहा, “सफलता इतनी आसानी से नहीं मिलती।”
तीन महीने बाद न वे करोड़पति बने, न किसान, न उद्योगपति। लेकिन एक बदलाव ज़रूर आया। अब वे सच में मेहनत की कदर करने लगे थे। दफ्तर के चपरासी से लेकर सब्ज़ी वाले तक सबको नए सम्मान से देखते।
एक शाम थके हुए सोफे पर बैठे बोले, “अमीर बनूँ या न बनूँ, मेहनत की इज़्ज़त समझ आ गई।” पत्नी हँसकर बोलीं, “अच्छा है, कम से कम पसीना तो असली बहा।”
रामभरोसे जी आज भी कोशिश में लगे हैं। फर्क बस इतना है कि अब वे खून-पसीना एक करने से पहले डॉक्टर से सलाह ले लेते हैं।