रमेश जी बड़े शौकीन आदमी थे। शादी-ब्याह में जाना उन्हें बहुत पसंद था क्योंकि वहाँ खाने-पीने का अच्छा इंतजाम होता था। लेकिन इस बार शादी में जो हुआ, उसने उनकी जिंदगी का नजरिया ही बदल दिया।
शहर के बड़े होटल में शादी थी। रमेश जी चमकदार कुर्ता पहनकर पहुँचे और सीधे खाने के पंडाल की तरफ चले गए। जैसे ही लाइन में खड़े हुए, सामने बड़े-बड़े बर्तनों में खाना देखकर उनके चेहरे पर खुशी चमक उठी।
सबसे पहले उन्होंने रोटी ली। जैसे ही रोटी हाथ में आई, उन्होंने सोचा, “आज तो मजा आ जाएगा।” लेकिन पास खड़े बुजुर्ग ने कहा, “भाई साहब, शादी का खाना खाकर ही असली आटे का भाव समझ आता है।”
रमेश जी ने मुस्कुराकर पूछा, “कैसे?”
बुजुर्ग बोले, “घर में रोटी बर्बाद होती है, लेकिन यहाँ एक रोटी के लिए पाँच मिनट लाइन में खड़े होना पड़ता है।”
फिर रमेश जी दाल लेने गए। दाल की कढ़ाही देखकर उन्हें लगा जैसे सोने का खजाना मिल गया हो। उन्होंने प्लेट में दाल डाली और चखकर कहा, “वाह, शादी की दाल तो घर की दाल से ज्यादा स्वादिष्ट होती है।”
तभी पीछे से किसी ने कहा, “लेकिन यहाँ दाल का स्वाद ही नहीं, बल्कि आटे दाल का भाव भी पता चलता है।”
रमेश जी ने पूछा, “वह कैसे?”
आदमी बोला, “घर में पत्नी कहती हैं कि दाल में पानी ज्यादा डाल दिया, और यहाँ दाल खत्म होने से पहले लाइन खत्म होने की चिंता रहती है।”
अगले काउंटर पर सब्जी थी। रमेश जी ने थोड़ा सा आलू लिया और सोचा कि अगर घर में भी इतना ही लें तो महीने का बजट बच सकता है।
खाना खाते-खाते रमेश जी को एहसास हुआ कि शादी में पेट नहीं, बल्कि जीवन का हिसाब-किताब भी चलता है। मिठाई खाते समय उन्होंने कहा, “सच में, आज आटे दाल का असली भाव समझ में आ गया।”
घर लौटकर पत्नी ने पूछा, “खाना कैसा था?”
रमेश जी बोले, “बहुत अच्छा… बस एक बात समझ आई कि शादी में पेट भरता है, लेकिन जिंदगी का हिसाब भी लग जाता है।”