गाँव में रामू काका के बेटे की शादी थी। पूरे मोहल्ले में चर्चा थी कि बारात बड़े धूमधाम से निकलेगी। रामू काका ने खास तौर पर फैसला किया था कि इस बार बारात में बैंड ऐसा बजेगा कि सुनने वाले झूम उठें।
शादी वाले दिन सुबह से ही घर में हलचल थी। दूल्हा तैयार बैठा था, लेकिन उसका चेहरा ऐसा था जैसे किसी ने उससे पूछा हो कि आज परीक्षा भी देनी है और शादी भी करनी है। दोस्त बार-बार कहते, “भाई, मुस्कुरा ले, बारात निकलने वाली है।”
शाम होते ही बैंड वालों की एंट्री हुई। ढोल वाला इतना उत्साहित था कि पहले ही ढोल पीटने लगा। रामू काका बोले, “अभी बारात नहीं निकली।” ढोल वाला बोला, “भाई साहब, प्रैक्टिस कर रहा हूँ।”
फिर बारात निकली तो बैंड बजने लगा – जोर-जोर से, टेढ़ा-मेढ़ा, कभी धीमा, कभी तेज। मोहल्ले के बच्चे पीछे-पीछे नाचने लगे जैसे यह किसी त्योहार की रैली हो।
बारात जैसे ही मुख्य सड़क पर पहुँची, बैंड वाले ने अचानक देशभक्ति गीत शुरू कर दिया। दूल्हे के दोस्त चौंक गए क्योंकि वे फिल्मी गाना सुनकर नाच रहे थे, लेकिन अचानक माहौल बदल गया।
एक चाचा बोले, “बैंड तो अच्छा है, पर दूल्हा ज्यादा गंभीर लग रहा है।”
दूल्हे के दोस्त ने कहा, “भाई, यह शादी का तनाव है।”
रास्ते में एक जगह बैंड रुक गया क्योंकि ढोल वाला बोला, “पहले चाय मिलेगी तब बजाऊँगा।” रामू काका ने तुरंत चाय मंगवाई क्योंकि बारात का रुकना शुभ नहीं माना जाता।
फिर बारात दुल्हन के घर पहुँची। बैंड फिर जोर-जोर से बजा। लोग नाचते रहे, बच्चे तालियाँ बजाते रहे और दूल्हा मन ही मन सोचता रहा कि शादी से ज्यादा शोर तो बारात का है।
जयमाला के समय बैंड वाले ने इतना तेज संगीत बजाया कि दूल्हा घबराकर पीछे हट गया। किसी ने कहा, “लगता है बैंड ही दूल्हे का दिल धड़काने का काम कर रहा है।”
शादी खत्म हुई और लोग बोले, “आज बैंड सच में बारात का बैंड बजा गया।”
और रामू काका मुस्कुराकर बोले, “शादी में बैंड जरूरी है, वरना बारात का मजा पूरा नहीं होता।”