गाँव में मोहन और गीता की प्रेम कहानी बहुत मशहूर थी। दोनों बचपन से साथ पढ़े थे और बड़े होते-होते उनकी दोस्ती धीरे-धीरे प्यार में बदल गई। लेकिन मोहन जी का सपना था कि शादी भी “चट मंगनी पट ब्याह” स्टाइल में हो जाए।
मोहन हमेशा गीता से कहता, “मुझे ज्यादा इंतजार पसंद नहीं है, शादी होनी चाहिए तो बस हो जाए।” गीता हँसकर कहती, “शादी कोई चाय नहीं है जो तुरंत बन जाए।”
एक दिन मोहन ने हिम्मत करके अपने घर बात की। माँ ने पूछा, “लड़की वालों से बात हुई?”
मोहन बोला, “अभी नहीं, लेकिन जल्दी हो जाएगी।”
मोहन सीधे गीता के घर पहुँच गया और उसके पिता से बोला, “मुझे आपकी बेटी पसंद है, मैं शादी करना चाहता हूँ।” गीता के पिता थोड़ा हैरान हुए, लेकिन मोहन की सीधी बात उन्हें पसंद आ गई।
उन्होंने कहा, “इतनी जल्दी शादी?”
मोहन बोला, “जी हाँ, अगर प्यार सच्चा है तो इंतजार क्यों?”
गीता भी आकर बोली, “पापा, मोहन सही कह रहा है।”
बस क्या था… घर में हल्की हलचल शुरू हो गई। शादी की तारीख पूछी गई तो मोहन ने कहा, “अगले हफ्ते कर लेते हैं।” यह सुनकर गीता की माँ चाय का कप हाथ में लिए वहीं खड़ी रह गईं।
अंत में तय हुआ कि शादी जल्दी होगी, लेकिन कुछ रस्में निभानी होंगी।
शादी की तैयारी बहुत तेज हुई। मोहल्ले वाले कहने लगे कि यह सच में चट मंगनी पट ब्याह हो रहा है। किसी ने कहा, “इतनी जल्दी शादी देखकर तो समय भी हैरान होगा।”
शादी वाले दिन मोहन बहुत खुश था, लेकिन गीता थोड़ी घबराई हुई थी। मोहन ने कहा, “डर मत, शादी प्यार की मंजिल है।”
जयमाला के समय मोहन ने धीरे से कहा, “देखो, मैंने इंतजार कम किया लेकिन प्यार ज्यादा किया।”
शादी हो गई और दोनों हँसते हुए घर पहुँचे। मोहन ने कहा, “देखा, चट मंगनी पट ब्याह भी हो गया।”
मोहल्ले वाले कहते हैं कि कभी-कभी प्यार में ज्यादा सोचने से अच्छा है कि समय देखकर फैसला कर लिया जाए। और मोहन-गीता की प्रेम कहानी उसी का मजेदार उदाहरण बन गई।