गाँव के स्कूल में बच्चों की शरारतें मशहूर थीं। मास्टर जी कहते थे कि अगर बच्चों को पाँच मिनट अकेला छोड़ दिया जाए तो वे किसी नई शरारत की खोज कर लेते हैं। उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ।
मास्टर जी क्लास से बाहर क्या गए, बच्चों ने मौज-मस्ती शुरू कर दी। पिंटू ने कहा, “आज कुछ बड़ा करते हैं, छोटा खेल रोज खेलते हैं।” गोलू बोला, “हाँ, आज ऐसा काम करेंगे कि मास्टर जी भी हैरान रह जाएँ।”
फिर बच्चों ने मिलकर सोचा कि क्लास की छत को ही “आसमान” बना दिया जाए। उन्होंने टेबल और बेंच खिसकाकर छत की तरफ हाथ उठाकर कहा, “लो, हमने आसमान सिर पर उठा लिया।”
पिंटू बोला, “अब हम आसमान को पकड़कर रखेंगे ताकि बारिश छुट्टी लेकर आए।”
इतने में मास्टर जी वापस आ गए। क्लास का हाल देखकर उनकी आँखें बड़ी हो गईं। बच्चे बेंचों पर खड़े होकर छत को देखने का नाटक कर रहे थे जैसे सच में आसमान सिर पर उठा रखा हो।
मास्टर जी ने पूछा, “यह क्या चल रहा है?”
गोलू बोला, “सर, हम विज्ञान सीख रहे हैं। हमने पता लगाया है कि आसमान बहुत ऊपर है इसलिए उसे सिर पर उठाना मुश्किल है।”
मास्टर जी मुस्कुराए और बोले, “अगर आसमान सिर पर उठाओगे तो पढ़ाई कहाँ रखोगे?”
बच्चे चुप हो गए।
मास्टर जी ने समझाया, “आसमान सिर पर उठाने का मतलब है बड़े सपने देखना, न कि छत को हिलाने की कोशिश करना।”
पिंटू ने मासूमियत से पूछा, “सर, सपने भी क्लास में बैठते हैं क्या?”
मास्टर जी बोले, “हाँ, अगर मेहनत करोगे तो सपने खुद तुम्हारे पास आएँगे।”
उस दिन बच्चों ने समझ लिया कि शरारत करना अच्छा है, लेकिन पढ़ाई से दोस्ती करना उससे भी अच्छा है।
छुट्टी के समय बच्चे हँसते हुए बाहर निकले और पिंटू बोला, “आज हमने सच में आसमान सिर पर उठा लिया… बस मास्टर जी ने पकड़ लिया।”
और मोहल्ले वाले कहते हैं कि उस दिन बच्चों ने शरारत के साथ ज्ञान का आसमान भी थोड़ा ऊपर कर लिया।