मोहल्ले में चाचा रमेश बहुत ही चालाक किस्म के आदमी माने जाते थे। लोग मजाक में कहते थे कि चाचा अगर घर बैठे भी कोई फायदा उठा सकते हैं तो मौका नहीं छोड़ते। चाचा खुद को “सुविधा विशेषज्ञ” कहते थे।
एक दिन मोहल्ले में चर्चा थी कि शहर से गंगा स्नान के लिए बस जा रही है। सब लोग उत्साह में तैयारी कर रहे थे। पड़ोसी ने चाचा से कहा, “चाचा, आप भी चलो गंगा नहाने, बड़ा पुण्य मिलेगा।”
चाचा ने मुस्कुराकर कहा, “पुण्य करना अच्छी बात है, लेकिन ठंडे पानी में खड़े होकर पुण्य कमाना मेरी सेहत के खिलाफ है।”
यह सुनकर पड़ोसी हँस दिया।
अगले दिन चाचा के घर एक साधु बाबा आए और बोले, “अगर गंगा स्नान नहीं कर सकते तो मन से गंगा का ध्यान कर लो।” यह बात चाचा के दिमाग में बैठ गई।
चाचा ने एक नया तरीका निकाल लिया। उन्होंने घर के आँगन में बाल्टी भर पानी रखा, पास में एक छोटा सा स्पीकर लगाया और उसमें गंगा आरती का ऑडियो चला दिया।
फिर चाचा आँख बंद करके बाल्टी के पास बैठ गए और बोले, “आज मैं घर बैठे गंगा नहाऊँगा।”
पत्नी ने दूर से देखकर कहा, “चाचा जी, यह क्या नया प्रयोग है?”
चाचा बोले, “आधुनिक युग में सुविधा भी धर्म का हिस्सा है।”
फिर चाचा ने बाल्टी के पानी में दो बूंद गुलाब जल डाला और बोले, “अब यह पवित्र जल हो गया।”
पड़ोस का बच्चा यह देखकर बोला, “चाचा, अगर इतना आसान होता तो सब घर में ही गंगा नहा लेते।”
चाचा मुस्कुराए और बोले, “ज्ञान और श्रद्धा दिल से होती है, जगह से नहीं।”
शाम को चाचा बड़े खुश थे क्योंकि उन्हें लगा कि उन्होंने समय भी बचाया और धर्म भी निभा लिया।
मोहल्ले वाले कहते हैं कि चाचा सच में “घर बैठे गंगा नहाने” की कला के विशेषज्ञ हैं। और चाचा भी गर्व से कहते हैं, “जहाँ इच्छा हो, वहीं गंगा बहती है।”