गाँव की क्रिकेट टीम का नाम था “तूफान इलेवन”, लेकिन खेल देखकर लगता था कि तूफान तो दूर, हल्की हवा भी उनके पास से गुजर जाए तो गेंद उड़ जाए। टीम के कप्तान मोहन जी बड़े जोश से कहते थे कि इस बार ट्रॉफी जरूर आएगी, चाहे कुछ भी हो जाए।
मैच शुरू हुआ तो सामने शहर की मजबूत टीम थी। पहली ही गेंद पर मोहन जी के ओपनर बल्लेबाज बल्ला ऐसे घुमाने लगे जैसे मक्खी उड़ाने की कोशिश कर रहे हों। गेंद बल्ले को छूकर सीधे विकेट के पीछे चली गई। अंपायर ने उंगली उठाई तो बल्लेबाज ने कहा, “यह आउट नहीं, अभ्यास शॉट था।”
दूसरे बल्लेबाज मैदान पर आए और पहली गेंद देखकर इतने घबरा गए कि उन्होंने बिना शॉट खेले ही दौड़ना शुरू कर दिया। विकेट के बीच में पहुँचकर याद आया कि अभी गेंद खेली ही नहीं गई है। वह शर्म से वापस लौट आए।
फील्डिंग करते समय भी टीम का हाल बुरा था। एक खिलाड़ी कैच पकड़ने के लिए कूदे, लेकिन गेंद उनके हाथ से ऐसे बच निकली जैसे साबुन लगी मछली हो। कप्तान मोहन जी चिल्लाए, “ध्यान से! गेंद दुश्मन नहीं, मेहमान है।”
दूसरी टीम के बल्लेबाज ने छक्का मारा तो गेंद सीधे पास के खेत में जा गिरी। गेंद ढूँढने के लिए टीम के चार खिलाड़ी गए और लौटकर बोले, “गेंद तो नहीं मिली, लेकिन खेत के मालिक ने चाय जरूर पिला दी।”
मैच आगे बढ़ा तो “तूफान इलेवन” की हालत पतली होने लगी। रन बनाना तो दूर, खिलाड़ी खड़े रहने में भी मुश्किल महसूस करने लगे। स्कोर बोर्ड देखकर कप्तान मोहन जी ने लंबी सांस ली और बोले, “लगता है आज घुटने टेकने का समय आ गया है।”
आखिरी ओवर में पूरी टीम ने मिलकर बस एक ही रन बनाया और मैच हार गई। मैदान से बाहर आते हुए मोहन जी बोले, “हारना भी एक कला है।”
मोहल्ले वाले कहते हैं कि उस दिन क्रिकेट टीम ने सच में घुटने टेक दिए थे, लेकिन खेल भावना को सलाम करना नहीं भूले।